(क) त्यागपत्र उपन्यास में मृणाल के चरित्र के माध्यम से आत्मपीड़न का विश्लेषण किस प्रकार हुआ है?
या
मृणाल के माध्यम से अहिंसात्मक स्तर पर सामाजिक परिवर्तन का आग्रह किस प्रकार प्रस्तुत हुआ है?
(ख) ‘त्यागपत्र’ उपन्यास के द्वारा नैतिकता के पुनर्मूल्यांकन का प्रश्न किस प्रकार उठाया गया है?
या
उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट करें कि जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों और परम्पराओं का परित्याग क्यों आवश्यक है?
=
त्यागपत्र हिंदी ही नहीं, भारतीय उपन्यासों में भी सर्वाधिक भावव्यंजक उपन्यास है। जैनेन्द्र का यह उपन्यास ‘परख’, ‘सुनीता’ के बाद लिखा गया है। जिसका परिप्रेक्ष्य जटिल है और संवेदनात्मक विस्तार व्यापक है। नारी जीवन संघर्ष की जो शुरुआत जैनेन्द्र ने ‘परख’ से की थी, उसके एक चरण की सिद्धि ‘त्यागपत्र’ में दिखाई देती है। पर यह झलक है कि नारी का जो रूप यहाँ मिलता है वह जैनेन्द्र के अन्य उपन्यासों में नहीं मिलता।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जैनेन्द्र ने ‘त्यागपत्र’ उपन्यास में मृणाल नामक मध्यवर्गीय नारी के आत्मपीड़न की गाथा को प्रस्तुत किया है।
डॉ. सुरेन्द्र सिन्हा के अनुसार:
“मृणाल की संवेदनशीलता, उसकी भावुकता, चरित्र की गंभीरता सभी कुछ ऐसे पैने अस्त्र की भाँति पाठकों के हृदय को चीरते चलते हैं; और सभी जैसे यह समस्या प्रस्तुत करते चलते हैं कि नारी क्या इसीलिए प्रतीक्षित है, निर्दोष है, दया की शिकार है कि अधिक रूप से वह परतन्त्र है, पुरुष के आश्रित है? पश्चात् आत्मपीड़न ki साधना में ही अंत में मृणाल की मृत्यु हो जाती है और वह जैसे इस जगन्त समस्या के सम्मुख प्रश्न चिन्ह लगाकर जाती है।
जैनेन्द्र की दृष्टि में आत्मपीड़न –
“वास्तव में वह आत्मसमर्थता और पीड़ा ही हो सकती है, जो इस समस्त अनाडम्बर के आतंक से अधिकृत न हो और नीचे प्रेम की जीवंतता की कमी को पकड़ और पहचान सके। तब अधर्म के ही रास्ते में सर्वोदयी अध्यात्म एक प्रखर और प्रचंड कर्म की उज्ज्वलता में उदित होकर जगमगा आएगा और महसूस होगा कि उससे मौलिक प्रकाश कोई दूसरा नहीं।”
तात्पर्य यह है कि आत्मपीड़न एक ऐसी स्थिति है जिसमें मनुष्य उपरी क्रांति को लक्ष्य करता है, अपने अहम् का पोषण और विरोधी परिस्थिति में विद्रोह करता है, अपने देख में निष्पाप बनकर अपने से अधिक बलवती शक्तियों का सामना करता है। जिस स्थिति पर व्यक्ति का बल नहीं चलता वहाँ उसकी आंतिक शक्तियाँ विफल हो जाती हैं, वहीं पर आत्म-परिताप का सहारा लेकर दूसरे के भीतर करुणा जगाने और अपनी मन्तव्य शक्ति को भक्ति पैदा कर लेता है।
‘त्यागपत्र’ उपन्यास में मृणाल आत्मपीड़न की भावना से युक्त है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आत्मपीड़न की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है:
मानसिक अथवा शारीरिक पीड़ा में ही परम सुख का अनुभव करना आत्मपीड़न है।
भावना कुछ प्रतीकों के आधार पर व्यक्त होती है। मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य पर बल दिया है कि आत्मपीड़न से पीड़ित व्यक्ति नैतिक और सामाजिक नियमों से इस सीमा तक आक्रांत हो जाता है कि दूसरा कोई पहचान की उसकी प्रवृत्ति का सृजन ही दमन हो जाता है। साहित्य में आत्मपीड़न से ग्रस्त चरित्रों के द्वारा अहिंसात्मक स्तर पर सामाजिक संगठन के प्रति क्षोभ व्यक्त किया गया है। यह सत्य है कि पीड़ा में आनंद के भाव का अनुभव करना ही निश्चित रूप से एक उदात्त भाव है। यदि गांधीवादी दृष्टिकोण से विचार करें तो पीड़ा में सुख पाना ही तो अहिंसा है।
फ्रायड के अनुसार आत्मपीड़न का विभाजन:-
मनोविश्लेषणवादी फ्रायड के अनुसार आत्मपीड़न को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:
1. कामहैतिक विषयक
2. संत्रेण आत्मपीड़न
3. नैतिक आत्मपीड़न
Mrinaal संत्रेण आत्मपीड़न से पीड़ित है।
नैतिक आत्मपीड़न : मनोवैज्ञानिकों का यह विचार है कि इस क्षति पूर्णतः समाप्त हो जाती है। इसका कारण यह है कि मृणाल पर नैतिक और सामाजिक अंकुश का प्रभाव इतना गहरा है कि दूसरे की पीड़ा पहचान की क्षति पूर्णतः दब चुकी है।
मृणाल के चरित्र में अलग-अलग स्तरों पर आत्मपीड़न :
प्रत्यक्ष स्तर पर : आत्मपीड़न रही। मृणाल के निर्माण में पीड़ा का बहुत महत्व है। मृणाल के जीवन में पीड़ा बढ़ती ही गई है। शुरू में वह भी दुःखों के कारण छटपटाई है, किन्तु जब उसने पाया कि जीवन में दुःख का कोई अंत नहीं, तो वह धीरे-धीरे उसी दुःख के भीतर अपना मनोराज्य स्थापित कर बैठती है।
जीवन के विभिन्न स्तर :
1. बाल्यावस्था
2. किशोरावस्था
3. प्रौढ़ावस्था
बाल्यावस्था में आत्मपीड़न :
बाल्यावस्था में माता-पिता के रहने का छाप बाल्यावस्था से ही दृष्टिगोचर होता है।
~ बाल्यावस्था से आत्मपीड़न की शुरुआत
~ मृणाल की असह्य व्यथा
बाल्यावस्था से ही मृणाल के जीवन में प्रेम का अभाव रहा। घर के कड़े अनुशासन ने उसके जीवन में प्रेम के अभाव को और बढ़ा दिया। बाल्यावस्था से आत्मपीड़न की शुरुआत: बाल्यावस्था में ही छात्र और छात्राओं को बचाने के लिए मास्टर जी से बेंतों की पीड़ा लेकर स्वयं आत्मसंतोष का अनुभव किया।
“मैंने खड़े होकर कहा, यह मेरा कसूर है, मास्टर जी! मास्टर जी पहले तो मुझको देखते के देखते रहे फिर कहा—’अच्छा! आओ।’ मैं चली गयी। कहा—’हाथ फैलाओ’ मैंने हाथ फैला दिया। उस फैली हथेली पर उन्होंने तीन-चार बेंत मारे।”
अपनी सहेली को बचाने के लिए मृणाल का यह कदम ही उसके आत्मपीड़न की शुरुआत कहा जा सकता है। बेंत खाकर संतोष का अनुभव आत्मपीड़न ही है।
मृणाल की असह्य व्यथा :
धीरे-धीरे मृणाल का जीवन दुःख की गर्त में गिरता चला गया। बाल्यावस्था का प्रसंग एक बार फिर मृणाल के लिए आत्मपीड़न का कारण बना। अनुशासन की सख्त आज्ञा ने शीला के भाई एवं मृणाल के प्रेम प्रसंग के उजागर होते ही उसे बेंतों से पीटा।
बदन का कपड़ा बेहद माँस से झौना हो गया। जगह-जगह नील उभर आए कहीं लहू भी झलक आया किन्तु मृणाल न रोती है न झुझलाती है।”
इतने पर भी मृणाल ने उफ न की एवं अहिंसक सुख का अनुभव किया। यदि मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से विचार करें तो संत्रास में पीड़ा पाकर स्थिति का सुख प्राप्त करती है। उसकी इच्छा के विपरीत उसका विवाह एक विधुर से कर दिया जाता है। इस प्रकार वह इस पीड़ा को भी सहर्ष स्वीकार कर लेती है।
मृणाल का अभिशप्त जीवन :
बाल्यावस्था से ही मृणाल का जीवन एक अभिशाप की तरह आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर दुःख पाकर भी वह दुःखी नहीं होती है।
“बुआ का उसी दिन से पढ़ना छूट गया था। वह उस दिन से सीने-पिरोने, झाड़ने-बुहारने और इसी तरह के और कामों में शांत भाव से लगी रहती थीं। काम करते रहने के अतिरिक्त उन्हें और किसी बात से मतलब न था।”
इस प्रकार मृणाल का अभिशप्त जीवन आगे बढ़ता रहता है। वह हर परिस्थिति में शांत रहकर, उसे अपनाती है तथा अपने को कष्ट पहुँचाकर सुख अनुभव करती है।
किशोरावस्था :
मृणाल ने अपने जीवन में अपनी सर्वाधिक इच्छाओं का दमन करके एक विधुर से विवाह करना स्वीकार किया। अपने त्याग एवं बलिदान से मृणाल ने अहिंसात्मक तरीके से समाज को सचेत करने का, जागरूक का प्रयास किया।
– समाज के लिए अस्तित्व को नकारा
– अनमेल विवाह की समस्या
– अपेक्षितको गले लगाना
त्यागपत्र’ उपन्यास में मृणाल ने आत्मपीड़न द्वारा आज की खोखली सभ्यता, रीति-रिवाज, रूढ़ियों पर प्रश्न चिन्ह लगाया है।
समाज के लिए अस्तित्व को नकारा :
मृणाल ने आत्मपीड़न को ही अपने जीवन का श्रृंगार मान लिया। कुस्माराव में भी उसने जीवन की विपरीत परिस्थितियों में किसी को कष्ट न पहुँचाया। समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए उसने अपने अस्तित्व तक को मिटा डाला।
“विवाह की ग्रंथि दो के बीच की ग्रंथि नहीं है वह समाज के बीच की भी है। चाहने से भी वह क्या टूटती है! विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं व्यवस्था का प्रश्न है।”
प्रमोद का यह कथन भारतीय समाज की जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों को दिखाता है। इच्छा के विरुद्ध विवाह करके भी मृणाल समाज की व्यवस्था को बनाए रखने की खातिर अपना पतिव्रत धर्म का पालन करती है।
अनमेल विवाह की समस्या :-
अनमेल विवाह करके भी मृणाल अपने पति से छल नहीं करती तथा पति के समक्ष अपने पूर्व प्रेम संबंधों का प्रकटीकरण कर देती है। यही उसके जीवन की विडम्बना बन जाता है। वैवाहिक जीवन की नींव धीरे-धीरे हिलने लागती है। जीवन की इस विकट परिस्थिति में भी वह अपने परिवार को दुख नहीं पहुँचाना चाहती।
“सच-सच कहती हूँ प्रमोद, किसी और से नहीं कहा, तुझे कहती हूँ। बेंत खाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। न यहाँ अच्छा लगता है न वहाँ अच्छा लगता है।”
पति की बेंत की मार का ज़िक्र वह घर में किसी से नहीं करती। इस प्रकार आत्मव्यथा को जीवन का एक उच्च स्तरीय आयाम मानकर ही वह संतुष्टि अनुभव करती है।
विरक्ति को गले लगाना :-
पति के अविश्वास के कारण मृणाल का जीवन पूर्ण धराशायी हो जाता है। पति-पत्नी के संबंधों की दीवार बुरी तरह टूट जाती है। पति की आज्ञा स्वीकार करके मृणाल अपने घर का परित्याग कर देती है। कोयले वाले के सम्पर्क में आकर भी मृणाल के दृष्टिकोण में कोई फर्क नहीं आता।
“तुम समझते हो यह आदमी जिसके साथ मैं रह रही हूँ मुझे ज़्यादा दिन रख सकेगा? नहीं। मैं जानती हूँ एक दिन यह मुझे छोड़कर चला जाएगा। तभी इस कोठरी से मेरे उठने का भी दिन होगा।”
इस प्रकार मृणाल जीवन की विरक्ति को अपना कर आगे बढ़ती जाती है। लेकिन हर कदम पर वह एक सवाल समाज व्यवस्था पर खड़ा कर जाती है।
प्रौढ़ावस्था :-
मृणाल के जीवन का यह कुचक्र उसके अन्तिम दिनों तक उसके साथ चलता रहता है। वह बिना किसी शिकायत के इसे अपनाए रहती है। और एक दिन इस रूढ़िग्रस्त समाज को छोड़कर चली जाती है।
– नारी धर्म का पालन
– आत्म बलिदान
– अविश्वास के विरुद्ध आत्मपीड़न
– रोगों से पीड़ित यन्त्रणामय जीवन
– आत्मपीड़न द्वारा जाग्रति का प्रयत्न
अपने सम्पूर्ण जीवन में मृणाल कभी भी अपने कर्तव्य से च्युत नहीं होती। नारी का धर्म दान है। वह इसे मानती है तथा बिना किसी कामना के इस धर्म का पालन करती है।
रोगों से पीड़ित यन्त्रणामय जीवन :
मृणाल ने अपने जीवन की लम्बी अवधि विषैले एवं दर्दनाक वातावरण में बिता दी जिसके कारण उसे कई शारीरिक व्याधि का शिकार होना पड़ा। अन्तिम अवस्था में भी प्रमोद उसका उद्धार करने के लिए प्रस्तुत भी होता है लेकिन मृणाल उसकी प्रार्थना को अस्वीकार कर देती है।
“किनारा छूटा सो छूटा। मैं यहाँ थककर डूब भी गयी तो क्या बुराई है? आखिर क्या इस समन्दर के पेट में ही हम सब की जगह नहीं है?”
इस प्रकार मृणाल अपने यन्त्रणामय जीवन को गले लगाए रखती है यही उसके आत्मपीड़न की चरमसीमा है। जीवन के अन्तिम छोर पर भी वह स्वावलम्बी ही जीवन की नौका को छोड़ देती है।
आत्मपीड़न द्वारा जाग्रति का प्रयत्न :
सम्पूर्ण त्यागपत्र उपन्यास में मृणाल आत्मपीड़न द्वारा अहिंसात्मक तरीके से समाज को प्रेरित करने का प्रयास करती है। इस उपन्यास में प्रमोद सभ्यता का प्रतीक है और मृणाल स्वावलम्ब का। दूसरे के सहारे जीना मृणाल को स्वीकार नहीं। जब सामाजिक अवलम्ब पति ने ही उसे ठुकरा दिया तो उसका दिखावे के संस्कार रीति-रिवाज एवं सभ्यता से विश्वास उठ गया।
इस प्रकार आत्मपीड़न द्वारा, मृणाल समाज में कई स्तरों पर बदलाव लाना चाहती है।
– समाज के सघन अपराधों एवं अमानवीयता पर प्रश्न चिन्ह
– पुरुष के स्वामित्व व औचित्य को चुनौती
– अहिंसा एवं प्रेम को चरितार्थ करना
– सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की माँग
– सामाजिक मूल्यों की अवमानना
– स्वयं को तपाकर जाग्रति का प्रयास
– नैतिकता के पुनर्मूल्यांकन की माँग
– खोखली सभ्यता एवं रूढ़ियों का परित्याग
– नारी आत्मदान से मुक्ति का प्रतिपादन
– वर्ग उत्थान की प्रधान भावना
सामाजिक व्यवस्था के प्रति विरोध
समाज के सघन अपराधों एवं अमानवीयता पर प्रश्न चिन्ह :
त्यागपत्र की मृणाल विराट नारी चरित्र है जो अपनी दीनता से समाज का उपकार करती है और उसे अपने हाल पर तरस खाने के लिए छोड़ देती है। हिंदी उपन्यासों की परम्परा में आधुनिक भारतीय नारी का यह पहला क्रांतिकारी प्रवेश है, जहाँ समाज के सघन अपराधों एवं अमानवीयता पर प्रश्न चिन्ह लगता है।
“पेट में बालक है, लेकिन ऐसी अवस्था में भी स्वार्थ की बात सोचना अब ठीक नहीं है। मैं उसे उसके परिवार में लौटा कर ही मानूँगी। अब समय आया है कि उसे इस बात की अक्ल आ जाए। अब उसका मोह टूट गया है। वह जान गया है कि मैं उसकी सर्वस्व नहीं हूँ, मैं बस एक बदजात व्यभिचारिणी स्त्री हूँ…”
इस उपन्यास में मृणाल के माध्यम समाज के अपराधों एवं अमानवीयता को झेलती हुई नारी के यथार्थ को दिखाया गया है। मृणाल कोयले वाले के साथ अपनी गृहस्थी की अन्तिम परिणति के प्रति जागरूक थी। परन्तु वह नारी धर्म का पालन करती रही एवं अपने अहिंसात्मक व्यवहार से समाज कल्याण को ही प्रमुखता देती रही।
पुरुष के स्वामित्व व औचित्य को चुनौती :-
प्रस्तुत उपन्यास में मृणाल ने पति एवं परिवार द्वारा परित्याग करने के पश्चात् भी हार नहीं मानी। अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक वह अपना भरण-पोषण स्वयं करती रही। इस प्रकार मृणाल ने पुरुष के स्वामित्व व औचित्य को चुनौती दी।
“प्रमोद यह असम्भव न जानना कि मैं तुम्हें पुकारूँ और कहूँ, मुझे उबार लो। जब मेरे भीतर की श्रद्धा टूटेगी मैं तुम्हें आवाज दे लूँगी। इस मेरे वचन पर तुम मेरे पास अभी न आना। मैं तुमसे कहती हूँ।”
इस प्रकार प्रमोद के प्रस्ताव को स्वीकार न करके मृणाल ने समस्त पुरुष समाज के स्वामित्व एवं औचित्य को चुनौती दी है।
अहिंसा एवं प्रेम को चरितार्थ करना :
उपन्यास का चरमोत्कर्ष यह है कि मृणाल इस वेदना की आँच से पिघलकर प्रमोद जज के पद से त्यागपत्र देना इस बात का सूचक है कि प्रमोद समाज को यह चुनौती देना चाहता कि समाज के द्वारा मृणाल किस तरह अपमानित हुई है और समाज ने उसके साथ कितना बड़ा अन्याय किया है।
“आज इस सारी वकालत के पैसे और बुद्धिमत्ता की प्रतिष्ठा के ऊपर बैठकर सोचता हूँ कि क्यों मुझसे तनिक सरल सामान्य नहीं बना गया? इस सबका मैं क्या करूँ जब कि समय रहते प्रेम के प्रतिदान से मैं चूक गया।”
प्रमोद का आत्मग्लानि से भरना तथा स्वयं को दोषी समझना मृणाल के अहिंसा एवं प्रेम का प्रतीक है।
सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की माँग :-
मृणाल अपनी अहिंसात्मक वृत्ति द्वारा सोये हुए समाज को जगाने का प्रयास करती है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह दूषित समाज व्यवस्था को बदलने का प्रयास करती है परन्तु सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहती है।
“मैं समाज को तोड़ना-फोड़ना नहीं चाहती हूँ। समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे? या कि किसके भीतर बिगड़ेंगे? इसलिए मैं इतना ही कर सकती हूँ कि समाज से अलग होकर उसकी मंगलाकांक्षा में खुद ही टूटती रहूँ।”
मृणाल आत्मपीड़ा की जीवन-पद्धति अपनाकर इस जलन से दूसरों को आलोकित करने लगती है।
सामाजिक मूल्यों की अवमानना (तिरस्कार) :
प्रस्तुत उपन्यास में मृणाल ने बरसों से चली आ रही सामाजिक परम्पराओं एवं संकल्पित मूल्यों पर प्रहार किया है। प्रमोद समाज की एक ईकाई है और प्रमोद जैसी अनगिनत इकाइयों के समूह से ही समाज की रचना हुई है। इसलिए हर एक ईकाई उतनी ही दोषी है। मृणाल ने सामाजिक मूल्यों की अवमानना करके समाज को बदलने का प्रयास किया है।
“सहायता का हाथ देकर क्या मुझे यहाँ से उठाकर ऊँचे वर्ग में जा बिठाने की इच्छा है! तो भाई मुझे माफ कर दो, मेरी वैसी अभिलाषा नहीं है।”
स्वयं को तपाकर जाग्रति का प्रयास :
स्वयं आजीवन पीड़ा सहन करके भी वह अन्याय के साथ समंजन नहीं कर पाई। अपने भाई के परिवार तथा समाज की अन्य अनेक इकाइयों को उसने विचारने को विवश कर दिया। यही अहिंसा की सफलता है।
“सहायता मुझे इसलिए चाहिए कि मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ। और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ को भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ।”
इस प्रकार पीड़ा-भुक्त्त रहकर भी मृणाल समाज को जागरूक करने का प्रयास करती है।
नारी आत्मदान से मुक्ति का प्रतिपादन :
प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने मृणाल के माध्यम से नारी ‘आत्मदान’ द्वारा ‘मुक्ति’ के मूल्य का प्रतिपादन किया है।
“जब तक पास हूँ, तब तक वह पुरुष अन्य नहीं है। मेरा सब कुछ उसका है। उसकी सेवा में मैं त्रुटि नहीं कर सकती। पतिव्रत-धर्म यही तो कहता है।”
मृणाल का आत्मदान भाव उपर्युक्त पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित है। इस प्रकार मृणाल के उद्गारों में उसकी प्रबल आस की झलक हम पाते हैं।
खोखली सभ्यता एवं रूढ़ियों का परित्याग :
मृणाल का गंदे विषैले वातावरण में रहना तथा समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों को अपनाना खोखली सभ्यता एवं रूढ़ियों के परित्याग का परिचायक है।
जिन लोगों के बीच बसी हूँ, वे समाज की जूठन हैं और यह बात कौन जानता है कि वे जूठन होने योग्य भी नहीं हैं। लेकिन इंसान तो हैं, और यह बात जबकि उनके बीच आ पड़ी हूँ मैं साफ देखती हूँ। …”
वर्ग उत्थान की प्रधान भावना :
निम्नवर्गीय वित्तहीन समाज के एवं और बिना मुखौटे के यथार्थ चेहरे का बड़ा आकर्षक चित्र मृणाल ने प्रस्तुत किया है।
“….कलईवाला सदाचार यहाँ खुलकर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है, क्योंकि उसे जरूरत ही नहीं कि वह कहे मैं पीतल नहीं हूँ।”
इस परिस्थितियों के चित्रण से लेखक का लक्ष्य वर्ग उत्थान की भावना ही दिख पड़ता है। वह पिछड़े और निम्न स्तरों को ऊँचा उठाकर कुछ नया कर सकने का सामर्थ्य उनमें फूँक देना चाहता है।
नैतिकता के पुनर्मूल्यांकन की माँग :
मृणाल की बीभत्स स्थिति के लिए परिवार और समाज दोनों ही दोषी हैं लेखक ने निम्नलिखित शब्दों में मानव जीवन का सार सम्मिलित किया है-
“वही जमा हुआ दर्द मानव की मानस मणि है उसके प्रकाश में मानव का गतिपथ उज्ज्वल होगा।”
जैनेन्द्र ने त्यागपत्र उपन्यास में समाज की बँधी-बधाई रीतियों परम्पराओं और नैतिकता पर एक प्रश्न चिन्ह लगाया है। जैनेन्द्र का यह विचार है कि सभ्यता आवरण के अन्दर ही छिपी होती है सामाजिक मानक और मूल्य व्यक्ति के व्यवहार को संचालित करते हैं।
लेखक का यह भी विचार है कि नैतिकता को परिभाषित करने के लिए पुराने मानदंड पर्याप्त नहीं हैं। गंदे वातावरण में रहने वाले व्यक्तियों की नैतिकता और मूल्य उन सभ्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक प्रखर हैं इसका कारण यह है कि निर्धन और साधन रहित व्यक्तियों के भीतर मनुष्य के प्रति प्रेम अभी भी विद्यमान है ऐसे व्यक्ति अपनी भूख की तृप्ति के लिए चाहे तरह-तरह के अपराध कर लें लेकिन उनकी आत्मा उतनी ही पवित्र है। इसका कारण यह है कि मनुष्य के प्रति प्रेम विश्वास सहयोग की भावना उनके भीतर अभी भी जीवित है।
★ निष्कर्ष :
अतः स्पष्ट है जैनेन्द्र ने त्यागपत्र के माध्यम से नैतिकता के पुनः मूल्यांकन की माँग प्रस्तुत की है। इन बंधे बँधाए नियमों और रीतियों को पुनः परखना होगा। और इनका मूल्यांकन केवल सामाजिक दृष्टिकोण से नहीं अपितु मनुष्यता के संदर्भ में भी परखना होगा।

