आँसू – स्मरणीय बिंदु
- प्रथम संस्करण 1925 ई. में साहित्य सदन, चिरगाँव, झाँसी से प्रकाशित।
- द्वितीय संशोधित संस्करण 1933 ई. में भारतीय भंडार, प्रयाग से प्रकाशित।
- प्रथम संस्करण में मात्र 252 पंक्तियाँ।
- द्वितीय संस्करण में कुल 380 पंक्तियाँ।
- मूलतः एक विरह-काव्य। — स्मृति काव्य
- व्यष्टि-वेदना का समष्टि-वेदना के रूप में विकास।
आचार्य शुक्ल ने लिखा …….
- ”इनकी पहली विशिष्ट रचना ‘आँसू’ (सं. 1988) है। ‘आँसू’ वास्तव में तो हैं श्रृंगारी विप्रलंभ के, जिनमें अतीत के संयोग-सुख की खिन्न स्मृतियाँ रह-रहकर झलक मारती हैं, पर जहाँ प्रेम की मादकता की बेसुधी में प्रियतम नीचे से ऊपर आते और संज्ञा की दशा में चले जाते हैं, जहाँ हृदय की तरंगें ‘उस अनंत कोने’ को नहलाने चलती है, वहाँ वे आँसू उस ‘अज्ञात प्रियतम’ के लिए बहते जान पड़ते हैं।”
- ”जहाँ कवि …… इस ‘चिर दग्ध दुखी वसुधा’ को, इस निर्मल जगती को, अपनी प्रेमवेदना की कल्याणी शीतल ज्वाला का मंगलमय उजाला देना चाहता है, वहाँ वे आँसू लोक पीड़ा पर करुणा के आँसू जान पड़ते हैं। पर वहीं पर जब हम कवि की दृष्टि अपनी सदा जगती हुई अखंड ज्वाला की प्रभाविष्णुता पर इसप्रकार जमी पाते हैं कि ज्वाला या वेदना की अतिरंजित और दूरा रूढ़ भावना ही जो श्रृंगार की पुरानी रूढ़ि है – रह जाती है।”
- ”वेदना की कोई एक निर्दिष्ट भूमि न होने से सारी पुस्तक का कोई एक समन्वित प्रभाव नहीं निष्पन्न होता।”
- ”प्रसाद जी की यह पहली काव्य-रचना है, जिसने बहुत लोगों को आकर्षित किया। अभिव्यंजना की प्रगल्भता और विचित्रता के भीतर प्रेमवेदना की दिव्य विभूति का, विश्व में उसके मंगलमय प्रभाव का, सुख और दुख दोनों को अपनाने की उसकी अपार-शक्ति का और उसकी छाया में सौंदर्य और मंगल के संगम का भी आभास पाया जाता है।”
बच्चन सिंह ने लिखा ………
- ”‘आँसू’ के प्रथम संस्करण में आत्म-संकोच है तो द्वितीय में आत्म-प्रसार। इस आत्म-प्रसार में रहस्य और विश्व-मंगल का भी समावेश हुआ है। ‘आँसू’ की ज़मीन बहुत कुछ वैसी ही है जैसी ‘कामायनी’ की है। प्रसाद इसे ‘कामायनी’ के एक सर्ग के रूप में रखना चाहते थे, किंतु बाद में इसे नहीं रखा गया।”
- ”‘आँसू’ मानवीय विरह-काव्य है। इसमें प्रिय की सुन्दर देहयष्टि का आकर्षण है, आलिंगन-परिरंभण की मधुर स्मृतियाँ हैं, प्रेमजन्य पीड़ा है, दुखानुभव है। पर यह सब यूटोपिया है, मानसिक है, स्वप्नजन्य है।”
- ”‘आँसू’ में एक जादुई शक्ति थी। बहुत से लोगों ने उसे कंठस्थ कर रखा था। उसकी अनुगूँज देर तक सुनाई पड़ती रही। वस्तुतः यह किशोर-कंठ की पुकार थी। इसमें अनुभूति की उतनी गहराई नहीं है जितनी भावनामयता (सेंटिमेंटेलिटी) का प्रसार। इसमें वेदना की गरजना है, लहरों की घातों की कलकल ध्वनि की असंगतियाँ हैं।”
- शुक्ल जी को ‘आँसू’ में कोई समन्वित प्रभाव नहीं मिलता। किंतु अलग-अलग लेने पर उसमें रंजनकारिणी कल्पना व्यंजक चित्र का बड़ा ही अनूठा विन्यास और भावनाओं की सुकुमार योजना मिलती है। ‘आँसू’ न प्रबंधकाव्य है और न खंडकाव्य।
- ”छायावादी काव्य में सामान्यतः कथा-तत्त्व की कमी है। बिखराव उसकी विशेषता है। फिर भी उसमें एक केन्द्रवर्ती बिंदु है – स्मृति।”
डॉ. नगेन्द्र के इतिहास से ……..
- ”कवि ने आरंभिक व्यक्तिगत वेदना को भूलकर अंत में ‘आँसू’ को विश्व-कल्याण की भावना से संबद्ध कर दिया है।”
- ”ध्यान देने की बात यह है कि ‘आँसू’ एक स्मृति काव्य है – कवि ने अतीत-जीवन की अनुभूतियों को स्मृति के माध्यम से दर्दभरी अभिव्यक्ति दी है। यही कारण है कि ‘आँसू’ की भावभूमि स्थायी नहीं, विकासशील है। उसमें कवि का अतीत ही नहीं, उसका वर्तमान भी संयुक्त है।”
- इसलिए अंत तक आते-आते कवि अपने व्यक्ति-जीवन के नैराश्य और अवसाद से ऊपर उठकर अपनी वेदना को करुणा के रूप में विश्व-प्रेम में रूपान्तरित कर देता है।”
श्री इलाचन्द्र जोशी ने लिखा ………
- ”प्रसाद जी की आँसुओं की पंक्तियों ने हिंदी – जगत् को प्रथम बार उस वेदनावाद की मादकता से विभोर किया, जिससे बाद में सारा छायावादी-युग मतवाला हो उठा था।”
- ”वेदना की भयंकर बाढ़ में सारे युग को परिप्लावित कर देने की जैसी क्षमता प्रसाद जी के इन आँसुओं में रही है, वह हमारे साहित्य के इतिहास में वास्तव में अतुलनीय है।”
डॉ. विनय मोहन शर्मा ने लिखा …….
- ”आँसू में मानव-जीवन का-व्यक्ति का समष्टि की ओर विकास भी दिखलाई देता है। ….. ‘आँसू’ में पहले उठते यौवन की मादकता – बेचैनी फिर प्रौढ़ता का चिंतन और अंत में ढलती आयु का निर्वेद दिखलाई देता है।”
- ”इस प्रकार, ‘आँसू’ मोतियों की उस लड़ी के समान है जिसका प्रत्येक मोती पृथक् रहकर भी चमकता है और लड़ी के तार में गुँथ कर भी ‘आब’ देता है। वस्तुतः उसमें मुक्तत्व और प्रबंधत्व दोनों हैं।”
डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना ने लिखा ……
- ”आँसू काव्य में आरंभ से अंत तक विरह की धारा एकरस प्रवाहित हो रही है,इसमें मानवीय प्रेम-वेदना की तड़पन एवं कसक भरी हुई है,यह मानवीय वियोग का स्मृतिकाव्य है।”
‘आँसू’ का कथानक
- ’आँसू’ के कथानक को डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना ने चार भागों में विभक्त किया है –
- i. अतीत के संयोग-सुख की मादक स्मृति से उत्पन्न विरही की मनोदशा का चित्रण।
- ii. प्रियतम के अलौकिक रूप-सौंदर्य का निरूपण।
- iii. प्रेम-वेदना का चित्रण।
- iv. व्यथित विश्व के प्रति हार्दिक सहानुभूति का चित्रण।
