1900 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा के गृहप्रवेशोत्सव के समय हरिऔध ने यह कविता पढ़ी –

चार डग हमने भरे तो क्या किया । है पड़ा मैदान कोसों का अभी ।।

जीवन- परिचय

  • द्विवेदी युग के प्रख्यात कवि,उपन्यासकार, आलोचक ।

मूल नाम : अयोध्यासिंह उपाध्याय उपनाम : ‘हरिऔध’ जन्म : 15 अप्रैल 1865 जन्म-स्थान : निज़ामाबाद, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश निधन : 16 मार्च 1947,आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश माता : रुक्मिणी देवी

पिता : पं. भोलानाथ उपाध्याय शिक्षा-दीक्षा: घर पर ही उर्दू, संस्कृत, फ़ारसी, बांग्ला और अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य का अध्ययन ।

कार्य-क्षेत्र:

  • प्रारंभ में विद्यालय के प्रधानाध्यापक ।
  • 1889 से 1932 तक क़ानूनगो के पद पर कार्य ।
  • सेवानिवृत्ति के बाद 1941 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक प्राध्यापक ।
  • अध्यापन-कार्य से मुक्ति के बाद गाँव में रहकर साहित्य-सृजन ।

कृति -परिचय- 1890 के आसपास साहित्य-सृजन प्रारंभ ।

  • अपने रचनाकाल के प्रारंभिक दौर में हरिऔध का रुझान उर्दू के छंदों और ठेठ बोली की ओर ही रहा ।
  • पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव से उन्होंने काव्य में संस्कृत छंदों और संस्कृतनिष्ठ सामासिक पदावली का प्रयोग प्रारंभ किया ।

नाट्य कृतियाँ –

  • प्रद्युम्न विजय 1893 ई.
  • रुक्मणी परिणय 1894 ई. ।

औपन्यासिक कृतियाँ –

  • प्रथम उपन्यास प्रेमकान्ता, 1894 ई.
  • ठेठ हिन्दी का ठाठ,1899 ई.
  • अधखिला फूल ,1907 ई.

निबंध – संदर्भ सर्वस्व आत्मकथात्मक कृति – इतिवृत्त आलोचना – हिंदी भाषा और साहित्य का विकास,

विभूतिमती ब्रजभाषा

संपादन – कबीर वचनावली

काव्य -कृतियाँ

  • रसकि रहस्य, 1899 ई.
  • प्रेमाम्बुवारिधि,1900 ई.
  • प्रेम प्रपंच, 1900 ई.
  • प्रेमाम्बु प्रश्रवण, 1901 ई.
  • प्रेमाम्बु प्रवाह, 1901 ई.
  • प्रेम पुष्पहार, 1904 ई.
  • उद्बोधन, 1906 ई.
  • काव्योपवन, 1909 ई.
  • कर्मवीर,1916 ई.
  • ऋतु मुकुर,1917 ई.
  • पद्य प्रसून,1925 ई.
  • पद्य प्रमोद, 1927 ई.
  • चोखे चौपदे,1932 ई.
  • चुभते चौपदे
  • रस-कलश (1940 ई .)

प्रबंध काव्य

  • प्रियप्रवास (1914 ई .)
  • पारिजात (1937 ई .)
  • वैदेही वनवास (1940 ई .)

अनुवाद

  • वेनिस का बाँका

बाल साहित्य

  • बाल विभव
  • बाल विलास
  • फूल पत्ते
  • चन्द्र खिलौना
  • खेल तमाशा
  • उपदेश कुसुम
  • बाल गीतावली
  • चाँद सितारे
  • पद्य प्रसून

पुरस्कार एवं सम्मान

  • 1924 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति ।
  • ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधि से सम्मानित ।
  • 1934 में दिल्ली में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन के चौबीसवें अधिवेशन के सभापति ।
  • 12 सितंबर 1937 ई. को नागरीप्रचारिणी सभा,आरा की ओर से राजेंद्र प्रसाद द्वारा अभिनंदन ग्रंथ भेंट ।
  • 1938 में ‘प्रियप्रवास’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक ।

महत्वपूर्ण योगदान

  • खड़ीबोली को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रमुख कवि ।
  • अपने रचनाकाल के प्रारंभिक दौर में हरिऔध का रुझान उर्दू के छंदों और ठेठ बोली की ओर ही रहा ।
  • पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव से उन्होंने काव्य में संस्कृत छंदों और संस्कृतनिष्ठ सामासिक पदावली का प्रयोग प्रारंभ किया ।

आचार्य शुक्ल ने लिखा …

  • भारतेंदु के पीछे और द्वितीय उत्थान के पहले ही हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि पंडित अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध नए विषयों की ओर चल पड़े थे ।
  • जब पंडित महावीरप्रसाद जी द्विवेदी के प्रभाव से खड़ीबोली ने संस्कृत छंदों और संस्कृत की समस्त पदावली का सहारा लिया,तब उपाध्यायजी -जो गद्य में अपनी भाषा संबंधिनी पटुता उसे दो हदों पर पहुँचाकर दिखा चुके थे -उस शैली की ओर बढ़े और संवत् 1971 (1914) में उन्होंने अपना ‘प्रियप्रवास’ नामक बहुत बड़ा काव्य प्रकाशित किया ।
  • नवशिक्षितों के संसर्ग से उपाध्यायजी ने लोकसंग्रह का भाव अधिक ग्रहण किया ।
  • उक्त काव्य में श्रीकृष्ण ब्रज के रक्षक नेता के रूप में अंकित किये गए हैं। खड़ीबोली में इतना बड़ा काव्य अभी तक नहीं निकला है।
  • बड़ी भारी विशेषता इस काव्य की यह है कि यह सारा संस्कृत के वर्णवृत्तों में है, जिसमें अधिक परिमाण में रचना करना कठिन काम है ।
  • उपाध्यायजी का संस्कृत पदविन्यास अनेक उपसर्गों से लदा तथा ‘मंजु’, ‘मंजुल’, ‘पेशल’ आदि के बीच-बीच में जटित अर्थात् चुना हुआ होता है ।
  • यद्यपि द्विवेदीजी अपने अनुयायियों के सहित जब इस संस्कृत वृत्त के मार्ग पर बहुत दूर तक चल चुके थे,तब उपाध्यायजी उस पर आये,पर वे बिल्कुल अपने ढंग पर चले ।
  • यह काव्य अधिकतर भावाभिव्यंजक और वर्णनात्मक है। कृष्ण के चले जाने पर ब्रज की दशा का वर्णन बहुत अच्छा है ।
  • जैसा कि इसके नाम से प्रकट है,इसकी कथावस्तु एक महाकाव्य क्या अच्छे प्रबंधकाव्य के लिए भी अपर्याप्त है। अतः प्रबंधकाव्य के सब अवयव इसमें कहाँ आ सकते ?
  • किसी के वियोग में कैसी-कैसी बातें मन में उठती हैं और क्या-क्या कहकर लोग रोते हैं,इनका जहाँ तक विस्तार हो सका है,किया गया है ।
  • परंपरा पालन के लिए जो दृश्यवर्णन हैं,वे किसी बगीचे में लगे हुए पेड़-पौधों के नाम गिनाने के समान हैं। इसीसे शायद करील का नाम छूट गया ।

बच्चन सिंह ने लिखा ….

  • शुक्लजी इसमें प्रेम की अनेक अंतर्दशाओं की व्यंजना तो मानते हैं किंतु कथा की क्षीणता या घटनाओं के अभाव के कारण इसे महाकाव्य क्या,अच्छा प्रबंध काव्य भी नहीं मानते । किंतु विरह

निवेदन के हलके ताने-बाने से बुने हुए प्रबंधत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता ।

  • इसमें संस्कृत प्रबंध-विधान की रूढ़ियाँ टूटी हैं। आगे चलकर इसका विकास ‘साकेत’ और ‘कामायनी’ में देखा जा सकता है ।

प्रियप्रवास : महत्वपूर्ण तथ्य

  • प्रियप्रवास में लोक संग्रह के भाव की प्रधानता ।
  • कवि ने स्वयं प्रियप्रवास को ‘भिन्न तुकांत काव्य’ कहा है।
  • प्रियप्रवास का लेखन 15 अक्टूबर, 1909 को प्रारंभ हुआ और 24 फरवरी, 1913 को पूर्ण हुआ । 1914 में प्रकाशित ।
  • खड़ी बोली का पहला महाकाव्य ।
  • 17 सर्गों में निबद्ध कथानक ।
  • मूल कथा श्रीकृष्ण के मथुरागमन, राधा एवं गोपियों की विरह , पवनदूती प्रसंग, यशोदा की व्यथा, उद्धव-गोपी संवाद, राधा-उद्धव संवाद से सम्बंधित ।
  • राधा और कृष्ण सामान्य नायक-नायिका के स्तर से ऊपर उठाकर विश्वसेवी तथा विश्वप्रेमी के रूप में चित्रित ।
  • श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएँ बकासुर, पूतना वध, शकटासुर, कालियनाग, कंस, जरासंध आदि की कथाएँ प्रसंगवश वर्णित ।
  • प्रियप्रवास की राधा केवल विरहिणी ही नहीं बल्कि वह लोक व समाज सेविका भी है ।
  • कृष्ण भी जननायक, मानवता के अनन्य पुजारी, अन्याय का दमन करने वाले के रूप में चित्रित।
  • आध्यात्मिक एवं लौकिक प्रेम को प्रस्तुत करते हुए लोकपक्ष एवं लोक-कल्याण का चित्रण।

17 सर्गों में वर्णित कथा

  • प्रथम सर्ग में संध्याकालीन प्राकृतिक सौंदर्य, कृष्ण का गायें चराकर लौटना, ब्रजवासियों का उनके दर्शन के लिए विकल होना, बलराम सहित कृष्ण का सौंदर्य चित्रण तथा रात्रिकालीन नीरव वातावरण का मोहक वर्णन है।
  • द्वितीय सर्ग में कंस का निमंत्रण लेकर सुफलकसुत का आना, कृष्ण के गमन की कल्पना मात्र से गोकुलवासियों का व्यथित होना तथा इस वज्रपात से गोकुल में भय एवं आशंकाएँ व्याप्त होने का वर्णन है।
  • तृतीय सर्ग में नन्द की व्याकुलता, यशोदा की कृष्ण की कुशलता के लिए मनौतियाँ, माता की व्यथा का वर्णन है।
  • चतुर्थ सर्ग में वृषभानु (राधा के पिता) का परिचय, राधा का परिचय, उनके सौंदर्य का चित्रण, कृष्ण के प्रति उनका विशिष्ट अनुराग तथा कृष्ण के मथुरा-गमन के समाचार से उत्पन्न व्यथा, प्रकृति के कण-कण में उसी पीड़ा का विस्तार देखने का चित्रण है।
  • पाँचवें सर्ग में कृष्ण के मथुरा गमन के समाचार से गोकुल में व्याप्त व्यथा, गोकुल के कण-कण में व्याप्त उदासी और नीरवता एवं माता यशोदा की व्यथा का मार्मिक वर्णन है।
  • छठे सर्ग में अनेक दिवस बीतने पर भी कृष्ण के न लौटने से उत्पन्न ब्रजवासियों की व्याकुलता, मार्ग पर बैठ उनकी राह देखना, यशोदा का वात्सल्य-वियोग, राधिका का विरह, उनके व्यक्तित्व का लोककल्याणकारी रूप, पवन के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति एवं कृष्ण को उनकी याद दिलाने की विनती करने का वर्णन।
  • सातवें सर्ग में कृष्ण को साथ लिये बिना नन्द के मथुरा से लौटने पर माता यशोदा के पुत्र विषयक प्रश्नों का मार्मिक वर्णन, यशोदा की व्यथा और नंद का उन्हें कृष्ण के दो दिन में लौटने का कहकर आश्वस्त करना।
  • आठवें सर्ग में नंद के साथ कृष्ण के न लौटने से उत्पन्न गोकुलवासियों की व्यथा, उनके साथ बिताए पलों का स्मरण करना, कृष्ण-जन्म की स्मृतियों में नंद का डूबना, नंद की व्यथा, ब्रज-नारियों के भावोद्गार का मर्मस्पर्शी चित्रण।
  • नवेंद सर्ग में श्रीकृष्ण का गोकुल की यादों में खोना, कृष्ण का ब्रज-प्रेम, ब्रज-भूमि का प्रकृति सौंदर्य, यमुना का सौंदर्य, कृष्ण का उद्धव को ब्रज भेजना, मथुरा के मार्ग से रथ आता देख गोकुलवासियों की उत्सुकता एवं निराशा का चित्रण, उद्धव का गोकुल आगमन।
  • दसवें सर्ग में उद्धव का नंद और यशोदा से मिलना, गोकुलवासियों का नंद-गृह में एकत्र होना, यशोदा का उद्धव से कृष्ण की कुशलक्षेम पूछना, यशोदा की मनोव्यथा की लोककल्याणकारी मर्मवेदना, नंद की व्यथा का चित्रण।
  • ग्यारहवें सर्ग में उद्धव प्रसंग, वृद्ध गोप के कृष्ण विषयक उद्गार, कालियनाग मर्दन प्रसंग, प्रतिष्ठित गोप के उद्गार, गोकुलवासियों की दावाग्नि से रक्षा का प्रसंग वर्णित।
  • बारहवें सर्ग में श्रीकृष्ण के जननायक रूप के वर्णन में अभीरों के दल की भावाभिव्यक्ति-गोवर्धनधारण प्रसंग, अन्य गोपों के द्वारा कृष्ण की कीर्ति का बखान।
  • तेरहवें सर्ग में उद्धव का ब्रज भूमि का सौन्दर्य निहारना, गोपकुमारों का आना कृष्ण के विषय में पूछना, भयंकर भुजंग, हिंसक अश्व और व्योम पशुपाल के वध का प्रसंग, गोप द्वारा कृष्ण की बाल आह्लादकारी लीलाओं तथा कृष्ण के लोकोपकारी रूप का वर्णन।
  • चौदहवें सर्ग में गोपी-उद्धव संवाद, गोपियों की विरह-वेदना, उद्धव का उन्हें समझाना और गोपियों के अलौकिक प्रेम को अनुभव करना।
  • पन्द्रहवें सर्ग में कृष्णप्रेम में उन्मत्त पुष्प आदि से वार्तालाप करती एक बाला की बातें सुनना, गोपियों की विरह-व्यथा का वर्णन।
  • सोलहवें सर्ग में गोकुल के वसंतकालीन सौन्दर्य का चित्रण, राधा को प्रबोधन देने के लिए उद्धव का वृषभानु के गृह के निकट स्थित वाटिका में जाना, उद्धव-राधा संवाद, राधा के उदात्त कृष्णप्रेम से अभिभूत उद्धव का वर्णन।
  • सत्रहवें सर्ग में उद्धव का मथुरा लौटना, कंस-वध, कृष्ण-जरासंध युद्ध, कृष्ण का द्वारिका प्रस्थान, हरिऔध जी द्वारा विश्व प्रेम व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर है, महाकाव्य के इस महान उद्देश्य की स्थापना।

Question answer

  • अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की कृति ‘प्रियप्रवास’ में राधा का, परंपरा से एक भिन्न, रूप भी है, वह है : उत्तर: समाज-सेविका का
  • ‘प्रियप्रवास’ के संबंध में सही तथ्य हैं – उत्तर:
    • प्रियप्रवास खड़ी बोली हिंदी का पहला महाकाव्य है।
    • इसके छंदों में तुकान्तता नहीं है।
  • ‘दिवस का अवसान समीप था। गगन था कुछ लोहित हो चला।’ यह प्रकृति चित्रण किस महाकाव्य से है? उत्तर: प्रियप्रवास
  • ‘कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।’ तुलसीदास जी के लिए यह प्रशस्ति-वचन इनमें से किसका है? उत्तर: अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
  • ‘कवि-सम्राट’ की उपाधि किसे दी गई थी? उत्तर: अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
  • ‘दिवस का अवसान समीप था। गगन था कुछ लोहित हो चला। तरुशिखर पर थी अब राजती। कमलिनी-कुल वल्लभ की प्रभा।।’ इस काव्य पंक्तियों का आशय है: उत्तर:
    • आसमान में लालिमा फैलने लगी थी।
    • पेड़ों की फुनगियों पर सूरज की आखिरी किरणें विराजमान थीं।
  • रचनाकाल की दृष्टि से निम्नलिखित कृतियों का सही अनुक्रम बताइए: उत्तर: प्रियप्रवास, साकेत, तुलसीदास, कृष्णायन
  • प्रारंभ में हरिऔध ने ‘प्रियप्रवास’ का क्या नाम रखा था? उत्तर: ब्रजांगना विलाप
  • ‘तरुशिखा पर थी अब राजती। कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा’ पंक्ति में रेखांकित शब्द (कमलिनी-कुल-वल्लभ) का अर्थ है– उत्तर: सूर्य
  • प्रियप्रवास के प्रथम सर्ग में प्रयुक्त छंद कौनसा है? उत्तर: द्रुतविलंबित
  • Q. ‘बज उठी मुरली इस काल की तरणिजा-तट-राजित-कुंज में’ पंक्ति में रेखांकित शब्द (तरणिजा) का क्या अर्थ है? उत्तर: a. यमुना
  • Q. ‘कदन ज्यों करके दिशि कालिमा विलसता नभ में नलिनीश है।’ पंक्ति में ‘नलिनीश’ शब्द से किसकी ओर संकेत किया गया है? उत्तर: b. श्रीकृष्ण
  • Q. ‘दुख-निशा न हुई सुख की निशा’ पंक्ति के द्वारा कवि ने किस ओर संकेत किया है? उत्तर: b. कृष्ण मथुरा से वापस लौटकर कभी गोकुल नहीं आए।
  • Q. ‘सकल-पादप नीरव थे खड़े। हिल नहीं सकता यक पत्र था। च्युत हुए पर भी वह मौन ही पतित था अवनी पर हो रहा।’ पंक्तियों में वर्णित नीरवता का क्या कारण है? उत्तर: b. कंस का कृष्ण को बुलवाना।
  • Q. ‘हृदय-निर्गत वाष्प-समूह से। सजेल थे युग-लोचन हो रहे। बदन से उनके चुपचाप ही। निकलती अति-तप्त उसास थी।’ पंक्तियों में किसकी पीड़ा का चित्रण किया गया है? उत्तर: b. नंद बाबा की
  • Q. माता यशोदा श्रीकृष्ण और बलराम के सफलतापूर्वक कार्य संपन्न करके लौट आने पर ईश्वर से प्रार्थना के दौरान क्या संकल्प करती हैं? उत्तर: c. विधि-विधान से ईश्वर के चरण-कमलों की पूजा करूँगी।
  • Q. श्रीकृष्ण के मथुरागमन की सूचना मिलने के समय राधाजी के निकट कौन था? उत्तर: b. सखी ललिता
  • Q. ‘कल कुवलय के से नेत्र वाले रसीले। वररचित कबीले पीत कौशेय सोभी। गुणगण मणिमाली, मंजुभाषी सजीले वह परम छबीले लाडिले नन्द जी के।’ यह पंक्तियाँ किसने किससे कही? उत्तर: a. राधाजी ने सखी ललिता से।
  • Q. राधा पवन को किन-किन तत्वों के माध्यम से कृष्ण को अपनी याद दिलाने के लिए कहती है? उत्तर: d. उपर्युक्त सभी (कुम्हलाएँ पुष्प, पीला पत्ता, जलयुक्त कमल दल, सूखी लतिका, नीप का पुष्प, पत्ता, बाँसुरी की ध्वनि)
  • Q. ‘डूबी द्विधा जलधि में जन-मण्डली थी’ पंक्ति में कवि हरिऔध ने ब्रजवासियों की किस दुविधा की ओर संकेत किया है? उत्तर: d. प्रस्थान के समय रोना अशुभ मानकर वे किस प्रकार अपने आँसुओं को रोकें?
  • Q. ‘मेरे प्यारे कुँवर मुझसे आज न्यारे न होवें।’ यह कथन अक्रूर से किसने कहा? उत्तर: c. आभीर वृद्ध ने
  • Q. ‘धीरे-धीरे सु-पवन बहे स्निग्ध हों अंशुमाली। प्यारी छाया विटप वितरें शांति फैलें वनों में। बाधायें हो शमन पथ की दूर हो आपदायें।’ ‘प्रियप्रवास’ में उक्त पंक्तियाँ किसकी हैं? उत्तर: d. यशोदा मैया
  • Q. ‘धीरे-धीरे दिन गत हुआ पद्मनीनाथ डूबे’ पंक्तियाँ ‘प्रियप्रवास’ के किस सर्ग की पंक्तियाँ हैं? उत्तर: c. पंचम्
  • Q. ‘जाते-जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे। तो जाके सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना।’ इन पंक्तियों से राधा के चरित्र की कौनसी विशेषता व्यक्त हो रही है – उत्तर: b. लोकहितकारिणी
  • Q. राधा जी पवन से विरह-विधुरा नायिका के चित्र को हिलाने के लिए क्यों कहती हैं? उत्तर: b. कृष्ण को विरहविदग्धा राधाजी की याद आए।
  • Q. ‘अंततः राधा जी पवन से क्या लाने के लिए कहती हैं? उत्तर: c. कृष्ण के चरण-कमलों का स्पर्श
  • Q. ‘आँसू लाते कृशित दृग से फूटती थी निराशा। छाई जाती वदन पर भी शोक की कालिमा थी। सीधे जो थे न पग पड़ते भूमि में वे बताते। चिंता द्वारा चलित उनके चित्त की वेदनायें।’ ‘प्रियप्रवास’ की यह पंक्तियाँ किससे संबंधित हैं? उत्तर: a. नंदबाबा से
  • Q. ‘वह परम अनूठे रत्न आ ले गया था।’ पंक्ति में ‘वह’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? उत्तर: c. अक्रूर
  • Q. ‘आते ही वे निपतित हुई छिन्नमूला लता-सी’ पंक्ति में किसके भूमि पर गिरने की बात कही गई है? उत्तर: b. यशोदा मैया
  • Q. उद्धव के रथ को आता देखकर ब्रज की जन-मंडली वियोगविदग्धा क्यों हो गई? उत्तर: a. यान में उद्धव को देखकर।
  • Q. ब्रज–मार्ग में खड़े वृक्ष उद्धव को कैसे प्रतीत हो रहे थे? उत्तर: c. कृष्ण की प्रतीक्षा करते जनसमुदाय के समान
  • Q. ‘जहाँ रहे श्याम सदा सुखी रहें। न भूल जावें निज तात–मात को।’ यह कामना किसने की? उत्तर: b. वृद्ध पुरुष ने
  • Q. उद्धव से मिलन के समय नंद को कृष्ण से जुड़ा कौनसा प्रसंग याद आया? उत्तर: c. यमुना में डूबने से नंद को बचाना
  • Q. ‘प्यारे जीवें जगहित करें गेह चाहे न आवें’ पंक्ति किसने कही? उत्तर: c. राधा जी ने
  • Q. प्रियप्रवास के षोडश सर्ग में किस भक्ति का चित्रण किया गया है? उत्तर: c. नवधा भक्ति
  • Q. नवधा भक्ति का संदेश प्रियप्रवास में किसने दिया? उत्तर: a. राधा ने
  • Q. ‘तेरा होना विकल सुभगे बुद्धिमत्ता नहीं है। क्या प्यारे की बदन–छवि तू इन्दु में है न पाती।’ इन पंक्तियों में राधा जी किसे उद्बोधन दे रही हैं? उत्तर: a. विपन्ना ब्रज बाला को