श्री लाल शुक्ल एक हिंदी व्यंग्यकार, उपन्यासकार और निबंधकार थे, जो अपनी तीखी और यथार्थवादी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में काम किया और स्वतंत्रता के बाद भारत में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के पतन को उजागर करने वाली कई प्रसिद्ध कृतियाँ लिखीं।
श्री लाल शुक्ल के लेखन की शुरुआत वर्ष 1958 में कहानियों और निबंध – ‘अंगद का पाँव’ के प्रकाशन से हुई। उनका पहला उपन्यास ‘सूनी घाटी का सूरज‘ वर्ष 1957 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1970 में प्रकाशित, साहित्य अकादमी पुरस्कृत उनका अत्यंत प्रसिद्ध उपन्यास ‘राग दरबारी‘ – हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है तथा इसे आधुनिक क्लासिक्स का दर्जा प्राप्त है।
राग दरबारी उपन्यास के बारे में आलोचक नामवर सिंह ने कहा था :
“स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज का समझने के लिए जिन रचनाकारों ने अपने तर्क निर्मित किए हैं, उनमें श्रीलाल शुक्ल का महत्व अद्वितीय है। राग दरबारी उनकी ऐसी अमर कृति है जिसने हिंदी रचनाशीलता को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुयश दिलाया।”
प्रमुख उपन्यास :-
सूनी घाटी का सूरज (1957)
अज्ञातवास (1962)
राग दरबारी (1968)
सीमाएँ टूटती हैं (1970)
मकान (1979)
पहला पड़ाव (1987)
राग-विराग (2001)
राग दरबारी :-
यह एक ऐसा उपन्यास है जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को स्पष्टता और निर्ममता से अनावृत करता है। यह मानवीय संबंधों के खोखलेपन को उजागर करता है। कुल 35 भागों में यह उपन्यास है। उपन्यास के प्रमुख पात्र – वैद्यजी, रुप्पन बाबू, बद्री पहलवान, शंगनाथ, छोटा पहलवान, प्रिंसिपल साहब, जगन्नाथ, सनीचर, लंगड़ इत्यादि हैं।
नामवर सिंह के अनुसार
“राग दरबारी ग्रामीण यथार्थ की क्रूरता को बहुत निर्मम भाव से उजागर कर सका है।”
शांतिस्वरूप गुप्त के अनुसार
“समाज का प्रतिनिधित्व – की दृष्टि से ‘राग दरबारी’ को महाकाव्यात्मक उपन्यास कहने में कोई संकोच नहीं होता।”
राग दरबारी : संरचना शिल्प
• व्यंग्य – शैली और भाषिक भंगिमा
अपनी व्यंग्य – शैली और भाषिक भंगिमा के कारण “राग-दरबारी” अपने समकालीन उपन्यासों से भिन्न प्रकृति का है। पारंपरिक औपन्यासिक शिल्प का परित्याग कर एकदम भिन्न शैली अपनाकर श्री लाल शुक्ल ने अपनी सृजन – क्षमता का पूरा परिचय दिया है।
ग्रामीण – गंवार पात्रों के बीच रहकर कितनी कठिन जिंदगी शुक्ल को बितानी पड़ी। पात्रों की बोली-बानी इतनी हावी हो जाती है कि जीवन और रिश्तेनातों के बीच उन्हें तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
राग दरबारी में चकाचौंध, कटुता, लाफ़ेबाजी, गिटिर-पिटिर, फ़िसड्-फ़िसड् आदि शब्द : शब्दों का प्रयोग इस बात का प्रमाण है।
छोटे पहलवान की एक वार्ता का उदाहरण – “अरे गुरु कहा है, टन पर नहीं लटला, पान खाय अलबत्ता।”
उपन्यासकार ने व्यंग्य शैली व स्वयं अपनी भाषा का भी अत्यंत सावधानी से निर्माण किया है, जिसमें व्यंग्यात्मक तेवर अभिव्यक्ति को धारदार बनाते हैं।
उपन्यासकार ने व्यंग्य शैली व स्वयं अपनी भाषा का भी अत्यंत सावधानी से निर्माण किया है, जिसमें व्यंग्यात्मक तेवर अभिव्यक्ति को धारदार बनाते हैं।
भाषा प्रयोग के विविध रू
उपन्यास में जीवन के अनेक प्रसंगों और स्थितियों की योजना के अनुसार भाषा परिवर्तित होती है। सामाजिक व्यवहार की विश्वसनीयता के द्वारा प्रतिपादित होती है। उदाहरण के लिए स्कूल के शिक्षक, गयानाथ, बद्री पहलवान, रुप्पन बाबू आदि अनेक पात्र हैं, जिनकी भाषा, बोलने का लहजा आदि एक खास-प्रकार की पृष्ठभूमि को पाठक के सामने उपस्थित करते हैं।
रंगनाथ की भाषा में बौद्धिकता है, वैद्यजी की भाषा का लहजा लोचदार है — ।
शब्दावली चयन
गए हैं। लोक जीवन के क्षेत्रीय शब्दावली और तद्भव दोनों प्रकार के शब्दों का अवसरानुकूल प्रयोग किया गया है।
सबसे बड़ी विशेषता है, सभी पात्रों को अपने चरित्र के अनुकूल भाषा और उनके द्वारा प्रयुक्त शब्दों का मिज़ाज।
इसके साथ ही हिंदी में आगत शब्दों – जैसे अंग्रेज़ी, फ़ारसी, अरबी शब्दों के प्रयोग में भी उन्हें किसी प्रकार की झिझक नहीं दिखाई देती।
यहाँ स्वयं द्वारा दी गयी टिप्पणियों, चित्रों, वातावरण की दृष्टि से भाषा और शब्द-विन्यास पर भी विचार करना आवश्यक है।
• संस्कृत – तत्सम शब्द – जनता, बलात्कार, सत्य, ख़ाद्य, हस्तकौशल आदि।
• संस्कृत & तद्भव शब्द – पानी, मवेशी, मच्छर, दिन, रात।
• उर्दू शब्द – शहर, किनारा, देहात, मनपसंद, मुकाबला, निगाह, सबूत—।
• अंग्रेज़ी शब्द – ट्रक, पुलिस, ड्राइवर, पेट्रोल स्टेशन–।

