रामधारी सिंह दिनकर: ‘उर्वशी’ काव्य एवं महत्वपूर्ण Notes

तृतीय अंक –उर्वशी important notes for NET/SET

अध्ययनकाल में कवि की ‘बारदोली-विजय’ और ‘प्रणभंग’ प्रकाशित।

•  1961 – गीतिनाट्य, काव्य-नाटक

 • 1972 ज्ञानपीठ पुरस्कार

•  8 वर्षों में पूर्ण काव्य

•  पुरूरवा-उर्वशी के ऋग्वेद में वर्णित प्राचीन आख्यान पर आधारित कृति।

 • 5 अंकों में विभक्त कामाध्यात्म की रचना।

•  हजारीप्रसाद द्विवेदी –

 “दिनकर जी अहिंदीभाषियों के बीच हिंदी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे।”

 • हरिवंश राय बच्चन –

 “दिनकर जी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी-सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये।”

•  नामवर सिंह –

 “दिनकर जी अपने युग के सचमुच सूर्य थे।”

 स्वयं दिनकर उर्वशी के सन्दर्भ में – (भूमिका)

*  “इस कथा को लेने में वैदिक आख्यान की पुनरावृत्ति अथवा वैदिक प्रसंग का प्रत्यावर्तन मेरा ध्येय नहीं रहा। मेरी दृष्टि में पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है और उर्वशी सनातन नारी का।”

*  “मनुष्य के इस द्वन्द्व का, साकार से ऊपर उठकर निराकार तक जाने की इस आकुलता अथवा ऐन्द्रियता से निकलकर अतीन्द्रिय जगत् में आँख खोलने की इस उमंग का प्रतीक पुरूरवा है किन्तु उर्वशी द्वन्द्वों से सर्वथा मुक्त है। देवियों में द्वन्द्व नहीं होता, वे त्रिकाल अनुद्विग्न, निर्मल और निष्पाप होती हैं। द्वन्द्वों की कुछ थोड़ी अनुभूति उसे तब होती है, जब वह माता अथवा पूर्ण मानवी बन जाती है तब मिट्टी का रस उसे पूर्ण रूप से अभिसिक्त कर देता है।”

*  “नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है। इस नारी का संधान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते, तन से मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँचकर निष्पंद हो जाता है।”

*  “और पुरुष के भीतर भी एक पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता, जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है।”

*  “इंद्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श, यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है।”

 “देश और काल की सीमा से बाहर निकलने का एक मार्ग योग है, किंतु उसकी दूसरी राह नर-नारी-प्रेम के भीतर से भी निकलती है, मनुष्य का यह अनुमान अत्यंत प्राचीन है।”

उर्वशी : पात्र परिचय

 •पुरूरवा – वेदकालीन प्रतिष्ठानपुर के विक्रमी ऐल

 •महर्षि च्यवन – प्रसिद्ध भृगुवंशी, वेदकालीन महर्षि।

 • आयु – पुरूरवा – उर्वशी का पुत्र।

 • मधामात्य – पुरूरवा के मुख्य सचिव।

 • विश्वमना – राज ज्योतिषी

 • सहजन्या, रंभा, मेनका, चित्रलेखा – अप्सराएँ

 • औशीनरी – पुरूरवा की पत्नी

 • निपुणिका, मदनिका – औशीनरी की सखियाँ

 • उर्वशी – अप्सरा, नायिका

 • सुकन्या – च्यवन ऋषि की सहधर्मिणी

 • अपाला – उर्वशी की सेविका

प्रथम अंक

 • सूत्रधार और नटी के संवाद से कथा प्रारंभ

 • आकाश से सहजन्या, रंभा, मेनका का पृथ्वी पर अवतरण

 • कवि ने अप्सराओं को “अभुक्त प्रेम की जीवित प्रतिमा” तथा “कामासक्त मन की कामनाएँ” कहा है।

 • सहजन्या द्वारा मेनका को उर्वशी की प्रेम कथा बताना।

तृतीय अंक

 • गंधमादन पर्वत पर पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम प्रसंग से अंक प्रारंभ।

 • परस्पर प्रेम और वियोग की भावनाओं का आदान-प्रदान।

 • पुरूरवा का विश्वास कि उसके प्रेम की पुकार एक दिन इंद्रलोक तक अवश्य पहुँचेगी।

 • प्रेम का छण और भिक्षाटन दोनों अपयश के मूल।

 • पुरूरवा जब अनासक्ति के स्पर्श से प्रेम के पवित्र होने की बात करते हैं, तब उर्वशी को लगता है कि वह पुनः देवताओं की भुजाओं के घेरे में फँस गई है।

 • वह पुरूरवा के द्विधाग्रस्त मन से आशंकित हो जाती है।

 • उर्वशी रक्त के सामने बुद्धि को ध्येय सिद्ध करती है।

 • पुरूरवा इस बात को स्वीकार करते हैं कि रक्त बुद्धि से अधिक बली है, साथ ही यह भी कहते हैं कि रुधिर एवं त्वचा का आनंद ही सब कुछ नहीं है। इससे ऊपर भी आनंद है।

 • पुरूरवा के हृदय में कभी प्रेम कभी संन्यास चलता है, उर्वशी इनके समाधान तलाश करने का प्रयत्न करती है।

 • पुरूरवा के लिए उर्वशी और उसके विचार रहस्यमय बने हैं।

•  एक वर्ष बीत जाता है, पुरूरवा यज्ञ हेतु राजभवन जाते हैं और वे दोनों अनिश्चित काल के लिए अलग हो जाते हैं।

Q1. कालक्रम की दृष्टि से उर्वशी-पुरूरवा कथा के उल्लेख का सही क्रम कौन सा है?

= ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, पुराण, महाभारत

Q2. निम्नलिखित में से ‘उर्वशी’ शब्द के कोशगत अर्थों का कौन सा समूह सही है?

= उत्कट अभिलाषा, अपरिमित वासना, इच्छा अथवा कामना

Q3. पुरूरवा शब्द का अर्थ :-

= वह व्यक्ति जो नाना प्रकार का रव करे, नाना ध्वनियों से आक्रान्त हो।

Q4. भूमिका of उर्वशी

➔ उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं का प्रतीक है; पुरूरवा रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द से मिलने वाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य।

पुरूरवा द्वन्द्व में है, क्योंकि द्वन्द्व में रहना मनुष्य का स्वभाव है। मनुष्य सुख की कामना भी करता है और उससे आगे निकलने का प्रयास भी।

नारी नर को छूकर तृप्त नहीं होती, न नर नारी के आलिंगन में संतोष मानता है। कोई शक्ति है जो नारी को नर तथा नर को नारी से अलग रहने नहीं देती, और जब वे मिल जाते हैं, तब भी उनके भीतर किसी ऐसी तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है।

परिरंभ – पाश में बँधे हुए प्रेमी, परस्पर एक-दूसरे का अतिक्रमण करके, किसी ऐसे लोक में पहुँचना चाहते हैं, जो किरणोज्ज्वल और वायवीय है।

Q5.

 पुरूरवा इंद्र के समान ही शक्तिशाली है और सिंह से बाहें मिलाकर खेल सकता है, परंतु नारी की मुस्कान के आगे निस्सहाय हो जाता है।

 पशुओं में जो प्रेरणा ऋतु-धर्म से एकाकार है, मनुष्यों में वह ऋतु-धर्म का बन्धन नहीं मानती।

 मनुष्य में काम-शक्ति केवल प्रजा-सृष्टि तक सीमित नहीं है, वह एक निरुद्देश्य आनंद का कारण बन गई है।

Q6. भूमिका के अनुसार मनुष्य के 3 धरातल हैं :-

 जैव धरातल (वासना)

 बुद्धि का धरातल

 आत्मा का धरातल

➔ अर्थ और काम जैव धरातल के पुरूषार्थ हैं, जबकि धर्म का जन्म आत्मा के धरातल पर होता है।

Q7. इंद्र द्वारा तपस्या भंग करने के लिए भेजी गई अप्सराओं को परास्त करने हेतु नारायण ऋषि ने अपनी जांघ से उर्वशी को उत्पन्न किया था।

Q8. काम-सुख की इन्हीं निराकार आकृतियों का आख्यान मनोविज्ञान उदात्तीकरण की भाषा में करता है।

Q9.उर्वशी कहती है कि जब से वे मिले हैं, समय मरुद्गति (वायु की गति) से अतीत के गड्ढे में खोता जा रहा है।

Q10. पुरूरवा Dialogues :-

क) “क्षत्रिय भी भीख माँगते हैं क्या? और प्रेम क्या कभी प्राप्त होता है भिक्षाटन से?”

ख) “मर्त्य मानव की विजय का सूर्य हूँ मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं।”

ग) “सत्य ही रहता नहीं यह ज्ञान, तुम कविता, कुसुम या कामिनी हो।”

घ) “उर्वशी! तुम मेरे प्राणेश, ज्ञान-गुरू, सखा, मित्र, सहचर हो।”

ङ) काम ही धर्म है, काम ही पाप है।

च) पुरूरवा के अनुसार, बुद्धि की तुलना में शोणित (रक्त/अनुभूति) अधिक विश्वसनीय और सत्य है।

छ) पुरूरवा के अनुसार, दो सुरम्य नयनों के वातायन से उस अदृश्य जगती को देखना ही तन का अतिक्रमण है।

Q11.

(A) : पुरूरवा के अनुसार, रक्त की भाषा और लिपि मानस को कभी नहीं भरमाती।

(R) : क्योंकि बुद्धि छली है, जबकि रक्त (इंद्रिय अनुभव) सत्य की सीधी पुकार है।

Q12. पुरूरवा के अनुसार तन का अतिक्रमण इंद्रियों के माध्यम से ही उस पार की सत्ता को देखना है

“दो सुरम्य नयनों के वातायन से अदृश्य जगती को देखना”

Q13.उर्वशी कहती है कि रक्त बुद्धि से अधिक बलवान है क्योंकि बुद्धि केवल सोचती है पर शोणित उस सत्य को अनुभव करता है।

Q14.पुरूरवा अपने प्रेम को किसके समान बताते हैं जो (नक्षत्रों के बीज प्राण के नभ में बोने वाली है?

– रसमयी वेदना

 Q15. पुरूरवा ➔ सोम-वंश (चंद्र वंश)

Q16.उर्वशी की उत्पत्ति के विषय में देवी भागवत के अनुसार ‘उर्वशी-तीर्थ’ कहाँ स्थित है?

– बदरी धाम

Q17. भूमिका में ‘पानी पर चलो, किन्तु पानी का दाग नहीं लगे’, का प्रयोग किसके संदर्भ में है?

– देवत्व और अनासक्ति

Q18. पुरूरवा के अनुसार, ‘मर्त्य मानव’ और ‘देवता’ में मुख्य अंतर क्या है?

– देवता शीतल है, मनुष्य अगन (अग्नि) है

Q19.

क) उर्वशी के अनुसार, पुरुष कब तक पुरुष है?

➔ जब तक उसके भीतर ‘वैश्वानर’ गरज रहा है।

ख) उर्वशी सहज भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है।

ग) उसे नश्वरता के वरदान का बोध है।

घ) वह स्वयं को नारायण की ‘महाकल्पना’ मानती है।

ङ) उर्वशी ➔ ‘देवों के आनन पर पड़ा हुआ एक झिलमिल रहस्य आवरण’, कहती है।

च) “जब से हम-तुम मिले, समय… लय होता जा रहा मरुद्गति से अतीत-गह्वर में।”

Q20. उर्वशी में ‘इड़ा’ और ‘इला’ के संबंधों की कथा किस पुराण से ली गई है?

– सामान्य पुराण कथा

Q21.पुरूरवा के अनुसार, किसका ‘हृदय-कपाट’ भिक्षा माँगने से नहीं खुलता?

– उर्वशी का

Q22. ‘मृत्यु ही एक मात्र सत्य है” के विपरीत ‘उर्वशी’ में किस सुख को ‘अमृत-शिखा’ कहा गया है?

– प्रेम को

Q23. पुरूरवा के आंतरिक द्वन्द्व के सन्दर्भ में :-

क) वह मर्त्य लोक के सुखों से विषण्ण है।

ख) उसमें देवत्व की प्यास है।

ग) वह इंद्रियों के माध्यम से अतींद्रिय को छूना चाहता है।

Q24. दिनकर ने काम को धर्म और मोक्ष के बीच एक सेतु के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

Q25. पशुओं में काम ऋतु कर्म (प्रजा-सृष्टि) तक सीमित है, लेकिन मनुष्यों में यह एक “निरुद्देश्य आनंद” का कारण बन गया है, जो कला और सौंदर्य को जन्म देता है।

Q26.

क) प्रेम की नाव हमें सहज ही दिव्य लोक तक ले जाती है।

ख) प्रेम संन्यास का विरोधी नहीं है। दिनकर ‘भोग’ के माध्यम से ‘योग’ जैसी स्थिति की बात करते हैं।

Q27.

क) इस कथा का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।

ख) शतपथ ब्राह्मण के अनुसार उर्वशी के गर्भ से पुरूरवा के 6 पुत्र हुए, जिनमें सबसे बड़ा ‘आयु’ था।

ग) सर विलियम विल्सन का अनुमान है कि यह कथा अन्योक्तिपरक है, जिसमें नायक सूर्य और नायिका ऊषा है।

Que. 28.

 A. शोणित (रक्त) – विश्वसनीय लिपि और भाषा

 B. बुद्धि – छली और भरमाने वाली

 C. प्रेम – अमृत-शिखा

 D. समय – मरुद्गति (वायु की गति)

Que. 29.

 A. उर्वशी के नयन – अतींद्रिय जगती के वातावरण

 B. उर्वशी का आलिंगन – प्रकाश का महासिंधु

 C. उर्वशी का सामीप्य – रस की कादम्बिनी

 D. उर्वशी की मुस्कान – दुरंत विरह की औषधि

Que. 30.

 A. काम-धर्म – धर्म और पाप का उज्जवल उदाहरण

 B. पुरुष का अस्तित्व – वैश्वानर (अग्नि) का गरजते रहना

 C. उदात्तीकरण – निष्काम काम-सुख

 D. नारायण की महाकल्पना – उर्वशी का वास्तविक स्रोत

Que. 31.

 A. सत्य ही रहता नहीं यह ज्ञान = सौंदर्य की अनिर्वचनीयता

 B. तुम कविता, कुसुम या कामिनी हो = साक्षात् कविता का भ्रम

 C. नक्षत्रों के बीज प्राण के नभ में बोने वाली = रसमयी वेदनाओं में डुबोने वाली

 D. स्वर्ग की सुंदरियों को ललचाने वाली = चक्षु राग और विलोल हृदया

Que. 32.

 A: दिनकर के अनुसार ‘उर्वशी’ का आख्यान केवल एक प्राचीन वैदिक प्रसंग का पुनरावृत्ति मात्र नहीं है।

 R: क्योंकि कवि का मुख्य उद्देश्य पुरूरवा को (सनातन नर) और उर्वशी को (सनातन नारी) के प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करना है।

 Both correct & correct explanation.

*** Imp. Lines**

 उर्वशी ➔ रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी क्योंकि बुद्धि सोचती है और शोणित अनुभव करता है

पढ़ो रक्त की भाषा को, विश्वास करो इस लिपि का

 पुरूरवा ➔ न तो पुरुष में पुरुष, न तुम नारी केवल नारी हो

“अतिक्रमण”

 पुरूरव:। पुनरस्तं परेहि, दुरापना वात इवाहमास्म – ऋग्वेद

= हे पुरूरवा! तुम अपने घर को लौट जाओ में वायु के समान दुष्प्राप्य हूँ

 उर्वशी –

क्या खो गया समय को

लय होता जा रहा मरुद्गति से अतीत-गह्वर में

– नदियाँ आती स्वयं, ध्यान सागर पर कब देता है?

– वरण किया क्यों नहीं, माँग लाने में यदि अपयश था?

 पुरूरवा –

वरण करता में किसका?

उस सौंदर्य सुधा का जो देवों की शांति, इन्द्र के दृग की शीतलता थी?