राग दरबारी- श्रीलाल शुक्ल

Questions:-

Q राग दरबारी उपन्यास सामाजिक विद्रूपताओं को उजागर करता है ?

या

Q  राग दरबारी उपन्यास समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को अनावृत करता है ?

या

 Q यह उपन्यास मूल्यहीनता को दर्शाता है।

या

 Q राग दरबारी उपन्यास में लेखक का प्रयोजन या उद्देश्य स्पष्ट करें ?

या

Q  राग दरबारी उपन्यास यथार्थ को (ग्रामीण) व्यक्त करता है ?

Or

 Q राग दरबारी उपन्यास नामकरण , कथा वस्तु |

श्री लाल शुक्ल आधुनिक काल के सशक्त साहित्यकारों में से हैं जिनकी लेखनी के माध्यम से सदा ही सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है। यह यथार्थ एक ओर व्यक्ति संदर्भों से ध्वनित हुआ है तथा दूसरी ओर सामाजिक संदर्भों से भी व्यक्त हुआ है। उनके उपन्यास ‘राग दरबारी’ का अध्ययन करने पर मोटे रूप में हम पाते हैं कि उन्होंने ग्रामीण परिवेश में फैले भ्रष्टाचार, शोषण, न्याय की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति, मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता तथा मानवीय संबंधों में खोखलेपन को उजागर किया है। हिंदी साहित्य के विख्यात आलोचक ‘नेमिचन्द्र जैन’ ने अपने विचार इस प्रकार दिए हैं।

आज के भारतीय जीवन के इस पक्ष की (पतनोन्मुखता, गिरावट, विकृति, मूल्यहीनता) बहुत सी विभिन्न स्थितियों के बड़े प्रभावी चित्र ‘राग दरबारी’ में हैं जो हमारे चिर परिचित अनुभव को फिर से ताजा करते हैं।

एक अन्य विचारक ‘रामदरश मिश्र’ के अनुसार

राग दरबारी ग्रामीण यथार्थ की क्रूरता को बहुत निर्मम झांप से उजागर कर सका है।

इसी प्रकार शांतिस्वरूप गुप्त के अनुसार

समाज का प्रतिनिधित्व की दृष्टि से राग दरबारी को महाकाव्यात्मक उपन्यास कहने में कोई संकोच नहीं होता।

राग दरबारी उपन्यास में तथ्य और यथार्थ की गहनता उपन्यास के महत्व को और बढ़ा देते हैं। उपन्यास में आधुनिकता का जो भावबोध है वह व्यंग्य और करुणा से उभारा गया है। इस उपन्यास की रचना में लेखक के कई प्रयोजन (उद्देश्य) निहित हैं। जिसे मुख्य रूप से हम तीन भागों में बाँट सकते हैं।

राग दरबारी : उद्देश्य

• मानवीय संबंधों के खोखलेपन की अभिव्यक्ति

 – सामाजिक संबंध

 – भावात्मक संबंध

 – पारिवारिक संबंध

• मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता

• भ्रष्टाचार एवं सामाजिक विद्रूपता

 – सामाजिक स्तर

 – राजनीतिक स्तर

 – आर्थिक स्तर

 – शैक्षिक स्तर

–  धार्मिक स्तर

नारी धर्म का पालन :

मृणाल ने अपने जीवन में नारी धर्म से कभी मुख नहीं मोड़ा। उसने बिना हिचकिचाहट अपना सर्वस्व दान कर दिया।

“जिसको तन दिया उससे पैसे कैसे लिया जा सकता है, यह मेरी समझ में नहीं आता। तन देने की जरूरत में समझ सकती हूँ। तन दे सकूँगी शायद यह अनिवार्य हो। पर लेना कैसे ? दान स्त्री का धर्म है ।”

हिंदी के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक आलोचक डॉ. देवराजू को मृणाल के समर्पण में यह वृत्ति नजर आई है। लेकिन एक अन्य आलोचक धनराज मानधाने का यह विचार है कि मृणाल के ‘समर्पण में भूख की अपेक्षा दूसरों को पीड़ा से बचाने की भावना अधिक विद्यमान है। उनका यह भी विचार है कि यदि मृणाल का व्यवहार भोग वृत्ति से प्रेरित और संचालित होता तो वह कोयले वाले को अपने परिवार में लौटने की सम्मति कभी न दे पाती।

आत्म बलिदान :

मृणाल के जीवन में नियति का यह प्रकोप अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। एक डॉ. के घर में ट्यूटर बनने के बाद प्रमोद के रिश्ते का संदर्भ मृणाल को इस आश्रय से भी वंचित कर देता है। अपने परिवार के लिए समाज की व्यवस्था के लिए मृणाल इस आत्म बलिदान को पूरा करती है।

“सदा के लिए भाग्य में भटकना बदा है। मानों यह खूब जानती है और जानकर अशेष भाव से हृष्ट-पुष्ट होकर उसे ही अपना लें, यह चाहती हैं। जैसे किसी ओर कृतार्थता नहीं है।”

मृणाल किसी को कष्ट नहीं देना चाहती। वह अपने त्याग एवं बलिदान से संतोष की अनुभूति करती है तथा इसे जीवन का लक्ष्य मानकर अपनाए रखती है।

अविश्वास के विरुद्ध आत्मपीड़न :

समूची जीवन-गति मृणाल के अन्तर में बूंद-बूंद दर्द भरने की दुखद गाथा है। कोयलेवाले का त्याग करने के पश्चात् गंदी बस्ती में रहना हर दुःख को वह नियति मान कर सहती गई ।

कोयले वाले के साथ रहती हुई भी वह जानती थी कि वह उसका सहारा नहीं बनेगा। प्रमोद का अवलंब भी उसे स्वीकार नहीं था। इस अविश्वास के विरुद्ध उसका आत्मपीड़न उसके जीवन की करुण कहानी को बयां करता है। अपने जीवन के इस मोड़ पर आकर, वह केवल उनका सहारा लेना चाहती है जिनसे कुछ छिपाना न पड़े, जिन पर पूर्ण विश्वास हो यही कारण है कि वह प्रमोद के साथ न जाकर बस्ती में रहना स्वीकार करती है।

मानवीय संबंधो के खोखलेपन की अभिव्यक्ति :-

आज की मुख्य समस्या है मानव संबंधो में आया खोखलापन, निस्सारता, जर्जरता, स्पंदनहीनता। यही समस्या ‘राग-दरबारी’ उपन्यास में श्रीलाल शुक्ल ने उठाई है उन्होंने ग्रामीण जीवन तक फैली इस बीमारी को यथार्थ के धरातल पर व्यंग्य के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया है और यह दिखाने का प्रयास किया है कि शहरों की संस्कृति धीरे-धीरे गाँवों में भी फैलती जा रही है। वहाँ भी लोगों के पारिवारिक, सामाजिक संबंध खोखले हो गये हैं। वे संबंधो का मात्र दिखावा है। संबंधो के खोखलेपन का प्रथम सोपान पारिवारिक संबंध है।

पारिवारिक संबंध :- 

व्यक्ति के संबंधो की शुरुआत परिवार से होती है। जन्म के साथ ही वह कई संबंध अपने साथ लाता है जैसे – पिता-पुत्र, भाई-बहन, इत्यादि परन्तु आज इन संबंधो में गिरावट आई है।

राग-दरबारी में लेखक ने इस विघटन की स्थिति को पाठक के समक्ष सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है तथा एक प्रश्न उठाया है कि भारतीय पुरातन पद्धति कहाँ समाप्त होती जा रही है? जिस देश में राम जैसे बेटे एवं लक्ष्मण जैसे भाई पारिवारिक संबंधो का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, आज वही संबंध क्षीण एवं जर्जर नजर आ रहे हैं। राग दरबारी उपन्यास में कुसहर प्रसाद, वैद्यजी, गयादीन तथा अन्य कई पात्रों के माध्यम से पारिवारिक संबंधो के बिखराव को दिखाया गया है।

1. कुसहर प्रसाद एवं पुत्र छोटे पहलवान के स्पंदनहीन संबंध

2. वैद्य जी के अपने पुत्र बद्री पहलवान से कटु संबंध

3. वैद्य जी एवं रुप्पन के स्वार्थपरक संबंधो का यथार्थ

4. रंगनाथ नाथ के मामा से खोखले संबंधो का सशक्त चित्रण

5. बद्री एवं रुप्पन का आपसी स्नेह चढ़ा राजनीति की बलि

कुसहर प्रसाद एवं पुत्र छोटे पहलवान के स्पंदनहीन संबंध : 

उपन्यास में लेखक ने कुसहर प्रसाद एवं उनके पुत्र छोटे पहलवान के पारिवारिक संबंधो का मूर्त वर्णन किया है। कुसहर के पुत्र छोटे लाल ने उसका सिर फोड़ दिया। एक दिन कुसहर प्रसाद रोते हुए वैद्यजी के पास आए। उनके सिर से खून बह रहा था। उसे किसने मारा पूछने पर एक अन्य व्यक्ति ने कहा

“इन्हे और कौन मारेगा? ये छोटे पहलवान के बाप हैं। उसे छोड़कर किसी साले में दम है कि इनको हाथ लगादे”

यह केवल कुसहर की कथा नहीं थी बल्कि उनके परिवार में पुश्तों से चली आ रही रीत थी। जिसके वर्णन से लेखक ने सम्बन्धों में खोखलेपन को दर्शाया है।

वैद्यजी के अपने पुत्र बद्री पहलवान से कटु संबंध :

लेखक ने इस उपन्यास में एक तरफ अनपढ़ लोगों के पारिवारिक संबंधों के बिखराव को दर्शाया है, तो दूसरी तरफ कुलीन, शिक्षित, एवं सभ्य लोगों के संबंधों के पतन को दर्शाया है। वैद्यजी के दो पुत्र हैं रुप्पन एवं बद्री। दोनों से ही वैद्यजी के संबंध स्नेह रहित हैं। राजनीति के खेल ने पिता-पुत्र के रिश्तों को मात्र दिखावा बना दिया है। अपने प्रेम प्रसंग के कारण बद्री पारिवारिक मर्यादा को तोड़ कर पिता का अपमान करता हुआ कहता है।

“नाक कान वाली बात न करो। नाक है कहाँ, वह तो पंडित अजुध्या प्रसाद के दिनों में ही कट गई थी।”

वैद्यजी ने कहा, “तुम अब नीचता की बातें कर रहे हो”।

इस प्रकार पिता-पुत्र का संवाद उनके बीच के संबंधो के कडुवेपन को सिद्ध कर रहा है।

वैद्यजी एवं पुत्र रुप्पन के स्वार्थपरक संबंधों का यथार्थ : 

वैद्यजी जो की कुशल राजनीतिज्ञ हैं उनकी राजनीति का प्रभाव उनके पारिवारिक संबंधो पर दिखाया गया है। रुप्पन वैद्यजी के छोटे पुत्र हैं तथा पिता के सहायक भी हैं। परन्तु जब उन्हें यह लगता है कि पिता जी गलत कर रहे हैं तो वह अपने पिता का विरोध करता है। वैद्यजी मात्र राजनीति की ख़ातिर अपने पुत्र से सभी संबंध तोड़ लेते हैं।

“मैं तुझे मैं अपने उत्तराधिकार से वंचित करता हूँ। सब लोग सुन लें। मेरे बाद बद्री ही इस कॉलेज में मैनेजर होगा। यही मेरा अन्तिम निर्णय है। रुप्पन को कुछ नहीं मिलेगा।”

रंगनाथ के अपने मामा से खोखले संबंधों का सशक्त चित्रण : 

रंगनाथ जो कि शहर में रहने वाला एक युवक है। अपनी सेहत खराब हो जाने के कारण वह अपने मामा के यहाँ गाँव में जाता है। परन्तु थोड़े ही दिनों में वह अपने मामा की भ्रष्ट राजनीति एवं स्वार्थपरकता देखकर उनके विरुद्ध हो जाता है। जिसके चलते उनके संबंधों में निस्सारता आ जाती है।

“मुझे यहाँ से नफरत हो रही है। मैं कल ही वापस चला जाऊँगा।”

रंगनाथ का यह कथन उसके रिश्तों में आई कड़वाहट की दास्ता बयां कर रहा है।

बद्री एवं रुप्पन का आपसी स्नेह चढ़ा राजनीति की बलि :-

बद्री एवं रुप्पन में भाई का संबंध है। परन्तु राजनीति का व्यापक असर उनके इस रिश्ते को खोखला बना देता है। दोनों भाई नाममात्र के भाई रह जाते हैं। उनका आपसी स्नेह समाप्त हो जाता है। पदलोलुपता के शिकार वैद्यजी अपने ही पुत्रों का इस्तेमाल करते हैं। बद्री का यह कथन उनके आपसी संबंधों को व्यक्त करता है :

“अरे रुप्पन, उन्हीं को दो चार लप्पड़ मारने होंगे। सो जब कहोगे, मार दूंगा।”

इस प्रकार लेखक ने पारिवारिक संबंधों के खोखलेपन एवं बिखराव को सशक्त रूप में पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। जिसमें आधुनिक युग के विषाक्त वातावरण में जी रहे सामान्य मानव की घुटन के दृश्य स्पष्ट रूप से उभरे हैं।

सामाजिक संबंध :

पारिवारिक संबंधों के समान ही सामाजिक संबंध भी भावना शून्य ता के शुष्क धरातल पर खड़े हैं जिन्हें विश्वास का जल सिक्त नहीं करता। अविश्वास की पृथ्वी पर खड़े ये संबंध स्वार्थपरता के प्रतीक हैं। वे चाहे मालिक नौकर के संबंध हों, मित्र के हो, पंच और प्रजा के हों। सभी में एक प्रकार का शून्य बिराजता है, इसी कारण व्यक्ति का सामाजिक दायरा छोटा होता जा रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण इस उपन्यास में देखने को मिलते हैं।

 – नौकर-मालिक संबंधों में स्वार्थपरकता

 – प्रिंसिपल एवं वैद्यजी के संबंधो में चाटुकारिता

 – गुरु-शिष्य के संबंधो में राजनीति

प्रिंसिपल एवं खन्ना मास्टर के संबंधों में कटुता

–  प्रिंसीपल एवं मालवीय के संबंधों में तानाशाही

 – वैद्यजी एवं पुलिसवालों के संबंधों में स्वहित की प्रधानभावना

नौकर-मालिक सम्बंधों में स्वार्थपरकता : 

वैद्यजी का सनीचर से नौकर मालिक का सम्बंध है। उसे घर के कामों के लिए रखा जाता है परंतु अपने स्वार्थो की सिद्धि के लिए वैद्यजी उसे ग्राम सभा का प्रधान बनाने की सोचते हैं। उस समय का दृश्य देखने से स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार आधुनिक युग में सम्बंध स्वार्थ प्रेरित होते हैं।

वैद्यजी ने अकस्मात कहा “सुनो मंगलदास इस बार हम लोग गाँव सभा का प्रधान तुम्हें बनाएंगे।”

सनीचर के लिए वैद्यजी का यह कथन उनके निजी स्वार्थ भावना को स्पष्ट करता है। वैद्यजी के समर्थक प्रिंसपल साहब के शब्द उनके स्वार्थी दृष्टिकोण को स्पष्ट कर देते हैं –

“प्रधान कोई गब्भू-घुसहू ही हो सकता है। भारी ओहदा है पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो एक दिन में लाखों का वारा न्यारा कर दें।”

प्रधान बनाने के स्वार्थ के कारण प्रिंसीपल की तथा वैद्यजी की शैली ही बदल जाती है। वे सनीचर को उसके वास्तविक नाम मंगलदास के नाम से बुलाते हैं। यह व्यवहारिक परिवर्तन संबंधों की प्रगाढ़ता अथवा घनिष्टता का सूचक नहीं अपितु स्वार्थ सिद्धि का सूचक है।

प्रिंसीपल एवं वैद्यजी के संबंधों में चाटुकारिता:-

राग दरबारी उपन्यास में लेखक ने प्रिंसीपल एवं वैद्यजी के सामाजिक संबंधों के माध्यम से वर्तमान युग में चाटुकारिता के महत्व का प्रतिपादन किया है। किस प्रकार प्रिंसीपल वैद्यजी की चापलूसी करके सम्मान से जीते हैं।

“अभी प्रिंसीपली में यह मुसीबत नहीं है और जहाँ वैद्यजी मैनेजर हों, वहाँ तो समझ लो कि प्रिंसीपल पूरा बबर शेर है। हमें किसी की खुशामद से मतलब नहीं। वैद्यजी का पल्ला पकड़े हैं और सबसे जूतों से बात करते हैं।”

सम्माननीय पद पर आसीन प्रिंसीपल का यह व्यवहार आज के युग में सामाजिक संबंधों की वास्तविकताओं को उजागर करता है।

गुरु-शिष्य के संबंधों में राजनीति :

आज प्रत्येक संबंध राजनीति की बलि चढ़ता जा रहा है।

गुरु-शिष्य जैसा पावन संबंध भी राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया है। खन्ना मास्टर के प्रति उनके विद्यार्थी का व्यवहार राजनीति के दुष्प्रभाव को स्पष्ट करता है।

“लड़के ने पकड़े जाने से इस आधार पर इनकार कर दिया कि मुझे प्रिसिपल साहब का हमदर्द होने के कारण पकड़ा जा रहा है।”

इस प्रकार राजनीति पारिवारिक ही नहीं बल्कि सामाजिक संबंधों को भी निगलती जा रही है।

प्रिंसिपल एवं खन्ना मास्टर के संबंधों में कटुता :

अध्यापक वर्ग में आपसी संबंध भी संतोषजनक नहीं है। इस वातावरण में अध्यापक वर्ग बच्चों को क्या शिक्षा देंगे। अध्यापक वर्ग के आपसी भेदभाव के कारण विद्यार्थी भी शिक्षा के प्रति उदासीन हो गए एवं राजनीति के प्रति जागरूक।

“मास्टर साहब जाँच-वाँच से कुछ नहीं होगा। सीधा रास्ता वही है। आप हुकुम दें तो किसी दिन यहीं अँधेरे-उजेले में प्रिंसपल साहब का भरंत-मिलाप कर दिया जाय।”

शिक्षकों के आपसी द्वेष भाव ने विद्यार्थियों के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। इस सत्य को लेखक ने ‘राग दरबारी’ उपन्यास में व्यंग्यों के माध्यम से उजागर किया है।

प्रिंसिपल एवं मालवीय के संबंधों में तानाशाही :-

स्वतंत्र भारत में आज संवैधानिक तौर पर तानाशाही नहीं है परन्तु आज भी उच्च वर्ग या उच्च पद पर आसीन लोग अपने से निम्न के साथ तानाशाही का व्यवहार करते हैं।

“ज्यादा कानून न छाँटो। जब से तुम खन्ना के साथ उठने बैठने लगे हो, तुम्हें हर काम में दिक्कत मालूम होती है।”

मालवीय के प्रति प्रिंसिपल साहब का व्यवहार उनके तानाशाही दृष्टिकोण का सूचक है। जिसके चलते वे स्कूल के प्रत्येक अध्यापक पर रोब झाड़ते रहते हैं।

वैद्यजी एवं पुलिसवालों के संबंधों में स्वहित की प्रधान भावना : वैद्यजी एवं पुलिस अधिकारियों के संबंधों का आधार मानवीय न होकर मात्र स्वार्थ है।जिसके चलते पुलिस अधिकारी वैद्यजी की चाटुकारिता करते हैं। जो ऐसा नहीं करते वैद्यजी उसका तबादला कर वा देते हैं।

“बापू रंगनाथ इतने दिन अपने मामा के साथ रहकर भी तुमने उन्हें नहीं पहचाना। इससे पहले वाले थानेदार को उन्होंने बारह घंटे में शिवपालगंज से भगाया था। इन्हें तो लगता है 24 घंटे मिल गए।”

प्रिंसिपल के इस कथन से वैद्यजी एवं पुलिसवालों के आपसी संबंधों का पूर्ण रूप से पता चलता है।

भावनात्मक संबंध :

पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के अतिरिक्त भी कुछ संबंध ऐसे होते हैं जो दया, सहानुभूति, प्रेम आदि भावनाओं पर आधारित होते हैं। ऐसे संबंधों में मानवीयता का पूर्ण विकास दिखाई देता है, क्योंकि इनमें कोई स्वार्थ निहित नहीं होता, केवल किसी व्यक्ति से सहानुभूति होती है। परन्तु लेखक ने इस उपन्यास में यह दिखाया है कि ये संबंध भी धीरे-धीरे समाप्त हो गए हैं।

लंगड़ के प्रति शुष्क व्यवहार:-

लंगड़ नाम का एक पात्र तहसीलदार से अपनी अर्जी की नकल बिना रिश्वत दिये निकालने की जिद किये हुए है। उसकी इस सत्य प्रियता एवं भ्रष्टाचार विरोधी प्रवृत्ति का समर्थक गाँव में एक भी नहीं। कोई उससे सहानुभूति नहीं दिखाता अपितु सभी उसका मजाक ही उड़ाते हैं।

रंगनाथ ने पुकार कर कहा “लंगड़ हो क्या?” वह कुछ आगे निकल गया था। वहीं रुक गया और पीछे मुड़कर देखते हुए बोला-

“हाँ बापू, लंगड़ ही हूँ।”

“मिल गई नकल?”

रंगनाथ के इस सवाल का जवाब सनीचर ने दिया। “नकल नहीं, इन्हें मिलेगा सिकंदर। उसी में टाँग लटकाकर झूला करेंगे।”

इस प्रकार भारतीय समाज में सहानुभूति के संबंध भी समाप्त होते जा रहे हैं। अतः इस प्रकार भारतीय समाज के पारस्परिक संबंधों के खोखलेपन को बहुत ही सुन्दरता से उजागर किया है। वे चाहे पारिवारिक हो, सामाजिक हो अथवा भावनात्मक, सभी संबंध रीते युक्त और स्वार्थ से प्रेरित हो गए हैं।

इसी कारण भारतीय समाज टूट रहा है। उसमें व्यक्तिवादी, क्षणवादी विचार धारायें घर करती जा रही हैं और एक लघु मानव की प्रतिष्ठा हो रही है जो अपने से बाहर सोचता ही नहीं।