काव्य हेतु — संस्कृत आचार्यों के मत

आचार्य

ग्रंथ

प्रमुख काव्य हेतु

भामह

काव्यालंकार

केवल प्रतिभा

दण्डी

काव्यादर्श

प्रतिभा, अभ्यास, लोकव्यवहार (श्रुत व यत्न)

वामन

काव्यालंकारसूत्रवृत्ति

लोक, विद्या, प्रकीर्ण (व्युत्पत्ति प्रमुख)

रुद्रट

काव्यालंकार

प्रतिभा (सहजा व उत्पाद्या), व्युत्पत्ति, अभ्यास

राजशेखर

काव्यमीमांसा

प्रतिभा (कारयित्री व भावयित्री), व्युत्पत्ति

मम्मट

काव्यप्रकाश

शक्ति (प्रतिभा), लोकशास्त्र-अवेक्षण, अभ्यास

केशव मिश्र

अलंकारशेखर

प्रतिभा (कारण), व्युत्पत्ति (विभूषण)

हेमचंद्र

काव्यानुशासन

प्रतिभा (नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा)

पंडितराज जगन्नाथ

रसगंगाधर

केवल प्रतिभा

काव्यशास्त्र में यह एक मूलभूत प्रश्न रहा है कि कवि अपनी रचना के माध्यम से पाठक में वही अनुभूति कैसे जगा पाता है जो उसने स्वयं अनुभव की। इसी प्रश्न के उत्तर में विभिन्न संस्कृत आचार्यों ने “काव्य हेतु” की अवधारणा प्रस्तुत की — अर्थात वे मूलभूत कारण जो काव्य-रचना के लिए आवश्यक हैं।

काव्य हेतु का अर्थ

हेतु से अभिप्राय है — मूलभूत, आंतरिक अथवा अनिवार्य कारण। काव्य हेतु का अर्थ है काव्यरचना में सहायक मूलभूत कारण अथवा साधना।


साहित्यशास्त्र में यह मूलभूत प्रश्न है कि कवि में व्यक्त हर्ष-विषाद भावना में भी उसी अनुभूति को जगाने में वह कैसे सफल हो पाता है। इसका स्पष्ट उत्तर है कि कवि की असाधारण प्रतिभा, अभिव्यक्ति क्षमता के बल पर प्रभावों के समझ द्रव्य साकार कर देता है तथा प्रभावा अभिभूत एवं आनन्दित हो जाता है।


ध्वन्यालोक में कहा गया है कि कवि काव्यरूपी संसार का विलक्षण सृष्टिकर्ता है। कवि में यह क्षमता होती है कि वह अपनी लेखनी के माध्यम से साधारण को असाधारण तथा अचेतन को चेतन रूप में परिवर्तित कर देता है। विचारणीय प्रश्न यह है कि वह सामान्य मानव होते हुए भी अपनी काव्य रचना के द्वारा असाधारण कार्यों को संपन्न कर पाता है। भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतकों के अनुसार यह शक्ति प्रतिभा है; व्युत्पत्ति एवं अभ्यास अन्य काव्य हेतु हैं।
काव्य हेतुओं की संख्या एवं प्रमुख काव्य हेतु के विषय में विद्वान एकमत नहीं हैं। काव्य हेतु के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के मतों का अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है।

संस्कृत आचार्यों के अनुसार काव्य हेतु

1. भामह

काव्य को किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति द्वारा ही रचा जा सकता है। भामह के अनुसार प्रतिभासंपन्न कवि ही श्रेष्ठ अनिन्दनीय काव्य की रचना कर सकता है; यह प्रतिभा किसी विरले को ही प्राप्त होती है।

2. दण्डी



दण्डी ने अपने काव्य ‘काव्यादर्श’ में प्रतिभा, अभ्यास और लोकव्यवहार को काव्य हेतुओं के रूप में मान्यता दी है। दण्डी के अनुसार प्रतिभा निस्संदेह एक आवश्यक काव्य हेतु है, पर इसके अभाव में भी श्रुत (शास्त्र-ज्ञान) और यत्न (अभ्यास) के द्वारा उपासित होने पर वह किसी-किसी पर अनुग्रह कर ही देती है

3.वामन


वामन ने तीन प्रकार के काव्य हेतु माने हैं:
1.लोक (लोकव्यवहार का ज्ञान)
2.विद्या (शास्त्र ज्ञान)
3.प्रकीर्ण
इन्होंने सर्वाधिक महत्व व्युत्पत्ति को और उसके उपरांत दूसरा स्थान अभ्यास को दिया है। प्रतिभा की चर्चा प्रकीर्ण के अंतर्गत गौण रूप में की है।

4. आचार्य रुद्रट



ये प्रतिभा, व्युत्पत्ति एवं अभ्यास को काव्य के हेतु स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार प्रतिभा के 2 भेद हैं:
1.सहजा (कवियों में जन्मजात)
2.उत्पाद्य (लोकशास्त्र और अभ्यास से उत्पन्न होती है — उत्पाद्य से सहजा में निखार आता है)

5. राजशेखर


इन्होंने ‘काव्यमीमांसा’ में काव्य हेतु का विस्तृत विवेचन किया है। इन्होंने प्रतिभा को प्रभाव हेतु स्वीकार किया है। वे व्युत्पत्ति को भी महत्व देते हैं। उन्होंने प्रतिभासंपन्न कवि को काव्य कवि तथा अन्य को शान्त कवि के रूप में मान्यता दी है। इन्होंने प्रतिभा के 2 भेद किए हैं:


कारयित्री — प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका संबंध कवि से है।
भावयित्री — प्रतिभा का संबंध सहृदय पाठक या आलोचक से है।


6. आचार्य मम्मट


आचार्य मम्मट ने अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में काव्य हेतुओं पर विचार करते हुए लिखा है:

शक्तिनिपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्। काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे।।”


अर्थात काव्य के 3 हेतु हैं — शक्ति (प्रतिभा), लोकशास्त्र का अवेक्षण, तथा अभ्यास।

वे एक अन्य स्थान पर यह भी कहते हैं — “शक्तिः कवित्व बीजरूपा” अर्थात ‘शक्ति’ काव्य का बीज संस्कार है, जिसके अभाव में काव्य रचना संभव नहीं है। जिसे अन्य आचार्य ‘प्रतिभा’ कहते हैं, उसी को मम्मट ने ‘शक्ति’ कहा है।


7. केशव मिश्र

प्रतिभा कारणं तस्य व्युत्पत्ति विभूषणं”


अर्थात प्रतिभा काव्य का कारण है तथा व्युत्पत्ति से उसे विभूषित करते हैं।


8. हेमचंद्र


इन्होंने अपने ग्रंथ ‘काव्यानुशासन’ में लिखा है —

“प्रतिभा काव्य का हेतु है, तथा नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं।”


9. पंडितराज जगन्नाथ


इन्होंने अपने ग्रंथ ‘रसगंगाधर’ में ‘प्रतिभा’ को ही प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया है:

“तस्य च कारणं कविगतां केवलं प्रतिभा”

निष्कर्ष


यह निष्कर्ष निकलता है कि काव्य के 3 प्रमुख हेतु हैं:
1.प्रतिभा
2.व्युत्पत्ति
3.अभ्यास
कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका संबंध कवि से है। भावयित्री प्रतिभा का संबंध सहृदय पाठक या आलोचक से है।