भाषा’ शब्द संस्कृत के ‘भाष्‘ धातु से निष्पन्न है जिसका अर्थ है व्यक्त वाणी। इस प्रकार से इस धातु के अर्थ में ही भाषा का लक्षण विद्यमान है। व्यक्त वाणी का अर्थ है स्पष्ट और पूर्ण अभिव्यक्ति।

 इंग्लिश में भाषा के लिए language शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिसका संबंध लैटिन के शब्द lingua से एवं फ़्रांसीसी शब्द langue से है।

 किसी भाषा की परिभाषा देना कठिन कार्य है। परिभाषा बनाते समय 3 दोषों से बचने की चेष्टा करनी चाहिए।

1. अव्याप्ति – जितने पर परिभाषा लागू होनी चाहिए उतने पर लागू न हो

2. अतिव्याप्ति – जितने पर परिभाषा लागू होनी चाहिए, उससे अधिक पर लागू हो

3. असंभव – परिभाषा किसी पर भी लागू न हो।

– आधुनिक भाषा वैज्ञानिकों द्वारा दी गई परिभाषाएं –

भारतीय विद्वान –

1. पतंजलि – “व्यक्ता वाचि वर्णा येषां त इमे व्यक्तवाचः” अर्थात् जो वाणी वर्णों में व्यक्त हो उसे भाषा कहते हैं।

2. कामदा प्रसाद गुरु – “भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकते हैं।”

3. बाबू राम सक्सेना – “जिस ध्वनि चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार – विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं।”

4. आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा – “भाषा यादृच्छिक, रूढ़ उच्चारण संकेतों की वह प्रणाली है जिसके माध्यम से मनुष्य परस्पर विचार – विनिमय अथवा भावाभिव्यक्ति करते हैं।”

पाश्चात्य विद्वान –

1. हेनरी स्वीट – “ध्वन्यात्मक – शब्दों द्वारा विचारों का प्रकटीकरण ही भाषा है।”

2. गार्डिनर – “विचारों की अभिव्यक्ति के लिए व्यक्त एवं स्पष्ट ध्वनि संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उन्हें भाषा कहते हैं।”

1. भाषा उच्चारण ध्वनि संकेतों की व्यवस्था है –

भाषावैज्ञानिकों में वाक्यगत ध्वनियों से उच्चारण ध्वनिप्रतीक को ही भाषा कहा जाता है। भाषा को उच्चारण-संकेत कहकर उसकी ऐसी विशेषता पर बल दिया गया है जिसके द्वारा वह विचारों या भावों की अभिव्यक्ति के अन्य साधनों, जैसे इंगित आदि से अलग हो जाती है। इंगित उच्चारण संकेत नहीं है। इसी तरह लाल हरी रोशनी से अर्थ तो अभिव्यक्त हो जाता है, किन्तु उच्चारण संकेत नहीं होने के कारण वह भी भाषा की कोटि में नहीं आ सकती।

2. भाषा यादृच्छिक संकेत है –

अर्थात शब्द और अर्थ में कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है। उदाहरणार्थ – पशु विशेष को कुत्ते या घोड़ा क्यों कहते हैं, यह कहना असंभव है। यदि इन ध्वनियों और इनसे बोधित होने वाले अर्थों में कोई नियम या युक्तियुक्त पूरी संबंध होता तो सभी भाषाओं में उन वस्तुओं के लिए एक ही ध्वनियाँ प्रयुक्त होतीं; किन्तु विभिन्न भाषाओं में इनके वाचक विभिन्न शब्द हैं।

उदाहरणार्थ:-

 संस्कृत: अश्वः

 हिंदी: घोड़ा

 अंग्रेजी: horse

इन पशुओं और इनकी वाचक ध्वनियों में कोई संबंध नहीं है। यह ध्वनियाँ मनमाने ढंग से गढ़ी गईं, समाज ने इन्हें स्वीकार कर लिया और ये इन पशुओं का बोधक बन गयीं।

3. भाषा के ध्वनि-संकेत रूढ़ अर्थ विशेष में प्रसिद्ध होते हैं –

यह प्रसिद्ध परंपरा से प्राप्त होती है। पहले से लोगों से सुनकर आज जन्म लेने वाला बच्चा उस प्रयोग करते आ रहे हैं। उसे सुनकर आज जन्म लेने वाला बच्चा उस वस्तु के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने लगता है। वह यह नहीं समझता,न समझने की कोशिश करता है और न कोशिश करने पर सफल होगा कि इसे घोड़ा क्यों कहा गया। वह तर्कहीन प्रयोग-प्रवाह ही शब्द है। किसी भी भाषा में लिखने योग्य संकेत होते हैं, वे प्रायः रूढ़ ही होते हैं।

1. भाषा एक प्रकार की संरचना या व्यवस्था है –

भाषा में अन्तर्निहित नियमबद्धता होती है। इसीलिए इसे संरचना की व्यवस्था कहा गया है। वाक्य और अर्थ में यादृच्छिक संबंध होता है तथा वह रूढ़ या परंपरा से प्राप्त होता है, किन्तु भाषा के सफल प्रयोग के लिए उसके अन्तर्निहित नियमों का पालन भी अनिवार्य होता है।

जैसे इन 2 वाक्यों को लें –

क) लड़का पढ़ता है  ख) लड़की पढ़ती है

अतः यदि कोई लड़का पढ़ती है कहे तो व्याकरण या भाषाविज्ञान को जाननेवाला हिंदी भाषाभाषी भी इसे अशुद्ध (नियमविरुद्ध) वाक्य बताएगा। इतना ही नहीं, कई भाषाओं में तो नियम के अज्ञान से अर्थ का अनर्थ हो सकता है।

नियमावलियाँ केवल वाक्य के स्तर पर ही नहीं होतीं बल्कि शब्दों की संरचना में भी होती हैं। प्रत्येक भाषा की नियम व्यवस्था भी अलग – अलग होती है।

भाषा की विशेषताएँ, प्रकृति एवं प्रवृत्तियाँ-

1. भाषा परिवर्तनशील है :-

भाषा परिवर्तित होने वाली वस्तु है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण परिवर्तन में मात्रा का अन्तर भले ही हो, परिवर्तन का क्रम अनिवार्य है। यह परिवर्तन भाषा के सभी तत्व – ध्वनि, शब्द, व्याकरण, अर्थ में पाया जाता है।

eg:- बिन्दु से बूँद, शावक से साड़ा, मध्य से मंह में ध्वनि-परिवर्तन स्पष्ट है।

2. भाषा स्थिरीकरण और मानकीकरण से प्रभावित होती है –

भाषा में 2 विरोधी प्रवृत्तियाँ देखी जाती हैं-

एक, विविधता और परिवर्तन दूसरी, एकता और स्थिरीकरण। परिवर्तन भाषा का अनिवार्य क्रम है, जिससे उसमें विविधता आ जाती है इसलिए एक युग की भाषा दूसरे युग की भाषा से भिन्न होती है, किंतु परिवर्तन के क्रम का नियंत्रित होना आवश्यक है वरना इतने जल्दी व अधिक परिवर्तन के कारण वह अबोधगम्य बन जाएगी। भाषा को बोधगम्य बनाए रखने के लिए परिवर्तन के क्रम व गति का नियंत्रण आवश्यक है।

3. भाषा भौगोलिक रूप से स्थानिकृत होती है :-

प्रत्येक भाषा की भौगोलिक सीमा होती है अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान की भाषा में भेद होना अनिवार्य है।

“चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी”

4.भाषा सामाजिक वस्तु है :-

भाषा की उत्पत्ति समाज से होती है और उसका विकास भी समाज में ही होता है। समाजशास्त्रियों की सुप्रसिद्ध परिभाषा के अनुसार, चाहे तो भाषा के माध्यम से भी कह सकते हैं कि, ‘भाषा समाज की, समाज के लिए, और समाज द्वारा’ निर्मित होती है। भाषा ऐसी सामाजिक वस्तु को शिशु तक पहुँचाने का काम पहले माता करती है किन्तु किस भाषा को, वह किसकी है यह समाज की संपत्ति है। समाज को छोड़कर भाषा की कल्पना नहीं हो सकती।

5. भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न है :-

भाषा प्रवाहमान है। भाषा आरम्भ हुई तब से आज तक चली आ रही है और जब तक मानव-समाज ही रहेगी, तब तक यह चलती रहेगी। भाषा की यह गतिशीलता समाज में भी और समाज के, किन्तु न तो इसे उत्पन्न कर सकता है और न इसे समाप्त कर सकता है।

6.भाषा सर्व-व्यापक है :-

मनुष्य का समस्त कार्य-कलाप भाषा से व्याप्त और संचालित है। लिखित-लिखित लेकिन का व्यवहार या शक्ति – परिसीमित है। लेकिन भाषा के बिना अकल्पनीय है।

7. भाषा सम्प्रेषण का मौखिक माध्यम है :-

सम्प्रेषण के सांकेतिक, आंगिक, लिखित अनेक रूप हैं अर्थात इनमें से किसी के द्वारा लेकिन अपना अभिप्राय दूसरों तक स्पष्ट कर सकता है। किन्तु इनमें किसी के भी द्वारा विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है। सांकेतिक या आंगिक साधनों की अपूर्णता तो स्पष्ट ही है, लिखित भी उससे मुक्त नहीं है। उच्चारण भाषा में ध्वनि के आरोह-अवरोह आदि की महिमा के द्वारा जो प्रभाव उत्पन्न हो जाता है वह लिखित भाषा में असम्भव है।

8. भाषा अर्जित वस्तु है :-

भाषा जन्मजात वस्तु नहीं है, मनुष्य भाषा सीख सकता है। जिस वातावरण और समाज में वह रहता है, उसी की भाषा सीख सकता है। अतः जिस भाषा के क्षेत्र में जो व्यक्ति उत्पन्न होता है, उसे वह अनायास सीख लेता है। भाषा के अर्जन का अर्थ यही है कि उसे अपने चारों ओर के वातावरण से सीखना पड़ता है।

9.भाषा व्यवहार द्वारा अर्जित की जाती है :-

भाषा कैसे सीखी जाती है, यह शिशुओं को देखने से स्पष्ट हो जाता है। आस-पास के बड़े लोगों को ध्वनियों का जैसा प्रयोग करते वह देखता है, वैसा ही स्वयं अनुकरण करने का प्रयास करता है। तो व्याकरण, कोश, आप्त-वाक्यआदि भाषा सीखने के और भी अनेक साधन हैं, लेकिन व्यवहार द्वारा अर्जित भाषा के बाद ही ये सम्भव हो पाते हैं। यही कारण है कि भाषा सीखने की प्रक्रिया में भारतीय विद्वानों ने व्यवहार को पहला स्थान दिया। सीखने वाले की दृष्टि से इसे अनुकरण कहेंगे किन्तु समाज की दृष्टि से व्यवहार; शिशु सामाजिक, भाषिक व्यवहार का ही अनुकरण है।

10. भाषा सहज और नैसर्गिक क्रिया है :-

भाषा 2 प्रकार से सीखी जाती है – अनुकरण द्वारा या बौद्धिक प्रयत्न द्वारा। दोनों समस्तर हैं। अनुकरण से जब आदमी भाषा सीखता है तब उसकी बुद्धि विकसित नहीं होती इसलिए उसे श्रम ज्ञान नहीं होता परंतु बुद्धि विकसित होने के बाद सचेत प्रयत्न द्वारा हम कोई दूसरी भाषा सीखते हैं तब श्रम का अनुभव होता है।

11. भाषा सामाजिक दृष्टि से गठित होती है :-

भाषा एक होने पर भी सामाजिक स्तर-भेद से भेद में अंतर आ जाता है। सभी हिन्दी बोलने वाले हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं, किन्तु सबकी एक सी हिन्दी नहीं होती। जिसका जैसा सामाजिक स्तर होता है उसकी भाषा वैसी ही होती है। यह स्तर भेद शैक्षिक, आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक, व्यावसायिक कारणों से हुआ करता है। eg:- कवि की भाषा वह नहीं होगी जो कुली की है।

यह स्तर भेद सबसे अधिक शब्द भंडार में देखा जाता है, उससे कम व्याकरण, उससे कम ध्वनि में

12. भाषा पहले उच्चारण रूप में परिवर्तित होती है :-

भाषा में परिवर्तन उसके उच्चारण और लिखित दोनों रूपों में होता है, किन्तु लिखित रूप में परिवर्तन बहुत बाद को आता है। पहले उच्चारण रूप में ही परिवर्तन होता है। किन्तु कई बार भाषा के उच्चारण रूप में परिवर्तन हो जाने पर भी लिखित रूप में परिवर्तन नहीं होता। Laughter, Daughter, Subtle आदि शब्दों के \bm{u} का उच्चारण आज बहुत बदल गया है, किन्तु उनका लिखित रूप वही है जो उच्चारण में आज से शताब्दियों पूर्व था।

13. प्रत्येक भाषा का ढाँचा स्वतन्त्र होता है :-

प्रत्येक भाषा का ढाँचा दूसरी भाषा से भिन्न होता है। eg. हिन्दी में 2 लिंग, 2 वचन, संस्कृत में 3, । कुछ भाषाओं में कुछ ध्वनियों का प्रयोग सम्भव है, पर दूसरी भाषाओं में नहीं। उदाहरणार्थ – अंग्रेजी में \bm{th, d_2}, का प्रयोग सम्भव है, जैसे data, street आदि पर जापानी में यह बिल्कुल संभव नहीं है।

14. भाषा संयोगात्मकता से वियोगात्मकता की ओर उन्मुख होती है :-

परिवर्तन के क्रम में भाषा संयोगात्मक से वियोगात्मक होती जाती है अर्थात्

synthetic अर्थात से जुड़ने शब्द की बजाय अलग से संयुक्त होने लगता

eg: “राम ने पुस्तक पढ़ी” वाक्य में ‘ने’ विभक्ति स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त हुई। इसी प्रकार वियोगात्मकता की स्थिति में ‘हॉस्पिटल’ और ‘कॉलेज’ जैसे शब्दों के स्थान पर ‘दुष्यन्त का पुत्र’ और ‘कुन्ती का पुत्र’ जैसे प्रयोग होते हैं।

निष्कर्ष :-

भाषा मानव – जीवन का महत्वपूर्ण अंग है, जिसकी अनुभूति हमारी साँसों और हर क्रिया में समाई रहती है। भाषा का ज्ञान मनुष्य को पशु से अलगता है। भाषा एक सामाजिक व्यवस्था और व्यवहार है। इसका प्रयोग समाज के भीतर अपने भाव-ज्ञान की अभिव्यक्ति और परस्पर विचार-विनिमय का माध्यम है।