सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के दर्शन को स्पष्ट करें।

निराला विद्रोही क्यों हो गए? उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फ़रवरी 1897 ई. में बंगाल में हुआ। “महाप्राण” नाम से विख्यात निराला छायावादी दौर के चार स्तंभों में से एक हैं। उनकी कीर्ति का आधार “सरोज स्मृति”, “राम की शक्ति पूजा”, “कुकुरमुत्ता” हैं; बतौर अनुवादक भी वे सक्रिय रहे। वह हिंदी में मुक्तक छंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। वह मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति के पक्षधर हैं। वर्ष 1930 में प्रकाशित अपने कविता-संग्रह “परिमल” की भूमिका में उन्होंने लिखा:

“मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है।”

निराला के बचपन में उनका नाम सुरजकुमार रखा गया। निराला जी महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषा और साहित्य का ज्ञान इन्होंने स्वाध्याय से अर्जित किया। उनका जीवन दुख की कथा सा है। 3 वर्ष की आयु में उनकी माँ का और 20 वर्ष के होते-होते उनके पिता का देहांत हो गया। महायुद्ध में फैली महामारी में उनकी पत्नी मनोहरा देवी व चाचा, भाई, भाभी का भी देहांत हो गया।

निराला का व्यक्तित्व घनघोर सिद्धांतवादी और साहसी था। वह सतत संघर्ष-पथ के पथिक थे। निराला जी एक सुप्रसिद्ध लेखक, कहानीकार, कवि, उपन्यासकार, निबंधकार एवं संपादक भी थे। निराला को प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता का जनक माना जाता है।

जीवन के अंतिम दिनों में निराला जी गरीबी एवं कष्टों में पिस-पिसकर विक्षिप्त हो गए। उनकी कविता में विषय की विविधता और नवीन प्रयोगों की बहुलता है। शृंगार, रहस्यवाद, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति-वर्णन के अतिरिक्त शोषण और वर्गभेद के विरुद्ध विद्रोह, शोषितों एवं दीन-हीन जन के प्रति सहानुभूति तथा पाखंड और प्रदर्शन के प्रति व्यंग्य व उनके काव्य की विशेषताएँ हैं।

 ये छायावाद के महेश, महाप्राण और अपराजेय हैं। निराला अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए विख्यात हैं। ये ओज और करुणा के कवि माने जाते हैं।

 रामविलास शर्मा ने निराला को “ओज और औदात्य का कवि” कहा है। तथा “राग-विराग” नाम से निराला की कविताओं का संपादन किया है।

 छायावादी कविता को व्यापक भूमि पर स्थापित करने वाले कवि निराला हैं। ये अपने व्यंग्य और क्रांतिधर्मा चेतना के लिए विख्यात हैं।

 निराला “बसंत के अग्रदूत” माने जाते हैं। ये मुक्त छंद के प्रवर्तक हैं।

– निराला छायावाद के शलाका पुरुष माने जाते हैं। ये अपने जीवन में सबसे पहले “समन्वय” – 1922 पत्रिका से जुड़े। इसके बाद द्वितीय स्थान पर “मतवाला” – 1923 पत्रिका से जुड़े।

 निराला की पहली रचना – जूही की कली (1916)

 अंतिम कविता – पत्रोत्कंठित (1961)

 निराला का अंतिम काव्य संग्रह सांंध्यकाकली 1969 है। इनका एकमात्र काव्य संग्रह जो मरणोपरांत प्रकाशित हुआ।

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला काव्य संग्रह

1. अनामिका – प्राचीन भाग-1

2. परिमल

3. गीतिका

4. तुलसीदास

5. अनामिका – द्वितीय भाग

6. कुकुरमुत्ता

7. अणिमा

8. बेला

9. नए पत्ते

10. अर्चना

11. आराधना

12. गीत कुंज

13. अपरा

14. सांंध्या काकली

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की प्रमुख कविताएं निम्नानुसार हैं:

1. सरोज स्मृति – 1935

2. राम की शक्ति पूजा – 1936

3. तोड़ती पत्थर – 1937

राम की शक्ति पूजा :-

बांग्ला के कृत्तिवास रामायण से प्रभावित यह कृति निराला के आत्मसाक्षात्कार की कविता है। इस कविता में राष्ट्रीय चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति है। यह महान बिम्ब विधानों की कविता है।

सरोज स्मृति और तुलसीदास मिलकर राम की शक्ति पूजा का निर्माण करती है।

निराला के छंदों पर रबड़ छंद और केंचुआ छंद का आरोप लगाया जाता है। शुक्ल जी के अनुसार –

“काव्य में न वाद है न ऐसा, जिसे लेकर निराला कोई पंथ ही खड़ा कर दे।”

निराला के चर्चित वाक्य निम्न हैं –

“मैंने अपनी कविताओं में मयूर-व्याल को पूंछ से बांध दिया है।”

“मुझे प्रोफेसरों के बीच में छायावाद को सिद्ध करना होगा।”

“वह कवि ही क्या, जिसके कलाकार के धड़, दार्शनिक के पैर और पहलवान की छाती न हो।”

1. व्यक्तिगत सुख-दुख की अभिव्यक्ति का काव्य

निराला छायावादी कवियों में ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में अपने व्यक्तिगत सुख-दुख की अनुभूतियों को व्यक्त किया है। उनका पूर्ण जीवन दुख, करुणा एवं निराशा के साथ-साथ संघर्ष एवं विषमताओं के साथ बीता, इन्हीं सभी की अभिव्यक्ति उन्होंने अपने काव्य में की है। “जूही की कली”, “मैं अकेला”, “सरोज स्मृति”, असंख्य उनकी ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें व्यक्तिगत सुख-दुखों को सुंदर अभिव्यक्ति के साथ पिरोया गया है।

स्नेहा निर्झर बह गया है

रेत ज्यों तन रह गया है

2. आत्म गौरव एवं आत्माभिमान का काव्य

निराला का संपूर्ण काव्य आत्म गौरव एवं अभिमान का काव्य है। अपने उग्र स्वभाव व आत्माभिमान के कारण वह धीरे-धीरे अपने समकालीनों से कटते गए हैं। निर्भय होकर सच्ची बात कहने के कारण इन्हें उन्होंने साहित्य जगत में अनेक शत्रु बना लिए। इस कारण कई बार उनकी उपेक्षा भी हुई, जिस कारण उनका आहत अभिमान और अधिक बढ़ गया। वे लिखते हैं

दिए हैं मैंने जगत को फूल फल

किया है अपनी प्रभा से चकित चल

3. प्रेम एवं सौंदर्य का काव्य

निराला की आरंभिक रचनाओं में प्रेम और सौंदर्य का प्रभावशाली वर्णन हुआ है। कई स्थानों पर उनका प्रेम निरूपण लौकिक होने के साथ-साथ अलौकिक भी बन गया है। “जूही की कली” नामक कविता प्रेम और सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है

दिव्य देह धारी ही कूदते है इसमें

प्रिय पाते हैं प्रेमामृत पीकर अमर होते हैं।

4. प्रकृति चित्रण

अन्य छायावादी कवियों के समान निराला ने भी प्रकृति का बड़ा सुंदर एवं मनोहारी वर्णन किया है। वे प्रकृति के अद्भुत चितेरे थे। उनकी कविता में प्रकृति निर्जीव पदार्थ की तरह अंकित नहीं है बल्कि वह सजीव एवं प्राणवान है। बसंत हो या वर्षा, ग्रीष्म हो या शरद ऋतु उनकी कविता समान रूप से प्रकृति के भव्य रूपों का अंकन करती है। निराला के शब्दों में संध्या का भावपूर्ण चित्रण देखिए –

दिवावसान का समय

मेघमय आसमान से उतर रही है

वह संध्या सुंदरी परी सी

धीरे, धीरे, धीरे

5. रहस्यानुभूति का काव्य

निराला जी वेदांत दर्शन से अधिक प्रभावित थे और वे भक्ति को सर्वोपरि मानते थे। “पंचवटी प्रसंग” में उन्होंने मुक्ति और भक्ति पर गंभीर विचार किया है, साथ ही इस कविता में उन्होंने भक्ति, योग, कर्म, ज्ञान आदि का समन्वय करने का प्रयास किया है –

भक्ति-योग-कर्म-ज्ञान एक ही है

यद्यपि अधिकारियों के निकट मित्र देखते हैं।

6. राष्ट्रीय भावना

महाकवि निराला के काव्य में राष्ट्रप्रेम का स्वर अत्यंत प्रखर है। उन्होंने भारत की महान परंपराओं को कविता में स्थान दिया और भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ को काव्य में अंकित किया है। “खून की होली जो खेली”, “जागो फिर एक बार”, “भारती वंदन” आदि कविताओं में कवि ने बार-बार देश प्रेम की भावना को व्यक्त किया है –

भारती जय विजय करें

कनक शस्य कमल धरे

7. प्रगतिशील विचारधारा

निराला केवल छायावादी कवि नहीं थे अपितु वे प्रगतिवादी कवि भी थे। उनका काव्य दलितों और कमजोर वर्गों के प्रति विशेष सहानुभूति रखता है। निराला के हृदय का करुण भाव समाज के उपेक्षित, कमजोर, पीड़ित एवं शोषित वर्गों की रक्षा को अर्पित है। “विधवा” की पीड़ा उन्हें द्रवित करती है तो “भिखारी” की दीनता एवं भूख उन्हें करुणा से भर जाती है। कड़कड़ाती धूप में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती मजदूर नारी का करुण चित्रण पाठक के मन को अनायास ही छू जाता है।

वह तोड़ती पत्थर

देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर

देख कर कोई नहीं

देखा मुझे उस दृष्टि से

जो मार खा रोई नहीं।

8. व्यंग्य एवं हास्य का पुट

निराला ने समाज में फैली विकृतियों एवं विद्रुपताओं का व्यंग्यात्मक चित्रण किया है। “कुकुरमुत्ता” कविता में उनके तीक्ष्ण व्यंग्य को देखा जा सकता है। “कुकुरमुत्ता” निम्न एवं कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व है और पूंजीवादी गुलाब को चुनौती देता हुआ कहता है –

अबे सुन बे गुलाब

भूल मत पर भाई तूने खुशबू रंगो आब

खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट

दाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्

9. सामाजिक चेतना और विद्रोह का काव्य

निराला के काव्य की एक विशेषता यह भी है कि उनका संपूर्ण काव्य सामाजिक चेतना और विद्रोह का काव्य है। “वीणा वादिनी वर दे” नामक कविता में कवि समाज में नवीन शक्ति का प्रादुर्भाव देखना चाहता है। वह समाज के शोषित और उपेक्षितों की व्यथा को व्यक्त करता है। अन्य छायावादी कवियों की अपेक्षा निराला अधिक विरोधी और स्वच्छंदतावादी दिखाई देते हैं। निराला उन पुरानी रूढ़ियों और जड़ परंपराओं को नष्ट करना चाहते थे जो समाज को खोखला करती जा रही है। काव्य जगत में मुक्त छंद का प्रवर्तक इसी विद्रोह और जड़ परंपराओं का विरोध है। “सरोज स्मृति” में वे लिखते हैं –

तुम करो ब्याह तोड़ता नियम

मैं सामाजिक योग के प्रथम

लग्न में पढ़ूँगा स्वयं मंत्र

यदि पंडित जी होंगे स्वतंत्

10. परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य

निराला का काव्य उनके हृदय के समान ही कोमलता और कठोरता का समन्वय है। जहाँ जूही की कली में उनका स्वर फूलों से भी कोमल हो जाता है वही बादल राग में हुंकार भरा वज्र से भी कठोर। एक ओर वे जूही की कली को प्यार भी करने लगते हैं और दूसरी ओर कुकुरमुत्ता में पूंजीपतियों को गाली देने लगते है। एक ओर उनके गीतों में मोहक कल्पनाओं के कोमल चित्र हैं तो दूसरी ओर राम की शक्ति पूजा जैसे काव्य में प्रौढ़ता और दृढ़शक्ति सम्पन्नता है।

11. अलंकार योजना

निराला की कविताओं में अलंकारों की अधिकता है। आपके काव्य में रूपक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, संदेह, यमक, उपमा, उदात्त आदि अलंकारों का विशेष प्रयोग हुआ है।

 अनुप्रास – तोड़ो, तोड़ो तोड़ो कारा / पत्थर की, निकले फिर गंगाजल धारा

 उपमा – वह इष्ट देव के मंदिर की पूजा-सी। / वह दीपशिखा सी शांत, भाव में लीन।।

12. छंद योजना

निराला जी ने छंदों का बंधन कभी नहीं स्वीकार किया। उन्होंने अपनी ओजमयी वाणी से सिद्ध कर दिया कि काव्य के लिए छंद का बंधन व्यर्थ है। उनकी मुक्त छंद की रचनाओं में एक अपना लय है, सौंदर्य है। उन्होंने स्वच्छंद काव्य लिखकर हिंदी में नयी छंद प्रणाली “मुक्तक” का आरंभ किया।

13. लक्षणात्मक प्रयोग

निरालाजी की कविताओं में लक्षणात्मक प्रयोग अधिक मिलते हैं। लक्षणात्मक प्रयोग का एक उदाहरण देखिये –

गंध-व्याकुल-कुल उर सर

लहरा खुलकर कमल मुख पर

हर्ष आलि हर स्पर्श शर-शर

गूँज बारम्बार (रे कह)।

14. भाषा की उन्मुक्तता

निराला जी के काव्य की एक प्रमुख विशेषता उनके काव्य भाषा की उन्मुक्तता भी है, जिसको लेकर वे छायावादी कविताओं में अपना विशिष्ट स्थान बना पाए। कुकुरमुत्ता तक आते-आते वे अपनी इसी भाषा सम्बंधी उन्मुक्तता के कारण प्रयोगवाद और नयी कविता के सूत्राधार तक कहे जाने लगे। उनकी भाषा में सहज स्वाभाविक ता है। वह किसी प्रकार की कृत्रिमता सहज नहीं कर पाती। पंत जी के समान निराला ने भी खड़ी बोली को बनाया और माँजा है।

15. निराला का भाषा शैली

निराला की भाषा शुद्ध खड़ीबोली है जो संस्कृत के तत्सम शब्द से पूर्णत संपन्न है। इनकी भाषा पर बंगला भाषा की छाप दिखलाई पड़ती है। भाषा की क्लिष्टता के कारण कविता दुरुह और दुर्बोध हो गयी है। भाव-गांभीर्य के कारण भी निराला की भाषा विशेष बोझिल सी हो गयी है। बंगला शब्दों के साथ-साथ ही निराला जी के काव्य में उर्दू, फ़ारसी और विदेशी शब्दों के भी प्रयोग मिलते हैं। दर्शन, चिंतन तथा विचार प्रधान रचनाओं में भाषा दुरुह और दुर्बोध हो गयी है, किन्तु जहाँ हृदय-तत्व की प्रधानता है, वहां भाषा कोमलकांत पदावली से युक्त हो गयी है। भाषा में शब्दों का चयन प्रसंगानुकूल हुआ है। ओज, प्रसाद व और माधुर्य गुणों से युक्त से संपन्न होने के साथ-साथ भाषा कोमल, सरस और प्रवाहपूर्ण है। मुहावरों के प्रयोग से वह और भी जीवंत हो उठी है। इस प्रकार निरालाजी कोमल और दुरुह दोनों प्रकार की भाषा प्रयुक्त करने में पूर्णत सिद्ध हस्त है।

निराला जी की भाषा के संबंध में श्री दामोदर ठाकुर अपने अंग्रेजी निबंध में लिखा है जिसका अनुवाद प्रो० फूलचंद जैन “सारंग” हिन्दी में करते हुए कहा है –

“प्रत्येक कवि अपनी भाषा के स्तर का निर्माता होता है। इस दृष्टि से निराला ने अपनी भाषा के संबंध में जो किया है, संभवतः हिंदी का कोई कवि उसकी तुलना नहीं कर सकता।”

निष्कर्ष

कहा जा सकता है कि निराला का काव्य एक चित्रशाला है जहां जीवन और जगत के बहुरंगी स्वरूप को सुव्यवस्थित किया गया है। उनके काव्य में सुख-दुख, हास्य-करुणा, राग-विराग, शांति-विद्रोह, अध्यात्म-शृंगार, आदर्श और यथार्थ जैसे बहुरंगी चित्र अंकित है। उनकी आस्था मानवतावाद में थी और मानव जीवन को सुखमय एवं गौरव में बनाने के लिए ही उन्होंने साहित्य सृजन का काम किया। निःसंदेह वे महान व्यक्ति होने के साथ-साथ एक महान साहित्यकार थे इसलिए उन्हें महाप्राण निराला के नाम से संबोधित किया जाता है।