अनुवाद प्रविधि – अनुवाद प्रविधि से आशय है – अनुवाद का सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष (अनुवाद करने से पहले की प्रक्रिया का अध्ययन)

​सैद्धांतिक पक्ष– अनुवाद के सैद्धांतिक पक्ष के अन्तर्गत अनुवाद का अर्थ परम्परा एवं महत्व का अध्ययन किया जाता है। अनुवाद की भारतीय एवं पाश्चात्य परिभाषाओं एवं विचारों का अध्ययन एवं विश्लेषण करने के पश्चात अनुवाद के वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास किया जाता है।

​व्यावहारिक पक्ष– अनुवाद के सैद्धांतिक पक्ष की जानकारी के पश्चात् हमें व्यावहारिक पक्ष की जानकारी का ज्ञान होना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। व्यावहारिक पक्ष के अन्तर्गत अनुवाद की तकनीक अथवा शिल्प के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती है। अनुवाद कार्य किन-किन विधियों अथवा तरीकों से किया जाता है। वे अनुवाद की तकनीकों के अन्तर्गत आते हैं—

​डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने मुख्य रूप में अनुवाद को 8 प्रविधियों की ओर संकेत किया है —

  1. ​पाठनिष्ठ प्रविधि – इसमें स्रोत भाषा के कथ्य सम्प्रेषण पर बल दिया जाता है। लक्ष्यभाषा की प्रकृति अथवा सौन्दर्य की परवाह न करते हुए कथ्य को ज्यों का त्यों संप्रेषित करने पर जोर दिया जाता है। जैसे– विधिक, तकनीकी, वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक क्षेत्रों के अनुवाद आदि में इस विधि का प्रयोग किया जाता है।
  1. ​संबंध प्रविधि – इस प्रविधि में 2 भाषाओं के शब्दों में संबंध और उनकी प्रकृति को दर्शाता है। जैसे मराठी के शब्द, ‘बिन्दास्त’ शब्द का अनुवाद हिन्दी में बिन्दास अथवा बेधड़क शब्दों के प्रयोग से करना। एक भाषा के शब्द के प्रतिस्थापन के रूप में अन्य भाषा के देशज, तत्सम, तद्भव रूप का प्रयोग इस विधि में किया जाता है।
  1. ​शैली बद्ध प्रविधि – इस विधि में भाषा की अपेक्षा शैली को महत्व देते हैं।
  1. ​छाया प्रविधि – इसमें शब्दों के ऊपर अर्थ– अर्थात् अभिधेयार्थ को महत्व न देकर व्यंग्यार्थ अथवा ध्वनि को महत्व देते हैं। उनका अनुवाद करते हैं।
  1. ​लक्ष्य समूह प्रविधि – इस विधि में लक्ष्य समूह (Target Audience or Reader) को ध्यान में रखते हुए अनुवाद किया जाता है। यदि अनुवाद किसानों, ग्रामीणों के लिए है तो भाषा का स्तर उन्हीं के अनुरूप होगा और यदि प्रबुद्ध वर्ग के लिए है तो अनुवाद उनके स्तर का होगा।
  1. ​निरपेक्ष विधि – इस विधि में अनुवादक निरपेक्ष होकर अनुवाद करता है। जो जैसा है (भाषा में) उसे लक्ष्य भाषा में वैसा ही उल्था कर देता है। अनुवादक का व्यक्तित्व बीच में नहीं आता।
  1. ​समतुल्यता प्रविधि – इसमें स्रोत भाषा के प्रतीक शैली तथा प्रवाह को लक्ष्यभाषा में भी बनाए रखा जाता है। दोनों भाषाओं को बराबर महत्व दिया जाता है। जैसे भगीरथ प्रयत्न का अनुवाद हरक्युलियन effort में करना। यदि प्रसाद की कहानी पुरस्कार का अनुवाद करना है तो उसी के समकक्ष भव्यता, प्रतीक, प्रधान शैली का प्रयोग करना होगा।
  1. ​अर्थप्रेषण प्रविधि – इस प्रविधि में अर्थ को महत्व दिया जाता है। यथा mind शब्द का दिमाग, मन अथवा विचार के अर्थ में अनुवाद करना। यहाँ सन्दर्भ के अनुसार शब्द का चुनाव कर उसमें किसी एक अर्थ का चयन कर लिया जाता है।

​अनुवाद की प्रक्रिया

​अनुवाद की प्रक्रिया जटिल होती है। अनुवादक को अनुवाद के रूप में पुनर्रचना करनी पड़ती है। लेखक विषय वस्तु के चुनाव में स्वतंत्र होता है। उसकी अपनी भावभूमि होती है किन्तु अनुवादक को लेखक की अभिव्यक्ति को पुनर्प्रस्तुल करना होता है। अनुद्य (जिसका अनुवाद करना है) सामग्री का रूप यथावत रखने को वह बाध्य है। उसका रूप परिवर्तन वह नहीं कर सकता। अनुवाद करते समय उसे न केवल कथ्य पर ध्यान देना होता है अपितु शैली, शब्द योजना, वाक्य विन्यास, प्रतीक, मुहावरे आदि का भी ध्यान रखना होता है।

​प्रसाद और नागार्जुन की शैली समान नहीं अतः उनकी कवियों का अनुवाद करते समय अनुवादक को अनुवाद में भी शैलीगत वैभिन्न लाना होगा।

​स्रोत भाषा में व्यक्त पर्याय ज्यों के त्यों लक्ष्य भाषा में हो। यह आवश्यक नहीं। इसके अतिरिक्त एक भाषा में व्यक्त शब्द दूसरी भाषा में भी वही अर्थ दे यह जरूरी नहीं। जैसे अंग्रेजी के Ice और Snow के लिए हिन्दी में एक ही शब्द है बर्फ। किंतु दोनों एक नहीं है। तरू, वृक्ष, विटप के लिए अंग्रेजी में Tree शब्द है किन्तु इससे तरू की कोमलता, वृक्ष की कठोरता तथा विटप की विशालता का अतिरिक्त अर्थ ध्वनित नहीं होता।

​कई बार एक ही वाक्य दो संदर्भों में अलग अर्थ देता है –

क) उसने मन भर मिठाई खाई (जी भर)

ख) मुझे मन भर मिठाई चाहिए (मात्रा तोल)

वाक्य दो हैं किन्तु अर्थ अलग है। अनुवादक को इसका ध्यान रखना होगा।

​अनुवाद की प्रक्रिया – अनुवाद करते समय अनुवादक को तीन बातों का ध्यान रखना होगा –

  1. ​उसे दोनों भाषाओं का ज्ञान हो।
  1. ​उसे विषय का समुचित ज्ञान हो – तकनीकी, वैज्ञानिक विषय आदि।
  1. ​मूल लेखक के साथ सहानुभूति हो, उसके प्रति सम्मान हो।

​बाइबिल एवं अन्य धर्म ग्रंथों के अनुवादों की सफलता का कारण अनुवादकों का मूल लेखकों से तादात्म्य स्थापित करना है।

​अनुवाद के चरण (प्रक्रिया) – इस प्रकार हैं –

  1. ​स्रोत भाषा के पाठ का विश्लेषण एवं अर्थ ग्रहण
  1. ​स्रोत भाषा एवं लक्ष्य भाषा में तालमेल स्थापित करना (भाषा, शैली, शब्द, वाक्य, प्रतीक, मुहावरें आदि के स्तर पर)
  1. ​भाषान्तरण एवं अर्थान्तरण की प्रक्रिया
  1. ​पुनरीक्षण अर्थात् दोनों रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन। इन चरणों को पाकर अनुवादक एक सफल अनुवाद करने में सक्षम होता है।

​1. इसका अर्थ है कि मूल पाठ को पढ़ते समय अनुवादक वाच्यार्थ के साथ-साथ लक्ष्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ को भी ग्रहण करने में सक्षम हो। उदाहरण के लिए पंकज कहते ही कमल के फूल की बात मन में आती है किंतु साथ ही पंक अर्थात् कीचड़ में पैदा होना, किंतु कीचड़ से निरपेक्ष रहना, निर्मल रहने के भाव को भी अनुवादक को ग्रहण करना होगा। कमल का फूल न कहकर पंकज कहा गया है इस बात को ध्यान में रखना होगा।

​2. स्रोत भाषा एवं लक्ष्य भाषा में तालमेल का अर्थ है कि स्रोत भाषा में अभिव्यक्ति/विचार के समकक्ष लक्ष्य भाषा में विचार खोजना जैसे ऊँट के मुँह में जीरा तथा हरक्युलियन effort के लिए A Drop in the ocean के लिए ऊँट के मुँह में जीरा तथा हरक्युलियन effort के लिए A to the doorbell का अनुवाद द्वारा खोलना होगा। दो दरवाजे की घंटी का उत्तर देना नहीं होगा। इसी प्रकार अनुवादक को दोनों भाषाओं की शैली को ध्यान में रखना होगा।

​3. भाषान्तरण एवं अर्थान्तरण – अनुवादक यहाँ कर्त्ता की भूमिका में प्रस्तुत होता है। वह मूल पाठ में व्यक्त कार्य एवं उद्देश्य के प्रति सच्चा रहता है। उसे अनुवादक कहते हैं। दोनों भाषाओं की व्याकरणिक संरचना, शब्दों के क्रम, शैलीगत भिन्नता इत्यादि का ध्यान रखना होगा। उदाहरण के लिए Diploma in Transition का अनुवाद ‘डिप्लोमा पहले ही होगा और अनुवाद बाद में’ क्योंकि हिंदी में यह शब्द-केस रहता है। हिंदी तथा अंग्रेजी के वाक्य The meeting was chaired by John का हिंदी में अनुवाद होगा ‘जॉन ने बैठक की अध्यक्षता की’ न कि ‘बैठक की अध्यक्षता जॉन द्वारा की गई’। डम्मी संरचना अर्थात हम पुरानी अंग्रेजी के किसी पाठ का अनुवाद कर रहे हैं तो उसका अनुवाद पुरानी हिंदी में ही करना उपयुक्त होगा।

​4. इसके पश्चात् अनुवाद की असंगति हटाना एवं मूल पाठ की फिर से पढ़कर यह देखना चाहिए कि क्या मूल पाठ का कार्य एवं अर्थ अनूदित पाठ में आ गया है या नहीं। पूरी तरह से संतुष्ट हो जाने के बाद ही उसे अनुवाद कार्य को पूरा हुआ मानना चाहिए।

​इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुवाद की प्रविधि एवं प्रक्रिया अनुवादक की मार्गदर्शक है। बिना इनका पालन किए अनुवाद की सफलता में संदेह रहता है। 

डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल के अनुवाद के 8 प्रविधियों का उल्लेख किया है जो निम्न लिखित हैं –

1. पाठनिष्ठ प्रविधि – मूल शब्द ही रहते हैं।  

2. संबन्ध प्रविधि – दोनों पाठों के शब्दों में सूक्ष्मता रहता है।  

3. शैलीबद्ध प्रविधि – मूल पाठ की शैली होती है।  

4. छाया प्रविधि – मूल पाठ के शब्द के स्थान पर अर्थ को लेते हैं।  

5. लक्ष्य समूह प्रविधि – इसके अंतर्गत लक्ष्य समूह यानि पाठक के पढ़ने के स्तर के अनुसार।  

6. निरपेक्ष प्रविधि – अनुवादक का व्यक्तित्व अनुवाद में नहीं आता है।  

7. समतुल्यता प्रविधि – रस, छन्द, अलंकार आदि में दोनों पाठों में समतुल्यता।  

8. अर्थ-प्रेषण प्रविधि – अर्थ को महत्व दिया जाता है, शैली को अपेक्षाएँ कम।  

अनुवाद की प्रक्रिया के सन्दर्भ में विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए हैं जैसे – नाइडा न्यूयॉर्क, डॉ भोलानाथ तिवारी आदि विद्वानों ने अपने-अपने विचार प्रकट किये हैं। इन सभी प्रारूपों में से कुछ पर प्रकाश डालना समीचीन है।  

नाइडा द्वारा प्रस्तावित प्रारूप

नाइडा के अनुवाद को वैज्ञानिक तकनीक के रूप में स्वीकार किया है। अतः अनुवाद के विभिन्न सोपानों को समझने के लिए एवं विश्लेषण के लिए भाषा वैज्ञानिक तकनीक आवश्यक है।  

नाइडा ने अनुवाद के 3 चरण बताए हैं –  

1. विश्लेषण  

2. अंतरण  

3. पुनर्गठन  

नाइडा के अनुवाद सोपान का प्रवाह

 1. स्रोत भाषा (मूलपाठ)  

 विश्लेषण (अनुवादक द्वारा मूलपाठ का विश्लेषण)  

 अंतरण (सामग्री का भाषाई व अर्थगत अंतरण)  

 पुनर्पाठ (पुनर्गठित पाठ तैयार करना)  

 2. लक्ष्य भाषा (अनूदित पाठ)  

आरेख से स्पष्ट होता है कि तीनों सोपानों में एक निश्चित क्रम है। पहले चरण में स्रोत भाषा में निहित मूलपाठ के संदेश को ग्रहण करने के लिए अनुवादक सबसे पहले पाठ का विश्लेषण करता है पाठ भाषा के माध्यम से प्रेषित किया जाता है। अतः अथवा बाह्य रूप एवं अभ्यंतर स्तर दोनों स्तरों का भाषिक संरचना का विश्लेषण करता है।  

उदाहरण:

यदि अंग्रेजी में एक वाक्य ले = “Mohan frightened Sheela”. गहरे स्तर पर इस वाक्य के 2 उदाहरण। संरचनात्मक संबंध है – (1) एक मोहन कर्ता के रूप में सक्रिय प्राणी के रूप में कार्य करता है। (2) दूसरे में वह डराने के रूप में प्रयुक्त हुआ मात्र क्रिया के साधक के रूप में प्रयुक्त हुआ है।  

इस प्रकार इसमें क्रिया के 2 रूप दृष्टिगोचर होते हैं। हिन्दी में भी इसके 2 समानान्तर संदेश संभव हैं –  

1. मोहन शीला को डराता है  

2. शीला मोहन से डरती है  

विश्लेषण के उपरान्त प्राप्त इन दोनों संदेशों के बाद ही अनुवादक पाठ के सन्दर्भ के अनुसार उनमें से किसी एक या दोनों संदेशों को अनूदित पाठ में सम्प्रेषित करने का निर्णय लेगा।  

2. अंतरण (दूसरा सोपान)

विश्लेषण से प्राप्त अर्थबोध का लक्ष्यभाषा में अंतरण किया जाता है। प्रत्येक भाषा का मूल संदेश अपने ढंग से भाषिक इकाइयों में बँटती है। अतः एक भाषा से दूसरी भाषा में अंतरित करने का अर्थ है – अभिधार्थ के धरातल पर पुनः विन्यास करना। नाइडा के अनुसार पुनर्विन्यास की यह प्रक्रिया काफी मात्र ध्वनि/लिपि के स्तर पर सीमित रहती है तो केवल नवीन अभिव्यक्ति के रूप में भाषा के सभी स्तरों पर रहती है।  

उदाहरण:

हिंदी में लोकोक्ति है – नाच न जाने आँगन टेढ़ा

अंग्रेजी अनुवाद होना – A bad carpenter quarrels with his tools.  

इन उपर्युक्त दोनों वाक्यों में शब्दों की समानता तो नहीं है किसी संदेश के धरातल पर दोनों अभिव्यक्तियां समतुल्य हैं।  

3. पुनर्गठन (तीसरा सोपान)

यह अनुवाद प्रक्रिया का तीसरा एवं अंतिम चरण है। नाइडा के मतानुसार प्रयोग भाषा की अपनी अभिव्यक्ति प्रणाली एवं व्याकरण रीति होती है एवं इसके स्तर ही लक्ष्य भाषा की अपनी अभिव्यक्ति संरचना भी स्वाभाविक एवं बोधगम्य बनाती है। अनूदित पाठ के रचयिता के रूप में अनुवादक कई प्रकार के छूट ले सकता है या पद में लिखित सामग्री को गद्यानुवाद कर सकता है लेकिन सामग्री के काव्यात्मकता को बिना ह्रास किये। यहाँ अनुवादक लेखक या रचयिता के रूप में प्रस्तुत होता है। इसमें लक्ष्य भाषा की प्रकृति को ध्यान में रखकर स्रोत भाषा की सामग्री को प्रस्तुत करता है एवं इसके लिए अनुवादक को लक्ष्य भाषा एवं स्रोत भाषा के प्रयुक्त सन्दर्भों में समानता और विषमता का ध्यान भी रखना पड़ता है।  

उदाहरण:

 His bread is buttered on both sides.  

 हिन्दी अनुवाद – उसकी पाँचों उँगुलियाँ घी में हैं।  

उपर्युक्त उदाहरण में स्रोत के संदेश का लक्ष्य भाषा में अनुवाद अभिव्यक्ति के स्तर पर समान है।  

इस प्रकार नाइडा ने अनुवाद प्रक्रिया का सामान्य प्रारूप प्रस्तुत किया है।  

डॉ. भोलानाथ तिवारी द्वारा अनुवाद प्रक्रिया

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अनुवाद के लिए 6 चरण स्वीकार किये हैं –

डॉ. भोलानाथ तिवारी के 6 चरणों का क्रमबद्ध ढाँचा (डायग्राम संरचना)

1. मूल पाठ का बोधन  

2. विश्लेषण  

3. भाषान्तरण  

4. पुनरीक्षण (तुलना)  

5. समायोजन  

6. समतुल्यता (तुलना)  

1. मूल पाठ का बोधन

इस प्रथम चरण में मूल पाठ की सामग्री को अर्थपरक संरचना एवं विषय-वस्तु के आश्रय की दृष्टि से पढ़ा जाता है एवं भाषिक संरचना को समझा जाता है। इसके लिए अनुवादक शब्दकोश एवं कोशान्तरो की सहायता ले सकता है। संदर्भ एवं देश आदि से सम्बन्धित जानकारी को भी पाठ बोधन का आधार बनाता है एवं मूल पाठ की गहराई में पहुँचते हुए उसके संदेश, भाव, छंद, वाच्यार्थ आदि विविध आयामों का गहनता से बोधन करता है।  

2. विश्लेषण

मूलपाठ का बोधन हो जाने के पश्चात् पाठ का गहनता से विश्लेषण करता है। एवं पाठ में निहित विचारों एवं भावों को समझने का प्रयास करता है। इस चरण में अनुवादक भाषा स्तर पर विश्लेषण, अभिव्यक्ति स्तर, मुहावरे के स्तर पर, अलंकार एवं समान शब्दावली आदि के स्तर पर पाठ का विश्लेषण करता है। वह पाठ में निहित लक्ष्यात्मक एवं व्यंग्यात्मक अभिव्यक्तियों की विश्लेषण को भी ध्यान में रखता है।  

उदाहरण:

एक शब्द है ‘पानी’  

–  उसने पानी पिया  

–  उसका पानी ढल गया  

–  उसने घाट-घाट का पानी पिया  

–  वह पानी-पानी हो गया

एक ही ‘पानी’ शब्द के इतने अर्थ हो सकते हैं अतः अनुवादक को पानी में निहित व्यंग्यार्थ को पकड़ना होगा।  

3. भाषान्तरण

इस चरण में स्रोत भाषा के पाठ की लक्ष्य भाषा में स्थानान्तरण किया जाता है। इसके लिए अनुवादक किसी मूल भाषा के शब्दों को अपनाता है तो कभी उसके पर्याय खोजना है और इस प्रकार वह स्रोतभाषा के मूलपाठ के संदेश को लक्ष्य भाषा में बाँधता है या वह कह सकते हैं कि अनुवादक इस चरण में परकाया में प्रवेश करता है। 

उदाहरण:

 अंग्रेज़ी का वाक्य है – You are welcome  

 हिंदी में अनुवाद क्रमशः तू, तुम, आप आदि में से अनुवादक को लक्ष्य भाषा एवं प्रकृति की दृष्टि के अनुसार लेना पड़ेगा।  

4. पुनरीक्षण

भाषान्तरण के पश्चात् अनूदित सामग्री का सूक्ष्म निरीक्षण वर्गों की तरह अनुवादक एक सूक्ष्म निरीक्षण एवं समीक्षा के साथ दोबारा पुनरीक्षण करता है। वह भाषागत, शैलीगत, विषयगत, अर्थबोधता, व्याकरणिक स्तर एवं शब्दचयन आदि के आधार पर देखता है कि लक्ष्य भाषा के रूपांतरण के पश्चात अनूदित सामग्री में उपयुक्त बातों की सुरक्षा हुई है या नहीं। मूल के अर्थ, भाव, संवेदना को अक्षुण्ण रख मूल की ध्वनि तथा सम्भव आकार एवं भाषिकयों की रक्षा हुई है या नहीं।  

5. समायोजन

पुनरीक्षण के पश्चात दोनों पाठों यानि कि स्रोत भाषा पाठ एवं लक्ष्य भाषा पाठ के सामग्रियों का पठन करने के पश्चात उन दोनों पाठों का समायोजन किया जाता है। दूसरे अनूदित पाठ का लक्ष्य भाषा की दृष्टि से समायोजन करता है एवं तीन बातों का ध्यान रखा जाता है –  

1. भाषा में सहज प्रवाह हो  

2. स्रोत भाषा का छाया न हो  

3. अर्थ स्पष्ट हो  

6. समतुल्यता अथवा तुलना

इस चरण में अनुवादक दोनों प्रकार की अर्थ स्पष्टता अभिधार्थ है। यह समतुल्यता वह भाषा परक एवं शैली परक दोनों स्तरों पर सुनिश्चित हो सके।  

उदाहरण:

1. भाषापरक समतुल्यता:  

 अंग्रेज़ी शब्द: Office

हिंदी अनुवाद: कार्यालय  

 अंग्रेज़ी शब्द: Crowd

हिंदी अनुवाद: भीड़  

2. शैलीपरक समतुल्यता:  

 अंग्रेज़ी वाक्य: Please come in

हिंदी अनुवाद: कृपया अंदर आएं  

इस चरण में यह देखा जाता है कि अनूदित सामग्री अर्थनिर्देश, अर्थ संकोच और अर्थ विस्तार जैसे दोषों से मुक्त हो और भाषा शैली भी मूल के अनुरूप हो।  

इस प्रकार डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अनुवाद प्रक्रिया के चरण प्रस्तावित किये हैं।  

उपसंहार

निष्कर्षतः स्पष्ट होता है कि अनुवाद एक विधिवत प्रक्रिया है जिसमें अनुवादक को एक सर्जन की भाँति मूल पाठ का विश्लेषण करते हुए एवं गूढ़ अर्थ को समझते हुए लक्ष्य भाषा में भाषान्तरित करना होता है। इसमें अनुवादक को प्रत्येक चरणों से होकर गुजरना पड़ता है। और मूल पाठ का बोधन, विश्लेषण, भाषान्तरण, समायोजन करते हुए मूलपाठ के सन्देश को लक्ष्य भाषा के संदेश में प्रेषित करता है।