स्त्री-विमर्श के संदर्भ में मीराबाई का मूल्यांकन करें।


  • स्त्री चेतना और मीरा का काव्य।
    मध्यकाल में स्त्री-विमर्श के रूप में मीरा की भूमिका।
    मीरा की स्त्री चेतना।
    मीराबाई : हिन्दी की पहली स्त्री-विमर्शकार।

 विमर्श का अर्थ है जीवंत बहस। किसी की समस्या या स्थिति को एक कोण से न देख कर भिन्न दृष्टिकोणों, दृष्टियों, संस्थाओं का समाहार करते हुए उलट-पुलट कर देखना, उसे समग्रता से समझने की कोशिश करना ही विमर्श है।

 इस प्रकार स्त्री विमर्श का अर्थ है स्त्री को केन्द्र में रख कर समाज, संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का पुनरीक्षण करते हुए स्त्री की स्थिति पर मानवीय दृष्टि से विचार करने की अनवरत प्रक्रिया।

 स्त्री विमर्श मुख्य रूप से उत्तर आधुनिक युग का एक ऐसा वैचारिक नारी आंदोलन है जिसमें ज्ञान और अध्ययन के, विभिन्न अनुशासनों में पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में स्त्री की उपस्थिति, सहयोग और उसके महत्व की विवेचना पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

मध्ययुगीन समाज में स्त्री की भूमिकाएं कान की स्त्री से भिन्न थी। उसके लिए उड़न भरने के लिए अनंत आकाश नहीं था। तत्कालीन समाज में किसी स्त्री को मुक्ति की साधन, सुलभ न थी।

• सामाजिक रूप से पतनशील मध्यकाल में मीरा ही ऐसी अकेली हैं जिन्होंने व्यक्ति स्वतंत्रता का आह्वान कर सामाजिक रूढ़ियों और गलत मान्यताओं को तिलांजलि देने का अद्भुत साहस किया।

मीरा की विद्रोही चेतना पर प्रकाश डालते हुए डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय लिखते हैं-

“घर-घर-कुल-समान के बंधन तोड़कर सड़क पर उतरी, जात-पात को ढह दिखाती मीरा अपने बंधन की श्रृंखला तोड़ व ऊँच-नीच का जग-बंध भी चौपट कर दिया।।”

साहित्यकार अपने जीवनानुभवों को साहित्य में अभिव्यक्त करता है। साथ ही वह समाज में आ गयी एवं विकृतियों एवं उनके समाधान को भी अपने साहित्य में देने की कोशिश करता है। इसी तरह मीरा ने भी अपनी कविताओं में “स्व” के माध्यम से स्त्री संघर्ष को उद्घाटित किया है।

•  स्त्री पराधीनता व यातना बोध –

मीरा के जीवन में अनेक जटिलताएँ एवं बदनामी थी। राजकुल की बेटी/बहू होने के कारण उन्हें समाज द्वारा “अमानवीय पीड़ा सहनी पड़ी। उनकी कविता में एक ओर सामंती समाज में स्त्री की पराधीनता और यातना का बोध है तो दूसरी ओर इस व्यवस्था के बंधनों का पूरी तरह से निषेध और उससे स्वतंत्रता के लिए संघर्ष भी है।

 • सती प्रथा का विरोध –

उस समय की प्रथानुसार पति के मर जाने पर स्त्री अपने पति की चिता के साथ सती हो जाती थी। तत्कालीन व्यवस्था में सती प्रथा की अमानवीयता को महसूस न करके इसे स्त्री के त्याग व बलिदान से जोड़ा जाता था। मीरा ने पति की मृत्यु के बाद इसी क्रूर व्यवस्था को अपनाने से मना कर दिया। वे विधवा होने के बाद भी कुल की रीति को नहीं अपनाती व सती होना स्वीकार नहीं करती क्योंकि वे कृष्ण को अपना पति मानकर स्वयं को सुहागिनी घोषित करती हैं-

[गिरधर गास्याँ सती न होस्याँ]

[मन मोह्यो घने नामी ॥]

•पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था का विरोध/स्त्री अस्तित्व की आवाज़ उठाना –

मीरा ने स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबर की माँग की, वे चाहती थी जिस प्रकार पुरुष अपने निर्णय लेता है, उसी प्रकार स्त्री भी अपने निर्णय स्वयं ले। इस कारण उन्होंने अनेक कष्ट सहे। समाज के दबाव/तानों से भी मीरा नहीं डरी।

[राणाजी म्हाने या बदनामी लगे मीठी]

[कोई निन्दो कोई बिन्दो, मैं चलूँगी चाल अपूठी ॥]

•कुल मर्यादा/लोकलाज को चुनौती / मीरा विरोधियों को चुनौती देती हैं –

मीरा कहती हैं कि कुल मर्यादा और लोकलाज के नाम पर में अपनी स्वतंत्रता का हनन नहीं होने दूँगी। अगर तुम्हें मेरी आस्था या संकल्प से कोई परेशानी है तो तुम अपने घर में पर्दा कर लो

[लोकलाज कुल काण जगत की, दइ बहाय जस पाणी]

[अपने घर का परदा करले, मैं अबला बौराणी ॥]

• स्त्री-बंधनों से मुक्ति –

जहाँ पर्दा या घूंघट का चलन वर्तमान में भी विद्यमान है, वहाँ मध्यकालीन समय में स्त्री द्वारा सब बंधन तोड़ना तत्कालीन समाज के लिए असहनीय था। लेकिन मीरा को निंदा की कोई परवाह नहीं थी। सास-नंद उनसे लड़ती थी, उन्हें जली-कटी बातें सुनाती हैं, ताले में बंद कर उनके आवागमन पर रोक भी लगा दी गयी है-

• हली म्हासूँ हरि बिन रह्यो न जाय।

सासू लड़े मेरी ननद खिज्वावै, राणा रह्या रिसाय ॥

• सास बुरी mhari ननद छैली,जल बल होय जाय अंगीठी

• कुरीतियों/रूढ़ियों पर प्रहार –

मीरा साधुओं के साथ बैठकर सत्संग करने लगी, मंदिर जाने लगी व भजन कीर्तन करने लगी, उन्होंने गृह त्याग किया। उन्होंने स्त्री पराधीनता को चुनौती दी। तत्कालीन समाज स्त्री न तो संन्यास लेती थी न तीर्थ पर जाती थी। पहली बार मीरा ने इस रूढ़ि पर प्रहार किया।

 इसके अतिरिक्त मीरा ने कार्यक्षेत्र की विभाजन रेखा को भी चुनौती दी। 16 वीं शती में मीरा ने घर-बाहर की सीमाओं से अस्वीकार कर सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखा और संतों के साथ वृंदावन व द्वारका तक की यात्राएँ कीं। इन सीमाओं को तोड़ने के कारण ही मीरा को विद्रोही कहा जाता है। वे समाज की परवाह न करके रैदास को अपना गुरु बनाती हैं-

मीराबाई उठै तो जात से चमार

हूँ तो बड़ाँ घरां री धावड़ीं एजी

मीरा की स्वातंत्र्य चेतना, खुलकर विरोध करने की भावना और साहस हमें आज भी प्रभावित करते हैं। उनके समय में आज जैसे संचार माध्यम व नारी संगठन नहीं थे जिनमें सभी स्त्रियाँ मिलकर एक साथ अपने शोषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर सकें।

इसलिए आज के समय में स्त्री विमर्श पर विचार करते हुए मीरा की स्त्री चेतना पर विचार करना नितांत आवश्यक व प्रासंगिक है। मीरा मध्यकाल में स्त्री अस्मिता को प्रमाणित करने वाली यशस्वी स्त्री के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके व्यक्तित्व में तत्कालीन नारी जाति की व्यथा और उसकी समस्याएँ अन्तर्निहित हैं। यही कारण है कि भक्त मीरा की तुलना में उनका रचनाकार रूप विराटतर हो गया है