भूमिका
भाषा-विज्ञान शब्द 2 शब्दों से मिलकर बना है –
भाषा + विज्ञान
अर्थात – भाषा का वैज्ञानिक, तर्कपूर्ण, विश्लेषणात्मक और व्यवस्थित अध्ययन ही भाषा-विज्ञान कहलाता है।
भाषा-विज्ञान वह शास्त्र है जो यह बताता है कि भाषा कैसे उत्पन्न होती है, कैसे विकसित होती है, कैसे बदलती है और किस प्रकार मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं को भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है।
भाषा-विज्ञान का अर्थ केवल भाषा के व्याकरण से नहीं है।
भाषा-विज्ञान की परिभाषाएँ
1. Bloomfield – “Linguistics is the scientific study of language.”
2. डॉ. सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय – “भाषा विज्ञान वह शास्त्र है जो भाषा के रूप, कार्य, अर्थ और विकास का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।”
1. डॉ राहुल सांकृत्यायन – “भाषा-विज्ञान भाषा के शरीर और आत्मा दोनों का अध्ययन है – उसके स्वरूप, अर्थ और सामाजिक उपयोग का।”
भाषा विज्ञान प्रमुख शाखाएँ
• ध्वनि विज्ञान
• रूप विज्ञान
• वाक्य विज्ञान
• अर्थ विज्ञान
• प्रयोग विज्ञान
• समाज भाषा विज्ञान
• मानसिक भाषा विज्ञान
• ऐतिहासिक भाषा विज्ञान
भाषा, मानव समाज का आधार है। यह विचार, भाव और ज्ञान के संप्रेषण का सबसे प्रभावी साधन है। भाषा का अध्ययन प्राचीन काल से होता आया है, परंतु आधुनिक भाषा-विज्ञान ने भाषा को वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखा है।
यह भाषा को केवल व्याकरणिक नियमों का समूह न मानकर एक जीवंत सामाजिक प्रक्रिया के रूप में समझता है।
आधुनिक भाषा-विज्ञान का विकास-क्रम
19वीं शताब्दी में जब यूरोप में तुलनात्मक पद्धति का विकास हुआ, तब भाषाओं के पारिवारिक संबंधों की खोज प्रारंभ हुई। इस युग में संस्कृत भाषा के अध्ययन ने यूरोप विद्वानों को आकर्षित किया और उन्होंने भारतीय भाषाओं को वैज्ञानिक दृष्टि से परखना। 20वीं शताब्दी में भाषा के संरचनात्मक पहलुओं का अध्ययन शुरू हुआ।
प्रमुख विद्वानों का योगदान
1. बिशप काल्डवेल (Bishop Caldwell)
दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं के महत्वपूर्ण विद्वान।
उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “A Comparative Grammar of the Dravidian or south Indian Family of Languages” में यह सिद्ध किया कि तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाएँ संस्कृत की शाखाएँ नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्र द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित हैं।
2. जॉन बीम्स (John Beames)
इनकी ग्रन्थ “Comparative Grammar of the Modern Aryan Languages of India” आधुनिक आर्य भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन है।
उन्होंने हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, मराठी आदि भाषाओं की संरचना और विकास का विश्लेषण किया।
बीम्स ने आर्य भाषाओं की आपसी समानताओं और ऐतिहासिक क्रम को वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया।
3. पादरी – कैलॉग
उन्होंने ‘A Grammar of the Hindi Language’ की रचना की।
कैलॉग ने हिंदी की ध्वनियों, शब्दरचना और वाक्य-विन्यास का वैज्ञानिक विश्लेषण किया और इसे स्वतंत्र भाषा के रूप में स्थापित किया।
4. डॉ. श्रीराम गोपाल भण्डारकर
भण्डारकर संस्कृत के सम्पादक विद्वान होने के साथ ही साथ आधुनिक यूरोप भाषाविज्ञान पद्धति से भी भली-भाँति परिचित थे।
आपने प्राचीन तथा मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषाओं पर आधुनिक दृष्टि से विचार किया। सन 1877 में इन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय में ‘विल्सन फिलोलोजीकल लेक्चर्स’ व्याख्यान माला के अन्तर्गत भारतीय भाषाओं पर 7 व्याख्यान दिये थे, जो बाद में ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित हुए।
5. डॉ. हार्नले
इनका विख्यात ग्रन्थ “Grammar of the Eastern Hindi, Compared with other indian languages” है।
इन्होंने आधुनिक भारतीय आर्य-भाषाओं में बिहारी तथा अवधी को ही पूर्वी हिन्दी कहा है। भोजपुरी पर विस्तृत विचार तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं से सम्बन्धित ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक सामग्री इस ग्रन्थ की अन्य विशेषताएँ हैं।
6. राल्फ लिली टर्नर
इन्होंने ‘A Comparative Dictionary of the Indo-Aryan Languages’ की रचना की। जिसमें संस्कृत से लेकर आधुनिक आर्य भाषाओं तक के शब्दों का व्युत्पत्तिशास्त्रीय अध्ययन किया गया। इसका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘Nepali Dictionary’ है, जिसमें आर्य – भाषाओं को आधार बनाया गया। इसमें पहली बार आर्य – भाषाओं के शब्द-समूह का तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत किया।
7. जूल ब्लॉक
फ्रांसीसी विद्वान जिन्होंने मराठी और द्रविड़ भाषाओं की संरचना पर कार्य किया।
“La Formation de la Language Marathi”
“La Indo Aryan Structure Grammatical des Langus Dravidiennes” अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
8. जॉर्ज ग्रियर्सन
भारतीय भाषाविज्ञान के क्षेत्र में उनका नाम सर्वोपरि है।
उन्होंने ‘Linguistic Survey of India’ नामक विशाल सर्वेक्षण किया जिसमें भारतीय रूप से अधिक भाषाओं और बोलियों का वर्णन किया गया। उन्होंने भारतीय भाषाओं को आर्य, द्रविड़, ऑस्ट्रिक और चीनी-तिब्बती भाषा-परिवारों में वर्गीकृत किया।
9. फर्डिनेंड द सोस्यूर
आधुनिक भाषा विज्ञान के जनक माने जाते हैं।
उनकी प्रसिद्ध कृति ‘A Course in General Linguistics’ ने भाषा-विज्ञान को एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में स्थापित किया। इन्होंने भाषा के Synchronic and Diachronic अध्ययन का सिद्धांत दिया। उन्होंने Langue और Parole में अंतर स्पष्ट किया। इनका संरचनात्मक दृष्टिकोण आगे चलकर भाषाविज्ञान, साहित्य और मानवशास्त्र के अध्ययन की आधारशिला बना।
निष्कर्ष
इन सभी विद्वानों ने यह सिद्ध किया कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति और समाज का प्रतिबिंब है। आज आधुनिक भाषा-विज्ञान की शाखाएँ – ध्वनि विज्ञान, रूप-विज्ञान, वाक्य-विज्ञान, समाज-भाषाविज्ञान, मनो-भाषाविज्ञान आदि – -इन्हीं महान विद्वानों की वैज्ञानिक सोच और योगदान का परिणाम हैं।
