
भारतीय आर्यभाषा
संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति, दर्शन और सभ्यता की सबसे प्राचीन और गौरवशाली भाषा मानी जाती है। इसे “देवभाषा”, “वेदों की भाषा” कहा गया है। संस्कृत न केवल धार्मिक ग्रन्थों की भाषा रही, बल्कि इसमें भारत के इतिहास, समाज और विज्ञान के सभी पक्षों की अभिव्यक्ति की।
“लौकिक” शब्द का अर्थ है – “लोक में प्रयुक्त”, अर्थात वह भाषा जो लोक व्यवहार, काव्य, नाटक, दर्शन, इतिहास में प्रयुक्त हो। इस रूप का विकास वैदिक काल के पश्चात (800-500 ई.पू) में हुआ।
“संस्कृत” का अर्थ है जिसका संस्कार (परिमार्जन) कर दिया गया है।
वैदिक संस्कृत में 3 रूपों का उल्लेख था उनमें से लौकिक संस्कृत का मूल – आधार पश्चिमोत्तरी बोली थी। पाणिनि ने इसी भाषा को व्याकरणबद्ध कर अष्टाध्यायी की रचना की।
लौकिक संस्कृत को संस्कृत, क्लासिकल संस्कृत, साहित्यिक संस्कृत, इत्यादि नामों से जाना जाता है। लौकिक संस्कृत केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय मन और चेतना की भाषा थी। इसके रामायण, महाभारत, पुराण तथा कालिदास, भवभूति, भास जैसे कवियों के रचनात्मक ग्रन्थ रचे गए।
कवि पतंजलि – संस्कृत नाम भाषासंस्कार:
Max muller – classical sanskrit is the perfectly polished & grammatically refined form of the ancient vedic tongue
लौकिक संस्कृत की विशेषताएँ :-
1. लौकिक संस्कृत में शब्द रूप व धातु रूपों में वैकल्पिक रूपों की न्यूनता हो गई।
2. संधि नियमों की अनिवार्यत हो गई।
3. लेट् लकार का अभाव हो गया।
4. वैदिक संस्कृत में 52 ध्वनियाँ थी, उनमें से 4 ध्वनियाँ लौकिक संस्कृत में लुप्त हो गई और 48 ध्वनियाँ शेष रह गईं।
5. लौकिक संस्कृत में ळ, ळ्ह नहीं रहे।
6. संगीतात्मक स्वर के स्थान पर बलात्मक स्वर का प्रयोग होने लगा।
7.उपसर्गों का स्वतंत्र प्रयोग नहीं रहा।
8. भाषा में समासों का प्रयोग समाप्त हो गया।
9. लौकिक संस्कृत में अनुस्वार के 2 रूप हो गए (अनुस्वार, अनुनासिक)। अनुस्वार (ं) की स्वतंत्र सत्ता है, यह नासिका ध्वनि है। अनुनासिक (ँ) स्वतंत्र है।
संस्कृत भाषा की ध्वनियाँ
संस्कृत में 48 ध्वनियाँ हैं, जो इस प्रकार हैं –
स्वर (13)
मूल स्वर – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ओ = 11
संयुक्त स्वर – ऐ, औ = 2
व्यंजन –
स्पर्श –
क ख ग घ ङ (कण्ठ्य)
च छ ज झ ञ (तालव्य)
ट ठ ड ढ ण (मूर्द्धन्य)
त थ द ध न (दन्त्य)
प फ ब भ म (ओष्ठ्य) = 25
अन्तस्थ – य र ल व = 4
उष्म संघर्षी – श ष स = 3
घोष ऊष्म – ह (विसर्ग) = 1
शुद्ध अनुनासिक – (अनुस्वार) = 1
कुल = 48
