केशवदास

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि (रीतिकाल के प्रथम आचार्य) और प्रसिद्ध कवि थे। काव्य संसार में इन्हें ‘कठिन काव्य का प्रेत’ के रूप में प्रसिद्ध हैं।

काव्यांग निरूपण, उक्ति वैचित्र्य और अलंकार-प्रियता के लिए केशवदास स्मरणीय हैं।ओरछा में इनका जन्म हुआ।ओरछा के राजा इन्द्रजीत इनके प्रधान आश्रयदाता थे। बीरसिंहदेव का आश्रय भी इन्हें प्राप्त था।

साहित्य और संगीत, धर्मशास्त्र और राजनीति, ज्योतिष और वैद्यक सभी विषयों का इन्होंने गंभीर अध्ययन किया था।

रचनाएँ

 रसिकप्रिया – 1591

 कविप्रिया, रामचन्द्रिका – 1601

 वीरचरित्र या वीरसिंहदेव चरित्र – 1606

 विज्ञानगीता – 1610

 जहांगीरजसचन्द्रिका – 1612

‘रतनबावनी’ का रचनाकाल अज्ञात है, पर यह इनकी सर्वप्रथम रचना है।

‘छन्दमाला’ का रचनाकाल भी अज्ञात है।

‘राम अलंकृतमंजरी’ ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है।

केशवदास ने लक्षण-ग्रन्थ ही नहीं, लक्ष्य-ग्रन्थ भी लिखे हैं।

शृंगार ही नहीं, अन्य रसों की भी रचनाएँ की हैं। मुक्तक ही नहीं, प्रबन्ध भी प्रणीत किये गये हैं। लक्षण ग्रन्थ 3 हैं – रसिकप्रिया, कविप्रिया और छंदमाला

केशव की रचना में 3 रूप दिखाई देते हैं – आचार्य का, महाकवि का, इतिहासकार का।

ये परमार्थतः हिन्दी के प्रथम आचार्य हैं। इन्होंने ही हिन्दी में संस्कृत की परम्परा की व्यवस्थापूर्वक स्थापना की थी। व्यवस्थित व सर्वांगपूर्ण रीतिग्रन्थ सबसे पहले इन्होंने ही प्रस्तुत किए।

रचनाकार-व्यक्तित्व की समृद्धि की दृष्टि से डॉ. नगेंद्र ने केशवदास को रीतिकाल का प्रस्तोता स्वीकार किया है।

रीतिकाल परम्परा में केशवदास


रीतिकाल

हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने केशवदास के बारे में कहा कि –

“केशवदास ने हिन्दी साहित्य को शास्त्रीयता और परिपक्वता प्रदान की।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने केशव की कविता के संबंध में विचार करते हुए कहा है कि

“केशव को कवि हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता भी न थी जो एक कवि में होनी चाहिए। वे संस्कृत साहित्य से सामग्री लेकर अपने पांडित्य और रचना कौशल की धाक जमाना चाहते थे।”

केशव काव्य कला / अभिव्यक्ति पक्ष

केशव हिन्दी के श्रेष्ठ आचार्य कवि हैं, जिन्हें कतिपय समीक्षकों ने सूर, तुलसी के बाद स्थान दिया है। साथ ही इन्हें चमत्कारवादी और अलंकारवादी कवि भी माना जाता है। इनकी अभिव्यंजना शक्ति सर्वथा विशिष्ट है।

‘रामचन्द्रिका’ छन्दों का अजायबघर सा प्रतीत होती है, क्योंकि इन्होंने एक सर्ग में एक छन्द के नियम का पालन न करके, एक सर्ग में अनेक छन्दों का प्रयोग किया है।

यहाँ उनकी काव्य-कला को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है, जो इस प्रकार है-

भाषा –

केशव संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे, परन्तु केशव ने अपनी कविता जनसाधारण भाषा में की। केशव ने अपनी कविताएँ ब्रजभाषा में लिखी। परन्तु उस पर संस्कृत, बुंदेलखंडी, अवधी, अरबी-फारसी आदि कितनी ही तत्कालीन प्रचलित भाषाओं का प्रभाव परिलक्षित होता है।

इसके साथ ही केशव की भाषा में अभिधा की प्रधान्य है। उन्होंने अभिधा के द्वारा ही अपनी कविता में चमत्कार उत्पन्न करने की चेष्टा की है तथा लाक्षणिक प्रयोगों का कम सहारा लिया है। सुविधा की दृष्टि से केशव की ब्रजभाषा में प्रयुक्त शब्दावली को निम्नलिखित ढंग से विभक्त कर सकते हैं

क) संस्कृत के शब्द –

केशव की ब्रजभाषा में संस्कृत के तत्सम शब्द पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। ‘रामचन्द्रिका’ में तो संस्कृत शब्दावली का ही प्राधान्य दिखाई देता है। कारण है कि केशव ने पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिए जो मार्ग अपनाया था, उसमें लोकभाषा की उपेक्षा संस्कृत भाषा की पदावली ही उपयुक्त ठहरती है –

सिर चन्द्र की चन्द्रिका चारु हाशे।

महापातक की ध्वांत धाम प्रणाशे॥

ख) प्राकृत एवं अपभ्रंश के शब्द –

केशव ने जहाँ-तहाँ अपभ्रंश का प्रयोग किया है। उन्होंने वीरगाथा पदावली में प्राकृत एवं अपभ्रंश के शब्दों का प्रयोग किया, यथा – सुख्ख, अच्छे, कटाच्छ, छुद्र आदि।

ग) बुन्देलखण्डी के शब्द –

केशव बुन्देलखण्ड के रहने वाले थे, अतएव उनकी साहित्यिक भाषा में इस भाषा के शब्दों की भरमार थी। यथा – बोरिया, आईयो, छंडी आदि। इनकी भाषा बुन्देलखण्डी मिश्रित ब्रजभाषा कहलाती है।

घ) अवधी के शब्द –

केशव की भाषा में अवधी के शब्द भी मिलते हैं। इसका कारण यह है कि उस समय हिन्दी साहित्य के अंतर्गत अवधी और ब्रजभाषा दोनों का ही प्राधान्य था और बुन्दैलखण्ड इन दोनों भाषाओं से प्रभावित था।

ङ) अरबी-फारसी के शब्द –

केशव के समय उत्तरी भारत में अरबी-फारसी का प्रचार पर्याप्त मात्रा में हो गया था। केशव ने दरबारी कवि होने के नाते दरबारी-बोलचाल की भाषा (अरबी-फारसी) का प्रयोग किया। केशव की कविता में इसी कारण सिरताज, बाजी, तंग, शोर, फरमान आदि…

 मुहावरे और लोकोक्तियाँ –

केशव ने मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग करके जहाँ-तहाँ लाक्षणिक पदावली का भी प्रयोग किया है। इनकी रचनाओं में मुहावरों व लोकोक्तियाँ कम ही प्रयुक्त हुई हैं, तथापि इनके प्रयोग से भाषा का सुन्दर श्रृंगार हुआ है।

 मुहावरे – “बोलत बोल फूल से झरैं”, “अब जो तू मुख मोरि है।” आदि।

 लोकोक्तियाँ – “प्यास बुझाइ न ओस के चाटे”, “तोते है दूध सिराई न पीजैं” आदि।

भाषा के गुण एवं दोष

 गुण – केशव की भाषा में ओज, माधुर्य एवं प्रसाद गुणों से भरपूर है। ‘रामचन्द्रिका’ और ‘रतन बावनी’ में ओज का प्राधान्य, ‘रसिकप्रिया’ में माधुर्य गुण का प्राधान्य है। उसके शृंगारिक छन्द माधुर्य-गुण से ओत-प्रोत हैं।

 दोष – कहीं व्याकरण के विरुद्ध प्रयोग होने के कारण च्युति-संस्कृत दोष मिलता है। केशव के पास शब्द भण्डार की कमी न थी। संस्कृत शब्दों की बहुलता के कारण ही केशव की भाषा में सरसता एवं सरलता के स्थान पर क्लिष्टता एवं कठोरता दृष्टिगोचर होती है, जिससे जनसाधारण उसे समझने में कठिनाई का अनुभव करता है।

छन्द योजना –

केशव को छन्दों पर असाधारण अधिकार है।

रो. जगन्नाथ तिवारी के अनुसार –

हिन्दी साहित्य का कोई भी ऐसा अन्य कवि दिखाई नहीं देता, जो इतने अधिकार से साथ इतने प्रकार के छन्दों का प्रयोग कर सका हो।”

प्रो. जगन्नाथ ने स्पष्ट किया है-

रामचन्द्रिका के आरम्भ में एकाक्षरी से लेकर क्रम से अष्टाक्षरी तक के छन्द प्रयुक्त हुए हैं। अन्यत्र प्रायः अप्रयुक्त मोटनक, सोमराजी, चित्रपदी आदि छन्दों का भी प्रयोग है।

इसके साथ ही दण्डक (कवित्त) के भी जगमोहन, अनंग-शेखर आदि अनेक उपभेद रामचंद्रका में मिलते हैं।

तिवारी जी ने यह भी कहा है – “उनकी सबसे बड़ी विशेषता धारावाहिता और भावानुकूलता है। बड़े छन्दों का प्रयोग प्रायः छप्पय, भुजंगप्रयात और वंसस्थ ऐसे स्थलों पर किया गया है जहाँ गम्भीरता तथा खोज की आवश्यकता है। वीर रस के वर्णन में प्रायः छप्पय, भुजंग प्रयात का सफल प्रयोग हुआ है।”

आचार्य केशव ने 3 प्रकार के छन्दों में काव्य रचना की है। मात्रिक छन्दों की संख्या 24 व वर्णिक की 58 हैं।

 संवाद योजना (भाव पक्ष) –

‘रामचन्द्रिका’ केशव द्वारा संवाद शैली में लिखित महाकाव्य है। इस काव्य में जो महत्वपूर्ण संवाद हैं वे हैं – परशुराम-राम संवाद, दशरथ-विश्वामित्र संवाद, राम-लक्ष्मण संवाद, रावण-अंगद संवाद, सीता-हनुमान संवाद आदि।

इन संवादों में कई संवाद छोटे और कई बड़े लम्बे हैं। केशव दरबारी कवि थे। इसलिए वे वाक्पटुता से उन्हीं प्रसंगों की संवाद-योजना में कौशल दिखाते हैं जिन प्रसंगों में उन्हें वाक् चातुरी प्रकट करने का मौका मिला है।

रामचन्द्रिका के संवाद कथा को गति देने में सक्षम हैं। इसमें घटनाओं में सम्बन्ध सूचना तथा संयोजन स्थापित किया गया है।

इस दृष्टि से रावण-हनुमान संवाद दृष्टव्य है, जिसमें व्यंग्य एवं वैदग्ध्य ओतप्रोत है-

रे कपि कौन तू? अक्षको घातक दूत बली रघुनन्दन जू को।


  • संवादों के द्वारा पात्रों के चारित्रिक पहलुओं को भी प्रकट किया गया है। संवाद पात्रों के अनुकूल भावानुकूल हैं।

अलंकार विधान

हिन्दी साहित्य में केशव ही पहले ऐसे आचार्य एवं कवि कहे जाते हैं, जिन्होंने संस्कृत के अलंकार-संप्रदाय के आधार पर हिन्दी में भी उसी विशिष्ट परम्परा का प्रयोग किया है। इन्होंने ‘कविप्रिया’ में अलंकारों के प्रति अपनी रुचि का परिचय दिया है, वहीं दूसरी ओर ‘रसिकप्रिया’ में रस के प्रति भी अपनी रुचि प्रदर्शित की है।

केशव का युग अलंकरण के साथ-साथ पाण्डित्य एवं चमत्कार-प्रदर्शन का भी था। अतः केशव भी कभी-कभी पाण्डित्य एवं चमत्कार-प्रदर्शन से प्रभावित अलंकार-योजना करते थे। ऐसे स्थलों पर कविता का भाव-पक्ष प्रायः उपेक्षित हो जाता है।

श्लेष केशव का प्रियतम अलंकार है। इसके अतिरिक्त विरोधाभास, परिसंख्या, उपमा-उत्प्रेक्षा, सन्देह, रूपक, विभावना, यमक-अनुप्रास आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है।

अलंकारों के आधार पर कवि केशव ने कुछ सुन्दर बिम्ब भी प्रस्तुत किए हैं। इस प्रकार उनके अलंकारों में ऐसे बिम्ब उभरते हैं जो वस्तु-सौन्दर्य, प्रकृति-सौन्दर्य, चरित्र-सौन्दर्य तथा भाव-सौन्दर्य का वर्द्धन कर देते हैं।

उपमा – “चतुर चोर से सोभित भए।

धरनीधर बनमाला गए।।”

केशव के काव्य में रस परिपाक (भाव पक्ष)

“रस काव्य की आत्मा है”। शृंगारादि भेद से रस से तक की श्रेणी में आता है। शृंगार के संयोग एवं वियोग दोनों पक्षों के उदाहरण प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं।

उदाहरण –

करुण रस –

“हा राम! हा रमण! हा रघुनाथ धीर,

लंकाधिनाथ बश जानहु मोहि वीर।।”

भयानक रस –

भूतल सकल भ्रमित ह्वै गयो

लोक लोक कोलाहल भयो

वियोग शृंगार-

बिसेस कालराति सों कराळ राति मानिये

वियोग सीय को न, काल बलोकहार जानिये॥

केशव अनुभूति पक्ष

1. शृंगारिक भावना

केशव मूलतः दरबारी कवि थे, इसलिए उनके काव्य में शृंगार रस की प्रधानता है। उन्होंने नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य और विरह का बहुत सूक्ष्म चित्रण किया है। उनकी ‘रसिकप्रिया’ पूरी तरह शृंगारिक भावनाओं पर आधारित है।

“केसोदास अकासहु नायक, तेरो ही मुख देखिये को गयो है।”

2. ऐश्वर्यमयी भक्ति

केशव रामभक्त थे, लेकिन उनकी भक्ति तुलसीदास जैसी दैन्य भाव की नहीं, बल्कि ‘ऐश्वर्य भाव’ की थी। वे राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के साथ-साथ एक वैभवशाली राजा के रूप में देखते हैं। उनकी रामचंद्रिका में भक्ति का यह रूप स्पष्ट झलकता है।

“जानकी-कंठ की कंठिका कंठ बसै। रसना रसिये राम-नामहि।”

3. संवादों में मनोवैज्ञानिक चित्रण

केशव की रामचंद्रिका के संवादों में मनोवैज्ञानिकता के अद्भुत गुणों का भी समावेश हुआ है। रामचंद्रिका में पात्रों के अनुरूप उनके मनोभावों की सुन्दर व्यंजना हुई है। जैसे रावण के चरित् में क्रूरता, कठोरता, निष्ठुरता इत्यादि मनोभावों की व्यंजना मिलती है, तो राम के चरित्र में धीरता, गंभीरता, उदात्तता इत्यादि मनोभावों की व्यंजना इत्यादि मनोभावों की अभिव्यक्ति हुई है।

4. व्यंग्य एवं वाग्वैदग्ध्य –

केशव के संवादों में व्यंग्य के साथ-साथ वाग्वैदग्ध्यता का अद्भुत गुण मिलता है। इस दृष्टि से रावण-अंगद संवाद का क्या कहना है? रावण ने जब अंगद से उसका और उसके पिता का परिचय जानना चाहा, तो अंगद का यह व्यंग्य एवं विदग्धतापूर्ण उत्तर हँसी से लोटपोट कर देता है।

‘रावण-हनुमान संवाद’ भी केशव के वाग्वैदग्ध्य एवं व्यंग्य का अनूठा उदाहरण है

“सगार कैसे तरयो? जैसे ‘गो पद’, काज कह?

सिय चोरहि देखों।

कैसे बँधायो? जो सुंदरी तेरी हुई दृग सोवत, पावक लेखों।”

5. कूटनीतिज्ञता

कूटनीति भेद नीति अथवा राजनीतिक दाँव-पेंच से संबंधित संवाद केशव के रामचंद्रिका के संवादों की एक अन्यतम विशेषता है। रावण-अंगद संवाद कूटनीति का एक सुन्दर उदाहरण है। शत्रु पक्ष के अंगद को अपने पक्ष में करने के लिए रावण-अंगद संवाद में व्यवहारकुशल २ नीतिनिपुणता के साथ-साथ कूटनीतिज्ञता का अद्भुत संगम मिलता है। देखें-

“देहि अंगद राज लोक मारि बानर राज को।

बाँधि देहि विभीषणों अरू कोरि सेतु समाज को॥”

6. प्रकृति चित्रण

डॉ श्यामसुन्दर दास ने केशव के बारे में लिखा है –

“प्रकृति के अतुलित सौन्दर्य से प्रभावित होने के लिए जिस भावुकता की आवश्यकता होती है, उसका केशव में सर्वथा अभाव है।”

परन्तु ऐसी बात नहीं है कि केशव प्रकृति-चित्रण में पूर्णतया असफल रहे हों और सर्वत्र भावुकता का अभाव दिखाई देता हो।

केशव ने प्रकृति को आलम्बन, उद्दीपन, संवेदनात्मक, उपदेशात्मक व प्रकृति निर्माण के रूप में निरूपित किया है।

 आलम्बन – प्रकृति के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर कवि प्रकृति चित्रण के लिए विवश हो जाता है। महाराज दशरथ की वाटिका का वर्णन देखिए :

“देिख देखि अनुराग उपज्जिय।

बोलत कल ध्वनि कोकिल संज्जिय॥”

उद्दीपन – मनुष्य की संयोग-वियोग की स्थितियों में प्रकृति उद्दीपक का कार्य करती है। श्रीराम की विरह दशा को प्रकृति किस प्रकार उद्दीप्त कर रही है, एक उदाहरण देखिए

“हिमांशु सुर सो लगै सो बात बज्र सी बहै”

निष्कर्ष –

रामचंद्रिका के काव्य सौन्दर्य का विश्लेषण करते हुए कहा जा सकता है कि केशव ने इसमें भावानुकूल भाषा का प्रयोग किया है। इसमें उन्होंने अपने मौलिकता को प्रस्तुत किया है और विभिन्न प्रकार के छन्दावली का प्रयोग उन्होंने इस महाकाव्य में किया है। रस, व्यंजना, अलंकार-व्यंजना, प्रकृति चित्रण आदि का प्रयोग केशव के इस महाकाव्य में हुआ है, जो इस काव्य के सौन्दर्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। केशव के इस महाकाव्य में भाव और कला का अनूठा संगम है।