अनुवाद की परिभाषा

डॉ० नगेन्द्र अनुवाद को एक मौखिक उपलब्धि मानते हुए लिखते हैं

​“अनुवाद वह कार्य है जहाँ निष्ठापूर्वक मौखिक रूपांतरण की क्रांति शुरू किया जाता है तो वह अनुवाद न रहकर वक्ता के स्तर पर रूपान्तरित होता है।”

​अतः स्पष्ट है कि एक भाषा के विचारों को दूसरी भाषा में रूपांतरित कर देना ही अनुवाद नहीं होता। अनुवाद को सदैव मूल लेखन के समकक्ष होना जरूरी है।

अनुवाद के भेदों पर विचार करते हुए अनेक विद्वानों ने अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए हैं। अनुवाद के प्रकारों को सुविधा एवं स्पष्टता की दृष्टि से इन शीर्षकों के अन्तर्गत रखा जा सकता है

अनुवाद के प्रकार

  1. ​गद्य-पद्य के आधार पर
    • ​गद्यानुवाद
    • ​पद्यानुवाद
    • मुक्तछंद अनुवाद
  2. ​साहित्यिक विधा के अनुसार
    • काव्यानुवाद
    • ​नाटकानुवाद
    • ​कथानुवाद
    • ​अन्य साहित्यिक विधाओं के अनुवाद:
      • ​आत्मकथा अनुवाद
      • ​जीवनी
      • ​निबंध
      • ​रेखाचित्र
      • ​संस्मरण
      • ​रिपोर्ताज
      • ​डायरी
      • ​आलोचना
  • ​आलोचना
  • ​यात्रा साहित्य
  1. ​विषय के आधार पर
    • ​पत्रकारिता अनुवाद
    • ​विधि-साहित्य अनुवाद
    • ​वैज्ञानिक साहित्य अनुवाद
    • ​धार्मिक साहित्य अनुवाद
    • ​ललित साहित्य अनुवाद
    • ​कार्यालयी अनुवाद
    • ​गणित साहित्य
    • ​ऐतिहासिक
  • तकनीकी
  1. ​अनुवाद की प्रकृति के आधार पर
    • ​मूलनिष्ठ अनुवाद
    • ​मूलमुक्त (मुक्तानुवाद)
    • ​शब्दानुवाद
    • ​भावानुवाद
    • ​छायानुवाद
    • ​व्याख्यानुवाद
    • ​सारानुवाद
    • ​रूपांतरण
    • ​आदर्शनुवाद
  • ​वार्तानुवाद
  • गद्य-पद्य के आधार पर
  1. ​गद्यानुवाद – अनुवाद में ग्रंथ के मूल गद्य का अनुवाद गद्य में ही किया जाता है। कई बार पद्य का अनुवाद भी गद्य में कर दिया जाता है। हेमचन्द्र के ‘अन्याय’ गोदान, और कालिदास के मेघदूत का गद्य में नागार्जुन द्वारा अनुवाद हुआ है। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने गीतांजलि का गद्य में अनुवाद किया है।
  1. ​पद्यानुवाद – यह अनुवाद पद्य में ही होता है। प्रायः मूल पद्य का पद्य में ही अनुवाद किया जाता है। शेक्सपियर के मैकबेथ और हैमलेट तथा कालिदास के मेघदूत का अनुवाद इसी काव्यानुवाद की श्रेणी में आते हैं। छंदोबद्ध अनुवाद करते समय अनुवादक के लिए छंदोंबद्धता का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
  1. ​छंदमुक्त अनुवाद – (मुक्त छंद अनुवाद) यह अनुवाद मुक्त छंद में होता है। इस प्रकार के अनुवाद करते समय अनुवादक स्रोत भाषा के छंद-बंधन में न बंधकर लक्ष्य भाषा में प्रचलित किसी भी छंद में अनुवाद करने के लिए स्वतंत्र होता है। अंग्रेज़ी कविता पोप के इलियड में प्रयुक्त ब्लैंकवर्स या शेली छंद में मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रूपांतरित शेष काव्यालोचनाओं नाम से किया गया अनुवाद। मेघदूत का मेकडोनाल्ड छंद निर्मित मुक्त छंद में अनुवाद इसके प्रमाण हैं।
  • साहित्यिक विधा के आधार पर
  1. काव्यानुवाद – काव्यानुवाद से तात्पर्य है किसी काव्यकृति का अनुवाद। ड्रायडन ने काव्यानुवाद को कठिन मानते हुए लिखा है – “काव्यानुवाद असंभव है”। इस कथन के बावजूद विश्वभर में अनेक श्रेष्ठ काव्यकृतियों के सफल अनुवाद घटित हुए हैं। काव्यानुवाद में मूल की शैली, आलंकारिक प्रयोग आदि का ध्यान रखना पड़ता है। काव्यानुवाद का बुनियादी तत्व शब्द होता है और शब्द की अर्थ ध्वनि एवं नाद सौंदर्य की अनुवादक को पूरा ध्यान रखना पड़ता है।
  1. ​नाटकानुवाद – नाटक का नाटक के रूप में अनुवाद करना ही नाटकानुवाद कहलाता है। नाटकानुवाद अत्यंत कठिन कार्य है क्योंकि इसमें पाठनीयता के साथ-साथ रंगमंचीयता की ध्यान रखना पड़ता है। नाटकानुवाद की सबसे बड़ी समस्या

सांस्कृतिक वैशिष्ट्य के अंतरण की है। स्रोत एवं लक्ष्य भाषाओं की नाट्य परंपराओं की भिन्नता भी अनुवाद में कठिनाइयाँ उपस्थित करती है। पश्चिमी एवं नाटक का रूपान्तर ही नाटकानुवाद को सफल बना सकता है। हिंदी में भारतेंदु, जी.पी. श्रीवास्तव, अमृतराय, रघुवीर सहाय, लक्ष्मीनारायण मिश्र आदि ने नाटकों के सफल अनुवाद किए हैं। मुक्तानुवाद के माध्यम से ही हिंदी में राष्ट्रीय अभिनय की संभावनाएँ विकसित हुई हैं।

  1. ​कथानुवाद – इस प्रकार के अनुवाद में उपन्यास तथा कहानी का अनुवाद किया जाता है। यह काव्यानुवाद तथा नाटकानुवाद की तुलना में सरल होता है। कथा-साहित्य के अनुवाद में देशकाल और संस्कृति का विशेष महत्व होता है। ई०एम०फोस्टर के ‘अ पैसेज टू इंडिया’, प्रेमचंद, सरतचन्द्र, सत्येन्द्र आदि के उपन्यासों के अन्य भाषाओं में अनुवाद हुए। विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुए।
  1. अन्य गद्य विधाओं के अनुवाद – गद्य की अन्य विधाओं जैसे— आत्मकथा, जीवनी, निबंध, यात्रासाहित्य, एकांकी, रिपोर्ताज, संस्मरण आदि में भी अनुवाद की अनंत संभावनाएँ हैं। लेनिन के निबंधों का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ। रोम्याँ रोलाँ द्वारा लिखित गाँधी और विवेकानंद की जीवनी का अनेक भाषाओं में अनुदित हुई। इन गद्यविधाओं में विचारों की स्पष्टता एवं अनुभूति की कलात्मकता का जो समन्वय होता है उसका अनुवाद में भी आना होता है। जवाहरलाल नेहरू की कृति ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ का ‘हिन्दुस्तान की कहानी’ नाम से अनुवाद हुआ।
  • विषय के आधार पर अथवा साहित्येत्तर अनुवाद
  1. ​वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य का अनुवाद – विकसित और विकासशील दोनों ही तरह के देशों के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद की अत्यंत आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक अनुवाद से अभिप्राय है कि स्रोत भाषा में व्यक्त वैज्ञानिक सूचनाओं का लक्ष्य भाषा में इस तरह अंतरण करना कि मूल की सूचनाएँ अनुवाद में नष्ट न हों।

वैज्ञानिक साहित्य में चूंकि तथ्य सूचना प्रधान होता है अतः उपादानों को छोड़कर वैज्ञानिक साहित्य की शैली प्रायः सपाट होती है। वैज्ञानिक अनुवाद में ‘वैधानिक शब्दावली’ का प्रयोग आवश्यक होता है।

​वैज्ञानिक साहित्य में अनुवाद की प्राथमिक शर्त यह है कि अनुवादक विषय का पूर्ण ज्ञान रखता हो। विषय का ज्ञान न होने से अनुवादक अनेक प्रकार की गलतियाँ कर बैठता है। जैसे- Bees woke up very quickly in the light – इसमें सामान्य अनुवादक woke up का अर्थ जगाना लगा लेता है। विषय का जानकार ‘सक्रिय होना’ ही करेगा।

​विषय ज्ञान की ही तरह वैज्ञानिक अनुवाद की भाषा भी महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक अनुवाद की भाषा वस्तुनिष्ठ, तथ्यपरक, स्पष्ट, सुबोध एवं असंदिग्ध होनी चाहिए। साहित्यिक अनुवाद में कुछ छूट छोड़ और वृद्धि जोड़ी जा सकती है। किन्तु वैज्ञानिक अनुवाद में ऐसा नहीं होता। इस अनुवाद में अर्थ की स्पष्टता एवं सरलता पर बल देना चाहिए।

​पारिभाषिक शब्दों के निर्माण की भी है। पारिभाषिक शब्द किसी विशिष्ट अर्थ या संकल्पना को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। जिस भाषा में वैज्ञानिक अनुवाद करना है (लक्ष्यभाषा) उसे पारिभाषिक शब्दावली की दृष्टि से सम्पन्न होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो अनुवादक को या तो स्रोत भाषा के पारिभाषिक शब्द का अपनी भाषा की प्रकृति के अनुसार (जैसे अकादमी, एंटीबायोटिक) कर लेना चाहिए या व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय शब्दावली से अथवा अपनी भाषा के धातुओं, प्रत्ययों, उपसर्गों आदि के आधार पर नये शब्द बना लेने चाहिए।

वैज्ञानिक अनुवाद कुछ अनुवादों को छोड़कर पूर्ण अनुवाद होता है। आवश्यक स्थलों पर व्याख्या, पादटिप्पणी आदि देकर तथ्यों को समझाना भी आवश्यक हो जाता है। अतः निष्कर्षतः अनुवादक में विषय ज्ञान के साथ ही साहित्य जैसे गणित, ज्योतिष, विज्ञान, विधि आदि के लिए तो शब्दानुवाद ही अपेक्षित है। विधि साहित्य में तो शब्द का अपना महत्व होता है अतः यहाँ शब्दानुवाद वांछनीय होगा

लक्ष्यभाषा की सहज गति हो वह उत्तम वैज्ञानिक अनुवाद कहलाता है।  

2. कार्यालयी अनुवाद

कार्यालयी अनुवाद में बड़े-बड़े के प्रशासनिक कार्यालयों से सम्बद्ध अनुवाद जैसे बैंकों, रेलवे, न्यायालयों, होटलों, ध्यानाकर्षण, पर्यटन, डाक-तार, बीमा आदि से संबंधित अनुवाद आते हैं।  

कार्यालयी अनुवादों की पहली विशेषता यह होती है कि इनके लिए प्राप्त सामग्री मुख्यतः आलेखन-प्रधान होती है। शासकीय अनुवाद, के अंतर्गत सरकारी पत्र, टिप्पण, आलेखन, विज्ञापन, सूचनाएं, परिपत्र, अधिनियम, तार, प्रचार-सामग्री, नियम-नियमावली आदि आती हैं। कार्यालयी अनुवादों में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग अनिवार्यतः होता है और ये पारिभाषिक शब्द सभी विभागों के लिए अलग-अलग होते हैं।  

कई बार स्रोत भाषा के शब्द के लिए लक्ष्यभाषा में कई पर्याय होते हैं ऐसे में पर्यायों का सटीक चुनाव भी अनुवादक के लिए चुनौती होता है जैसे अंग्रेज़ी में Confidential के लिए हिन्दी में गोपनीय, अंतरंग, Interest के लिए अभिरुचि, हित, ब्याज, लाभ आदि। श्लैषानुवादक की पर्याय चयन, सही अर्थों शेहानुवादक की पर्याय चयन सही। इसलिए अन्यथा अनुवाद हास्यास्पद हो जाएगा।  

कार्यालयी अनुवाद में एक बात और ध्यान देने योग्य यह है कि यह भाषा पूरी तरह से छरहरी होनी चाहिए अनेकार्थी नहीं। इसीलिए कहीं-कहीं शब्दानुवाद की आवश्यकता पड़ती है। प्रशासनिक अनुवाद के लिए आवश्यक तो यह है कि इसके प्राविधिक स्वरूप को बनाए रखते हुए प्रांजल और स्पष्ट अनुवाद के लिए प्रयास किया जाए। अनुवाद के लिए कार्यालयीय पद्धति, शैली, प्रारूप आदि का भी ध्यान रखना चाहिए।  

प्रकृति के अनुसार भेद

1. शब्दानुवाद – (Literal translation, Verbal translation, वर्ड फॉर वर्ड ट्रांसलेशन) 

स्रोत भाषा के प्रत्येक शब्द का यथावत् अनुवाद शब्दानुवाद कहलाता है। शब्दानुवाद पर विशेष आग्रह बाइबिल तथा उसके दैवी समझे जाने वाले नियमों के सन्दर्भ में किया गया। यद्यपि शब्दानुवाद को हेय दृष्टि से देखा जाता है किन्तु आज भी कानून जैसे कुछ प्राविधिक (कानूनी) विषयों के अनुवाद में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। साहित्यिक अनुवाद में शब्दानुवाद अपर्याप्त होता है। विज्ञान, गणित जैसे तकनीकी विषयों के प्राविधिक अनुवाद में शब्दानुवाद के बिना काम नहीं चलता। यहाँ प्रमाणिकता लाने के लिए शब्दानुवाद किया जाता है।  

शब्दानुवाद से कभी-कभी उलझनें भी पैदा हो जाती हैं जैसे Pay, Security, आदि का शब्दार्थ अंग्रेज़ी में भिन्न है तथा बैंकिंग क्षेत्र में भिन्न। शब्दानुवाद में मूल बातों के यथातथ्य होने के कारण अनुवाद की भाषा प्रायः कृत्रिम एवं निष्प्राण हो जाती है तथा उसमें मूल पाठ या रचना का स्वाभाविक प्रवाह नहीं रह जाता। कई बार अनुवाद हास्यास्पद भी हो जाता है। यथा –

1. मेरा सिर चक्कर खा रहा है।

– My head is eating circles.  

2. वह पानी-पानी हो गया

– He became water and water.  

2. भावानुवाद (sense for sense)

अनुवाद के क्षेत्र में यह उत्तम कोटि का माना जाता है। भावानुवाद में शब्दानुवाद की तरह केवल शब्द, वाक्यांश तथा वाक्य प्रयोग आदि पर ध्यान न देकर स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा के मूल अर्थ, विचार और भावाभिव्यक्ति पर अधिक ध्यान दिया जाता है। डॉ० भोलानाथ तिवारी की मान्यता है कि – “सामान्यतः मूल सामग्री यदि सूक्ष्म भावों वाली है तो उसका भावानुवाद करते हैं और यदि वह तथ्यात्मक, वैज्ञानिक या विचार प्रधान है तो उसका शब्दानुवाद करते हैं।”  

भावानुवाद में यह आभास होता है कि मूल भाषा ही पढ़ी जा रही है क्योंकि सहजता, सरलता, प्रवाहमयता एवं कथ्य या सम्यक् प्रेषण इस अनुवाद की खास विशेषताएँ हैं। अनुवाद की व्यावहारिक कठिनाई दूर करने का भावानुवाद एक अच्छा रास्ता है। इस अनुवाद में मूल का यंत्रवत अनुकरण नहीं रहता। उल्लेखनीय है कि दुनिया के श्रेष्ठ साहित्यिक अनुवाद प्रमुख रूप से भावानुवाद ही हैं।  

भावानुवाद का एक नकारात्मक पक्ष यह है कि भावानुवाद में प्रायः अनुवादक की अपनी शैली आ जाती है और इसका अपना व्यक्तित्व मूल लेखक के व्यक्तित्व पर एक सीमा तक छा जाता है। कभी-कभी ऐसे अनुवादक के बारे में यह भी कहा जाता है कि मूल के भीतर प्रवेश किए बगैर ही लक्ष्यभाषा की प्रकृति के अनुरूप भाव सामग्री प्रस्तुत कर दी गई है। वास्तव में भावानुवाद ललित साहित्य के लिए अधिक उपयोगी होता है क्योंकि इसमें सर्जनात्मकता अधिक होती है। शब्दानुवादक प्रायः विशुद्ध भाषांतरकार के रूप में ही हमारे सामने आता है किन्तु भावानुवादक कारयित्री प्रतिभा (creative writer) वाले लेखक के रूप में हमारे सामने आता है।

नकारात्मक पक्ष –

कभी-कभी पाठक किसी रचना को (अनूदित) लेखक के अभिव्यक्ति पक्ष को जानने के लिए ही पढ़ता है। भावानुवाद ऐसे पाठकों के लिए भ्रामक होता है क्योंकि भावानुवाद में प्रायः अनुवादक की अपनी शैली आ जाती है। उमर खय्याम की रुबाइयों का केशवप्रसाद पाठक, मैथिलीशरण गुप्त, बच्चन एवं रघुवंशलाल गुप्त द्वारा किया गया अनुवाद भावानुवाद के उदाहरण हैं।  

वास्तव में आदर्श अनुवाद वह है जो शब्दानुवाद तथा भावानुवाद दोनों पद्धतियों को यथावसर अपनाते हुए मूल भाव के साथ-साथ यथाशक्ति मूल शैली को भी अपने में उतार लेता है और साथ ही भाषा की सहज प्रकृति को भी अक्षुण्ण बनाए रखता है। डॉ० भोलानाथ तिवारी के अनुसार “आदर्श अनुवादक सिरिंज की वह सुई है जो सिरिंज की दवा को ज्यों की त्यों मरीज के शरीर में पहुँचा देती है।”  

3. सारानुवाद-

इसमें स्रोत भाषा की मूल सामग्री का संक्षिप्त अनुवाद किया जाता है। डॉ० भोलानाथ तिवारी की राय में अपनी संक्षिप्तता, सरलता, स्पष्टता या लक्ष्यभाषा के स्वाभाविक-सहज प्रवाह के कारण सारानुवाद अधिक उपयोगी है। लम्बे भाषणों एवं रिपोर्टों के लिए इस प्रकार का अनुवाद अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है। संसद में प्रायः इसी प्रकार के अनुवाद को अपनाया जाता है।  

4. मूलमुक्त अनुवाद (स्वतंत्र अनुवाद)

इस प्रकार के अनुवाद में अनुवादक अधिक स्वतंत्र होता है। यह स्वतंत्रता कथन-पद्धति अथवा अभिव्यक्ति शैली की दृष्टि से होती है न कि विचार या कथ्य की दृष्टि से। संक्षिप्तता की दृष्टि से कुछ बातें छोड़ी भी जा सकती हैं। इतना ही नहीं सामग्री के सहज एवं बोधगम्य बनाने के उद्देश्य से उदाहरणों एवं उपमानों के देशीकरण की भी स्वतंत्रता अनुवादक को प्राप्त रहती है। मूलाश्रित या मूलोन्मुख अनुवाद के भेद – भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, व्याख्यानुवाद, रूपान्तर, वार्तानुवाद।  

संक्षेप में कहें तो इस अनुवाद में मूल भाव की रक्षा की जाती है; किन्तु स्रोत भाषा की भाषा-शैली अनुवादक के लिए बन्धनकारी नहीं होती।

रूपांतर

मन्नू भंडारी ने अपने उपन्यास महाभोज का नाट्य रूपांतर किया है।

स्वतंत्र अनुवाद के कुछ उदाहरण हैं –

उमर खय्याम की रुबाइयों का फिट्ज़गेराल्ड द्वारा किया गया अनुवाद / लाइफ ऑफ एशिया का रामचंद्र शुक्ल द्वारा अनुवाद किया गया।  

वैज्ञानिक-तकनीकी तथा सृजनात्मक (साहित्यिक) अनुवादों में अंतर

1. विज्ञान (वैज्ञानिक-तकनीकी अनुवाद)

1. अभिधा-प्रधान अनुवाद  

2. भाषा-शैली पर ध्यान नहीं, सपाट-शैली का प्रयोग  

3. ‘कैसी’ की अपेक्षा ‘क्या’ पर जोर  

4. एकार्थी अनुवाद  

5. अनुवाद में स्पष्टता अनिवार्य  

6. विषय का ज्ञान अपेक्षित, कुछ भी जोड़ा या छोड़ा नहीं जाता  

7. पारिभाषिक शब्दों का अनिवार्यतः प्रयोग  

8. मूल का सच्चा प्रतिनिधि  

9. शब्दानुवाद पर ज़ोर  

10. अनुवाद तटस्थ होता है।  

2. सृजनात्मक साहित्य

1. लक्षणा एवं व्यंजना प्रधान अनुवाद  

2. भाषा-शैली एवं सौंदर्य का विशेष ध्यान  

3. ‘क्या’ की अपेक्षा ‘कैसी’ पर जोर  

4. अनेकार्थी अनुवाद  

5. संकेत एवं व्यंजना होती है  

6. विषय के ज्ञान की आवश्यकता नहीं। कुछ जोड़ा जाता है, कुछ छोड़ा जाता है।  

7. ऐसा कोई बंधन नहीं  

8. निकटतम समतुल्यता का प्रयास  

9. भावानुवाद वांछनीय  

10. अनुवादक का व्यक्तित्व बीच में होता है।  

शब्दानुवाद

इसके मुख्य उपभेद 3 हो सकते हैं।

क) जिसमें मूल सामग्री की हर शब्दाभिव्यक्ति का प्रायः उसी क्रम में अनुवाद किया जाए। जैसे I am going home का “मैं हूँ जा रहा घर” या Ram killed Ravana का “राम मारा रावण”। बाइबिल की पुरानी पोथी के कई युनानी अनुवाद लगभग इसी प्रकार के लिए किए गए थे। अनुवाद का यह निकृष्टतम रूप है। कभी-कभी ऐसा शब्दानुवाद पूर्णतः अबोधगम्य हो जाता है, क्योंकि हर भाषा में शब्द क्रम एक जैसा नहीं होता।  

ख) ऐसा अनुवाद जिसमें मूल का क्रम तो नहीं रखते किन्तु मूल में हर शब्द का अनुवाद में पूरा ध्यान रखते हैं और इसीलिए मूल की शैली अनुवाद में स्पष्ट झलकती है। हिन्दी अखबारों में अंग्रेज़ी में किए गए ऐसे उदाहरण प्रायः मिलते हैं –

  • ​It is an interesting point – यह एक रोचक बिन्दु है।
  • ​Burn the lamp – बत्ती जलाओ।
  • ​The insects that called silver fish – कीड़े जो रजत मछली कहलाते हैं।

​इस प्रकार के शब्दानुवादों में पहले प्रकार के अनुवादों की तरह अस्पष्टता तो नहीं रहती किन्तु लक्ष्य भाषा की सहज प्रकृति इसमें नहीं पाती बल्कि स्रोत भाषा की शैली की छाया लक्ष्यभाषा पर बुरी तरह छायी रहती है।

​ग) शब्दानुवाद का तीसरा रूप वह है जिसमें मूल के प्रत्येक शब्द, पद, पदबंध, मुहावरा, लोकोक्ति, कहावत, वाक्य के लक्ष्यभाषा में प्राप्त पर्याय के आधार पर अनुवाद करते हुए मूल के भाव को लक्ष्यभाषा में संप्रेषित किया जाता है। इसमें किसी भी शब्द या अभिव्यक्ति – संदर्भ (पदबंध, मुहावरा, लोकोक्ति, कहावत, वाक्य) आदि की उपेक्षा नहीं की जाती।

वास्तव में शब्दानुवाद ऐसी सामग्री के अनुवाद में बहुत सफल नहीं हो सकता, जिसमें तथ्यात्मक साहित्य जैसे गणित, ज्योतिष, विज्ञान, विधि आदि के लिए तो शब्दानुवाद ही अपेक्षित है। विधि साहित्य में तो हर शब्द का अपना महत्व होता है अतः यहाँ शब्दानुवाद वांछनीय होगा।

शब्दानुवाद की कमियाँ


  1. स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा यदि वाक्यगठन, विशिष्ट प्रयोग मुहावरे तथा वाक्यरचना आदि की दृष्टि से बहुत समान हैं तब तो ठीक है किन्तु यदि दोनों में इन दृष्टियों से असमानता हो तो फिर यह असमानता जितनी अधिक होगी, शब्दानुवाद उतना ही घटिया होगा।  

2. शब्दानुवाद में प्रायः स्रोत भाषा का प्रभाव स्पष्ट रहता है। छंद की उस छंद के कारण अनुवाद की भाषा प्रायः अकृत्रिम तथा निष्प्राण हो जाती है तथा उसमें मूल रचना का स्वाद नहीं रहता। उसको मूल रचना का स्वाद नहीं रहता।

3. अक्सर ही ऐसा अनुवाद अस्पष्ट एवं हास्यास्पद हो जाता है।

4. ऐसा अनुवाद मूल का स्रोत अनुवाद बनकर रह जाता है।

व्याख्यानुवाद –

इसमें मूल का व्याख्या के साथ अनुवाद होता है। यह व्याख्या अनुवादक के व्यक्तित्व, ज्ञान एवं दृष्टिकोण पर आधारित होती है तथा उसमें कथ्य के स्पष्टीकरण के लिए कुछ अतिरिक्त उदाहरण, उद्धरण, प्रमाण इत्यादि जोड़े जा सकते हैं। इसी कारण व्याख्या में अनुवादक केवल अनुवादक न रहकर काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। लोकमान्य तिलक का गीतानुवाद इसी कारण का है। व्याख्यानुवाद में अनुवादक मूल की बातों को विस्तार के साथ अपने ढंग से समझाने पर बल देता है। मूल की तुलना में यह काफी बड़ा होता है। इस अनुवाद की एक कमी यह है कि इसमें इस बात का भय रहता है कि अनुवादक मूल लेखक के विचारों में कुछ अपना रंग आरोपित करके उसके साथ अन्याय भी कर सकता है।  

आदर्श अनुवाद –

यह अनुवाद का आदर्श प्रकार है। इसमें निकटतम समतुल्यता को आधार बनाया जाता है। इसमें वह बोधगम्यता यथासाध्य अपना व्यक्तित्व नहीं आने देता। अनुवाद मूल जैसा होता है। अर्थात् अनुवादक का यह प्रयास होता है कि मूल को पढ़कर या सुनकर लक्ष्य-भाषा-भाषी भी वही अर्थ ग्रहण करें