प्रेमाख्यान काव्य परंपरा :- प्रेमाख्यान काव्यों की 2 परम्पराएँ हैं :-
1. सूफी प्रेमाख्यान काव्य
2. प्रेमाख्यान काव्य।
हिन्दी में सूफी प्रेमाख्यानक काव्य की परम्परा मुल्ला दाउद कृत चंदायन से आरम्भ होती है। – डॉ० रामकुमार वर्मा
सूफी प्रेमाख्यान हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा है जो प्रेम और आध्यात्मिक के अद्भुत मिश्रण को दर्शाती है। यह 14वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक विकसित है।
भक्तिकाल में सूफी फकीरों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं को चरितार्थ करने के उद्देश्य से जो प्रेमाख्यान मसनवी शैली में लिखे, उन्हें ही हम हिन्दी में सूफी प्रेमाख्यानों के रूप में जानते हैं।
आचार्य शुक्ल कुतुबन कृत मृगावती व डॉ नगेन्द्र असाइत कृत हंसावली से प्रेमाख्यान परंपरा का प्रारंभ मानते हैं।
भक्तिकाल (1375- 1700 ई.)
निर्गुण
ज्ञानाश्रयी (संत): कबीर, गुरुनानक, रैदास, दादूदयाल
प्रेमाश्रयी (सूफी): जायसी, कुतुबन, उस्मान
सगुण
राम भक्ति: तुलसीदास, नाभादास
कृष्ण भक्ति: सूरदास, मीरा, रहीम
पूर्वमध्यकालीन प्रेमाख्यान काव्य परम्परा के प्रतिष्ठित रचनाकार मलिक मुहम्मद जायसी के पूर्वज अरब के निवासी थे। जायसी की जन्मतिथि के विषय में विद्वानों में मतभेद है। आचार्य रामचन्द्रशुक्ल ने इनका जन्मकाल 1492 ई. निश्चित किया है। सैयद अशरफ को जायसी का गुरू माना जाता है। जायसी ने अपने महदी गुरू शेख बुरहान का भी उल्लेख किया है।
रचनाएँ :-
1. पद्मावत – यह प्रबन्धात्मक प्रेमाख्यानक काव्य है। ‘पद्मावत’ के प्रत्येक शीर्षक को ‘खण्ड’ का नाम दिया है। ये खण्ड ‘स्तुति खण्ड’ से आरम्भ होकर ‘उपसंहार खण्ड’ तक समाप्त होते हैं। कुल 57 खण्ड हैं। यह महाकाव्य जायसी की काव्य-प्रतिभा का सर्वोत्तम प्रतिनिधि है। इसमें चितौड़ के राजा रतनसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा वर्णित है। यह मसनवी शैली में रचित अवधी भाषा में रचित है। इसमें लोक कथानक तथा कल्पित एवं वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर निर्मित कथावस्तु के माध्यम से मानव की प्रेम संवेदना को अंकित किया गया है। ‘पद्मावती’ की इस विरह-व्यंजना की व्यापकता एवं गहनता के कारण ही जायसी को प्रेम की पीर का कवि कहा जाता है।
2. अखरावट– इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, जगत के स्वरूप आदि पर प्रकाश डाला गया है।
3. आखिरी कलाम– इस रचना में प्रलय का चित्रण किया गया है। जायसी ने विस्तार से ईश्वर की महत्वपूर्ण देन पर प्रकाश डाला है।
4. चित्ररेखा – इसमें करतार की वंदना के साथ पैगम्बर मुहम्मद व अपने 4 साथियों का वर्णन किया है। चन्द्रपुर नगर के राजा चन्द्रभानु व रानी रूपरेखा की पुत्री चित्ररेखा के माध्यम से प्रेम की महत्ता को निरूपित किया गया है।
5. कहरनामा – यह रचना लोकगीत कहरवा के तर्ज पर है। कवि ने इसमें योग पर बल दिया है, प्रभु से मन रमाने की प्रेरणा दी है।
इसके अतिरिक्त ‘महरी बाइसी’, ‘कन्हावत’, ‘मसला’ भी इनकी ही रचना मानी जाती है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल –
“इन्होंने मुसलमान होकर हिंदुओं की कहानियाँ हिंदुओं की ही बोली में पूरी सहृदयता से कहकर उनके जीवन की मर्मस्पर्शिनी अवस्थाओं के साथ अपने उदार हृदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा दिया।”
बच्चन सिंह ने उनकी भाषा के बारे में लिखा है –
“जायसी की अवधी (अवधी की अरघान’ है। जायसी का जो भी कुछ पढ़िए, अवधी की रस-गंध जरूर मिलेगी।”
डॉ बच्चन सिंह –
सूफी काव्य में एक ही कवि है जायसी, शेष लकीर के फकीर हैं।
आचार्य शुक्ल ने इसे
“फारसी मसनवी शैली का महाकाव्य माना है।”
डॉ. नगेन्द्र
“इसे महाकाव्य मानने से अस्वीकार करते हैं। इनका कथन है कि इसमें मूल चेतन-भाव एवं विशेषताओं का अभाव है।”
पद्मावत का महाकाव्यत्व:-
भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा में विविध विद्वानों ने महाकाव्य के जिन लक्षणों का उल्लेख किया है। आचार्य विश्वनाथ ने प्रायः उन सभी लक्षणों का समस्त में समाहार करते हुए उसके निम्नांकित लक्षण घोषित किए हैं –
1. महाकाव्य की कथा सर्गबद्ध होती है।
2. यह एक प्रकथन-प्रधान विशालकाय काव्य-रचना है।
3. शृंगार, वीर अथवा शांत रसों में से 1 रस प्रधान।
4. इसमें 1 ही छन्द का प्रयोग रहता है।
5. नायक धीरोदात्त गुणों से ओत-प्रोत
6. इसका विषय परम्परा से प्रतिष्ठित और लोकप्रिय होता है।
7. इसमें एक ही छन्द का प्रयोग रहता है।
8. इसके यत्र-तत्र दुष्टों की निन्दा और सज्जनों की प्रशंसा की जाती है।
9. इसके आरम्भ में मंगलाचरण की योजना की जाती है।
10. महाकाव्य में कम से कम 8 या उससे अधिक सर्ग होने चाहिए।
11. सर्गों का नामकरण सर्गों की कथा के अनुरूप और ग्रन्थ का नामकरण नायक के नाम या कवि की कृति के अनुसार किया जाता है।
डॉ० शंभूनाथ सिंह ने अपने 6 महाकाव्य का स्वरूप-विकास, शीर्षक शोधग्रन्थ में महाकाव्यों के तथ्य निर्धारित करते हुए भावी कसौटी पर पद्मावत को अलंकृत या साहित्यिक महाकाव्य स्वीकार किया है।
1. महदुद्देश्य, महत्प्रेरणा और महती काव्य-प्रतिभा :-
क) 57 खण्डों के वृहदकाव्य तथा उत्तम काव्यगुणों से ओत-प्रोत पद्मावत का प्रणयन करने वाले जायसी वास्तव में ही महान् काव्य-प्रतिभा के धनी थे।
ख) जायसी की प्रेरणा और उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति और साधना पद्धतियों में समन्वय करने का प्रयास रहा है। जायसी ने स्थल-स्थल पर सूफी मान्यताओं को अन्य धर्मों की मान्यताओं के स्थान पर अधिक बलपूर्वक प्रतिष्ठित किया है तथापि हिन्दू-देवताओं, महापुरुषों और धार्मिक मान्यताओं का भी उन्होंने श्रद्धापूर्वक उल्लेख और चित्रण किया है – वे कहते हैं-
विधिना के मारग हैं तेते, सरग नखत तन रोवाँ जेते।
ग) पद्मावत का उद्देश्य निश्चय ही उदात्त और भव्य है। पुरुषार्थ चतुष्टय में से पद्मावत में यद्यपि धर्म, अर्थ और काम की भी सिद्धि दिखाई गई है। जायसी अपने शब्दों में परम सत्ता के प्रेम की “पीर” मानते हैं। कवि ने ग्रन्थ के अन्त में इस तथ्य को स्वयं ही उद्घाटित कर दिया कि मैंने रतनसेन पद्मावती आदि पात्रों के माध्यम से जिस कथा को कृति में निबद्ध किया है, वह तो मेरे उद्देश्य के निर्वहण का माध्यम मात्र है।
2. महत्कार्य (मूल कार्य) – पद्मावत का मूल कार्य किंचित् विवादास्पद है। शुक्ल जी ने पद्मावती और नागमती के सती होने को मूल कार्य माना है। कवि का उद्देश्य आध्यात्मिक प्रेम का निरूपण करना था। तदर्थ संसार की असारता को दिखाना आवश्यक था।
जायसी ने सती खंड में इस प्रकार दिखाया है –
“राती पिय के नेह गई, सरग भएउ रतनार।
जो रे उवा सो अथवा रहा न कोई संसार।”
3. युग-जीवन के विविध चित्र – जायसी ने लोक जीवन के अनेकानेक चित्रों से पद्मावत की श्रीवृद्धि की है। कुमारियों की स्वच्छन्द क्रीड़ा, स्त्री-सौन्दर्य, स्त्रियों की जातियाँ, बागों का वर्णन, विरह-वर्णन, सपत्नियों की ईर्ष्या का वर्णन, युद्ध-वर्णन तथा दूतियों के हथकंडों आदि का जायसी ने विशद वर्णन किया।
4. सुसंगठित एवं जीवंत कथानक – संपूर्ण कथानक कृति नायक और नायिका रतनसेन तथा पद्मावती से किसी न किसी प्रकार सुसम्बद्ध है। मूल कथानक के साथ-साथ आध्यात्मिक अर्थ की भी प्रतीति कराते चलना निस्सन्देह एक कठिन कार्य था।
5. महत् अथवा उदात्त चरित्र – पद्मावत में नायक रतनसेन की निष्ठा, साहस और धैर्य पर पीछे प्रकाश डाला जा चुका है। अन्य पात्रों में पद्मावती का चरित्र भी औदात्य से ओत-प्रोत है। पद्मावती व नागमती सदगृहिणी हैं। विरहिणी नागमती के निम्नांकित उद्गार चारित्रिक औदात्य, पति-निष्ठा और भारतीय नारियों के आदर्श चरित्र का अतीव उत्तम उदाहरण हैं :-
“यह तनु जारौं छारि कै, कहौं कि पवन उड़ाव”
अपने चरित्र नायक के औदात्य की रक्षा करने के हेतु ही जायसी ने रतनसेन को अलाउद्दीन के हाथों वीरगति पाते न दिखाकर देवपाल से युद्ध के फलस्वरूप का ग्रास बनते चरित्र करना आदि।
6. गरिमामयी उदात्त शैली –
पद्मावत में जायसी ने फारसी की मनसभी शैली और प्राकृत प्रेमाख्यानों की शैली का सुन्दर समन्वय किया है। इसी शैली में तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना की है। लौकिक प्रेम कथा के माध्यम से अलौकिक प्रेम की भी व्यंजना कराते जाना जायसी की गरिमामयी शैली के कारण ही संभव हो सका।
डॉ० मनमोहन गौतम के शब्दों में –
“पद्मावत की शैली में नाना भावों का वर्णन करने की क्षमता है और वैविध्यपूर्ण जगत के कार्य-कलापों का अंकन करने की सामर्थ्य है।”
अलंकारों का स्वाभाविक सौन्दर्य पद्मावत में प्रस्फुटित हुआ है। अलंकारों का सौन्दर्य अंगभूत है, पृथक नहीं।
“जेहि दिन दसन ज्योति निरमई।
बहुतन्ह ज्योति ज्योति ओहि भई।”
7. प्रभावान्विति और गम्भीर रस व्यंजना –
डॉ० मनमोहन गौतम ने पद्मावत को सफल महाकाव्य बताते हुए कहा है–
पद्मावत के पूर्वार्द्ध में प्रेम-कथा बढ़ती जाती है। विवाह के उपरांत सुख के विस्तृत संदर्भ हैं किन्तु उत्तरार्द्ध में क्रमशः जीवन-सुख में उतार आता जाता है। रतनसेन का पकड़ा जाना, कालकोठरी में उसकी भयंकर यातनाएँ, अंत में पद्मावती व नागमती का सती हो जाना, क्षत्राणियों का जौहर। जिस प्रकार पूर्वार्द्ध में गम्भीर प्रभावान्विति मिलती है उसी प्रकार अंत में भी।
रस व्यंजना की दृष्टि से पद्मावत महत्वपूर्ण है। प्रेम कथा होते हुए भी शृंगार अंगीरस के रूप में प्राप्त नहीं होता। अंत में करूणा-प्लावित शांत रस की ही अभिव्यक्ति की गई है। अंतिम दृश्य में दोनों रानियाँ शांत भाव से ज्वालाओं का आलिंगन करती हैं। वे कहती हैं –
“जियत कंठ तुम्ह हम कंठ लाई।
मुए कंठ नहि छोड़ हिं सांई।”
कवि को जहाँ भी अवसर मिलता है वह स्त्रियों के सौन्दर्य वर्णन में प्रवृत्त हो जाता है। अतिरंजना व अतिशयोक्ति सौन्दर्य वर्णन में दृष्टिगोचर है। संयोग वर्णन प्रकृति की उद्दीपक भूमिका के साथ हुआ है।
षटऋतु वर्णन के अन्तर्गत वियोग वर्णन की उत्कृष्टता की दृष्टि से नागमती का विरह वर्णन हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है।
जायसी के वियोग वर्णन में पर लोक गीतों का प्रभूत प्रभाव है। बारहमासा लोकगीतों से ग्रहण किया गया है।
षटऋतु वर्णन तथा बारहमासा में प्रकृति के सौन्दर्य तथा परिवर्तनों के अनुक्रम में नायिका के भाव परिवर्तनों को अंकित किया गया है।
पद्मावत में बादशाह चढ़ाई खण्ड, राजा बादशाह युद्ध खण्ड तथा गोरा-बादल युद्ध खण्ड में वीर रस का परिपाक हुआ है। करूण, वात्सल्य, वीर, शान्त आदि रस गौण रूप में ही पद्मावत में व्यंजित हुए हैं।
