महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड, उत्तरकाण्ड—रामचरितमानस के क्रमशः सात काण्ड.
  • उत्तरकाण्ड श्रीरामचरित मानस का सातवाँ और अंतिम काण्ड.
  • उत्तरकाण्ड अर्थात् उत्तर + काण्ड.
  • ‘उत्तर’ शब्द का अर्थ है बाद का, ‘काण्ड’ का अर्थ है घटना, वर्णन अथवा वृत्तान्त.
  • उत्तरकाण्ड में राम—रावण युद्ध के बाद की घटनाओं का वर्णन है, इसलिए इसे उत्तरकाण्ड कहा गया.
  • उत्तर काण्ड में कुल 3 श्लोक, 12 छंद, 130 दोहे हैं.

उत्तरकाण्ड का कथा-सार

  • राम रावण को परास्त कर जब लंका से अयोध्या लौटने लगे, तब चौदह वर्ष पूरे होने में एक ही दिन शेष था.
  • राम चिंतित हुए क्योंकि भरत ने राम से चौदह वर्ष पूर्ण होते ही अयोध्या लौटने का वचन लिया था और साथ ही यह भी कहा था कि यदि एक दिन का भी विलंब हुआ तो वे जीवित नहीं रहेंगे.
  • श्रीराम ने भरत को आश्वस्त करने के लिए विभीषण आदि सखाओं, लक्ष्मण जी एवं श्रीसीताजी के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या के निकट पहुँचने पर हनुमान जी के साथ भरत के पास अपने आगमन की सूचना भेजी.
  • दूसरी ओर सूचना न होने के कारण भरत आदि सभी अयोध्यावासी श्रीराम के आगमन को लेकर चिंतित थे.
  • माता और भाइयों को शुभ शकुन हो रहे थे, भरत की दाईं आँख और भुजा बराबर फड़क रही थी परंतु सूचना के अभाव में अत्यधिक चिंतित थे.
  • इसी समय ब्राह्मण के वेश में हनुमान जी वहाँ पहुंचे और भरत को श्रीराम के आगमन की सूचना से आश्वस्त कर पुनः
  • श्रीराम के पास लौटे और उन्हें भरत के गहन प्रेम के विषय में बताया.
  • भरत ने श्रीराम के आगमन की सूचना माताओं के पास भिजवाई and मंत्रियों तथा नगरवासियों को श्रीराम के स्वागत की तैयारियाँ करने के लिए कहा.
  • श्रीराम पुष्पक विमान से सुग्रीव आदि सखाओं को अयोध्या नगरी तथा उसके आस-पास के स्थान दिखाते आ रहे थे.
  • श्रीराम ने नगरवासियों को स्वागत के लिए आता देखकर विमान उतरवाया तथा विमान से उतरकर उसे पुनः कुबेर के पास भेज दिया.
  • उन्होंने गुरु वशिष्ठ, वामदेव को प्रणामकर भरत को गले लगाया. लक्ष्मण भी भरत और शत्रुघ्न से मिले.
  • भरत और शत्रुघ्न ने भी श्री सीता जी को प्रणाम किया.
  • श्रीराम सभी नगरवासियों से प्रेमपूर्वक मिले. उधर, तीनों माताएँ राम को देखकर व्याकुल होकर उनकी ओर दौड़ीं.
  • श्री सीता जी ने भी माताओं को प्रणाम कर आशीर्वाद लिया.
  • इसके बाद श्रीराम ने सुग्रीव आदि मित्रों का सबसे परिचय कराया.
  • मुनि वशिष्ठ ने शुभ दिन देखकर तथा अन्य ब्राह्मणों से परामर्श कर राज्याभिषेक की तैयारियाँ प्रारंभ कीं.
  • श्रीराम ने स्नेह से भरत की जटाएँ सुलझाई तथा तीनों भाइयों को स्नान कराकर स्वयं भी स्नान किया.
  • श्रीसीता जी को माताओं ने उबटन-स्नान कराया और उसके पश्चात् श्रीराम एवं सीताजी को सिंहासन पर बिठाया गया.
  • वैदिक विधि-विधान से राज्याभिषेक संपन्न हुआ.
  • देव स्वयं बंदीजन (स्तुति करने वाले) के वेश में श्रीराम की स्तुति करने आए.
  • शंकर जी ने भी उनकी स्तुति की.
  • राज्याभिषेक के बाद श्रीराम ने सुग्रीव आदि को भवनों में ठहराया और छः मास के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया.
  • हनुमान जी ने सुग्रीव से कुछ दिन और श्रीराम की सेवा करने की अनुमति माँगी.
  • रामराज्य की स्थापना हुई, सभी नगरवासी सुखी एवं समृद्ध हुए. चारों ओर आनंद-उल्लास का वातावरण छा गया.
  • अंगद भी श्रीराम को छोड़कर नहीं जाना चाहते थे परंतु राम ने उन्हें समझा-बुझाकर विदा किया.
  • श्रीराम एक बार भाइयों और हनुमान जी के साथ उपवन में विहार करने गए, वहाँ सनकादिक ऋषियों ने आकर उनकी स्तुति की और पुनः ब्रह्मलोक को चले गए.
  • कुछ समय पश्चात् लव और कुश का जन्म हुआ. अन्य भाइयों के भी दो-दो पुत्र हुए.
  • एक दिन श्रीराम ने नगरवासियों को बुलाकर सदाचार का उपदेश दिया और कहा कि शिवजी से droh (द्रोह) रखने वाला कभी सच्चा भक्त नहीं हो सकता.

  • एक दिन वसिष्ठ मुनि ने श्रीराम से कहा कि मैंने ब्रह्माजी के कहने पर इस आशा से पुरोहित का निन्दित कार्य किया था कि एक दिन साक्षात् ब्रह्म रूप में आप रघुवंश में प्रकट होंगे। ऐसा कहकर वसिष्ठ मुनि ने जन्म–जन्मांतर तक श्रीराम के चरणों में प्रेम का वरदान माँगा।
  • यह कथा सुनकर आनंदित हुईं पार्वती जी ने शिवजी से गरुड़ और कागभुशुण्डि के मिलन के विषय में पूछा।
  • उन्होंने पूछा कि कौए को भगवान की भक्ति कैसे मिली तथा भक्त होकर भी वह कौए की योनि में क्यों रहा?
  • जवाब में शिवजी ने बताया कि दक्ष के यज्ञ में तुम्हारे प्राणत्याग के पश्चात् मैं घूमता हुआ सुमेरु पर्वत के निकट स्थित आश्रम में गया, तब वह निर्विकार पक्षी दिखाई दिया।
  • लंका–युद्ध के समय नागपाश में बँधने पर नारदजी ने गरुड़जी को बुलाकर श्रीराम–लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त कराया, तब गरुड़जी के मन में श्रीराम के प्रति संदेह उत्पन्न हुआ कि यदि यह स्वयं भगवान है तो नागपाश में कैसे बँधे?
  • नारद जी गरुड़ जी के संदेह को समझे और उन्होंने गरुड़ जी को शंका के निवारण के लिए ब्रह्मा जी के पास और फिर ब्रह्मा जी ने मेरे (शिवजी) के पास भेजा।
  • कुबेर के यहाँ जाते समय गरुड़ मुझे मिले और अपनी समस्या (शंका) बताई। मैंने उन्हें कागभुशुण्डि के पास भेजा।
  • गरुड़ के निवेदन पर कागभुशुण्डि ने उन्हें बाललीला से रावण वध कर अयोध्या लौटने तक की सारी रामकथा सुनाई।
  • गरुड़ ने कागभुशुण्डि को अपने संदेह के विषय में बताकर राम कथा सुनकर उसके दूर होने की बात कही।
  • यह सुनकर कागभुशुण्डि ने उन्हें अपने मन में उत्पन्न हुए संदेह के विषय में बताया।
  • कागभुशुण्डि ने बताया कि जब प्रभु श्रीराम रामावतार लेकर अयोध्या पहुँचे, तब वे भी छोटे कौवे के रूप में वहाँ गए और पाँच वर्ष तक उनके साथ खेलते रहे।
  • बालक श्रीराम बाललीला में उन्हें पकड़ने का प्रयत्न करते थे और कागभुशुण्डि उड़कर दूर चले जाते, उनकी पकड़ में ही न आते थे। तब उन्हें राम के मनुष्य होने की शंका हुई।
  • एक दिन श्रीराम ने उन्हें पकड़ने के लिए अपनी बाँह का विस्तार किया।
  • कागभुशुण्डि ने वहाँ से भागकर सात लोक पार किये किंतु वे जहाँ–जहाँ जाते प्रभु अपनी बाँहें फैलाते उनकी ओर आते दिखाई देते। डरकर कागभुशुण्डि ने अपनी आँखें बंद करलीं, जब आँखें खोलीं तो स्वयं को अयोध्या में पाया।
  • कागभुशुण्डि को असमंजस में देख श्रीराम हाँसे और कागभुशुण्डि उनके मुख में प्रविष्ट हो गए। उन्होंने श्रीराम के उदर में समस्त चराचर जगत, अनेक अयोध्या, दशरथ और कौशल्या, अनेक सृष्टियाँ, प्रलय और रामावतार के दृश्य देखे।
  • इन दृश्यों को देखकर कागभुशुण्डि भ्रांत हो गए, तब श्रीराम ने पुनः मुख खोला और उन्हें बाहर आने दिया। उन्होंने अपनी माया समेटी, उन पर हाथ फिराया तथा वर माँगने के लिए कहा।
  • कागभुशुण्डि ने उनसे अटूट भक्ति का वरदान माँगा।
  • भगवान ने कागभुशुण्डि को अपनी माया की प्रबलता व भक्ति की महिमा के विषय में बताया। वे पुनः बालक्रीड़ा करने लगे।

  • कागभुशुण्डि ने गरुड़ जी को बताया कि वे कुछ समय वहाँ रहकर अपने आश्रम लौट आए।
  • संपूर्ण वृत्तान्त सुनकर गरुड़जी ने कागभुशुण्डि से पूछा कि वे इतने ज्ञानवान और भक्त होकर भी इस योनि को कैसे प्राप्त हुए?
  • इस प्रश्न के उत्तर में कागभुशुण्डि ने अपने एक जन्म की कथा सुनाई।
  • उन्होंने बताया कि एक जन्म में उन्होंने कलियुग में अयोध्या में जन्म लिया, वहाँ सभी लोग पाप में लिप्त थे। धर्म लुप्त हो गया था, पाखण्डों का बोलबाला था।
  • भीषण अकाल पड़ने पर वे अयोध्या से उज्जयिन आ गए। वे जाति से शूद्र थे।
  • उज्जयिन में उन्होंने एक शिवभक्त वेदज्ञ ब्राह्मण की छलपूर्वक सेवा की।
  • वे ब्राह्मण उन्हें ज्ञान और वैराग्य का उपदेश किया करते थे, पर कागभुशुण्डि ज्ञान की उन बातों को सुनते ही न थे।
  • उन्होंने गरुड़ जी को बताया कि वे शिवभक्त होने के साथ-साथ विष्णु के निंदक भी थे।
  • उनके इस आचरण से उनके ब्राह्मण गुरु मन ही मन पीड़ित रहते थे परंतु फिर भी नित्य उपदेश देते थे।
  • आगे उन्होंने बताया कि एक बार वे शिव मंदिर में शिवजी का नाम जप रहे थे कि उनके गुरुजी वहाँ आ गए परंतु उन्होंने अभिमानवश उठकर गुरु को प्रणाम नहीं किया।
  • गुरु ने तो शिष्य के इस अपराध को अनदेखा किया परंतु शिवजी ने कुपित होकर उन्हें अजगर बन जाने का शाप दिया।
  • गुरु को शिष्य पर दया आई और उन्होंने शिवजी की स्तुति कर शिष्य को क्षमा करने तथा कुछ समय में ही शाप का प्रभाव समाप्त होने की प्रार्थना की।
  • शिवजी ने कहा कि उनका शाप व्यर्थ नहीं जाएगा, इसे हजार जन्म लेने ही पड़ेंगे किंतु इसे जन्म-मृत्यु की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ेगी तथा प्रत्येक जन्म में यह ज्ञानी ही रहेगा।
  • इसके साथ ही शिवजी ने कागभुशुण्डि को कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न करने के लिए कहा।
  • शाप के अनुसार कागभुशुण्डि सर्प बने तथा इसके बाद उन्होंने अनेक जन्म धारण किये।
  • ज्ञान की स्मृति तथा गुरु के अपमान की पीड़ा उनके हृदय में निरंतर बनी रही।
  • अंततः कागभुशुण्डि ने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया। वे बच्चों के साथ खेलते हुए भगवान की लीला किया करते थे।
  • बड़ा होने पर उनके पिता ने उन्हें वेद-शास्त्र आदि पढ़ाने का प्रयत्न किया परंतु उनका मन नहीं रमा।
  • उनका मन सदैव श्रीराम के चरणों में रमा रहता था।
  • पिता के देहांत के बाद वे स्वतंत्र होकर प्रभु-भक्ति में रम गए।
  • मुनियों के आश्रमों जाकर उन्होंने राम का गुणगान और चरित्र सुना।
  • राम के दर्शन की लालसा में भटकते हुए वे अंततः सुमेरु पर्वत पर पहुँचे।

  • कागभुशुण्डि ने गरुड़ जी को बताया कि वे कुछ समय वहाँ रहकर अपने आश्रम लौट आए.
  • संपूर्ण वृत्तान्त सुनकर गरुड़जी ने कागभुशुण्डि से पूछा कि वे इतने ज्ञानवान और भक्त होकर भी इस योनि को कैसे प्राप्त हुए?
  • इस प्रश्न के उत्तर में कागभुशुण्डि ने अपने एक जन्म की कथा सुनाई.
  • उन्होंने बताया कि एक जन्म में उन्होंने कलियुग में अयोध्या में जन्म लिया, वहाँ सभी लोग पाप में लिप्त थे। धर्म लुप्त हो गया था, पाखण्डों का बोलबाला था.
  • भीषण अकाल पड़ने पर वे अयोध्या से उज्जयिन आ गए. वे जाति से शूद्र थे.
  • उज्जयिन में उन्होंने एक शिवभक्त वेदज्ञ ब्राह्मण की छलपूर्वक सेवा की.
  • वे ब्राह्मण उन्हें ज्ञान और वैराग्य का उपदेश किया करते थे, पर कागभुशुण्डि ज्ञान की उन बातों को सुनते ही न थे.
  • उन्होंने गरुड़ जी को बताया कि वे शिवभक्त होने के साथ-साथ विष्णु के निंदक भी थे.
  • उनके इस आचरण से उनके ब्राह्मण गुरु मन ही मन पीड़ित रहते थे परंतु फिर भी नित्य उपदेश देते थे.
  • आगे उन्होंने बताया कि एक बार वे शिव मंदिर में शिवजी का नाम जप रहे थे कि उनके गुरुजी वहाँ आ गए परंतु उन्होंने अभिमानवश उठकर गुरु को प्रणाम नहीं किया.
  • गुरु ने तो शिष्य के इस अपराध को अनदेखा किया परंतु शिवजी ने कुपित होकर उन्हें अजगर बन जाने का शाप दिया.
  • गुरु को शिष्य पर दया आई और उन्होंने शिवजी की स्तुति कर शिष्य को क्षमा करने तथा कुछ समय में ही शाप का प्रभाव समाप्त होने की प्रार्थना की.
  • शिवजी ने कहा कि उनका शाप व्यर्थ नहीं जाएगा, इसे हजार जन्म लेने ही पड़ेंगे किंतु इसे जन्म-मृत्यु की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ेगी तथा प्रत्येक जन्म में यह ज्ञानी ही रहेगा.
  • इसके साथ ही शिवजी ने कागभुशुण्डि को कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न करने के लिए कहा.
  • शाप के अनुसार कागभुशुण्डि सर्प बने तथा इसके बाद उन्होंने अनेक जन्म धारण किये.
  • ज्ञान की स्मृति तथा गुरु के अपमान की पीड़ा उनके हृदय में निरंतर बनी रही.
  • अंततः कागभुशुण्डि ने एक ब्राह्मण के घर जन्म लिया. वे बच्चों के साथ खेलते हुए भगवान की लीला किया करते थे.
  • बड़ा होने पर उनके पिता ने उन्हें वेद-शास्त्र आदि पढ़ाने का प्रयत्न किया परंतु उनका मन नहीं रमा.
  • उनका मन सदैव श्रीराम के चरणों में रमा रहता था.
  • पिता के देहांत के बाद वे स्वतंत्र होकर प्रभु-भक्ति में रम गए.
  • अनेक मुनियों के आश्रमों जाकर उन्होंने राम का गुणगान और रामचरित सुना.
  • श्रीराम के दर्शन की लालसा में भटकते हुए वे अंततः सुमेरु पर्वत-शिखर पर स्थित लोमश ऋषि के आश्रम में गए.
  • उन्होंने लोमश ऋषि से सगुणोपासना का मार्ग पूछा.
  • कुछ समय रामचरित सुनाने के पश्चात् वे भी निर्गुणोपदेश देने लगे. बार-बार निर्गुणोपदेश के उपदेश को रोकने पर ऋषि ने क्रोधवश कागभुशुण्डि को कौआ बनने का श्राप दिया.
  • कौआ बनकर वे ऋषि को प्रणाम कर उड़ गए.
  • कागभुशुण्डि ने बताया कि यह वास्तव में उनकी परीक्षा थी. श्रापग्रस्त होकर कौआ बनने पर भगवान ने उनकी अटूट रामभक्ति देखकर उन पर कृपा की.
  • भगवान ने लोमश ऋषि की बुद्धि में परिवर्तन किया.
  • फलतः ऋषि ने पश्चात्तापस्वरुप कागभुशुण्डि को वापस बुलाकर, समझाकर राम-मं‍त्र की दीक्षा देकर उनके बालरूप का ध्यान करने का उपदेश दिया, जो उन्हें अत्यंत प्रिय लगा.
  • ऋषि ने उनसे रामभक्ति से विमुख लोगों को रामकथा सुनाने से मना किया.
  • ऋषि ने कागभुशुण्डि के शरीर पर हाथ फेरकर रामभक्ति से विमुख न होने तथा समस्त इच्छाएँ पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया. आकाशवाणी ने भी आशीर्वाद का समर्थन किया.
  • कागभुशुण्डि ने बताया कि इसके बाद वे ऋषि को प्रणाम कर प्रसन्न मन से आश्रम में आ गए. यहाँ रहते अब तक उन्हें सत्ताईस कल्प (4 अरब 32 करोड़ मानव वर्ष का एक कल्प) बीत चुके हैं.
  • अंत में कागभुशुण्डि ने गरुड़ जी को ज्ञान-वैराग्य का उपदेश दिया और भक्ति-मार्ग की श्रेष्ठता स्थापित की.
  • उन्होंने गरुड़ के सात प्रश्नों के उत्तर दिये. इसके बाद गरुड़ जी उन्हें प्रणाम कर बैकुण्ठ चले गए.
  • शिवजी ने इस प्रकार यह संपूर्ण चरित्र पार्वती जी को सुनाया और सत्संगति तथा रामचरित की महिमा का गुणगान किया.

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीरि।। {130 (क)} कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दामि।। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।। (130 ख)

यह उत्तरकाण्ड एवं श्रीरामचरित मानस का अंतिम दोहा है.

उत्तरकाण्ड के मुख्य बिंदु

  • राम राज्य का वर्णन.
  • श्रीराम–वसिष्ठ–संवाद.
  • शिव–पार्वती–संवाद.
  • कागभुशुण्डि–गरुड़ संवाद.
  • ज्ञानभक्ति निरूपण और भक्ति की महिमा का गुणगान.
  • गरुड़ जी के सात प्रश्न तथा कागभुशुण्डि के उत्तर.
  • भजन महिमा.

Starting with – रामायण–माहात्म्य। तुलसी विनय और फलस्तुति। श्री गणेशाय नमः। श्रीजानकीवल्लभो विजयते। श्रीरामचरितमानस। सप्तम सोपान। 

#

  • सभी सखाओं को 6 महीने के बाद राम ने विदा किया।
  • सबसे पहले भरत ने सुग्रीव को आभूषण पहनाए।
  • लक्ष्मण ने विभीषण को पहनाए।
  • अंगद को आभूषण नहीं पहनाए गए।
  • फिर जामवंत को भी राम ने पहनाए।
  • अंगद ने राम से अयोध्या में रहने की याचना की पर श्रीराम नहीं माने।
  • हनुमान ने सुग्रीव से श्रीराम के पास 10 दिन रहने की आज्ञा माँगी। व हनुमान श्रीराम के पास रहे।
  • केवल निषाद को राम ने आते-जाते रहने को कहा अयोध्या में।
  • राम वनवास से लौटने पर अपने महल जाने से पूर्व कैकई से मिले।
  • राजतिलक सबसे पहले गुरु वशिष्ठ, फिर ब्राह्मणों ने किया।
  • श्री राम सबसे पहले अपने गुरु — ब्राह्मण — भरत — शत्रुघ्न — जनता — माताओं से मिले।
  • धर्म के 4 चरण = सत्य, पवित्रता, ईमानदारी, दयादान
  • चारों वेदों ने बन्दी के रूप में आकर राम की स्तुति की।
  • अयोध्या आने से पूर्व भरत को राम के आने का समाचार हनुमान ने ब्राह्मण वेश में दिया।
  • सम्पूर्ण कथा शिव पार्वती संवाद है।
  • अयोध्या के निवासी :-
    • अकालमृत्यु नहीं है,
    • कोई पीड़ा व रोग रहित है,
    • कोई दुखी व गरीब नहीं है,
    • कोई अज्ञानी व गुणहीन भी नहीं है,
    • सभी अंधकार से रहित हैं।
    • धर्म के मार्ग व चलने वाले पुण्यात्मा हैं।
    • सभी नर नारि गुणी व चतुर हैं।
    • सभी ज्ञानी व कृतज्ञ हैं। सरल स्वभाव के हैं।
  • काकभुशुण्डी एक शूद्र थे, शिव भक्त थे, एक शिव भक्त ब्राह्मण उनके गुरु थे (उज्जैन के)।
    • ये विष्णु निन्दक थे।
    • एक दिन गुरु को काकभुशुण्डी ने प्रणाम नहीं किया। जिस पर क्रोधित हो शिव ने उन्हें साप बनने का शाप दिया। व 1,000 बार अलग योनी में रहने का भी
    • अपने ब्राह्मण जन्म में एक, जो उन्हें 1000 कष्ट रहित जन्म के बाद प्राप्त हुआ। वे ज्ञान प्राप्ति के लिए लोमश ऋषि के पास गए।