भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ में चित्रलेखा का चरित्र-चित्रण

भगवती चरण वर्मा

चित्रलेखा

छायावादी कवि और प्रेमचंदोत्तर युग के प्रमुख उपन्यासकार भगवती चरण वर्मा का हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण नाम है। इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन का प्रारंभ एक कवि के रूप में किया। प्रताप और शारदा जैसी पत्रिकाओं में इनकी रचना छपने लगी थी।

इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी प्रमुख रूप से कार्य किया है।

इनको ‘भूले बिसरे चित्र’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

उपन्यास :-

1. तीन वर्ष – नयी सभ्यता की चकाचौंध से पथभ्रष्ट युवक की मानसिक व्यथा की कहानी है।

2. आखिरी दाँव – एक जुआरी के असफल प्रेम की कथा है।

3. अपने खिलौने – नयी दिल्ली की (‘मॉडर्न सोसायटी’) पर व्यंग्य है।

4. भूले बिसरे चित्र – यह इनका सर्वाधिक सफल उपन्यास है। जिसमें अनुभूति और संवेदना की कलात्मक सत्यता के साथ इन्होंने 3 पीढ़ियों को, भारत के स्वातंत्र्य आंदोलन के 3 युगों की पृष्ठभूमि का मार्मिक चित्रण किया है।

5. पतन

6. अपने खिलौने

7. थके पाँव

भगवतीचरण वर्मा ने एक बार अपने सम्बन्ध में कहा है –

“मैं मुख्य रूप से उपन्यासकार हूँ, कवि नहीं – आज मेरा उपन्यासकार ही सहज रह गया है, कविता से लगाव छूट गया है।”

डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी –

वर्मा जी के साहित्य में मानव जीवन की जटिलताओं का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। वे जीवन के नैतिक प्रश्नों को गहराई से प्रस्तुत करते हैं।

उपन्यास (अर्थ):- यह गद्य साहित्य की एक प्रमुख विधा है। जिसमें मानव जीवन, समाज, घटनाओं और भावनाओं का विस्तृत तथा यथार्थ चित्रण किया जाता है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार – “उपन्यास समाज का दर्पण है”

चित्रलेखा (1934) – यह एक दार्शनिक उपन्यास है जिसका मुख्य विषय पाप और पुण्य की व्याख्या है। उपन्यास का आरंभ एक दार्शनिक प्रश्न से होता है “पाप क्या है?”। गुरू रत्नांबर अपने 2 शिष्य श्वेतांक व विशालदेव को संसार में भेजते हैं ताकि वे अनुभव द्वारा पाप व पुण्य का पता लगा सकें।

कथा के 3 प्रमुख पात्र हैं –

 कुमारगिरी – एक तपस्वी संन्यासी तो त्याग व वैराग्य का प्रतीक है। विशालदेव गुरूदेव की आज्ञा पर इसका शिष्य बनता है।

 बीजगुप्त :- एक सामंत है जो भोग विलास व सांसारिक जीवन का प्रतिनिधित्व करता है। श्वेतांक इसको अपना स्वामी स्वीकार करता है।

 चित्रलेखा :- अत्यंत सुन्दरी, नर्तकी व एक अनुपम बुद्धिमान स्त्री जिसके इर्द-गिर्द पूरी कथा घूमती है।

• कथा में कुल 22 परिच्छेद हैं।

प्रासंगिक कथा के रूप में विशालदेव, यशोधरा, श्वेतांक की कथा है, जिसके माध्यम से वर्मा जी ने पाप और पुण्य की समस्या का निदान खोजने का प्रयत्न किया है।

चित्रलेखा

भारतीय साहित्य में अधिकतर नायक प्रधान रचनाएँ हुई हैं किन्तु आज युग बदल गया है अतः नायिका को भी प्रधानता अब दी जाने लगी है। प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद आदि अनेक प्रमुख साहित्यकारों का ध्यान स्त्रियों की ओर गया है। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास भी स्त्री प्रधान है। यदि चित्रलेखा को उपन्यास की सूत्रधार कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। वह जिस पात्र को जिधर चाहे घुमा देती है। बीजगुप्त, कुमारगिरी, श्वेतांक, यशोधरा, मृत्युंजय सभी को वह अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करती है।

18 वर्ष की अवस्था में वह विधवा हो जाती है। तदोपरांत उसके जीवन में कृष्णादित्य का आगमन होता है। वह गर्भवती हो जाती है। समाज की दुत्कार के कारण कृष्णादित्य ने आत्महत्या कर ली और चित्रलेखा ने नर्तकी का रूप धारण कर लिया।

1. अनुपम सौन्दर्य की मूरतः

चित्रलेखा का कण्ठ कोमल था। उसके अनुपम सौन्दर्य के कारण बड़े-बड़े लक्षाधीश सामंत उसके पैरों में लेटने को तैयार थे। बीजगुप्त उसके सौन्दर्य से आकर्षित हो गया। कुमारगिरी का संयमी मन भी उसके सौंदर्य से विचलित हो गया। वह अपनी योग तपस्या को छोड़ चित्रलेखा के रूप सौन्दर्य से वशीभूत हो जाता है।

महायज्ञ में नृत्य करते समय चित्रलेखा के सौंदर्य का वर्णन लेखक के शब्दों में दर्शनीय है –

कुमार – “यह स्त्री असाधारण सुन्दरी है।”

“उस समय उसके सौन्दर्य में अभूतपूर्व आकर्षण था। उसका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति था और उसकी लहराती हुई वेणी नाग की भाँति थी”

2. वाक्पटुता का गुण / विदुषी / तर्कशीलता का गुण –

सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति के साथ-साथ चित्रलेखा विदुषी भी है और तर्क करने में प्रवीण। वह जहाँ भी जाती है, सब पर अपना अधिकार जमा लेती है। सभी विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। जब बीजगुप्त उसकी ओर आकर्षित होकर प्रणय का प्रस्ताव करता है, तब वह स्पष्ट कहती है –

“नहीं, मैं व्यक्ति से नहीं मिलती, मैं केवल समुदाय के सामने आती हूँ, व्यक्ति का मेरे जीवन में कोई संबंध नहीं।”

चित्रलेखा की वाक्पटुता का उत्कृष्ट नमूना देखने को तब मिलता है जब महायज्ञ में वह कुमारगिरी के मिथ्या प्रदर्शन का भण्डाफोड़ देती है।

चन्द्रगुप्त की सभा में ईश्वर के स्वरूप को छल से प्रदर्शित करने वाले कुमारगिरी से वह कहती है –

“योगी तुमने जो दिखलाया है था, वह मैंने भी नहीं देखा। मंत्री चाणक्य को सब झूठ ठहरा सकते हैं, पर मैं नहीं।”

3. मादकता व उल्लास की पक्षधर –

विधवा होने के पश्चात्, कृष्णादित्य के जीवन में आते ही उसका संयम टूट जाता है। नर्तकी बनने के बाद बीजगुप्त के साथ रहते हुए मादकता का अनुभव करती है। वह अब मदिरा का सेवन करती है व वासना के सभी संभव साधनों में रमण करने लगती है। वह श्वेतांक से उल्लास की आवश्यकता समझाते हुए कहती है –

“जीवन एक अविकल पिपासा है। उसे तृप्त करना जीवन का अन्त कर देना है।”

4. दार्शनिक समझ –

चित्रलेखा दर्शन पर तर्क-वितर्क करने में निपुण थी। जब वह बीजगुप्त से प्रथम बार भेंट करती है तब व्यक्ति व समाज पर वह बीजगुप्त के साथ तर्क करती है। उसकी तर्क शक्ति इतनी तेज़ है कि उसके प्रभाव से कुमारगिरी भी अपने आप को नहीं बचा पाते। जब कुमारगिरी स्त्री को अन्धकार, मोह व वासना की संज्ञा देते हैं तब चित्रलेखा प्रत्युत्तर में उनको अभिवादन करते हुए कहती है –

“प्रकाश पर लुब्ध पतंग को अन्धकार का प्रणाम।”

व अपने दार्शनिक विचार प्रकट करते हुए कहती है – 

“शान्ति अकर्मण्यता का दूसरा नाम है, और रहा सुख उसकी परिभाषा एक नहीं।”

5. दृढ़ एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी –

चित्रलेखा का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली व दृढ़ होता है कि उसके आगे सभी बौद्धिक दृष्टि से कमज़ोर दिखाई पड़ते हैं। चाहे व चन्द्रगुप्त की सभा हो या कुमारगिरी जैसे तपस्वी से तर्क करना, उसे हराना एक कठिन कार्य था। वह कुमारगिरी से दीक्षा पाना चाहती है, जिसमें कुमारगिरी स्त्री को दीक्षा देने में संकोच करता है। तब चित्रलेखा उससे कहती है –

“स्त्री शक्ति है, वह सृष्टि है, यदि उसे संचालित करने वाला व्यक्ति योग्य है।”

कुमारगिरी का सत्य जानने पर कि उसने उसे धोखा दिया है चित्रलेखा उसे लताड़ते हुए कहती है –

“तुमने मुझे धोखा दिया – वासना के कीड़े! तुम मुझसे झूठ बोले। तुम्हारी तपस्या विफल हो जाएगी।”

6. नृत्य कला में निपुण –

चित्रलेखा पाटलीपुत्र की सबसे सुन्दर व निपुण नर्तकी थी। उसका नृत्य देखकर सभी पुरुष, सामंत उसके पैरों में लेटने को तैयार हो जाते थे। चन्द्रगुप्त की राजसभा में भी उसे नृत्य करने के लिए बुलाया जाता है, जहाँ सभी राजदरबारी उसके नृत्य व सौन्दर्य पर मुग्ध हो जाते हैं। वह अपनी नृत्य कला की पूजा करती है। मृत्युंजय के घर पर जब वह नृत्य कर रही होती है उसके नृत्य में बाधा पड़ने पर वह क्रोधित होकर नृत्य करने को मना भी कर देती है।

“मैं समाजच्युत नर्तकी ही हूँ…”

7. ऐश्वर्यपूर्ण जीवन से परिपूर्ण –

नर्तकी होने के साथ रहने पर वह एक ऐश्वर्य से परिपूर्ण जीवन यापन करती है। वह मदिरा की शौकीन हो गई है। उसके पास ऐश्वर्य के तमाम साधन उपलब्ध होते हैं। वह मादकता के उन्माद में श्वेतांक को कहती है –

“पिपासा तृप्त होने की चीज नहीं।— मुझे जल की आवश्यकता नहीं, मुझे मदिरा चाहिए।”

8. त्याग भाव का ढोंग / मनुष्यता को धोखा –

चित्रलेखा बीजगुप्त के साथ रहते हुए भी कुमारगिरी की ओर आकर्षित होती है। जब मृत्युंजय अपनी पुत्री यशोधरा के विवाह का प्रस्ताव बीजगुप्त के समक्ष रखता है तब चित्रलेखा भी स्वयं के कुमारगिरी के साथ रहने का एक अवसर पाने की सोचती है साथ ही वह बीजगुप्त की घृणा का पात्र भी नहीं बनना चाहती इसलिए वह अपनी मनुष्यता को धोखा देते हुए कहती है –

“बीजगुप्त को सुखी बनाना मेरा कर्तव्य है, उसे मुक्त कर देना ही मेरा महान त्याग है।”

9. सामाजिक रीतियों का पालन करने वाली / विवाह संस्कार में विश्वास –

चित्रलेखा विवाह संस्कार जैसी सामाजिक रीतियों को स्वीकार करती है इसलिए वह चाहती है कि बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो जाए क्योंकि वह यह जानती है कि उसकी व बीजगुप्त की भविष्यत संतान को बीजगुप्त का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता। चित्रलेखा यशोधरा व बीजगुप्त के सन्दर्भ में कहती है –

“भगवान करे यह परिचय घनिष्ठता में परिणत हो और घनिष्ठता जीवन के पवित्र बंधन में”

“मैं समाजच्युत नर्तकी हूँ, बीजगुप्त की पत्नी होना मेरे लिए असम्भव है।”

10. चंचल स्वभाव का व्यक्तित्व –

यशोधरा का स्वभाव चंचल है, ममत्व के वशीभूत होकर वह चंचलता से निर्णय लेती है वह बीजगुप्त के साथ सुखी व विलासी जीवन व्यतीत करते हुए भी वह कुमारगिरी के पास चली जाती है, वह इसके पश्चात् भ्रम नष्ट होने पर पुनः बीजगुप्त के पास जाती है –

चित्रलेखा बीजगुप्त से –

“इस परिवर्तनशील संसार में किसी भी चीज का बदल जाना अस्वाभाविक नहीं है…. प्रेम परिवर्तनशील है।”

11. स्वाभिमान व आत्मसम्मान से परिपूर्ण व्यक्तित्व / स्वतंत्र विचारधारा की स्त्री –

चित्रलेखा में स्वाभिमान व आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरा है। जब उसे ज्ञात होता है कि कुमारगिरी ने उसे धोखा दिया है वह उसे लताड़ती है, व सच्चाई का शीशा दिखाती है। वह अपने आप को असहाय मानकर वह सब नहीं सहती व तुरंत वहाँ से रवाना हो जाती है –

चित्रलेखा to कुमारगिरी –

“तुम्हारे सामने जो स्त्री खड़ी है, वह इतनी असहाया नहीं है कि उस पर शासन कर सको”

“यहाँ मैं स्वामिनी हूँ, तुम दास हो। मैंने तुम पर आधिपत्य जमा लिया है।”

12. अहम् भाव से ग्रस्त –

चित्रलेखा अहम् भाव से भरी हुई ममत्व की दास है, ममत्व की तुष्टि के लिए व आत्म विश्वास का सहारा लेती है। स्वयं को सही दिखाने व मानने के कारण वह बहुत सारे गलत निर्णय भी लेती है। इस बात की पुष्टि बीजगुप्त श्वेतांक के साथ वार्ता में करते हैं –

“दोनों ही अहम् भाव से भरे हुए ममत्व के दास हैं।”

13. पश्चाताप व आत्मग्लानि का भाव – 

चित्रलेखा ने प्रेम व वासना के अंतर को पहचानने की भूल की। उसने सच्चे प्रेम को नहीं पहचाना जिस कारण व पश्चाताप करना चाहती है, इसलिए वह बीजगुप्त से दंड देने को कहती है व अंत में अपनी सारी संपत्ति को छोड़कर बीजगुप्त के साथ प्रेम के मार्ग पर निकल पड़ती है।

चित्रलेखा to बीजगुप्त –

“मैंने तुम्हारा जीवन नष्ट कर दिया, मैंने तुम्हें मिटा दिया, तुम मुझे शाप दो, दंड दो – पर मुझसे घृणा न करो।”

निष्कर्ष

भगवती चरण वर्मा के अनुसार चित्रलेखा केवल एक नर्तकी या वेश्या नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्र चिंतन और आत्मसम्मान से युक्त स्त्री है। उसके व्यक्तित्व में सौन्दर्य, बुद्धिमत्ता और जीवन-दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

 प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने चित्रलेखा के बारे में कहा है कि –

“चित्रलेखा केवल रूपवती स्त्री नहीं, बल्कि वह एक ऐसी चेतनशील नारी है जो अपने जीवन और प्रेम के विषय में स्वयं निर्णय लेने का साहस रखती है। उसके चरित्र में स्वतंत्रता व आत्मसम्मान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है।”

चित्रलेखा का चरित्र सौंदर्य, स्वाभिमान और दार्शनिकता का अद्भुत संगम है। वह समाज की रूढ़ धारणाओं को चुनौती देती है और अपने विचारों के आधार पर जीवन जीती है।