भूमिंका

भाषा परिवार से अभिप्राय ऐसे समूह से है जिसमें सम्मिलित सभी भाषाएं किसी एक समान मूल भाषा से विकसित हुई हों। यह भाषाओं के ऐतिहासिक विकास को समझने में सहायक हैं। भाषाओं की समानताओं और भिन्नताओं का वैज्ञानिक अध्ययन संभव बनाता है।

 डॉ. सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय – “जब एक ही मूल भाषा के से समय, स्थान और सामाजिक परिवर्तन के प्रभाव से नई – नई भाषाएं विकसित होती हैं, तो उनका समूह भाषा परिवार कहलाता है।

भारत के प्रमुख भाषा परिवार

 •इंडो – आर्य परिवार

 हिन्दी, संस्कृत, बंगला, मराठी, गुजराती, उड़िया

• द्रविड़ परिवार

 तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम, गोंडी

 •ऑस्ट्रो – एशियाईक परिवार

 मुंडा, संथाली, हो, खखाली

 •तिब्बती – बर्मी परिवार

 बोड़ो, मिजो, मणिपुरी

द्रविड़ परिवार

द्रविड़ भाषा परिवार भारत के सबसे प्राचीन और विशिष्ट भाषा – समूह में से एक है। यह मुख्यतः दक्षिण भारत में बोली जाने वाली भाषाओं का समूह है, जिसमें तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयालम जैसी समृद्ध भाषाएँ आती हैं। इस परिवार की भाषाओं का अपना एक स्वतंत्र व्याकरण, ध्वनितंत्र और शब्द-भंडार है, जो आर्य भाषाओं से भिन्न है।

दक्षिण भाषाओं का मूल दक्षिण भारत, श्रीलंका, और आंशिक रूप से मध्य भारत में पाया जाता है। यह भाषा परिवार संभवतः सिंधु-घाटी सभ्यता के लोगों की भाषा से जुड़ा माना जाता है।

 • Robert caldwell ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक A comparative Grammar of the Dravidian or South Indian Family of Languages में पहली बार द्रविड़ भाषाओं को एक स्वतंत्र भाषा परिवार सिद्ध किया।

 • डॉ. सुनीति कुमार ने कहा कि द्रविड़ भाषाएँ भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से एक हैं।

द्रविड़ परिवार की मुख्य भाषाएँ

इस परिवार में लगभग 25 भाषाएँ हैं जिन्हें द्रविड़ वर्ग, मध्यवर्ती वर्ग, आन्ध्र वर्ग, तथा बाहरी वर्ग इन 4 वर्गों में बाँटा जाता है।

1.तमिल

यह भाषा इनमें सबसे प्राचीन तथा समृद्ध है। इसका भाषिक क्षेत्र वर्तमान तमिलनाडु (मद्रास) है। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत के कुछ अन्य राज्य, उत्तरी श्री लंका में यह बोली जाती है। तमिल-भाषियों की संख्या 8 करोड़ से अधिक है।

 तमिल भाषा की लिपि वट्टेळुत्तु कहलाती है, जिसकी व्युत्पत्ति ब्राह्मीलिपि से मानी जाती है।

 पण्डित तमिल भाषा की 3 शैलियाँ हैं- सेन (संस्कृत), कोडुन (बोली-चाल शैली), मणि प्रवाल (साहित्यिक शैली) है।

 तमिल भाषा की वर्णमाला से 12 स्वर, 18 व्यंजन है। तमिल का ‘ळ’ मूर्धन्य है।

2.तेलगू

तेलगू वर्तमान आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की भाषा है तथा वहाँ की राजभाषा है। तेलगु व कन्नड़ भाषा की लिपि एक ही है, सिर्फ कुछ वर्णों के आकारों में अंतर है व मात्रा लिखने कि शैली भिन्न है।

 तेलगू भाषा और इसके साहित्य पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है, इसी कारण इसे Italion of the South भाषा के समान स्वतन्त्र हैं,

 16 स्वर 38 व्यंजन

 भारत की तीसरी सबसे अधिक बोले जाने वाली, in world 15th

 8.2 crore बोलने वाले।

3.मलयालम

इस शब्द की व्युत्पत्ति मलै (पर्वत) + आलम (शासन का प्रदेश) से हुई है अर्थात पर्वतीय क्षेत्र। यह केरल क्षेत्र की राजभाषा है। इसकी उत्पत्ति 9 वीं शताब्दी में तमिल से मानी जाती है। संस्कृत के प्रभाव तथा उत्तम प्रचुरता में लिंग भेद नहीं होता। मलयालम की लिपि तमिल से सम्बद्ध है। इसमें सारे महाप्राण व्यंजन लिये जाते हैं।

4.कन्नड़

कन्नड़ की व्युत्पत्ति ‘कर + नाडु’ से मानी जाती है। जिसके 2 अर्थ माने जाते हैं, 1. काली मिट्टी का क्षेत्र और ऊँची भूमि। श्री आर० नरसिंहाचार्य ने कन्नड़ की व्युत्पत्ति करिमित् + नाडु (सुगन्ध का देश) से मानी है। यह कर्नाटक राज्य की राजभाषा है। कन्नड़ का प्राचीनतम रूप 450 ई. के हलमिडी शिलालेख से मिलता है। इस भाषा का सबसे पुराना ग्रन्थ ‘कविराज मार्ग’ है। ‘हले’ इसकी विभाषा है जो दक्षिण कन्नड़ जिले में बोली जाती है।

द्रविड़ भाषाओं की प्रधान विशेषता

1.प्रधानत: इस परिवार की भाषाएँ अश्लिष्ट अन्त योगात्मक हैं।

2. शब्दान्त व्यंजन के उच्चारण में प्रायः उकार की ध्वनि जोड़ ली जाती है। 6 ‘आप’ का 6 ‘आपु’ या 6 ‘शाम’ का ‘शामु’ ।

3. द्रविड़ भाषाओं में स्वर – अनुरुपता मिलती है। मूल शब्द के स्वरों के अनुसार ही प्रत्ययों का रूप संयोग के समय परिवर्तित हो जाता है।

4. द्रविड़ भाषाओं में मूर्धन्य का प्राधान्य है।

5. द्रविड़ परिवार की भाषाओं में 2 ही वचन होते हैं। बहुवचन प्रत्यय के संयोग से बनता है।

6. द्रविड़ भाषा में 3 लिंग माने जाते हैं। निर्जीव पदार्थ नपुंसक लिंग में आते हैं।

7. इन भाषाओं में गिनती 100 पर आधारित होती है।

8. द्रविड़ भाषाओं में द्विरुक्त रूप होते ही नहीं, इन भाषाओं में संज्ञा के 2 रूप होते हैं 1. उच्च 2. निम्न । कुछ संज्ञाएँ क्रिया का कार्य भी करती हैं।

निष्कर्ष

द्रविड़ भाषाएँ भारत की प्राचीन और समृद्ध भाषिक परंपरा का आधार हैं, जिन्होंने दक्षिण भारत की सांस्कृतिक पहचान को गहराई दी है। भाषाविद् जॉर्ज ग्रियर्सन का मत है कि द्रविड़ भाषाओं की पूर्णतः स्वतंत्रता असंदिग्ध है, क्योंकि इसमें संस्कृत और प्राकृत के अनेक तत्त्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।