भ्रष्टाचार एवं सामाजिक निरूपण :
भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है भ्रष्ट आचरण अर्थात् व्यक्तिगत, सामाजिक स्तर पर आचरण के सर्वमान्य मानदण्डों के विरुद्ध आचरण करना। अतः यदि कोई व्यक्ति गाली भी देता है तो वह भ्रष्टाचार कह जायेगा परंतु आधुनिक काल में आकर इस शब्द का अर्थ संकोच हुआ है। आधुनिक युग में अपने स्वार्थ के लिए अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग करना भ्रष्टाचार कहलाता है। जब व्यक्ति अपने सामाजिक दायित्व का पालन करने के लिए आर्थिक लाभ की अपेक्षा करता है अथवा अपने दायित्व निभाने में अनुचित विलम्ब करता है तो वह भ्रष्टाचार कहलाता है।
आज देश के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार फैला हुआ है चाहे सामाजिक क्षेत्र हो अथवा धार्मिक, राजनीतिक अथवा आर्थिक, सभी क्षेत्र भ्रष्ट दिखाई पड़ते हैं। भ्रष्टाचार को वैधानिक ढंग से रोकना सरकार का कार्य है परन्तु उसकी ओर संकेत करना संवेदनशील …
साहित्यकार का कार्य है। साहित्यकार समाज में फैली हुई बुराइयों की ओर इंगित करके उसे छुटकारा पाने का मार्ग सुझा सकता है।
गबन, निर्मला, गोदान आदि उपन्यासों में प्रेमचन्द ने किन्ही सामाजिक बुराइयों की ओर संकेत किया है। उनके पीछे प्रेमचंद की भावना निश्चित रूप से यह होगी कि वे उन बुराइयों को जड़ से मिटा देना चाहते थे।
श्री लाल शुक्ल ने ‘राग-दरबारी’ के माध्यम से सामाजिक बुराइयों की ओर संकेत किया है। उनकी प्रस्तुतीकरण की विधि व्यंग्यात्मक है। व्यंग्य विसंगति, अतिरेक, ढोंग, पाखंड, अनुपातहीनता आदि के सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करने का माध्यम है।
भ्रष्टाचार के अनेक रूपों की अभिव्यक्ति हमें विविध क्षेत्रों में होती दिखाई देती है।
सामाजिक भ्रष्टाचार :
‘राग-दरबारी’ उपन्यास में सामाजिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार का विस्तार से वर्णन किया गया है। समाज का प्रत्येक क्षेत्र, चाहे वह गाँव हो या शहर, पंचायत हो या स्कूल सभी भ्रष्टाचार के अड्डे बने हुए हैं। सामान्य आदमी की इतनी शक्ति नहीं कि वह इस भ्रष्टाचार के जाल को तोड़ सके।
प्रस्तुत उपन्यास में कई स्तरों पर सामाजिक भ्रष्टाचार के दिग्दर्शन होते हैं।
सामाजिक भ्रष्टाचार
कानून व्यवस्था में भ्रष्टाचार
सामाजिक संस्थानों में भ्रष्टाचार की जड़े
वकीलों द्वारा रिश्वत लेने का भ्रष्ट आचरण
सरकारी मान्यता एवं अनुदान का दुरुपयोग
जनकल्याण के नाम पर मात्र भ्रष्टाचार
कानून व्यवस्था में भ्रष्टाचार :
कानून समाज में व्यवस्था को कायम रखने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन वर्तमान समय में कानून में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सामान्य जन बिना रिश्वत दिए इस संवैधानिक व्यवस्था का उपयोग नहीं कर सकता। वही दूसरी तरफ समाज का शक्तिशाली वर्ग रिश्वत के बल पर अपने स्वार्थों की पूर्ति करता है।
“चालान भी हो जाएगा। जल्दी क्या है? कौन सी आफत आ रही है,”
कानून के रक्षक का यह व्यवहार उसके भ्रष्ट आचरण का प्रतीक है।
सामाजिक संस्थानों में भ्रष्टाचार की जड़े : आज भ्रष्टाचार भयंकर रोग की तरह बढ़ता जा रहा है। हर क्षेत्र में अपनी जड़े जमाता जा रहा है। आज समाज में कोई भी ऐसा संस्थान नहीं होगा जहाँ भ्रष्टाचार न हो। इस यथार्थ से सब का बोध कराना ही एक साहित्यकार का परम उद्देश्य है। जिसमें श्रीलाल शुक्ल ने अथाह सफलता प्राप्त की है।
एक क्लर्क का यह कथन –
“आजकल ऐसे ही चिड़ीमारों से काम बनता है कोई शरीफ आदमी तो कुछ करके देता नहीं”
सामाजिक संस्थानों के यथार्थ को पाठक के समक्ष पेश करता है ताकि एक सामान्यजन भ्रष्टाचार के प्रति सचेत हो सकें। सचेतता ही इस बीमारी का अंत कर सकती है।
वकीलों द्वारा रिश्वत लेने का भ्रष्ट आचरण :
कानून व्यवस्था को बनाए रखने में वकील वर्ग का महत्वपूर्ण योगदान होता है परन्तु आज वकील वर्ग भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। अपने दायित्वों का पालन करने के लिए आर्थिक लाभ की अपेक्षा ही इसका मुख्य कारण है।
“नकल बाबू भी घर गिरस्तीदार आदमी है। लड़कियाँ ब्याहनी है। इसलिए रेट बढ़ा दिया। मान जाओ और पाँच रुपये दे दो।”
एक वकील द्वारा इस तरह की माँग ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है।
सरकारी मान्यता एवं अनुदान का दुरुपयोग :
आज शक्तिशाली वर्ग … अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए सरकारी मान्यताओं एवं अनुदानों का दुरुपयोग करते जा रहे हैं। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने सामान्य जन को जागरूक करने का प्रयास किया है।
“होली आते आते सनीचर की दुकान को सरकारी मान्यता मिल गई थी वहाँ शक्कर बिकने लगी थी जिसके बारे में यह मशहूर था कि वह परमिट पर मिलती है, पर यह मशहूर नहीं था कि परमिट कहाँ से मिलता है,”
इस प्रकार उच्च वर्ग केवल अपने हितों को महत्त्व देता है तथा सरकारी मान्यताओं एवं अनुदानों का दुरुपयोग करता है।
जनकल्याण के नाम पर मात्र भ्रष्टाचार :
जनकल्याण की योजनाएँ कागज़ों पर बनती है तथा दम तोड़ देती है। सामान्य जन सदैव इससे वंचित रह जाता है। इस प्रकार भ्रष्टाचार का दीमक व्यवस्था को किस प्रकार खोखला बनाता है यह हमें इस उपन्यास में देखने को मिलता है।
“गाँव सुधार के धुरंधर विद्वान उधर शहर में बैठकर गाँव में शौचालयों की समस्या पर गहन विचार कर रहे थे और वास्तव में 1937 से अब तक विचार ही विचार करते आ रहे थे।”
राजनीतिक भ्रष्टाचार
ग्राम पंचायत के चुनाव में भ्रष्टाचार
कॉलेज समिति के चुनाव में भ्रष्टाचार
प्रजातंत्र पर वंशवाद का पहरा
लोकतंत्र पर भ्रष्टाचार की छाप
न्यायालयों में भ्रष्टाचार
पद का दुरुपयोग
ग्राम पंचायत के चुनाव में भ्रष्टाचार :
भ्रष्टाचार की जड़े सामाजिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी जड़े जमा रहा है। शिवपालगंज में ग्राम प्रधान के चुनाव के समय जो राजनैतिक दाँव-पेंच प्रयुक्त होते हैं वे इस ओर संकेत करते हैं कि चुनाव व्यवस्था जड़ तक विषैली हो गई है। रामनगर वाली, नेषाद वाली तथा महिपालपुर वाली इन व्यंग्यात्मक विधियों का उल्लेख लेखक ने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के लिए किया है।
कॉलेज समिति के चुनाव में भ्रष्टाचार : कॉलेज समिति के चुनाव में वैद्यजी प्रतिद्वंद्वियों को रोकने के लिए हिंसा और बल का सहारा लेते हैं और एक पहलवान को कॉलेज के बाहर खड़ा कर देते हैं। वह हर आने वाले सदस्य को बंदूक दिखाकर भयभीत करके भगा देता है और उधर वैद्यजी सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुन लिए जाते हैं।
“यदि तुम्हारे हाथ में शक्ति है, तो उसका उपयोग प्रत्यक्ष रूप से उस शक्ति को बढ़ाने के लिए न करो। उसके द्वारा कुछ नई और विरोधी शक्तियाँ पैदा करो और उन्हें इतनी मजबूती दो कि वे आपस में एक दूसरे से संघर्ष करती रहें। इस प्रकार तुम्हारी शक्ति सुरक्षित एवं सर्वोपरि रहेगी।”
प्रजातंत्र पर वंशवाद का पहरा :
आज इस भ्रष्टाचार के युग में प्रजातंत्र नाम मात्र का प्रजातंत्र बन कर रह गया है। इस यथार्थ को श्रीलाल शुक्ल ने राग-दरबारी उपन्यास के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया है।
“वे पैदायशी नेता थे क्योंकि उनके बाप भी नेता थे,”
आज की भ्रष्ट राजनीति में प्रजातंत्र पर वंशवाद की काली छाया को आसानी से देखा जा सकता है। लेखक ने इस तथ्य को व्यंग्यों के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया है।
लोकतंत्र पर भ्रष्टाचार की छाप :
लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति जनता के पास है लेकिन यह केवल संवैधानिक सत्य है वास्तविकता इससे कहीं अलग है। वास्तव में शक्ति का केन्द्रीकरण कुछ शक्तिशाली हाथों में है, जो इसे अपनी इच्छा से प्रयोग करते हैं। वैद्यजी एक ऐसे ही पात्र हैं जो अपने नौकर सनीचर को प्रधान के चुनाव में प्रत्याशी की तरह खड़ा ही नहीं करते बल्कि उसकी विजय की घोषणा भी कर देते हैं। प्रधान बनने के बाद भी सनीचर सामान्य जनकल्याण को महत्त्व न देकर वैद्यजी के हित की रक्षा करता है।
“प्रधान कौन साला बनता है?”
“हम तो वैद्यजी को ही प्रधान मानते हैं। समझ लो यह दुकान उन्हीं की है। बैठ मैं रहा हूँ। समझ लो मैं उनका शिकमी हूँ।”
सनीचर के संवाद से लेखक ने लोकतंत्र पर भ्रष्टाचार की छाप को दिखाने का प्रयत्न किया है।
न्यायालयों में भ्रष्टाचार :
प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने प्रजातंत्र पर ही प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया बल्कि न्यायालयों की न्याय व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है। चुनाव अधिकारी भ्रष्ट अतः वह रिश्वत लेकर दूसरे पक्ष को विजयी घोषित कर देता है। इस निर्णय के विरुद्ध अदालत में अपील होती है परन्तु लेखक ने न्यायालयों में फैले भ्रष्ट न्याय विधि का वर्णन किया है।
“इस चुनाव के खिलाफ याचिका दाखिल… इसका परिणाम यह हुआ कि मुकदमा तीन साल चला पर न यह साबित होना था, और न हुआ कि चुनाव अधिकारी ने कोई गलती की है।”
इस प्रकार राजनैतिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार का वर्णन लेखक ने विस्तृत रूप से किया है।
पद का दुरुपयोग :
आज प्रत्येक उच्च अधिकारी अपने निजी हितों की पूर्ति के लिए पद का दुरुपयोग करना लाजमी समझता है। इस तथ्य को लेखक ने उजागर किया है।
“पहलवान प्रधान बनकर हमीं पर लम्बर लगाओगे? कम से कम इतना तो रहने दो कि जब जरूरत पड़े अपना खेत सींच लें।”
इस प्रकार राजनीति का आज कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जो भ्रष्टाचार रहित हो। प्रत्येक क्षेत्र भ्रष्टाचार में लिप्त है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने भ्रष्टाचार के विशाल रूप को पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है।
शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार
पद बनाए रखने के लिए भ्रष्ट चाटुकारिता
शिक्षा के क्षेत्र में कुनबापरस्ती
भाई-भतीजावाद
छंगामल कॉलेज भ्रष्ट राजनीति का अखाड़ा
तानाशाही
शैक्षिक स्तर पर भ्रष्टाचार के पैंतरे
पद बनाए रखने के लिए भ्रष्ट चाटुकारिता :
शिक्षा का क्षेत्र पवित्र माना जाता है। एक शिक्षक को गुरु तथा विद्यार्थी को शिष्य का दर्जा प्राप्त है। शिक्षक निष्ठापूर्ण अपने शिष्य को ज्ञान देता रहा है। परन्तु आज यह क्षेत्र भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा है। आज अयोग्य शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र को दूषित करते आ रहे हैं। मात्र चाटुकारिता के दम पर पदलोलुप शिक्षक अपनी सत्ता बनाए हुए हैं। प्रिंसिपल साहब शिक्षक के भ्रष्ट आचरण का एक सशक्त उदाहरण हैं।
“हमारा तो बस यही कि वैद्यजी की खुशामद करा लो, पर हरएक के आगे सिर झुकाने को तैयार नहीं हैं। लेक्चरार होना अपने बूते की बात नहीं”
वैद्यजी की चाटुकारिता करके प्रिंसिपल केवल अपने पद को बनाए रखना चाहते हैं। इस प्रकार भ्रष्टाचार हर क्षेत्र में अपनी जड़े जमा चुका है।
शिक्षा के क्षेत्र में कुनबापरस्ती :
प्रस्तुत उपन्यास में शिक्षा के क्षेत्र में कुनबापरस्ती को दिखाया गया है।
“आप देखिए न इसी जुलाई में उसने अपने तीन रिश्तेदार मास्टर रखे हैं। उन्हीं को हमसे सीनियर बनाकर सब काम ले रहा है, कुनबापरस्ती का बोलबाला है”
मास्टर खन्ना का यह कथन शिक्षा के क्षेत्र में कुनबापरस्ती को दिखाता है।
भाई-भतीजावाद :
आज हर क्षेत्र में भाई-भतीजावाद की झलक देखने को मिलती है। राग-दरबारी उपन्यास में शिक्षा के क्षेत्र में भाई-भतीजावाद का विस्तृत चित्रण किया है।
“मलेरिया इंस्पेक्टर है…. नया आया है। बी. डी. ओ. का भांजा लगता है। बड़ा फितरती है। मैं कुछ बोलता नहीं हूँ सोचता हूँ कभी काम आएगा।”
इस प्रकार हर क्षेत्र में भाई-भतीजावाद है। एक योग्य उम्मीदवार को नौकरी मिलना असंभव कार्य जान पड़ता है। भ्रष्टाचार के इस युग में रोजगार के क्षेत्र में भाई-भतीजावाद की समस्या गेहूँ में लगे घुन के समान है जो समाज को लगातार खोखला बनाता जा रहा है।
छंगामल कॉलेज भ्रष्ट राजनीति का अखाड़ा :
सम्पूर्ण उपन्यास में छंगामल कॉलेज राजनीति का अखाड़ा बना रहा है। हर प्रकार का अनैतिक, भ्रष्ट एवं स्वार्थपूर्ण व्यवहार कॉलेज के शिक्षक वर्ग, विद्यार्थी वर्ग तथा अन्य कर्मचारियों में देखने को मिलता है।
“उसी में आप क्यों नहीं लग जाते? ठाठ से मामा के यहाँ रहिए, कॉलेज में दो घंटे पढ़ाइए, बाक़ी वक्त रिसर्च कीजिए।”
इस प्रकार छंगामल कॉलेज मात्र भ्रष्ट राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया है।
तानाशाही :
भारत एक लोकतंत्रात्मक देश है, परन्तु विडम्बना यह है कि लोकतंत्रात्मक देश होते हुए भी यहाँ हर क्षेत्र में तानाशाही है। उच्च वर्ग का अधिकारी निम्न वर्ग के साथ तानाशाही करता है। आज के भ्रष्ट समाज में उच्च वर्ग अपने हितों की पूर्ति के लिए निम्न वर्ग का शोषण करता है। श्रीलाल शुक्ल ने राग-दरबारी उपन्यास में इस समस्या पर गहराई से प्रकाश डाला है।
“खन्नाजी और मालवीय जी मैं औरों से नहीं कहता केवल आपसे कह रहा हूँ। आपको इस्तीफा देना होगा।”
इस उपन्यास में वैद्यजी उच्च वर्ग का प्रतीक हैं जो पूर्ण रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं तथा अपना विरोध करने वाले को मार्ग से हटा देते हैं। खन्ना और मालवीय को कॉलेज से निकालने का उनके पास सबसे सख्त कारण यह था कि वह उनके विरोधी थे।
शैक्षिक स्तर पर भ्रष्टाचार के पैंतरे :
श्रीलाल शुक्ल ने प्रिंसिप्ल के माध्यम से आधुनिक समाज में शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर व्यंग्य का प्रहार किया है।
“जगह खन्ना के जाने से हुई या मालवीय के मरने से आपको इससे क्या मतलब? आपके घर का बाग़ है, आम खाइए। पेड़ क्यों गिन रहे हैं?”
सम्पूर्ण उपन्यास में लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली के माध्यम से भ्रष्टाचार की चिरस्थायी जड़ों को दिखाने का प्रयास किया है।
धार्मिक भ्रष्टाचार :
राग-दरबारी ने धार्मिक अंधविश्वासों का फायदा उठाने वाले पंडितों के भ्रष्टाचार का वर्णन किया है कि वे किस प्रकार भोली-भाली जनता को मूर्ख बनाते तथा किसी व्यक्ति की स्वाभाविक शंका का निराकरण नहीं कर सकते अपितु उन्हें नास्तिक कहकर दुत्कारते हैं। रंगनाथ और रुप्पन मेले में एक मंदिर जाते हैं। मूर्ति देखकर रंगनाथ के दिल में जिज्ञासा उत्पन्न होती है क्योंकि यह मूर्ति देवी की न लगकर किसी सिपाही की लगती है।
“यह किस देवता की मूर्ति है?”
पुजारी बहुत व्यस्त था। झल्लाकर बोला – “कुछ जेब से निकालकर पूजन चढ़ाओ, तब अपने आप जान जाओगे कि कौन देवता है,”
परन्तु रंगनाथ मूर्ति का निरीक्षण करके कहता है कि यह मूर्ति किसी देवी की नहीं है। इस पर पुजारी रंगनाथ को गालियाँ देने लगता है तथा ईसाई है, विलायतियों की औलाद कह कर मंदिर से बाहर निकाल देता है।
इस प्रकार लेखक ने इस दृश्य के माध्यम से धार्मिक अंधता, तर्कहीनता पर प्रकाश डाला है कि सत्य बात सुनकर किस प्रकार धार्मिक ठेकेदार जनता का अपमान करते हैं केवल इसलिए कि सत्य जानकर जनता बढ़ावा नहीं चढ़ायेगी और उनकी आय के स्रोत समाप्त हो जाएंगे। इस प्रकार धार्मिक क्षेत्र में हो रहे भ्रष्टाचार का वर्णन लेखक ने बहु सुन्दर रूप से किया है।
आर्थिक भ्रष्टाचार :
राग-दरबारी उपन्यास में लेखक ने हर प्रकार की विद्रूपता को अनावृत किया है जिसमें सब से बड़ी सामाजिक विद्रूपता भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में व्याप्त है। राजनीति, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक यहाँ तक की आर्थिक भी। आर्थिक क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसे लेखक ने अनावृत करने का प्रयास किया है।
आर्थिक भ्रष्टाचार
आर्थिक स्थिति का हवाला देकर शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार
रिश्वत आर्थिक स्थिति की बहाली के लिए
आर्थिक स्थिति का हवाला देकर शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार :
आज आर्थिक स्थिति का हवाला देखकर रिश्वत लेना या देना सही माना जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह प्रायः देखने को मिलता है। प्रिंसिपल के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि आज किस प्रकार भ्रष्टाचार जीवन का अभिन्न अंग बन गया है।
“मुझे चार-चार बहिनों की शादी करनी है। एक कौड़ी पल्ले नहीं है। अगर वैद्यजी कान पकड़कर कॉलेज से निकाल दे तो आगे भीख तक न मिले।”
आर्थिक स्थिति भी मनुष्य को भ्रष्टाचार की गर्त में ढकेल देती है।
रिश्र्वत आर्थिक स्थिति की बहाली के लिए :
वर्तमान समय में रिश्वत को आर्थिक सहायता का चोला पहनाकर शिक्षित वर्ग ही बढ़ावा दे रहा है। लंगड़ जो कि बिना रिश्वत के नकल प्राप्त करना चाहता है उसे तमाम वकील एक शिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग देने की अपील करते हैं।
“नकलनवीस भी घर गिरस्तीदार आदमी। लड़कियाँ ब्याहनी है। इसलिए रेट बढ़ा दिया है। मान जाओ और पाँच रुपये दे दो।”
भारतीय समाज की आज सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि शिक्षित वर्ग अनेक प्रकार के तर्क देकर रिश्वत लेने को उचित ठहराता है। भ्रष्टाचार हमारे जीवन का स्वाभाविक अंग बन कर रह गया है।
निष्कर्ष :
लेखक ने राग-दरबारी उपन्यास में समाज में फैले भ्रष्टाचार, मानवीय संबंधों का खोखलापन एवं संस्कारहीनता व मूल्यहीनता को स्पष्ट रूप से पाठक के समक्ष उकेरा है तथा एक प्रश्न खड़ा किया है। आखिर इन सब का कारण क्या है? इस उपन्यास को पढ़ कर प्रत्येक मनुष्य आत्मनिरीक्षण कर सकता है तथा सही जवाब प्राप्त कर सकता है।

