परिवर्तन : महत्वपूर्ण तथ्य
छंद: यह मुख्य रूप से रोला छंद में रचित है।
– संपूर्ण कविता 31 पद्यों में विभक्त।
– 1924 में रचित एक लंबी कविता।
-‘पल्लव’ नामक काव्य-संग्रह में संकलित।
– विद्वानों ने इस कविता को एक ‘ग्रैंड महाकाव्य’ कहा है।
– Pant जी के अनुसार पल्लव-काल की प्रतिनिधि रचना।
-दार्शनिक पृष्ठभूमि पर रचित कविता।
-कविता में कवि ने परिवर्तन को जीवन एवं जगत का शाश्वत सत्य स्वीकार किया है।
-परिवर्तन के सुंदर एवं सकारात्मक रूप के साथ-साथ कुरूप एवं विनाशकारी रूप का भी चित्रण।
परिवर्तन’ कविता में निहित संदेश:-
परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य।
जगत् में सब कुछ परिवर्तनशील।
परिवर्तन ही संसार के विकास का आधार।
संसार में सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं तथा जीवन में दोनों का आना निश्चित है।
संसार में दीनता और दुर्बलता है, इसीलिए यहाँ, दया, क्षमा और प्यार जैसी अद्भुत भावनाएँ हैं।
जगत् की परिवर्तनशीलता के कारण ही आज का दुख कल का आनंद बन जाता है।
जीवन और मृत्यु भी इसी परिवर्तन के दो पहलू हैं।
जीवन का अर्थ है जगत् का निरंतर विकसित होना और मृत्यु का अर्थ है गति तथा क्रम का नष्ट हो जाना।
‘परिवर्तन’ कविता का सार :-
• कवि सृष्टि के प्रारंभ में विद्यमान प्राकृतिक सौंदर्य का स्मरण करते हैं जबकि प्रकृति सौंदर्य में तनिक भी कृत्रिमता यानी बनावटीपन नहीं था, दुख, दीनता नहीं थी।
• पुरातन ऐश्वर्य को याद कर कवि प्रकृति के परिवर्तित रूप की बात करते हैं। उन्हें वसंत में भी वातावरण में व्याप्त सुगंध सूनी साँसों के समान प्रतीत होती है।
•कवि को संसार मिथ्या प्रतीत होने लगता है क्योंकि यह प्रतिक्षण परिवर्तनशील है। कवि बचपन के कोमल शरीर को वृद्ध होते देख परिवर्तन को अनुभव करते हैं।
• कवि सुख-दुख, आशा-निराशा, उत्थान-पतन को भी परिवर्तन के रूप में ही देखते हैं और संकेत करते हैं कि सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख का आना प्रकृति में परिवर्तन का संकेत है क्योंकि जीवन और जगत् में कोई भी वस्तु अथवा स्थिति एक-सी नहीं रहती।
• कविता के छठे भाग में कवि परिवर्तन को ‘निष्ठुर परिवर्तन’ कहकर संबोधित करते हैं और कहते हैं कि हे परिवर्तन, तुम्हारा ही तांडव अर्थात् विनाशकारी नृत्य सृष्टि में सर्वत्र दिखाई देता है।
• कवि को जगत के सभी करुण दृश्यों और उत्थान-पतन में परिवर्तन का चक्र ही दिखाई देता है। अतः वे परिवर्तन को सहस्त्र फन वाले वासुकि नाग के समान बताते हैं।
- कवि मृत्यु को परिवर्तन के विषभरे दांतों के समान और कल्पांतर को परिवर्तन के वस्त्र के समान विश्व को उसकी [अ]वासीय गुफा और दिशाओं को उसके वक्र कुंडल के [स]मान चित्रित करते हैं।
- कवि ने परिवर्तन को सृष्टि को पीड़ित, मर्दित (मसलना, कुचलना), खंडित करने वाला, अमंगलकारी और निरंकुश बताया है।
काल-कृमि: परिवर्तन को ‘कुटिल काल-कृमि’ (समय रूपी कीड़ा) कहा गया है, जो धीरे-धीरे संसार के मानस-शतदल (कमल) को कुतर रहा है।- कवि [ने आग], बाढ़, भूकंप को परिवर्तन का सैन्यदल कहा है।
- कवि कहते हैं ओ परिवर्तन! तुम्हारा एक कटाक्ष संपूर्ण सृष्टि में प्रलय उत्पन्न कर एक युद्ध-सा छेड़ देता है, जिससे गगनचुंबी इमारतें, बड़े-बड़े साम्राज्य धराशायी हो [जा]ते हैं।
- तुम्हारे एक रोमांच पर दिशाएँ काँप जाती हैं, पक्षीगण भयभीत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, सागर में फेनयुक्त ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगती हैं, जो सौ फन वाले सर्प [के] समान और दिशाएँ पिंजरे में बंद गजराज के समान [तुम्]हारे इशारों पर नृत्य करती हैं।
- आकाश भयंकर वेग से चलने वाली वायु से आहत होकर मानो भयंकर गर्जना करने लगता है।
- [क]वि पंत ने लतिका के मानवीकरण के द्वारा परिवर्तन की [वि]नाशलीला का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।
- कवि ने कहा है कि परिवर्तन की विनाशलीला के बाद इस पृथ्वी पर सवेरा रक्तरंजित तथा संध्या चिता की अग्नि के समान प्रतीत होता है, आकाश में बहती पवन [मा]नो पीड़ित संसार की दुखभरी श्वास है।
- जगत में सुख [सर]सों के फूल के समान और दुख सुमेरु पर्वत के समान [है]।
- कवि ने इस जगत को कंकाल अर्थात् खोखला कहा है।
- कवि कहते हैं कि इस जगत के वन में पीड़ित होकर चीखना व्यर्थ है क्योंकि शांति और सुख संसार में नहीं अपितु संसार के उस पार हैं।
- परिवर्तन के माध्यम से ईश्वर के सृष्टि के कण-कण में व्याप्त होने की ओर संकेत किया गया है तथा सृजन एवं संहार को एक दूसरे का पूरक बताया गया है।
- कवि ने कहा है कि जो मृत्यु रूपी रात्रि प्राणी के नेत्र बंद करती है, वही प्रातःकाल होने पर नवजीवन के रूप में नेत्र खोल भी देती है।
- कवि पंत ने परिवर्तन को विश्वव्यापी, अकूल, अपार, विपुलाकार, अनिर्वचनीय तथा इंद्रजाल के समान मायावी बताया है।
- कवि ने विश्व को शिक्षास्थल, प्रकृति को सुंदर नर्तकी, परिवर्तन को नश्वर तथा सूत्रधर कहा है।
- कवि ने परिवर्तन को ही सृष्टि का नियंता तथा समस्त कार्य-व्यापार का संचालक बताया है, जिसमें निराकार-साकार, जीवन और मृत्यु सब व्याप्त हैं।
- अंत में कवि परिवर्तन को चिरंतन, विवर्तन तथा विवर्तहीन कहकर संबोधित करते हैं।
- परिवर्तन-चयनित अंश
- आज कहां वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?भूतियों का दिगंत-छबि-जाल,ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?
- नग्न नगर कर भग्न भवन, प्रतिमाएँ खंडित ,हर लेते हो विभव, कला, कौशल चिर संचित /आधि, व्याधि, बहु वृष्टि, वात, उत्पात अमंगल वह्नि, बाढ़ भूकंप-तुम्हारे विपुल सैन्य दल
- …..एक सौ वर्ष, नगर उपवन,एक सौ वर्ष, विजन वन!यही तो है असार संसार,सृजन, सिंचन, संहार!
- यहाँ सुख सरसों, शोक सुमेरु;अरे, जग है जग का कंकाल !!वृथा रे, ये अरण्य-चीत्कार,
अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही तांडव नर्तन, विश्व का करुण विवर्तन!”
“आज कहाँ वह पूर्ण–पुरातन, वह सुवर्ण का काल? … दुरित, दुख, दैन्य न थे जब ज्ञात, अपरिचित जरा–मरण–भू–पात!”
“मिलन के पल केवल दो, चार, विरह के कल्प अपार!”
“जगत का अविरत हृत्कंपन तुम्हारा ही भय–सूचन; निखिल पलकों का मौन पतन तुम्हारा ही आमंत्रण!”
“खोलता इधर जन्म लोचन, मूँदती उधर मृत्यु क्षण, क्षण;”
