घासीराम कोतवाल की रंगमंचीयता।

रंगमंच से आशय

रंगमंच मानव अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है, जहाँ जीवन, समाज और कल्पना का सजीव प्रस्तुतीकरण दर्शकों के सामने किया जाता है। सामान्य अर्थ में रंगमंच उस स्थान, विधा और प्रक्रिया का समुच्चय है जहाँ नाटक का प्रदर्शन होता है। यह केवल भौतिक मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अभिनेता, संवाद, दर्शक, मंच-सज्जा आदि सभी तत्व सम्मिलित होते हैं।

रंगमंचीयता का संदर्भ कोई रचना तभी रंगमंचीय कही जाती है जब उसमें मंच पर प्रस्तुत किए जाने की क्षमता, दृश्यात्मकता, संवाद की सजीवता, अभिनय की संभावना और दर्शकों से संवाद स्थापित करने की शक्ति हो।

“नाट्य कृति में उपस्थित वे सभी तत्व जो उसे मंच पर प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने योग्य बनाते हैं, रंगमंचीयता कहलाता है।”

रंगमंचीयता के तत्व


  1. कथानक

  2. अभिनय

  3. दृश्य-विन्यास

  4. ध्वनि एवं संगीत

  5. वेशभूषा एवं मेकअप

  6. पात्रयोजना

  7. संवाद

  8. प्रकाश व्यवस्था

  9. मंच-सज्जा

  10. भाषा एवं शैली

  11. दर्शक संपर्क

विजय तेंदुलकर एक प्रसिद्ध मराठी नाटककार, लेखक, निबंधकार, फिल्म व टीवी पटकथालेखक, राजनीतिक पत्रकार और सामाजिक टिप्पणीकार थे। भारतीय नाट्य व साहित्य जगत में उनका उच्च स्थान रहा है। भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई।

रचनाएँ:-

 नाटक :- “ढाई पन्ने”, “शांताता! कोर्ट चालू आहे”, “घासीराम कोतवाल”, “सखाराम बाइंडर”, “कन्यादान” आदि।

उनके बहुचर्चित नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ का 6 हज़ार से ज्यादा बार मंचन हो चुका है।

सम्मान व पुरस्कार :-

उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान तथा पद्मभूषण आदि कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। श्याम बेनेगल की फिल्म “मंथन” की पटकथा के लिए 1977 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था।

अपने जीवनकाल में तेंदुलकर जी ने पद्मभूषण, महाराष्ट्र राज्य सरकार सम्मान, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड जैसे सम्मानजनक पुरस्कार प्राप्त किए।

घासीराम कोतवाल

यह नाटक आधुनिक भारतीय रंगमंच का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रयोगधर्मी नाटक है। यह नाटक मूल रूप से मराठी भाषा में लिखा गया है और 1972 में पहली बार मंचित हुआ। इसकी कथा 18वीं शताब्दी के पेशवा काल पर आधारित है, जिसमें पुणे की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को केंद्र में रखा गया है।

यह दो अंकों का नाटक है।

 प्रथम अंक में घासीराम के अपमान, उसकी प्रतिज्ञा और अपनी बेटी ‘गौरी’ का सौदा करके पुणे के कोतवाल बनने की प्रक्रिया को दिखाया गया है।

 द्वितीय अंक में कोतवाल के रूप में घासीराम के अत्याचार, उसकी शक्ति का पतन और अंततः उसकी मृत्यु को दर्शाया गया है।

 

दृश्य

इस नाटक में पारंपरिक दृश्यों की बजाय संगीत और नृत्य के माध्यम से निरंतरता बनी रही है, जिसे ‘मानवीय दीवार’ (Human wall) के प्रयोग से अलग-अलग स्थितियों में विभाजित किया गया है।

इसमें मराठी लोकनाट्य ‘तमाशा’ शैली का अत्यंत प्रभावी प्रयोग किया गया है। व लावणी, दशावतार और कीर्तन जैसे पारंपरिक लोक रूपों का अद्भुत मिश्रण है। कोरस (समूह) का प्रभावी प्रयोग इस नाटक में हुआ है।

– हिंदी में अनुवाद इस नाटक का वसंत देव ने किया है।

इस नाटक का प्रथम प्रदर्शन 16 दिसंबर 1972 को पुणे के ‘प्रोग्रेसिव ड्रामेटिक एसोसिएशन’ द्वारा किया गया था।

प्रमुख पात्र

 घासीराम (कोतवाल)सावलदास– मुख्य पात्र, जो कन्नौज का ब्राह्मण है और अपमान का बदला लेने के लिए क्रूर कोतवाल बन जाता है।

 नाना फड़नवीस – पुणे का शक्तिशाली और विलासी मंत्री, जो घासीराम को मोहरे की तरह इस्तेमाल करता है।

 गौरी – घासीराम की सुंदर बेटी, जिसका शोषण नाना द्वारा किया जाता है और जो सत्ता के खेल में बलि चढ़ जाती है।

 सूत्रधार – नाटक का कथावाचक, जो दर्शकों को कहानी से जोड़ता है और जो सत्ता के खेल में बलि चढ़ विभिन्न भूमिकाएँ भी निभाता है।

1. दृश्य-विन्यास (इंसानी पर्दा झूलते हुए)

इस नाटक में तेंदुलकर जी ने नवीन प्रयोग करते हुए कपड़े के पर्दे के स्थान पर झूलते हुए इंसानी पर्दे का प्रयोग किया है। यह पर्दा 2 खंडों में बटा हुआ है एवं क्षण भर में समाज के कई इकाइयों एवं घटकों के प्रतिरूप में बदल जाता है। घासीराम को कोतवाल के रूप में प्रतिष्ठित कराने वाला यही पर्दा उसके वध के समय रुष्ट ब्राह्मणों का रूप में रंगमंच पर दिखता है।

नाटक की शुरुआत में 12 ब्राह्मण गणपति वंदना करते हुए सामने आते हैं और नाटक के अंत तक यही ब्राह्मण भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में भी आते हैं। जहाँ जरूरत पड़ती है वहाँ पर इंसानी पर्दे के रूप में अनेक दृश्यबंधों का भ्रम भी पैदा कर देते हैं।

1. नाटक का सूत्रधार

नाटक का सूत्रधार कई भूमिकाएँ एक साथ निभा रहा है। कहीं वह भ्रष्ट ब्राह्मणों की लंपटता को उद्घाटित करने के लिए उनका पीछा करता है। पूना के ब्राह्मण रात को अपना घर छोड़कर बाहर वहाँ भटकते हैं, इनको दिखाने के लिए सूत्रधार और ब्राह्मण इंसानी पर्दे का रचनात्मक प्रयोग करते हुए खो-खो खेल शुरू कर देते हैं। इसके साथ ही सूत्रधार खोजी, अन्वेषण के रूप में सामने आता है।

 नाना एवं गौरी के मिलाप एवं इसके सुध-बुध खोने का निरूपण लयबद्ध ढंग से सूत्रधार की यह टिप्पणी भी सटीक है

“गौरी बोले। नाना डोले, घासीराम को कारोबार चालै।”

. ध्वनि योजना एवं नृत्य / संगीत / वाद्य यंत्र

नाटक का प्रारंभ गणेश वंदना से होता है जिसमें मंगलाचरण की तरह 12 ब्राह्मण कतारबद्ध मंच पर गाते हुए आते हैं

“गौरी गणेश नर्तन करै

हम तो पूना के ब्राह्मण धरै॥”

नाटक में दशावतार, भारूड़, खेला, पोवाड़ा, लावणी, किर्तन आदि शुद्ध मराठी लोक-कलाओं का मिश्रण करके प्रस्तुत किया जाता है।

नाटक में रंगमंच पर नृत्य संगीत का तालबद्ध वातावरण विद्यमान है। संगीतबद्ध पंक्तियाँ नाटक में अनेक स्थलों पर सुनने को मिलती हैं जैसे-

“मथुराजी उतरी

बावन घड़ी में जी, बावन घड़ी में”

• पात्रों की संख्या, (वेशभूषा, अभिनेयता एवं रंग सज्जा) दृश्य योजना

क) पात्र योजना

– घासीराम कोतवाल में लगभग 50 पात्र हैं जो 3 प्रकार के हैं-

1. देवता पात्र – गणेशजी

2. पुरुष पात्र

3. स्त्री पात्र

नाना फड़नवीस की 8 रानियाँ स्त्री पात्र हैं तथा 5 नारियाँ विवाह में सम्मिलित होने वाली नारियाँ हैं। इस नाटक की पात्र योजना इस प्रकार हैं-

सूत्रधार, गणेश जी, सरस्वती जी, लक्ष्मी जी, पहला ब्राह्मण, दूसरा ब्राह्मण, जोड़ीवाला, गाड़ीवाला, गुलाबी, घासीराम, नाना फड़नवीस, गौरी आदि।

उक्त सभी पात्र अपने-अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और पात्रानुसार ही अभिनय करते हैं। गणेश एवं सरस्वती जी भी नृत्य करते हैं। सूत्रधार संपूर्ण नाटक में पात्र के रूप में नाटक का संचालन करता रहता है एवं कथा का वर्णन भी करता रहता है।

नाटककार ने मुख्य पात्रों के चरित्र को कुशलता से उभारा है।

ख) दृश्य योजना / रंग सज्जा

प्रकाश, ध्वनि, रंग निर्देश आदि सहज है। पात्रों की वेशभूषा में आयु, ख्याल-छल, रहन-सहन, हाव-भाव कथानक के मंच के अनुसार समुचित है एवं पात्र कथानक को स्वाभाविक रूप से गति प्रदान करने वाले हैं।

रंगमंच पर प्रत्येक पात्र अपने-अपने चरित्र में उभर कर सामने आए हैं। पात्रों का चुनाव नाटककार ने अत्यंत सावधानी पूर्वक किया है जिसमें समूहन आदि में कमिश्रण की संभावना विद्यमान है। डॉ. जब्बार पटेल तथा राजेन्द्र नाथ ने इसके रंगमंच पर प्रस्तुत हुए अनेक युक्तियों की ओर संकेत किया है।

• भाषा शैली

यह नाटक मराठी भाषा में है। इसका हिन्दी में अनुवाद वसंत देव ने किया है। इस नाटक की भाषा अन्य विधाओं की भाषा के स्वरूप से अलग है।

इसमें ऐसे शब्दों का प्रयोग है, जो निरंतर प्रयोग से अपने अर्थों का विस्तार पा चुके हैं। जैसे-

ब्राह्मण के स्थान पर बामण

– संवाद छोटे-छोटे हैं एवं पात्रानुकूल हैं। शब्दों के साथ-साथ उस प्रदेश के बोली के लोकप्रिय शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। नाटक के अनुवाद में मराठी की भाँति हिन्दी की बोलियों के शब्द भी प्रस्तुत किये हैं।

 भाषा में लयात्मकता व तुकबंदी है-

“गौरी बोले, नाना डोले, घासीराम का कारोबार चालै”

तत्सम शब्द – गणेश वन्दना, नृत्य, मंगलमूर्ती

 तद्भव शब्द – जस, दीजै, आय, नाय, होअन

 देशज – बाम्हन, सुरसती, समन्दर, अगाड़ी, पिछाड़ी, पवित्रतर, बिसके

 विदेशी – उर्दू- नाफरमानी, दुश्मन, कतार

 मुहावरेदार भाषा – गाज गिरना, पेट में खाज होना, हाथ पीले करना, बदनामी के बादल, सड़क नापना

 लयात्मक भाषा

 सूत्रधार : गौरी न होय तो नाना बेढाना…

 सब लोग : बेढाना…

 ग्रामीण भाषा-

 सूत्रधार : चूक होय गई ब्राह्मण देवता!

 ब्राह्मण : तेरे कछु शरम कि संकोच?

 शैली –

दृश्यात्मक शैली के साथ-साथ सूचनात्मक शैली का भी प्रयोग हुआ है।

वीभत्स एवं डरावने दृश्यों को न अपनाकर केवल सूचना मात्र दिया गया।

सूत्रधार – गौरी बिचारी परलोक सिधारी,

नाना जियत रहे परम सुखकारी।

• नाटक का आकार

रंगमंचीयता के लिए नाटक का आकार बहुत कुछ उत्तरदायी होता है। कुशल निर्देशक रंगमंच पर प्रस्तुत करने के लिए उन्हीं नाटकों का चयन करते हैं, जिन्हें सरलता से 2 या 3 घंटों में प्रस्तुत किया जा सके। “घासीराम कोतवाल” अधिक बड़ा नाटक नहीं है। इसे ढाई या 3 घंटे में सरलता से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस दृष्टि में इस रंगमंच के लिए उपयुक्त नाटक माना जा सकता है। मूल मराठी नाटक को रंगमंच पर डॉ. जब्बार पटेल के कुशल निर्देशन में दिसंबर, 1972 में भारत नाट्य मंदिर में सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है।

निष्कर्ष

इस नाटक में कोई भी दृश्य ऐसा नहीं है, जिसे रंगमंच पर प्रस्तुत न किया जा सके। इसलिए यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण नाटक रंगमंचीयता के गुणों से युक्त है इसलिए इसे अनेक नाट्य संस्थाओं ने कई बार सफलतापूर्वक रंगमंच पर प्रस्तुत किया है।