सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ : स्मरणीय बिंदु

कृति-परिचय

​संपादन

  • ​1922-23 में कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ पत्रिका का संपादन।
  • ​1923 में ‘मतवाला’ पत्रिका के संपादन में सहयोग।
  • गंगा पुस्तक माला, लखनऊ में कार्य करते हुए 1927 ई. तक इन्हीं की ‘सुधा’ नामक मासिक पत्रिका का…
  • गंगाप्रसाद पाण्डेय ने ‘महाप्राण निराला’ नामक पुस्तक की रचना कर निराला को ‘महाप्राण निराला’ नाम दिया।

  • नंददुलारे वाजपेयी ने निराला को ‘शताब्दी का कवि’ कहा।

  • डॉ. नामवर सिंह ने निराला को ‘शताब्दी का काव्य’ …

  • निराला का पहला कविता-संग्रह ‘अनामिका’ 1923 में हुआ।

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ : स्मरणीय बिंदु

​❖ छायावादी एवं प्रगतिवादी लेखन

  • ​’कृत्तिवास रामायण’ की एक पंक्ति ‘रावण पर राम की विजय शक्ति का ही आशीर्वाद थी’ के आधार पर ‘राम की शक्तिपूजा’ कृति की रचना।
  • ​प्रथम कविता ‘जन्मभूमि’ 1920 में ‘प्रभा’ पत्रिका में प्रकाशित।
  • ​पहला कविता-संग्रह ‘अनामिका’ नाम से 1923 में प्रकाशित।
  • ​’निराला रचनावली’ आठ खण्डों में प्रकाशित।

जुही की कली

  • निराला के अभ्युदय काल की कविता।
  • ​’जुही की कली’ कविता का रचनाकाल निराला ने 1916 बताया है। वस्तुतः आधुनिक शोधों के अनुसार यह 1921 में रचित कविता।
  • ​’जुही की कली’ कविता सर्वप्रथम कलकत्ता से निकलने वाले मासिक पत्र ‘आदर्श’ में 1922 में प्रकाशित।
  • ​प्रारंभ में निराला के कवितासंग्रह ‘अनामिका–प्रथम’ में संकलित, कालांतर में ‘परिमल’ में संकलित।
  • ​इस कविता में कवि ने जुही की कली के खिलने के प्रसंग को मानवीकरण अलंकार के माध्यम से अत्यंत सुंदर शैली में अभिव्यक्त किया है।
  • ​कवि ने जुही की कली को नायिका तथा पवन अर्थात् मलयानिल को नायक के रूप में प्रस्तुत कर शृंगार रस की सुंदर योजना की है।

​कविता का सार

  • ​जुही की कली को कवि ने एक विरहिणी नायिका के रूप में अभिव्यक्त किया है।
  • ​उसका प्रियतम पवन अर्थात् मलयानिल उसे विरह व्याकुल छोड़कर दूर देश की ओर चला गया है।
  • ​जुही की कली निर्जन वन में अपनी लता पर पत्तों के बीच सोई हुई अपने प्रिय से मिलन के स्वप्न देख रही है— विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी–स्नेह-स्वप्न-मग्न- अमल-कोमल-तनु तरुणी–जुही की कली,
  • ​दूसरी ओर अचानक उसके प्रेमी पवन को अपनी प्रिया जुही की कली की याद आती है और वह उपवन–सर–सरित गहन–गिरि कानन कुंज–लता–पुंजों को पारकर अपनी प्रिया के पास लौट आता है, उसे स्नेह से चूमता है।
  • ​गहरी नींद में डूबी जुही की कली प्रिय का आगमन नहीं जान पाती।
  • ​प्रियतम पवन यह सोचकर क्रोधित होता है कि उसकी प्रिया को उसके आगमन पर हर्ष ही नहीं हुआ।
  • ​वह अपने झोंकों को तीव्र गति से चलाता है।
  • ​नायिका हड़बड़ाकर उठ जाती है और प्रिय को सामने देख खुशी से झूम उठती है।
  • ​फलतः मिलन होता है, गिले–शिकवे दूर होते हैं और दोनों प्रेम के रंग में डूब जाते हैं।

बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु

  • स्मृति की व्यथा को अभिव्यक्त करने वाली कविता।
  • ​1950 में रचित।
  • ​निराला के कविता संग्रह ‘अर्चना’ में संकलित।

​कविता का सार

  • ​कवि एक लंबी अवधि के बाद उसी घाट से होकर गुजरते हैं, जहाँ कभी उन्होंने अपनी प्रिया के साथ प्रेम के पल बिताये थे।
  • ​उनकी पुरानी स्मृतियाँ ताज़ा हो जाती हैं, वे कुछ पल वहाँ ठहरकर उन मीठी यादों में डूबना चाहते हैं, किंतु वे ऐसा कर नहीं पाते।
  • ​वे जानते हैं कि वहाँ रुकने पर लोग तरह-तरह के सवाल करेंगे क्योंकि वे उस स्थान विशेष से उनकी निजी आत्मीयता को नहीं जानते, उनकी स्मृति में बसे उस भोले सौन्दर्य को नहीं पहचानते।
  • ​कवि सोचते हैं कि इस गाँव के लोग उनकी स्मृति में संचित प्रेम की मौन भाषा को नहीं समझ सकेंगे, जो उन्हें यहाँ रुकने के लिये विवश कर रही है।
  • ​वे तरह-तरह के सवाल करके उन्हें उनके हृदय के आनंद से वंचित कर देंगे। अतः वे वहाँ नहीं रुकते।
  • ​कवि ने इस कविता में यही उदासी यही विवशता अभिव्यक्त की है— बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु! पूछेगा सारा गाँव बंधु!

कुकुरमुत्ता

  • 1941 में रचित सामाजिक, व्यंग्यात्मक कविता।
  • ​दो भागों में रचित लंबी कविता।
  • ​प्रगतिवादी चेतना की कविता।
  • ​कविता का प्रथम भाग ‘हंस’ के मई, 1941 के अंक में प्रकाशित।
  • ​’कुकुरमुत्ता’ कविता-संग्रह के अब तक तीन संस्करण प्रकाशित –
    • ​पहला – युग-मंदिर उन्नाव से।
    • ​दूसरा – श्री राष्ट्रभाषा विद्यालय, काशी से।
    • ​तीसरा – किताब महल, इलाहाबाद से।
  • ​’कुकुरमुत्ता’ का प्रथम संस्करण, 1942 में प्रकाशित।
  • ​’कुकुरमुत्ता’ कविता-संग्रह में ‘कुकुरमुत्ता’ के अलावा सात अन्य कविताएँ संकलित – गर्म पकौड़ी, प्रेमगीत, रानी और कानी, खजोहरा, मास्को डायलाग्स, स्फटिक शिला, खेल।
  • ​इस संग्रह की लगभग सभी कविताएँ 1939 से 1942 के मध्य रचित।

​कविता का सार

  • ​कविता में ‘गुलाब’ पूँजीपति वर्ग का और ‘कुकरमुत्ता’ सर्वहारा या शोषित वर्ग का प्रतीक।
  • ​गुलाब को पूरे रख-रखाव से उगाया और विकसित किया जाता है जबकि कुकुरमुत्ता गंदगी में स्वयं उगता और बढ़ता है।
  • ​गुलाब सुविधाभोगी और कुकुरमुत्ता अभावजीवी।
  • ​गुलाब क्षणिक, कुकुरमुत्ता शाश्वत।
  • ​गुलाब शोषक, कुकुरमुत्ता पोषक।
  • ​कुकुरमुत्ता सभी सांसारिक कार्यों का आधार।
  • ​कुकुरमुत्ता सर्वव्यापी, उपयोगी, कर्मशीलता का आधार, प्रगति का आधार, प्रभावशाली, सभ्यता का केन्द्र, सभी में विद्यमान, सरस, सभी का जन्मदाता।
  • ​अतः कुकुरमुत्ता अपने आपको बड़ा बताकर अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता है।
  • ​प्रथम खण्ड में कुकुरमुत्ता गुलाब पर व्यंग्य करता है।
  • ​कवि ने नवाब साहब के एक संक्षिप्त कल्पित प्रसंग के माध्यम से प्रगतिवादी चेतना (मानवतावादी दृष्टिकोण) की अभिव्यक्ति की है।
  • ​नवाब साहब फारस से गुलाब के पौधे मँगवाते हैं तथा अन्य फूलों के साथ अपने बगीचे में लगवा देते हैं।
  • ​गुलाब की देखभाल के लिए अनेक नौकर-चाकर नियुक्त किये जाते हैं।
  • ​बाग में अनेक अन्य फूलों व फलों के पौधे भी थे किंतु जब मौसम आने पर गुलाब खिलता है, तब बाग की शोभा अत्यधिक बढ़ जाती है।

  • गुलाब के समीप ही गंदगी में एक कुकुरमुत्ता उगता है।
  • ​कवि ने इसी कुकुरमुत्ते को सर्वहारा तथा शोषित वर्ग का प्रतीक और गुलाब को पूँजीपति वर्ग का प्रतीक मानकर पूँजीपति वर्ग पर तीखा व्यंग्य किया है।
  • ​कुकुरमुत्ता गुलाब को दूसरों का खून चूसने वाला, सुविधाभोगी, बनावटी, काँटेदार कहकर उस पर कटाक्ष करता है तथा स्वयं को अनेक रूपों में अभिव्यक्त कर मौलिक कहता है।
  • ​कुकुरमुत्ता शोषित होने के बाद भी स्वाभिमानी है।
  • ​कविता के दूसरे खण्ड में कवि नवाब की पुत्री बहार को माली की बेटी गोली की सखी बताते हैं।
  • ​एक दिन बहार गोली के घर पर कुकुरमुत्ते का स्वादिष्ट कबाब खाती है तथा उसकी चर्चा अपने माता-पिता से करती है।
  • ​नवाब कुकुरमुत्ते के स्वादिष्ट कबाब को खाने के लिए लालायित हो उठते हैं और तत्काल माली को कुकुरमुत्ता लाने का आदेश देते हैं।
  • ​माली उन्हें बताता है कि कुकुरमुत्ता अब नहीं रहा, अब केवल गुलाब शेष है।
  • ​नवाब आदेश देते हैं कि जहाँ गुलाब उगे हैं, वहाँ कुकुरमुत्ता उगाया जाए।
  • ​उत्तर में माली कहता है कि ‘कुकुरमुत्ता उगाये नहीं उगता।’ यहीं पर कविता समाप्त हो जाती है मानो पूँजीपति वर्ग पर सर्वहारा (मजदूर) वर्ग की जीत हो जाती है–

* आया मौसम, खिला फ़ारस का गुलाब,

बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;

वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता

पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-

* “अबे, सुन बे, गुलाब,

भूल मत जो पायी खुशबु, रंग-ओ-आब,

खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,

डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!

राम की शक्तिपूजा : महत्वपूर्ण तथ्य

आचार्य शुक्ल ने कहा ……….

  • ​”निराला जी पर बंगभाषा की काव्यशैली का प्रभाव समास में गुम्फित पदवल्लरी, क्रियापद के लोप आदि में स्पष्ट झलकता है।”
  • ​”सबसे अधिक विशेषता आपके पद्यों में चरणों की स्वच्छंद विषमता है। कोई चरण बहुत लंबा, कोई बहुत छोटा, कोई मझोला देखकर ही बहुत से लोग ‘रबर छंद’, ‘केंचुआ छंद’ आदि कहने लगे थे।”

  • ​”निराला जी की भाषा अधिकतर संस्कृत की तत्सम पदावली से जुड़ी हुई होती है, जिसका नमूना हमें ‘राम की शक्ति पूजा’ में मिलता है। जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, इनकी भाषा में व्यवस्था की कमी प्रायः रहती है, जिससे अर्थ या भाव व्यक्त करने में वह कहीं-कहीं बहुत ढीली पड़ जाती है।”

बच्चन सिंह ने कहा ………..

  • ​”आर्थिक, गार्हस्थिक, सामाजिक, साहित्यिक युद्ध में पराजित निराला अपनी मनोदशा को बदलने और पराजय के बोझ को फेंकने के लिए नए मार्ग का अन्वेषण कर रहे थे। वास्तविकता तो यह थी कि ‘एक और मन रहा राम का जो न थका।’ वे नए सिरे से युद्ध करना चाहते थे। इसके लिए उन्हें ‘राम की शक्ति पूजा’ का ‘ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव’ मिल गया।”

  • ​”‘शक्ति पूजा’ का मूल स्रोत कृत्तिवास का ‘बंगला रामायण’ है किंतु ‘बंगला रामायण’ की कथा में वर्णन की स्थूलता, अर्थ का इकहरापन और बंगाली भावुकता है। निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ में सूक्ष्मता के अनेक स्तरों पर विचरण करने वाली अर्थ-योजना, हिंदी प्रदेश का संचय और पौरुष है। ‘बंगला रामायण’ जितना बहिर्मुखी है, ‘राम की शक्ति पूजा’ उतनी ही अंतर्मुखी।”

  • “‘शक्ति पूजा के प्रसंग हैं – राम की पराजय, राम की चिंता, अन्तर्द्वन्द्व, हनुमान का ऊर्ध्वगमन, विभीषण की मंत्रणा, जाम्बवान की सलाह, राम का आराधना-संकल्प, पद्महरण प्रसंग, देवी-स्तुति और वर-प्राप्ति। इन प्रसंगों के वर्णन की एकसूत्रता और उदात्तता इस तरह प्रस्तुत की गई है मानो एक विशाल शिलाखंड को तराशकर एक उदात्त, भव्य और कलात्मक मूर्ति निर्मित की गई हो।”

​डॉ. नगेन्द्र के इतिहास से ……….

  • ​”‘राम की शक्ति पूजा’ निराला की ही नहीं संपूर्ण छायावादी काव्य की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है। इसमें कवि ने एक ऐतिहासिक प्रसंग के द्वारा धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का चित्रण किया है। राम धर्म के प्रतीक हैं और रावण अधर्म का। इस कविता में अधर्म का चित्रण एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में हुआ है, जिसके सामने एक बार तो राम का साहस भी कुंठित होने लगता है।”

• “यह स्थिति एक ओर तो कवि के व्यक्तिगत जीवन के भयानक संघर्ष से सम्बद्ध हो जाती है और दूसरी ओर युगीन यथार्थ की विकरालता को भी व्यंजित करती है। अंत में राम शक्ति की ‘मौलिक कल्पना’ करते हैं, उसकी आराधना करते हैं और अधर्म के विनाश के लिए सक्षम होते हैं। शक्ति की उपासना में एक ओर तो परंपरागत सत्य की स्वीकृति का संकेत निहित है और दूसरी ओर ‘मौलिक कल्पना’ इस बात पर बल देती है कि प्राचीन सांस्कृतिक आदर्शों का युगानुरूप संशोधन अनिवार्य है।”

  • 1936 में रचित और 1939 में ‘अनामिका द्वितीय’ में संकलित। (हस्तलिखित नोट: 1936 ‘भारत’ दैनिक पत्र में प्रकाशित)
  • ​राम के मानव-रूप का चित्रण।
  • ​समकालीन यथार्थ, परिवेश की सांकेतिक अभिव्यक्ति।
  • ​राम के द्वारा रावण पर विजय-प्राप्ति के उद्देश्य से शक्ति-पूजा करने के प्रसंग पर आधारित एक लंबी कविता।

​➤ पांच चरणों में अभिव्यक्त कथानक —

  1. ​रवि हुआ अस्त
  2. ​लौटे युग दल
  3. ​है अमानिशा
  4. ​खिल गयी सभा
  5. ​निशि हुई विगत

​राम की शक्ति पूजा : कथानक के मुख्य बिंदु

  • ​राम-रावण युद्ध और युद्ध में रावण पक्ष की प्रबलता।
  • ​सूर्यास्त होने पर युद्ध विराम के पश्चात् राम का सेना सहित शिविर में लौटना।
  • ​संशयग्रस्त विकल मन राम।
  • ​सीता की स्मृति से विश्व-विजय की भावना का उदय।

  • ​दूसरे ही क्षण युद्ध में शक्ति के रावण के पक्ष में होने के कारण असहायता का अनुभव, अश्रुपात।
  • ​राम के अश्रु देखकर क्रुद्ध हनुमान का आकाश निगलने को ऊर्ध्वगमन।
  • ​शिव का शक्ति को नियंत्रित एवं प्रबोधित करना।

  • ​माता अंजना के रूप में उदित होकर शक्ति का हनुमान का क्रोध शांत करना।
  • ​विभीषण का राम को अवसाद एवं पराजय के भाव से बाहर निकालने का प्रयत्न।
  • ​जाम्बवान का ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर’ का प्रस्ताव।

  • ​राम सहित संपूर्ण सभा प्रस्ताव के प्रति सकारात्मक।
  • ​108 नीलकमल अर्पण के द्वारा राम का शक्ति-उपासना का संकल्प।
  • ​राम की चेतना का ऊर्ध्वगमन। शक्ति द्वारा अंतिम नीलकमल ले जाना।
  • ​राम की विकलता तथा नीलकमल के स्थान पर अपना नेत्र अर्पित करने को उद्यत होना।
  • ​शक्ति का अवतरण एवं विजय-प्राप्ति का वरदान।
  • ​”‘होगी जय होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।’ कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन” पंक्तियों के साथ ‘राम की शक्ति पूजा’ कविता का समापन।