• ​मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति।
  • ​संवत् 1968 (सन् 1911) रामनवमी के दिन काव्य–सृजन प्रारंभ तथा संवत् 1969 (सन् 1912) जन्माष्टमी के दिन पूर्ण।
  • ​सर्वप्रथम संवत् 1969 (सन् 1912) में प्रकाशित।
  • ​अब तक 20 से भी अधिक संस्करण प्रकाशित।

​2. भारत-भारती : विशेषताएँ एवं खण्ड

  • ​स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उत्तर भारत में राष्ट्रीयता के प्रचार एवं प्रसार की दृष्टि से पर्याप्त महत्त्वपूर्ण।
  • ​गुप्त जी के प्रिय हरिगीतिका छंद में रचित काव्य–कृति।
  • ​तीन खण्डों में विभक्त :
    1. ​अतीत खण्ड
    2. ​वर्तमान खण्ड
    3. भविष्यत् खण्ड

3. खण्डों का संक्षिप्त विवरण

  • ‘अतीत खण्ड’ में भारत के प्राचीन गौरव, भारतीयों की वीरता, आदर्श, विद्या–बुद्धि, कला–कौशल, सभ्यता–संस्कृति, साहित्य, दर्शन, स्त्री–पुरुष आदि का गुणगान।
  • ​‘वर्तमान खण्ड’ में भारत की साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन में हुई अधोगति, रईसों की भोगलिप्सा, तीर्थ–मंदिरों में व्याप्त अनाचार, पतनोन्मुख समाज और स्त्रियों की दुर्दशा का चित्रण।
  • ​‘भविष्यत् खण्ड’ में देश की उन्नति की मंगल–कामना एवं भारतीयों को उद्बोधन।

4. रचना की प्रेरणा एवं विद्वानों के मत

  • ​‘पूर्व दर्शन’ नाम की कवि की तुकबंदी से प्रभावित कुरीसुदौली के अधिपति माननीय श्रीमान् राजा रामपाल सिंह जी की प्रेरणा एवं आग्रह पर रचित काव्य।

​विभिन्न विद्वानों के मत :

  • ​आचार्य शुक्ल– “गुप्त जी की ओर पहले पहल हिंदी प्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली उनकी ‘भारत भारती’ निकली। इसमें ‘मुसद्दस हाली’ के ढंग पर भारतीयों की या हिंदुओं की भूत और वर्तमान दशाओं की विषमता दिखाई गई है, भविष्य निरूपण का प्रयत्न नहीं है। यद्यपि काव्य की विशिष्ट पदावली, रसात्मक चित्रण, वाग्वैचित्र्य इत्यादि का विधान इसमें न था पर बीच-बीच में मार्मिक तथ्यों का समावेश बहुत साफ और सीधी–सादी भाषा में होने से यह स्वदेश की ममता से पूर्ण नवयुवकों को बहुत प्रिय हुई। प्रस्तुत विषय को काव्य का पूर्ण स्वरूप न दे सकने पर भी इसने हिंदी कविता के लिये खड़ी बोली की उपयुक्तता अच्छी तरह से सिद्ध कर दी।”

​5. विद्वानों के मत (आगे)

  • ​हजारीप्रसाद द्विवेदी– “‘भारत भारती में प्राचीन गौरव के प्रति कवि की आस्था व्यक्त हुई है। उसमें आर्यसमाज के तत्कालीन आंदोलन का प्रभाव है। फिरभी कवि ने भविष्य के लिये आशा का संदेश दिया है। भारत भारती ने तत्कालीन शिक्षित जनचित्त की आशा–आकांक्षा को बुभुक्षित रहने से बचाया। इसने किसी बड़े आदर्श को प्रतिष्ठित तो नहीं किया लेकिन जनचित्त को उसके प्राचीन गौरव की कहानी सुनाकर सजग और साकांक्ष बनाया। भारत भारती ने उनदिनों विदेशी शासन से मुक्ति पाने की अपूर्व प्रेरणा दी। समूचे हिंदी भाषी प्रदेश को उद्बुद्ध और प्रेरित करने में इस पुस्तक ने प्रशंसनीय शक्ति का परिचय दिया।”
  • ​डॉ. बच्चन सिंह– “‘हिंदी भाषाभाषी क्षेत्र में इतने व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय–सांस्कृतिक चेतना जगाने का जो काम अकेले भारत भारती ने किया,उतना अन्य पुस्तकों ने मिलकर भी नहीं किया।”

. भारत–भारती : वर्ण्य विषय (अतीत खण्ड)

  • ​अतीत खण्ड का प्रारंभ मंगलाचरण से।
  • ​मंगलाचरण में माँ भारती की वंदना तथा सीतापति श्रीराम एवं गीतामृत का पुण्य स्मरण।
  • ​‘मानस–भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती’ भारत–भारती कृति की प्रथम पंक्ति, जो मंगलाचरण का अंग है।
  • ​मंगलाचरण के बाद कवि लेखनी की वंदना करते हुए सोये हुए राष्ट्रीय भावों को जगाने की मंगल– कामना करते हैं।
  • ​अतीत खण्ड मंगलाचरण एवं उपक्रमणिका सहित 33 प्रमुख शीर्षकों में विभक्त।

1. अतीत खण्ड : चिंतन–बिंदु

  • ​संसार में किसी का समय सदा एक–सा नहीं रहता। ​’संसार में किसका समय है एक–सा रहता सदा, है निशि–दिवा–सी घूमती सर्वत्र विपदा–सम्पदा
  • ​उन्नति और अवनति प्रकृति एक अखण्ड नियम। ​’उन्नति तथा अवनति प्रकृति का नियम एक अखण्ड है, चढ़ता प्रथम जो व्योम में गिरता वही मार्तण्ड है। अतएव अवनति ही हमारी कह रही उन्नति–कला, उत्थान ही जिसका नहीं उसका पतन ही क्या भला
  • 2. भारत की अवनति देखकर व्यथा की अभिव्यक्ति।
  • ​भारत को पुनः उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए भारतवासियों को सजग करने का प्रयास। ​’जो इस विषय पर आज कुछ कहने चले हैं हम यहाँ, क्या कुछ सजग होंगे सखे! उसको सुनेंगे जो जहाँ?’ ‘हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी
  • ​ऋषिगणों से भारत की उत्पत्ति मानते हुए पूर्वजों का गौरवगान। ​’वे धर्म पर करते निछावर तृण समान शरीर थे, उनसे वही गंभीर थे, वरवीर थे, ध्रुव धीर थे।

3. भारतवासियों के आध्यात्मिक दृष्टिकोण का वर्णन।

  • पश्चिम की प्रगति का पूर्व–गुरु भारतवर्ष। यूनान के ज्ञान एवं चिंतन के मूल में हिंदुत्व का शिष्यत्व।

​4. विद्या–बुद्धि का वर्णन

  • ​संपूर्ण भारतवर्ष मानो एक नगरी थी बड़ी, पुर और ग्राम समूह संस्था थी मुहल्लों की लड़ी।
  • ​भारत की विद्या–बुद्धि का वर्णन।

5. भारतीय साहित्य एवं सभ्यता का वर्णन

  • ​वे प्रश्न पहले हल हुए थे एक हिंदुस्तान में’
  • ​भारतीय साहित्य के अंग के रूप में वेद, उपनिषद्, सूत्रग्रंथ, दर्शनग्रंथ, गीता, धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, ज्योतिष, गणित भाषा, व्याकरण, वैद्यक ग्रंथ, काव्य एवं इतिहास ग्रंथों का वर्णन।
  • ​शिल्पकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीतकला एवं अभिनय कला का वर्णन।
  • ​भारत के शौर्य–पराक्रम, राजस्व, शासन–व्यवस्था का वर्णन।
  • ​भारतीय जीवन–मूल्यों एवं आदर्शों का वर्णन।

​6. भारत की क्रमिक अवनति

  • ​अनार्यों के आक्रमण, बौद्ध, जैन युग, यवनों, मुसलमानों और अंग्रेजों के काल में हुई भारत की क्रमिक अवनति का वर्णन। ​’क्या थे यवन, पाते न प्रश्रय यदि अधम जयचंद से? जयशील पृथ्वीराज हारे अंत में छल–छंद से। हा! देश का दीपक बुझा भीषण अँधेरा छा गया;

​7. सुप्त–चेतना और पश्चाताप

  • ​है कर्म्म का ही दोष अथवा सब समय की बात है, होता कभी दिन है, कभी होती अँधेरी रात है।’
  • ​भारतवासियों की सुप्त–चेतना पर अवसाद एवं पश्चाताप।

8. अतीत खण्ड का समापन एवं वर्तमान खण्ड का प्रारंभ

  • ​अतीत खण्ड की अंतिम पंक्ति – ​’भगवान जानें, काल की कैसी निराली चाल है
  • वर्तमान खण्ड :
  • ​भारत की वर्तमान अवनति का वर्णन।
  1. कृषकों का दुर्दशा का चित्रण।
  2. गोवध का मर्मस्पर्शी चित्रण।
  • काव्य पंक्तियाँ:‘उन मंदिरों के ढेर ऊँचे, अद्रि-रूप उजाड़ हैं; हा पूर्वजों की बैठकों पर दीखते अब झाड़ हैं। वे झाड़ मर्मर-मिस पवन में भर रहे ये शब्द हैं – ‘जो थे यहाँ उनको हुए बीते अनेकों अब्द हैं।
  • 3.
    • ब्रिटिशकालीन भारत में व्याप्त दारिद्र्य, दुर्भिक्ष का वर्णन।
  • 4. भूख से पीड़ित भारतवासियों की दुर्दशा का चित्रण।
    • 5. नारी-जनों की दुर्दशा का चित्रण।

  • 6.भारतीय रईसों, उनके सपूतों, देशी नरेशों की स्वार्थपूर्ण भोगी विलासी प्रवृत्ति पर कुठाराघात

7. पतनोन्मुख धर्म, संप्रदायिकता, धर्म के स्वार्थसिद्धि का माध्यम बनने का चित्रण।

8. मंदिरों, तीर्थस्थानों में व्याप्त दुराचार, कामी साधु–संतों, विविध वर्णों की पथभ्रष्टता, स्त्रियों की अशिक्षा, दुर्दशा का चित्रण।

  • समाज में व्याप्त बुराइयों अंधविश्वासों पर प्रहार।
  • वर्तमान खण्ड की अंतिम पंक्ति— ‘मनुजत्व दो हमको दयामय! दुख दुर्बलता हरो।
    • भविष्यत् खण्ड
  • ​इस खण्ड का मूल स्वर भारतवासियों को उद्बोधन देना है।
  • यह खण्ड क्रमशः 6 शीर्षकों में विभक्त।
  • ​भविष्यत् खण्ड के बाद पृथक् ‘विनय’ शीर्षक के अंतर्गत ईश्वर से भारतवर्ष की उन्नति की मंगल प्रार्थना।
  • ​भविष्यत् खण्ड की प्रथम पंक्ति— ​’हत् भाग्य हिंदू जाति! तेरा पूर्व–दर्शन है कहाँ
  • ​उद्बोधन में ईर्ष्या–द्वेष के त्याग, बिखरे प्रेमसंबंधों को पुनः जोड़ने का आह्वान।
  • ​उद्यम, कर्मशीलता, निर्भीकता, सांप्रदायिक सद्भाव, एकता, विवेकशीलता का संदेश।
  • ​तर्क की कसौटी पर कसकर परंपराएँ स्वीकारने का संदेश।
  • ​अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन कर बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का संदेश।
  • ​प्रगति एवं उन्नति में बाधक परंपराओं का त्याग। नीर–क्षीर विवेक की प्रवृत्ति विकसित करने का आह्वान।
  • ​स्वार्थ का त्याग परमार्थ का अवलंबन।
  • ​देशभक्त बनने का आह्वान।
  • ​समाज के सभी वर्गों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि को अपने प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त करने का संदेश।
  • ​अपने व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन कर बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का संदेश।
  • ​प्रगति एवं उन्नति में बाधक परंपराओं का त्याग। नीर–क्षीर विवेक की प्रवृत्ति विकसित करने का आह्वान।
  • ​स्वार्थ का त्याग परमार्थ का अवलंबन।
  • ​देशभक्त बनने का आह्वान।
  • ​समाज के सभी वर्गों – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि को अपने प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त करने का संदेश।
  • कवियों को सामाजिक पुनर्निर्माण की दृष्टि से काव्य–सृजन करने का संदेश। ​’केवल मनोरंजन न कवि का कर्म्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म्म होना चाहि
  • ​देश में शिक्षा के विकास पर बल क्योंकि अशिक्षा ही अधिकांशतः अधोगति का कारण। ​’सबसे प्रथम कर्त्तव्य है शिक्षा बढ़ाना देश में, शिक्षा बिना ही पड़ रहे हैं आज हम सब क्लेश मे
  • ​सत्कर्मी देशीनरेशों, समाजसुधारकों, देशभक्तों, महापुरुषों का गुणगान।
  • ​घोर संकट में भी विश्वास बनाये रखने का संदेश।
  • ​अंत में पारस्परिक विरोध और वैमनस्य नष्टकर परस्पर प्रेमभाव रखने तथा वेदवाणी का प्रसार करने की संदेश।
  • ​सभी के इष्ट फल प्राप्त करने की मंगलकामना।

. मैथिलीशरण गुप्त के कृतित्व के विषय में कौनसा कथन सही नहीं है? (RPSC Asst. Prof. 2020)

सही उत्तर: c. ‘भारत–भारती’ में आद्यंत भारत का गौरवगान वर्णित है।

​5. किस साहित्यकार ने राष्ट्र (मातृभूमि) को ‘सगुणमूर्ति सर्वेश की’ कहकर इसकी वंदना की है? (Raj. College Lect. 2014)

सही उत्तर: a. मैथिलीशरण गुप्त

​8. “गुप्तजी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं, प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करने वाले अथवा मद में झूमने (या झीमने) वाले कवि नहीं” – मैथिलीशरण गुप्त पर यह मंतव्य निम्नलिखित विचारकों में से किसका है – (KVS PGT, 2018)

सही उत्तर: a. रामचंद्र शुक्ल

9. ‘भारत भारती’ के संबंध में कौनसे कथन सही हैं? (UGC NET, 2019)

सही उत्तर: i और iii (अर्थात् i. ‘भारत–भारती’ की रचना ‘मुसदद्से–मुद्दो–ज़जे–इस्लाम’ की प्रेरणा से हुई है। तथा iii. गुप्तजी ‘भारत दर्पण’ के लेखक ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफी से भी प्रभावित थे।)