भूमिका

कवि, नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार एवं निबंधकार जयशंकर प्रसाद का जन्म 1890 को वाराणसी में हुआ। प्रसाद हिन्दी के ऐसे सर्वप्रथम नाटककार हैं जिन्होंने इतिहास और नाटक दोनों का सही-सही समन्वय किया है। कवि के रूप में वे निराला, पंत, महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। प्रसाद ने अपनी काव्य रचना ब्रजभाषा की परंपरागत शैली से शुरू की परन्तु इस यात्रा का अंत खड़ी बोली की आधुनिक कविता में छायावाद के प्रवर्तक के रूप में हुआ।

प्रसाद के नाटक

हिन्दी नाट्य-साहित्य में प्रसाद जी का आगमन एक महत्वपूर्ण घटना है। प्रसाद जी ने हिन्दी नाटक को नई चेतना और प्राणशक्ति प्रदान की। उन्होंने न केवल युगीन धरातल पर उसके वर्ण-विषय को ही बदला, वरन नाट्य शिल्प में भी अपनी समन्वयवादी दृष्टि से प्रभूत परिवर्तन कर एक नये युग को जन्म दिया जिसे “प्रसादयुग” कहा जाता है। वैसे तो हिंदी नाटक के जन्मदाता भारतेन्दु थे लेकिन हिंदी नाटक को उसके चरमोत्कर्ष पर पहुँचाने का श्रेय प्रसाद को जाता है। प्रसाद जी की लेखनी से नाटकीय विकास की स्थिति पूर्णता को प्राप्त हुई।

प्रसाद जी ने अपने जीवनकाल में 13 नाटकों की रचना की —

 ऐतिहासिक नाटक : राज्यश्री, चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, कल्याणी, करुणालय, अजातशत्रु

 अर्द्धऐतिहासिक नाटक : जनमेजय का नागयज्ञ, विशाख, सज्जन

 काल्पनिक नाटक : एक घूँट, कामना

आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने लिखा है – “भारत के गिने-चुने आधुनिक श्रेष्ठ साहित्यकारों में प्रसाद जी का पद सर्वत्र ऊंचा रहेगा।”

 प्रसाद जी को 1938 में अपने कामायनी महाकाव्य के लिए मंगला प्रसाद पारितोषिक में हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा दिया गया।

 सन 1954 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया।

राष्ट्रीयता का स्वरूप एवं परिभाषा

राष्ट्रीयता का स्वरूप सदैव परिवर्तित होता रहता है। इस काल में देश के विभिन्न भागों में स्वतंत्रता की जो लहर फैल रही थी उसने देश के अधिकांश भाग को प्रभावित कर दिया था।

राष्ट्रीयता वास्तव में एक व्यापक भाव है जिसमें उनकी अनुभूतियाँ समन्वित रूप से अभिव्यक्त हो पाती हैं। देशप्रेम देश की दुर्दशा, विदेशियों के प्रति घृणा, देश पर आपत्ति की आशंका आदि। राष्ट्र से रागात्मक सम्बन्ध तथा उसकी समृद्धि, कल्याण और मंगल कामना ही राष्ट्रीयता की भावना है।

प्रसाद जी के नाटकों में राष्ट्रीयता

प्रसाद का लेखन का काल सन 1907 से 1937 तक का है और उसी समय हमारे देश में आजादी के बिगुल बज रहे थे और हमारा देश अब अंग्रेजों से गुलाम न रहकर आजाद होना चाहता था। सभी समकालीन साहित्यकार की तरह प्रसादजी ने भी अपने साहित्य में राष्ट्रप्रेम की भावना को उजागर किया है। उस समय में प्रसाद जी ने नई चेतना, पीड़ा, दुःख-दर्द को स्वयं महसूस कर चुके हैं और उन्हीं कारण उनके साहित्य को ऐतिहासिकता का आधार बनाकर राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र भावना और राष्ट्रीयता उनके समस्त साहित्य में दिखाई देती है।

प्रसाद के नाटकों में अभिव्यक्त राष्ट्रीय चेतना का अध्ययन हम निम्न शीर्षकों के अंतर्गत कर सकते हैं:

1. देशभक्ति:

स्वदेश-प्रेम राष्ट्रीयता का अनिवार्य तत्व है। प्रसाद के नाटकों में अनन्य देशभक्ति के उदाहरण प्राप्त होते हैं। उत्कृष्ट देश-प्रेम के कारण ही उन्होंने स्वदेश के गौरवपूर्ण प्राचीन इतिहास का उद्घाटन करना अपना लक्ष्य बना लिया था।

‘चन्द्रगुप्त’ नाटक में देशभक्ति की सबसे प्रखर ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस नाटक में सिंहरण अलका से कहता है कि –

“जन्म भूमि के लिए ही जीवन है।”

सिकन्दर के युद्ध में घायल होने के समय सिंहरण के माध्यम से प्रसाद की देशभक्ति के अमर-स्वर फूट पड़ते हैं।

डॉ नागेन्द्र के शब्दों में

“यह प्रसंग इतिहास के अनुकूल हो अथवा नहीं, परन्तु इसमें बोलती हुई देशभक्ति की भावना एकांत दिव्य है। देशभक्ति का इतना शुद्ध और पवित्र रूप मैंने हिंदी साहित्य में अन्यत्र नहीं देखा।”

2. स्वर्णिम अतीत का चित्रण:

सांस्कृतिक पुनर्जागरण के युग में अथवा राष्ट्रीय संकट के काल में गौरवपूर्ण अतीत की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। प्रसाद काल में लिखे गए नाटकों का लक्ष्य देश में राष्ट्रीय चेतना को प्रबुद्ध करना। प्रसाद जैसे नाटककारों ने देखा, कि हमारा वर्तमान इतिहास ही नहीं भूत इतिहास भी विदेशी छाया में मलिन हो गया है, अतः इससे उसका सच्चा स्वरूप प्रदर्शित करने के लिए, उन्होंने भारतीय ग्रंथों के ही आधार पर ऐतिहासिक अन्वेषण किया।

3. आध्यात्मिक उत्कर्ष:

प्रसाद के नाटकों में भारतवर्ष का आध्यात्मिक गौरव सुरक्षित है, उन्होंने प्राचीन भारतीय धर्मों – ब्राह्मण और बौद्ध की महत्ता का जयघोष किया। महाभारतकाल और पुराण से लेकर हर्षवर्धन तक के काल का विस्तृत वृत्त लेकर प्रसाद ने अपने नाटकों में अपने प्रगाढ़ इतिहास प्रेम, दीर्घकाल व्यापिनी, अखण्ड व समन्वयात्मक ऐतिहासिक दृष्टि और गम्भीर इतिहासानुशीलन का बड़ा ही भव्य परिचय दिया है। प्रसाद ने बौद्ध युग, मौर्य युग और गुप्त युग जो भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग हैं – से अपने नाटकों के विषय चुने। ‘चन्द्रगुप्त’ में विश्व विजय का आकांक्षी वीर सिकन्दर भारतीय आध्यात्मिकता के गौरव के सम्मुख नत-शिर दिखाई पड़ता है।

4. नैतिक उत्कर्ष –

डॉ. दशरथ ओझा मानते हैं कि

“प्रसाद के नाटकों में आध्यात्मिक और अधिभौतिक दोनों शक्तियों के सामंजस्य से मानव की गहनतम नैतिकता विकासोन्मुखी बनती है।”

‘राज्यश्री’ में हर्ष तथा राज्यश्री नैतिकता के ज्वलंत प्रतीक हैं। ह्वेनसांग जैसे विदेशी भी भारतीय नैतिकता के प्रशंसक हैं। ह्वेनसांग राज्यश्री से कहता है –

“मुझे वरदान दो कि भारत से जो मैंने सीखा है, वह जाकर अपने देश में सुनाऊँ।”

5. भौतिक उत्कर्ष –

प्रसाद ने अपने नाटकों में नैतिक उत्कर्ष के साथ भौतिक उत्कर्ष एवं भारतीयों के शौर्य का परिचय भी दिया है। इनके नाटकों में ऐश्वर्य का उद्घाटन किया गया है।

‘राज्यश्री’ में बतलाया गया है कि सम्राट हर्षवर्धन प्रयोग में अपनी समस्त सम्पत्ति, यहाँ तक की शरीर के वस्त्र तक, दान कर देते हैं। ह्वेनसांग भाव विभोर होकर कहता है –

“भारत का यह देवदुर्लभ दृश्य देखकर मुझे विश्वास हो गया, कि यही अमिताभ की प्रसव-भूमि हो सकती है।”

6. वर्तमान दुर्दशा का चित्रण :-

प्रसाद ने तत्कालीन समस्याओं दुर्दशाओं के हृदय विदारक और मर्मस्पर्शी चित्र उपस्थित किए हैं। उन्होंने राष्ट्र के विकासात्मक तथा संवेधनात्मक तत्वों की ओर ध्यान आकर्षित कर समाज का पथ प्रशस्त किया। भारतेन्दुकालीन नाटकों में देश की दुर्दशा का ‘भारत दुर्दशा’ आदि नाटकों में सर्वांगीण चित्रण किया गया था। प्रसाद ने अपने युग के नाटककारों के साथ इस कार्य को आगे बढ़ाया। भारत दुर्दशा के निम्नलिखित रूप प्रसाद के नाटकों में प्राप्त होते हैं –

 राजनीतिक दासता

 सामाजिक अव्यवस्था एवं विघटन

 संस्कृति और शिक्षा की दुर्दशा

 आध्यात्मिक एवं नैतिक पतन

 राष्ट्रीय बोधक नवीन स्वर

7. स्वराज्य की माँग

प्रसाद और प्रसाद काल के नाटककार शासन सुधार नहीं, स्वराज्य चाहने लगे। इन्होंने कभी प्रत्यक्ष रूप से और कभी प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से स्वराज्य की माँग की। प्रसाद के नाटकों में स्वराज्य प्राप्ति की भावना अभिव्यक्ति मिली है।

‘चन्द्रगुप्त’ में वह कहते हैं –

“पराधीनता से बढ़कर विडम्बना और क्या है?”

8. एक राष्ट्र की कल्पना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की भावना

प्रसाद जी ने एक स्वतंत्र और संगठित साम्राज्य की कल्पना की है। उनके नाटकों में एक आर्यवर्त एक देश, एक राष्ट्र की धारणा व्यक्त हुई है। ‘चन्द्रगुप्त’ में सम्पूर्ण आर्यवर्त के भू-भाग को अपना देश समझने की शिक्षा दी गयी है। नाटक के प्रारंभ में ही सिंहरण सम्पूर्ण आर्यवर्त के लिए चिंतित प्रतीत होता है। सिंहरण राजकुमारी अलका से भी अपनी यही भावना प्रकट करता है –

“परन्तु मेरा देश मालव ही नहीं, गॉंधार भी है, यही क्या, समस्त आर्यवर्त है।”

9. गाँधीवाद के सैद्धांतिक पक्ष की अभिव्यक्ति

प्रसाद और प्रसाद-कालीन नाटकों पर गाँधी जी के आदर्शों व सिद्धांतों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। प्रसाद के नाटकों में गाँधी जी की विचारधारा का पुष्ट रूप देखा जा सकता है। ‘विशाख’ के प्रेमानन्द महात्मा गाँधी ही हैं। प्रेमानन्द ने एक अहिंसा, प्रेम, दया और शांति का संदेश दिया है। प्रेमानन्द कहते हैं कि –

“मैं शाश्वत संघ का अनुयायी हूँ और प्रेम की सत्ता का विश्वभर में प्रचार करना मेरा लक्ष्य है।”

10. राष्ट्रीय आंदोलन की अभिव्यक्ति

प्रसाद युग में अनेक राष्ट्रीय आंदोलन हुए, जिनका प्रभाव तत्कालीन नाटकों पर भी पड़ा। ‘विशाख’ की नाग जाति का स्वातंत्र्य संघर्ष, भारतीय स्वातंत्र्य-संघर्ष के अनुरूप है और साथ ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की प्रेरक शक्ति थी। नागजाति संगठित होकर अत्याचारी राजा नरदेव के विरुद्ध आंदोलन करती है और अपना लक्ष्य प्राप्त करती है।

11. आत्मबलिदान की भावना

सन् 1920 के पश्चात् के नाटकों में आत्मबलिदान की भावना का स्पष्ट स्वरूप दिखाई पड़ता है। इतिहास की वीर कथाओं के माध्यम से वीरतापूर्ण बलिदान का गुणगान किया गया। प्रसाद ने हिन्दूकाल के उन वीर चरित्रों को चुना, जिन्होंने देश की रक्षा में अपने प्राणों तक की बलि चढ़ा दी थी।

‘स्कंदगुप्त’ नाटक में बंधुवर्मा रण क्षेत्र में दम तोड़ता हुआ कहता है –

“बंधुगण यह रोने का नहीं, आनंद का समय है। कौन वीर इस तरह जन्मभूमि की रक्षा में प्राण देता है, यही में ऊपर से देखने जाता हूँ।”

12. आवेश तथा समता के स्वर

प्रसाद के नाटकों में यत्र-तत्र क्रांतिकारी विचार और स्वर देखा जा सकता है। ‘स्कंदगुप्त’ में विजया कहती है –

“सुना दो वह संगीत, जिससे पहाड़ हिल जाएँ और समुद्र काँप कर रह जाए, अँगड़ाईयाँ लेकर मुचुकुन्द की मोहनिद्रा से भारतवासी जग पड़े।”

‘ध्रुवस्वामिनी’ में सामन्तकुमारी के गान में क्रांति का संदेश निहित है।

14. समाज के राष्ट्र-निर्माणात्मक अन्य पक्ष

 I) जातीय एकता: जातीय एकता पर भी प्रसाद ने अपने नाटकों के माध्यम से बल दिया। प्रसाद ने ‘चन्द्रगुप्त’ में चन्द्रगुप्त और यवन कन्या कार्नेलिया का विवाह सम्बन्ध स्थापित कराकर धार्मिक तथा साम्प्रदायिक समन्वय किया है।

 II) अस्पृश्यता निवारण: नाटकों के माध्यम से अस्पृश्यता निवारण के प्रयत्न भी किए गए। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ में सरमा कहती है कि— “वर्ण-समानता आर्य जाति की विशेषता और गौरव था।”

 III) स्त्री स्वातंत्र्य: अनेक ऐतिहासिक नाटकों में प्रसिद्ध नारियों की वीरता, साहस और शौर्य की प्रशंसा की गई है तथा उनके मानवोचित गुणों—स्नेह, सेवा, सहिष्णुता, दया आदि का भी सफलतापूर्वक आकलन किया गया है।

‘ध्रुवस्वामिनी’ में स्त्री का अत्यंत विद्रोही रूप दृष्टिगोचर होता है। ध्रुवस्वामिनी कायर पति रामगुप्त से मोक्ष प्राप्त करती है। “मैं अपनी रक्षा स्वयं करूँगी। मैं उपहार में देने की वस्तु शीलमणि नहीं हूँ।”