कामायनी : महत्वपूर्ण तथ्य

​डॉ. हरिचरण शर्मा – यह माना कि वह (कामायनी) छायावाद का उपनिषद् है, यह भी माना कि वह आधुनिक युग की श्रेष्ठ कृति है, यह भी सत्य है कि उसमें सृष्टि के विकास की कृत्रिम रूपरेखा प्रस्तुत की गई है पर यह सबसे बड़ा सत्य है कि कामायनी एक जीवन-काव्य है। आज विषमताओं के युग में जहाँ कदम-कदम पर जीवन के समक्ष अनेक प्रश्नचिह्न लगे हों, लगते जा रहे हों और मनुष्य उन सभी से जूझता हुआ जीने की कोई सही राह न तलाश पा रहा हो, वहाँ कामायनी एक राह दिखाती है, जीने के लिए अमृत-बिंदुओं की वर्षा करती है।

  • ​शांतिप्रिय द्विवेदी – ‘कामायनी छायावाद का उपनिषद है।’
  • ​निराला – ‘रहस्यवाद का पहला महाकाव्य’
  • ​नगेन्द्र – ‘मानवचेतना के विकास का महाकाव्य’
  • ​’कामायनी’ प्रसाद की अंतिम कृति।
  • ​1936 में प्रकाशित छायावाद का प्रतिनिधि महाकाव्य। (1935)
  • ​1937 में ‘कामायनी’ के लिए प्रसाद हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित।
  • ​’कामायनी’ का सृजन 1927 ई. में बसंत पंचमी के दिन प्रारंभ एवं इसका समापन शिवरात्रि के दिन 1935 में हुआ।
  • ​कामायनी के सृजन में प्रसाद को नौ वर्ष का समय लगा।
  • ​रायकृष्णदास और कृष्णदेव प्रसाद गौड़ के उल्लेखों से ज्ञात होता है कि प्रसाद ने प्रारंभ में इस कृति को ‘श्रद्धा’ नाम दिया था किंतु प्रकाशन से ठीक पहले इसे बदल कर ‘कामायनी’ कर दिया।
  • ​15 सर्ग – चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनंद।
  • ​’चिंता’ कामायनी का प्रथम एवं ‘आनंद’ अंतिम सर्ग।
  • ​’कामायनी’ की कथा का मूल आधार – शतपथ ब्राह्मण
  • ​कामायनी की कथा के अन्य आधार – ऋग्वेद, छांदोग्य उपनिषद, श्रीमद्भागवद्।
  • ​कामायनी का मुख्य रस – शांत रस।
  • ​प्रलय और उसके बाद मानव-सृष्टि के विकास की कथा ही ‘कामायनी’ की आधार-कथा।
  • ​मानवीय चित्तवृत्तियों के मानवीकरण के माध्यम से समरसतावाद एवं आनंदवाद का संदेश।
  • ​प्रमुख पात्र – श्रद्धा, इड़ा, मनु।
  • ​कामायनी का मूल दर्शन – प्रत्यभिज्ञा दर्शन – कश्मीर का शैव दर्शन।
  • ​व्यक्ति को उसकी सीमा से विमुक्त करके उसकी विराटता का बोध कराना प्रत्यभिज्ञा दर्शन का मूल लक्ष्य।
  • ​प्रत्यभिज्ञा दर्शन की मूल अवधारणा:
    1. ​शिव परमसत्ता।
    2. ​शिव 36 तत्त्वों से निर्मित।
    3. ​शिव ही ज्ञान और क्रिया के नियामक।
  • ​कामायनी का संदेश – अभेदवाद, समरसतावाद, आनंदवाद।
  • ​अभेदवाद – भेद बुद्धि समाप्त (अहं, अपना-पराया, स्वार्थ-संकीर्णता, अनंत इच्छाएँ)
  • ​समरसता – समाज, व्यक्ति, प्रकृति व पुरुष में समरसता पर बल ताकि समकालीन विषमताओं (असंतुलित जीवन, संकल्प-विकल्प की स्थिति और ज्ञान, क्रिया, इच्छा में बिखराव) को एकीकृत कर मानव-जीवन में समरसता स्थापित की जा सके।
  • ​आनंदवाद – समकालीन निरानंद जीवन की विफलता से उत्पन्न भटकन, अवसाद, निराशा को समाप्त कर निरर्थक जीवन को सार्थकता प्रदान करना और जीवन में आनंदवाद की स्थापना करना।
  • ​विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश।
  • ​कामायनी का उद्देश्य सत् (ज्ञान लोक), चित् (कर्म लोक) एवं इच्छा (भावलोक) में समन्वय स्थापित कर विश्वरूप शिव से तादात्म्य स्थापित कर आनंदवाद की स्थापना करना।

​कामायनी के प्रमुख प्रतीक

  • ​मनु – संकल्प-विकल्प, अहंभाव युक्त मन।
  • ​श्रद्धा – हृदय
  • ​इड़ा – बुद्धि
  • ​मानव – देव संस्कृति के विनाश के बाद विकसित मानव।
  • ​वृषभ – धर्म की प्रतीक।
  • ​श्रद्धा का पशु – जीवदया का प्रतीक।
  • ​नगरवासी – इंद्रियों के प्रतीक।
  • ​कैलाश पर्वत – शाश्वत आनंद का प्रतीक।

​कामायनी : कथा सार

  • ​प्रलय – सृष्टि का पुनरारंभ – जीवन का कटु यथार्थ – भौतिकता की पराकाष्ठा – बुद्धिवाद – आध्यात्मिक आनंद = कामायनी की कथा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
  • ​प्रथम सर्ग – ‘चिंता’ सर्ग में भयानक जल-प्रलय से बचे आधुनिक मानव-जाति के आदिपुरुष मनु की चिंताग्रस्तता का वर्णन।
  • ​अहंकार, विलासिता और पशु-पक्षियों की निर्मम बलि की अधिकता से देव-सृष्टि का विनाश।
  • ​मनु अवसादग्रस्त, निरुपाय एवं निष्क्रिय।
  • ​आशा सर्ग में मनु के हृदय में आशा का संचार। क्रियाशीलता में वृद्धि किंतु अवसादग्रस्तता पूर्ववत्।
  • ​श्रद्धा सर्ग में श्रद्धा के द्वारा मनु को जीवन की ओर मोड़ने और कर्मशील बनाने का प्रयास।
  • ​कामसर्ग में श्रद्धा का मनु को पूर्ण समर्पण एवं दोनों का साथ-साथ रहना।
  • ​वासना सर्ग में श्रद्धा और मनु का जीवन को व्यवस्थित करने, पशुपालन प्रारम्भ करने का वर्णन।
  • ​लज्जा सर्ग में मनु का प्रणय-निवेदन, श्रद्धा की लज्जाशीलता एवं उसके स्वभाव में परिवर्तन का चित्रण।
  • ​कर्म सर्ग में मनु के देव-संस्कृति के संस्कार पुनः उदित। ‘आकुलि’ और ‘किलात’ (असुर पुरोहित) के माध्यम से श्रद्धा के पालित पशु की बलि।
  • ​ईर्ष्या सर्ग में श्रद्धा द्वारा मनु को अपने जीवन-मरण का सहचर मानना। हिंसा न करने की प्रतिज्ञा करने के बाद भी मनु का अधिकांश समय शिकार में व्यस्त रहना।
  • ​गर्भवती श्रद्धा। मनु द्वारा श्रद्धा की उपेक्षा एवं ईर्ष्या।
  • ​मनु का श्रद्धा को छोड़कर चले जाना।
  • ​इड़ा सर्ग में श्रद्धा को छोड़कर मनु का हिमालय के उच्च शिखर पर स्थित अपनी गुफा से नीचे की ओर प्रस्थान। काम का संघर्षमय जीवन बने रहने तथा स्थापित प्रजातंत्र के शापित होने का शाप देना।
  • ​मनु का इड़ा से मिलन एवं कर्मशीलता का उदय।
  • ​स्वप्न सर्ग में श्रद्धा के पुत्र कुमार का जन्म।
  • ​स्वप्न में श्रद्धा का इड़ा के साथ मनु को तथा उनके द्वारा स्थापित वैभवपूर्ण नगर को देखना।
  • ​संघर्ष सर्ग में सारस्वत प्रदेश (इड़ा) के अशांत वातावरण, मनु प्रजापति बनने पर उत्पन्न निरंकुशता, सारस्वत प्रदेश की भौतिक सम्पन्नता, प्रजा के विद्रोह एवं मनु के घायल होने का वर्णन।
  • ​निर्वेद सर्ग में मनु को खोजते हुए श्रद्धा का आगमन।
  • ​अन्तर्द्वंद्वग्रस्त मनु का सच्ची शांति की तलाश में प्रस्थान।
  • ​दर्शन सर्ग में श्रद्धा का अपने पुत्र के साथ मनु के बिना ही सारस्वत प्रदेश में निवास।
  • ​अपने पुत्र को इड़ा के पास छोड़कर श्रद्धा का मनु की तलाश में प्रस्थान।
  • सरस्वती नदी के किनारे तपस्यालीन मनु के दर्शन।
  • ​श्रद्धा का हर स्थिति में मनु के साथ रहने का संकल्प।
  • ​मनु का शांति की खोज में जाने का लक्ष्य। श्रद्धा का भी साथ जाने को तत्पर होना।
  • ​श्रद्धा की पावन प्रेमयुक्त बातें सुनकर मनु के हृदय में श्रद्धा भाव जाग्रत, कैलाश पर्वत पर नटराज शंकर का नृत्य करते दिखाई देना, अनहद नाद सुनाई देना।
  • ​रहस्य सर्ग में श्रद्धा और मनु का आनंद शिखर (कैलाश पर्वत) की ओर प्रस्थान। एक ऐसे स्थान पर पहुँचना जहाँ ग्रह, तारे, नक्षत्र, ऋतुओं का अभाव, भूमण्डल की रेखा भी अदृश्य।
  • ​यहीं पर श्रद्धा का मनु को इच्छा लोक, कर्म लोक और ज्ञान लोक से परिचित कराना।
  • ​कामायनी के आनंद सर्ग में इड़ा का श्रद्धा के पुत्र मानव के सहयोग से सारस्वत प्रदेश की व्यवस्था करना। फलतः संपूर्ण प्रदेश का धन-धान्य संपन्न होना।
  • ​इड़ा और मानव का सारस्वत प्रदेशवासियों के साथ श्रद्धा और मनु के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत की यात्रा पर जाना।
  • ​कैलाश पर्वत पर जाकर सभी के आपसी भेदभाव, ईर्ष्या-द्वेष आदि का अंत। पारस्परिक अभिन्नता का अनुभव, जड़-चेतन में अद्वैत के दर्शन, सर्वत्र एक चेतना की विद्यमानता का आभास।
  • ​अखण्ड और घनीभूत आनंद में निमग्न होना।
  • ​कामायनी में अन्नमय कोष से ज्ञानमय कोष की यात्रा की कथा।

1. “भरा था मन में नव उत्साह, सीख लूँ ललित कला का ज्ञान। इधर रही गन्धर्वों के देश, पिता की हूँ प्यारी संतान।”

  • ​व्याख्या/मुख्य बिंदु: यह गंधर्व देश की कन्या (श्रद्धा) के उदात्त गुणों का वर्णन है।

​2. “यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न, भूत-हित-रत किसका यह दान। इधर कोई है अभी सजीव, हुआ ऐसा मन में अनुमान।”

  • ​व्याख्या/मुख्य बिंदु: ‘बलि का अन्न’ से तात्पर्य प्राणियों/जीवों के कल्याण (भूत-यज्ञ) के लिए निकाले गए अन्न से है।

​3. “कामायनी की कथा केवल एक फैंटेसी है।” कामायनी के संदर्भ में यह कथन किसका है?

  • उत्तर: गजानन माधव मुक्तिबोध

​4. ‘यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाघ्य है।’ कामायनी की कथा-सृष्टि के विषय में यह विचार किसका है? (RPSC Asst. Prof., 2020)

  • उत्तर:  जयशंकर प्रसाद

​5. ‘कर रही लीलामय आनन्द, महाचिति सजग हुई-सी व्यक्त, विश्व का उन्मीलन अभिराम, इसी में सब होते अनुरक्त।’ शिव की कौनसी तीन शक्तियों को ‘महाचिति’ कहा जाता है? (UGC NET Dec., 2020)

  • उत्तर: . इच्छा, ज्ञान, क्रिया

​6. ‘कामायनी’ में श्रद्धा किस गोत्र की है? (Chhatishgarh Asst. Prof., 2014)

  • उत्तर: . काम

​7. ‘कामायनी का महाकाव्यत्व असंदिग्ध है।’ यह कथन किसका है? (DSSSB PGT Exam., 2018)

  • उत्तर:  डॉ. नगेंद्र

​8. “वस्तु विन्यास की दृष्टि से कामायनी को दुखान्त रचना मान लेने में कोई आपत्ति नहीं।” यह कथन किसका है? (DSSSB PGT Exam., 2018)

  • उत्तर:  पं. नंददुलारे वाजपेयी

​9. भारतीय इतिहास में जलप्लावन की घटना का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है? (Chhatishgarh Asst. Prof., 2009)

  • उत्तर: . शतपथ ब्राह्मण के 8वें अध्याय में।

​10. ‘कामायनी’ को छायावाद का उपनिषद किसने कहा? (UPPSC Degree College Exam.2013)

  • उत्तर:  शांतिप्रिय द्विवेदी ने

11. ‘सफलता का वह कल्पित गेह’ किसे कहा गया है?

उत्तर: जीवन को

​12. ‘समर्पण लो—सेवा का सार, सजल—संसृति का यह पतवार’ पंक्ति में ‘पतवार’ किसे कहा गया है?

उत्तर: समर्पण को

​13. ‘कामायनी’ के सृजन में कवि प्रसाद को कितना समय लगा?

उत्तर: . 9 वर्ष 

​कामायनी : लज्जा सर्ग

​हिंदी साहित्य कोश, भाग–2 के अनुसार …..

​“प्रसाद ने अनुभूति और शिल्प दोनों ही दिशाओं में सतत जागरूक दृष्टि का परिचय दिया और इसी कारण वे ‘चित्रधार’ जैसी साधारण कृतियों की आरंभिक भूमिका से उठकर ‘कामायनी’ जैसी महत्वपूर्ण रचनाओं तक जा सके। प्रसाद मुख्यतया अनुभूति, गहन अनुभूति के रचनाकार हैं।”

​“उनके अनुभव की सीमाएँ हैं और इसी कारण यथार्थवादी लेखकों जैसी व्यापकता उनमें प्राप्त नहीं होती। पर अध्ययन, मनन के द्वारा उन्होंने इतिहास की दृष्टि प्राप्त की और ‘कामायनी’ में उनका युगबोध सहज ही देखा जा सकता है। प्रसाद का समस्त साहित्य मानवीय और सांस्कृतिक भूमिका पर प्रतिष्ठित है। प्रेम, सौंदर्य आदि की अनुभूतियाँ उनकी मानवीयता से संबंध रखती है।”

​आचार्य शुक्ल ने कहा ………..

  • ​“किसी एक विशाल भावना को रूप देने की ओर भी अंत में प्रसाद जी ने ध्यान दिया, जिसका परिणाम है ‘कामायनी’। इसमें उन्होंने अपने प्रिय ‘आनंदवाद’ की प्रतिष्ठा दार्शनिकता के ऊपरी आभास के साथ कल्पना की मधुमती भूमिका बनाकर ही की है।”
  • ​“काव्य का आधार है मनु का पहले श्रद्धा को फिर इड़ा को पत्नी रूप में ग्रहण करना तथा इड़ा को बंदिनी या सर्वथा अधीन बनाने का प्रयत्न करने पर देवताओं का उन पर कोप करना।”
  • ​“‘रूपक’ की भावना के अनुसार श्रद्धा विश्वास समन्वित रागात्मिका वृत्ति है और इड़ा व्यवसायात्मिका बुद्धि। कवि ने श्रद्धा को मृदुता, प्रेम और करुणा का प्रवर्तन करने वाली और सच्चे आनंद तक पहुँचाने वाली चित्रित किया है। इड़ा या बुद्धि अनेक प्रकार के वर्गीकरण और व्यवस्थाओं में वृत्त करती हुई कर्मों में उलझानेवाली चित्रित की गई है।”
  • ​“जिस समन्वय का पक्ष कवि ने अंत में सामने रखा है, उसका निर्वाह रहस्यवाद की प्रकृति के कारण काव्य के भीतर नहीं होने पाया है। पहले कवि ने कर्म को बुद्धि या ज्ञान की प्रवृत्ति के रूप में दिखाया, फिर अंत में कर्म और ज्ञान के बिंदुओं को अलग रखा।”

​डॉ. बच्चन सिंह से कहा ………..

  • ​“प्रसाद की पूर्ववर्ती रचनाओं को देखते हुए ‘कामायनी’ एक लंबी छलाँग प्रतीत होती है। इसकी काव्यगत श्रेष्ठता और औदात्य पर सभी लोग मुग्ध हैं पर उसके मूल्य–निर्णय को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।”
  • ​“इतिहास में रूपक के मिश्रण के साथ सांकेतिक अर्थ की बात भी उठायी गयी है। इस सांकेतिक अर्थ का संकेत प्रसाद ने ‘मानवता का विकास’, ‘मनोवैज्ञानिक अन्वेषण’, अतीत के साथ ‘वर्तमान रुचि से सामंजस्य’ और रूपकत्व का उल्लेख स्वयं कर दिया है।”
  • ​रामधारी सिंह दिनकर ने अपने निबंध ‘दोष रहित दूषण सहित’ में लिखा है – ‘इस विलक्षण कथा संधान मात्र को मैं आधी या उससे अधिक कविता मानता हूँ।’ उनके मतानुसार कामायनी में कर्म का संदेश और वैराग्य मत का खंडन है। वे कामायनी की कारीगरी में विराटता का अद्भुत सौंदर्य देखते हैं।
  • ​“मुक्तिबोध का कामायनी संबंधी अध्ययन फूहड़ मार्क्सवाद का नमूना है।”
  • ​“मुक्तिबोध एक ओर कामायनी को फैंटेसी मानकर कवि को छूट देते हैं तो दूसरी ओर यांत्रिक मार्क्सवाद को लादकर उसी छूट को वापस ले लेते हैं।”

​डॉ. नगेंद्र के इतिहास से…………

  • ​“‘कामायनी’ में बुद्धिवाद के विरोध में हृदय-तत्त्व की प्रतिष्ठा करते हुए कवि ने शैव दर्शन के आनन्दवाद को जीवन के पूर्ण उत्कर्ष का साधन माना है।”
  • ​“‘कामायनी अपनी सीमाओं के बावजूद भी हिंदी साहित्य की एक गौरवशाली उपलब्धि है।”

​लज्जा सर्ग : मुख्य बिंदु

  • ​‘कामायनी’ महाकाव्य का छठा सर्ग।
  • ​प्रसाद ने यहाँ यौवन की दहलीज़ पर आकर स्त्री के व्यक्तित्व में विकसित होने वाले ‘लज्जा’ भाव का मानवीकरण किया है और उसकी एक स्त्री के रूप में कल्पना की है।
  • ​पाँचवें सर्ग (वासना सर्ग) में मनु श्रद्धा के सौंदर्य से अभिभूत होकर उसके सम्मुख हृदय-समर्पण करते हैं और इस प्रेम-समर्पण को स्वीकार करने का निवेदन करते हैं – ​“आज ले लो चेतना का यह समर्पण दान, विश्व रानी! सुन्दरी नारी! जगत की मान।?” (वासना सर्
  • ​मनु की प्रेमिल बातें सुनकर श्रद्धा के हृदय में नारी-सुलभ लज्जा का उदय होता है, पलकें झुक जाती हैं, कान और कपोल अरुणिम हो जाते हैं तथा शरीर रोमांचित हो उठता है।
  • इस अवस्था में श्रद्धा मनु से कहती है कि “मैं अत्यंत दुर्बल हूँ, क्या मैं इस दान को ग्रहण कर सकूँगी, जिसका उपभोग करने में प्राण भी व्याकुल हो उठते हैं।”
  • “आह मैं दुर्बल, कहो क्या ले सकूँगी दान!
    वह, जिसे उपभोग करने में विकल हों प्राण?” (वासना सर्ग)
  • ​मनु के प्रेम-समर्पण के बाद लज्जावश श्रद्धा की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति में बदलाव आता है। अभी तक वह स्वच्छंद गति से सर्वत्र घूमती-फिरती थी किंतु अब उसकी स्वच्छंदता संकुचित होकर सिमटने लगती है।
  • ​श्रद्धा में आए इन्हीं परिवर्तनों को कवि ने मानवीकरण के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
  • एक दिन संध्याकाल श्रद्धा अपने परिवर्तनों पर विचार कर रही थी कि उसे संध्या-लालिमा में एक छायामूर्ति का आभास हुआ।
  • “नीरव निशीथ में लतिका सी तुम कौन आ रही हो बढ़ती? कोमल बाहें फैलाये सी आलिंगन का जादू पढ़ती
  • ​यह छाया-मूर्ति वास्तव में श्रद्धा के मन में उत्पन्न लज्जा मनोभाव का एक स्त्री के रूप में मानवीकरण है।
  • ​श्रद्धा कौतूहलवश उस छायामूर्ति से उसका परिचय जानने का प्रयास करती है तथा अपने व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों के विषय में उससे अनेक प्रश्न करती है।
  • श्रद्धा के प्रश्नों का उत्तर देती हुई लज्जा कहती है कि हे बालिका, तू इतना चमत्कृत अर्थात् आश्चर्यचकित मत हो, तेरे मन में होने वाले परिवर्तनों का कारण मैं ही हूँ।
  • “इतना न चमत्कृत हो बाले! अपने मन का उपकार करो मैं एक पकड़ हूँ जो कहती ठहरो कुछ सोच विचार करो
  • ​लज्जा कहती है कि मैं वह शक्ति हूँ जो युवतियों का मार्गदर्शन करती है, उन्हें समझाकर समर्पण से पूर्व अच्छी तरह सोच-विचारकर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है।
  • मैं युवतियों में निहित सौंदर्य हूँ, उसे गौरव का पाठ पढ़ाती हूँ। “उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं, जिसमें अनंत अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं
    ”
  • “मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती
    ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।”
  • ​लज्जा कहती है कि मैं ही देवसृष्टि में काम की पत्नी रति के नाम से विख्यात थी। देवसृष्टि के नष्ट होने के बाद एक भावना बनकर इधर-उधर भटक रही हूँ– ​‘मैं देवसृष्टि की रति रानी निज पंचवाण से वंचित हो, बन आवर्जना मूर्ति दीना अपनी अतृप्ति-सी संचित हो

लज्जा कहती है कि तुम मुझे रति की प्रतिकृति ही समझो तथा यह जान लो कि मैं युवतियों को शालीनता का पाठ पढ़ाती हूँ।

​“मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ मैं शालीनता सिखलाती हूँ

मतवाली सुंदरता पग में नूपुर सी लिपट मनाती हूँ।”

​मैं उनके व्यक्तित्व में कपोलों की लाली, आँखों में काजल, घुँघराली लटों और मन की मरोड़ के रूप में प्रकट होती हूँ।

​“लाली बन सरल कपोलों में आँखों में अंजन-सी लगती,

कुंचित अलकों सी घुँघराली मन की मरोर बन कर जगती।।”

​➤ वह कहती है कि मैं चंचल किशोरियों के सौंदर्य की रक्षा करती हूँ तथा उनके कानों की लाली बनकर प्रकट होती हूँ।

​“चंचल किशोर सुंदरता की मैं करती रहती रखवाली;

मैं वह हल्की सी मसलन हूँ जो बनती कानों की लाली।”

​➤ लज्जा की यह बातें सुनकर श्रद्धा उससे अपने जीवन के सही मार्ग के विषय में पूछती है–

​“हाँ ठीक परंतु बताओगी मेरे जीवन का पथ क्या है,

इस निविड़ निशा में संसृति की आलोकमयी रेखा क्या है?”

​➤ श्रद्धा कहती है कि मैं अपनी दुर्बलता को जानती हूँ, इसीलिए मेरा मन ढीला पड़ जाता है और मैं पराजित हो जाती हूँ।

​“यह आज समझ तो पायी हूँ मैं दुर्बलता में नारी हूँ

अवयव की सुंदर कोमलता लेकर मैं सबसे हारी हूँ।”

​➤ वह कहती है कि मेरी आँखों में सदैव आँसू भरे रहते हैं, हृदय में ममता छायी रहती है और मैं असहाय-सी बनी रहती हूँ।

क्या यही नारी-जीवन की व्याख्या है–

​“पर मन भी क्यों इतना ढीला अपने ही होता जाता है

घनश्याम खंड सी आँखों में क्यों सहसा जल भर आता है।”

​➤ श्रद्धा कहती है कि मैं जब भी दूसरों की परीक्षा लेने का प्रयत्न करती हूँ, तब मैं स्वयं परीक्षा के तराजू में तुले बन जाती हूँ तथा स्वयं को पुरुष के समक्ष असहाय-सा अनुभव करने लगती हूँ।

​“नारी जीवन का चित्र यही क्या विकल रंग भर देती हो,

अस्फुट रेखा की सीमा आकार कला को देती हो।”

​“रुकती हूँ और ठहरती हूँ पर सोच विचार न कर सकती,

पगली सी कोई अंतर में बैठी जैसे अनुदिन बकती।”

​“मैं जबी तोलने का करती उपचार स्वयं तुल जाती हूँ,

भुजलता फँसाकर नर तरु से झूले-सी झोंके खाती हूँ।”

​➤ श्रद्धा लज्जा से कहती है कि ऐसी स्थिति में मैं यह निर्णय ही नहीं कर पाती कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

➤ लज्जा इसके उत्तर में कहती है कि अब तुम्हारा यह सब पूछना व्यर्थ है क्योंकि तुम अपना सारा जीवन पहले ही पुरुष को अर्पित कर चुकी हो।

​“क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प अश्रु-जल से अपने;

तुम दान कर चुकीं पहले ही जीवन के सोने से सपने।”

​➤ वह श्रद्धा से कहती है कि तुम तो केवल श्रद्धा हो और तुम्हारा हृदय विश्वास से परिपूर्ण है। ऐसी स्थिति में तुम्हें केवल अमृतमयी नदी की भाँति बहते हुए अपने और पुरुष अर्थात् मनु के जीवन को हरा-भरा बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। 

​“नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पग तल में;

पीयूष स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।”

​➤ वह कहती है कि सत् और असत् का संघर्ष विश्व के साथ-साथ मानव-हृदय में भी होता है तथा इसमें हमेशा सत् की ही जीत होती है।

​➤ लज्जा आगे कहती है कि तुम्हें सत और असत् के फेर में न पड़कर संपूर्ण समर्पण भाव को ध्यान में रखते हुए दांपत्य-जीवन व्यतीत करना चाहिए।

​“देवों की विजय दानवों की हारों का होता युद्ध रहा;

संघर्ष सदा उर अंतर में जीवित रह नित्य विरुद्ध रहा।”

​“आँसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा।

तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगा।”

प्रश्न – उत्तर

1. ‘लज्जा सर्ग’ की प्रथम पंक्ति है –

उत्तर: कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी

2. निम्नलिखित पंक्तियों को उनके अलंकारों के साथ सुमेलित कीजिए –

  • ​A. कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती सी — ii. उत्प्रेक्षा
  • ​B. नारी जीवन का चित्र यही क्या विकल रंग भर देती हो। — i. मानवीकरण
  • ​C. जिसमें दुख सुख मिलकर मन के उत्सव आनंद मनाते हों। — iv. श्लेष
  • ​D. भुजलता फँसाकर नर-तरु से झूले-सी झोंके खाती हूँ। — iii. रूपक

3. ‘उज्ज्वल वरदान चेतना का’ किसे कहा गया है?

उत्तर: लज्जा को

4. ‘तुमको अपनी स्मितरेखा से यह संधि-पत्र लिखना होगा।’ पंक्ति में ‘संधि-पत्र’ का सांकेतिक अर्थ है –

उत्तर: प्रेम की स्वीकृति 

​कामायनी – इड़ा सर्ग

  • ​कामायनी का सर्ग–क्रम—चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनंद
  • ​’कामायनी’ का नवम् सर्ग।
  • ​’ईर्ष्या’ सर्ग के बाद और ‘स्वप्न’ सर्ग से पूर्व।
  • ​इस सर्ग की कथा के केंद्र में इड़ा।
  • ​इड़ा बुद्धि की प्रतीक।
  • ​’ईर्ष्या सर्ग’ में हिंसाप्रेमी मनु निरीह पशुओं का वधकर उन्हें लेकर आते हैं। श्रद्धा को यह पशु–हिंसा अप्रिय है।
  • ​गर्भवती श्रद्धा आगामी शिशु के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त रहती है।
  • ​मनु श्रद्धा की व्यस्तता को अपने प्रति उपेक्षा एवं तिरस्कार मानते हैं और पशुवध को लेकर मतभेद होने पर उसे छोड़कर सुख और शांति की तलाश में चले जाते हैं –

​“लो चला आज मैं छोड़ यहीं संचित संवेदन भार,

मुझको काँटे ही मिलें धन्य! हो सफल तुम्हें ही कुसुम–कुंज।”

कह ज्वलनशील अंतर लेकर मनु चले गए, था शून्य प्रांत;

‘रुक जा, सुन ले ओ निर्मोही!’ वह कहती रही अधीर अश्रांत।

  • ​संकल्प–विकल्प युक्त मनु हिमालय के उच्च शिखर पर स्थित गुफा में गर्भवती श्रद्धा को अकेला छोड़कर मार्ग के अनेक पर्वतों और नदियों को पार कर नीचे की ओर चल पड़े।
  • ​वे उजड़े सारस्वत प्रदेश पहुँचे। उन्हें सरस्वती नदी के तट पर इन्द्र के द्वारा वृत्रासुर के वध का प्रसंग याद आया।

​“यों सोच रहे मनु पड़े श्रांत

श्रद्धा का सुख साधन निवास जब छोड़ चले आये प्रशांत

पथ पथ में भटक अटकते वे आये इस ऊजड़ नगर प्रांत

बढ़ती सरस्वती वेग भरी निस्तब्ध हो रही निशा श्याम

नक्षत्र निरखते निर्निमेष वसुधा की वह गति विकल वाम

वृत्रघ्नी का वह जनाकीर्ण उपकूल आज कितना सूना

देवेश इंद्र की विजय कथा की स्मृति देती थी दुख दूना

वह पावन सारस्वत प्रदेश दुःस्वप्न देखता पड़ा क्लांत

फैला था चारों ओ ध्वांत।”

  • ​देवासुर संग्राम की स्मृति ताज़ा होने पर मनु को अनुभव होता है कि सुर–असुर का संघर्ष दूसरे की तुलना में स्वयं को श्रेष्ठ एवं सर्वोपरि मानने के अहंकार से उत्पन्न हुआ था।
  • ​वे सोचते हैं कि दोनों पक्ष श्रद्धाविहीन होने के कारण सदैव संघर्षरत रहे। यह सोचते ही उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि वे भी आज श्रद्धाविहीन होकर संघर्षरत हैं –

“था एक पूजता देह दीन

दूसरा अपूर्ण अहंता में अपने को समझ रहा प्रवीण

दोनों का हठ था दुर्निवार, दोनों ही थे विश्वासहीन

फिर क्यों न तर्क को शस्त्रों से वे सिद्ध करें– क्यों हो न युद्ध

  • ​इसी समय मनु को काम की शापमयी वाणी सुनाई दी, जिसमें उनके विश्वासमयी श्रद्धा को भूलने की बात कही गयी थी –

​“मनु! तुम श्रद्धा को गए भूल

उस पूर्ण आत्मविश्वासमयी को उड़ा दिया था समझ तूल

तुमने तो समझा असत विश्व जीवन धागे में रहा झूल

जो क्षण बीतें सुख साधन में उनको ही वास्तव लिया मान

वासना तृप्ति ही स्वर्ग बनी, यह उलटी मति का व्यर्थ ज्ञान

तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की

समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की।”

जब गूँजी यह वाणी तीखी कम्पित करती अम्बर अकूल

मनु को जैसे चुभ गया शूल।”

  • ​काम मनु को उनके द्वारा स्थापित प्रजातंत्र के शापित बने रहने तथा प्रजा में उलझन, समस्याएँ, अविश्वास, असंतोष, कुशंकाएँ, विपन्नता, विरोध, दुख, असामंजस्य के भाव बने रहने की बात कहते हैं।

​“यह अभिनव मानव प्रजा सृष्टि

द्वयता में लगी निरंतर ही वर्णों की करती रहे वृष्टि

अनजान समस्याएँ गढ़ती रचती हो अपनी ही विनष्टि 

  • आगे काम कहते हैं कि प्रेम से रहित होने के कारण तुम्हारी प्रजा के मस्तिष्क और हृदय के मध्य तालमेल नहीं हो पायेगा। वह हमेशा हार–जीत के झूले में झूलती रहेगी।

​“वह प्रेम न रह जाये पुनीत

​अपने स्वार्थों से आवृत्त हो मंगल रहस्य सकुचे सभीत

​सारी संसृति हो विरह भरी, गाते ही बीतें करुण गीत

​आकांक्षा जलनिधि की सीमा हो क्षितिज निराशा सदारक्त

​तुम राग विराग करो सबसे अपने को कर शतशः विभक्त

​मस्तिष्क हृदय के हो विरुद्ध, दोनों में हो सद्भाव नहीं

​वह चलने को जब कहे कहीं तब हृदय विकल चल जाय कहीं

​रोकर बीतें सब वर्तमान क्षण सुंदर सपना हो अतीत

​पेंगों में झूले हार जीत।”

  • ​काम कहते हैं कि श्रद्धा को छलने के कारण अर्थात् श्रद्धाभाव से रहित होने के कारण तुम हमेशा वृद्धावस्था और मृत्यु के बीच व्याकुल बने रहोगे। तुम्हारी प्रजा कभी जीवन में श्रद्धा के महत्त्व को नहीं जान पायेगी।

​“तुम जरा मरण में चिर अशांत

​जिसको अब तक समझे थे सब जीवन में परिवर्तन अनंत

​अमरत्व वही अब भूलेगा तुम व्याकुल उसको कहो अंत

  • ​काम की शाप ध्वनि विलीन होते ही मनु का चित्त अशांत हो जाता है और उन्हें अपना भावी जीवन संकटमय और संघर्षपूर्ण प्रतीत होने लगता है।
  • ​प्रभात होनेपर मनु को इड़ा (बुद्धि) के दर्शन होते हैं अर्थात् उनकी बुद्धि जागती है। मनु इड़ा से परिचय पूछकर अपना परिचय देते हैं –

​“इसमें अब तक हूँ पड़ी इसी आशा से आये दिन मेरा।”

​“मैं तो आया हूँ देवि बता दो जीवन का क्या सहज मोल

​भव के भविष्य का द्वार खोल!”

  • ​मनु के एकाकीपन, भटकन एवं कष्टों के विषय में जानकर इड़ा उनका स्वागत कर उन्हें सारस्वत प्रदेश पुनः बसाने और व्यवस्थित करने के लिए आमंत्रित करती है।
  • ​इड़ा मनु को आत्मनिर्भर एवं उन्नतिशील होने के लिए प्रेरित कर उनके हृदय में आत्मविश्वास, उल्लास और आशा का संचार करती है। मनु सारस्वत प्रदेश का दायित्व स्वीकारते हैं।
  • ​इड़ा से प्रेरित मनु प्रत्युत्तर में कहते हैं–’हे इड़े! तुमने अंधकारपूर्ण जीवन में उषा के समान उदित होकर मेरे सुप्त मनोभावों को जगा दिया है। अब मैं बुद्धि के अनुसार आगे बढ़ता हुआ आत्मनिर्भर बनने का प्रयत्न करूँगा।

​“जीवन निशीथ का अंधकार

​भग रहा क्षितिज के अंचल में मुख आवृत कर तुमको निहार 

  1. ​इड़ा सर्ग की प्रथम पंक्ति है – उत्तर: a. किस गहन गुहा से अति अधीर।
  1. इड़ा सर्ग की अंतिम पंक्ति है – उत्तर: d. सुख साधन का हो खुला द्वार।
  1. ​’अपने जड़ गौरव के प्रतीक वसुधा का कर अभिमान भंग’ पंक्ति में ‘जड़ गौरव के प्रतीक’ किसे कहा गया है? उत्तर: c. शैल शृंगों को
  1. ‘पागल मैं किस पर सदय रहा? क्या मैंने ममता ली न तोड़। किस पर उदारता से रीझा? किससे न लगा दी कड़ी होड़!’ पंक्तियों में मनु की किस मनःस्थिति का चित्रण किया गया है? उत्तर: a. ग्लानि और पश्चात्ताप
  1. ​’था एक पूजता देह दीन, दूसरा अपूर्ण अहंता में अपने को समझ रहा प्रवीण’ पंक्तियों में क्रमशः किसकी ओर संकेत किया गया है? उत्तर: c. असुरों और सुरों की ओर।