विरेचन सिद्धांत में मूलतः ग्रीक साहित्य के आचायार्च अरस्तू द्वारा संकेतित “कैथार्सिस” का ही विशद विवेचन है। कैथार्सिस शब्द का प्रयोग अरस्तू ने अपने ग्रंथों में एकाधिक बार किया है। यद्यपि अरस्तू से पहले प्लेटो ने भी दर्शन के क्षेत्र में कैथार्सिस शब्द का प्रयोग किया है, किन्तु आचार्य अरस्तू ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में ही विरेचन-सिद्धांत का विधिवत एवं पुष्ट विवेचन प्रस्तुत किया है। वास्तव में अरस्तू लगभग 20 वर्षों तक समाजशास्त्री प्लेटो के विद्यापीठ (अकादमी) में उनके सानिध्य में शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों ही रूपों में रहे थे। अरस्तू यद्यपि नीतिवादी गुरु प्लेटो के प्रति अनन्य श्रद्धावान थे, किन्तु कविता संबंधी उनके विचारों से सहमत न थे। उन्होंने जिस प्रकार उनके अनुकरण-सिद्धांत (Theory of Mimesis or Imitation) का प्रतिवाद किया है, उसी प्रकार कविता संबंधी आक्षेप का निराकरण करने के लिए अरस्तू ने विरेचन सिद्धांत का विवेचन-विश्लेषण किया है। नीतिवादी समाज व्यवस्थापक प्लेटो ने कविता पर आक्षेप लगाया है कि वह हमारी वासनाओं का संयमन करने के स्थान पर उसका सम्पोषण और सिंचन करती है। उनका तर्क था कि कविता मस्तिष्क पक्ष को प्रभावित करने के स्थान पर भाव या हृदय पक्ष को सम्पोषित करती है। अरस्तू ने कैथार्सिस का विवेचन सौन्दर्यशास्त्र के आधार पर किया है।

सिद्धान्त रूप में विरेचन –

अरस्तू ने चिकित्सा पद्धति के शब्द विरेचन का सांकेतिक और लाक्षणिक अर्थ ग्रहण किया है। वे केवल अभिधात्मक अर्थ तक ही सीमित नहीं रहे हैं। अरस्तू ने त्रासदी की परिभाषा में तथा राजनीतिशास्त्र (पॉलिटिक्स) नामक ग्रंथ में विरेचन शब्द का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यशास्त्र (पोएटिक्स) में त्रासदी की परिभाषा देते हुए कहा –

“त्रासदी किसी गंभीर, स्वतः पूर्ण तथा निश्चित आयाम से युक्त कार्य की अनुकृति का नाम है – जिसमें करूणा तथा त्रास के उद्रेक द्वारा इन मनोविकारों का उचित विरेचन किया जाता है।”

इस उद्धरण में त्रासदी के करूणा और त्रास भावों के विरेचन की बात प्रमुख है। अरस्तू ने त्रासदी के दुखात्मक भावों को विरेचन द्वारा माह्य बनाकर, प्लेटो के कविता सम्बन्धी आक्षेप का निराकरण किया है और इस बात पर बल दिया है कि त्रासदी के मुल भाव त्रास और करूणा होते हैं, जिनको उद्बुद्ध करके (उत्तेजित करके) विरेचन प्रक्रिया से मनो-विकारों का परिष्कार करना त्रासदीकार का मुख्य उद्देश्य होता है।

दूसरा स्थल जहाँ विरेचन शब्द का उल्लेख अरस्तू ने किया है वह है उनका राजनीतिशास्त्र (पॉलिटिक्स) नामक ग्रंथ। इसमें उन्होंने लिखा है कि संगीत का अध्ययन एकाधिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होना चाहिए। वे उद्देश्य हैं –

  1. शिक्षा के लिए
  2. विरेचन के लिए (शुद्धि के लिए)
  3. बौद्धिक आनन्द की प्राप्ति के लिए

उनके अनुसार परिश्रम के उपरांत संगीत – सानिन्ध्य से मनोविनोद होता है।

अतः विरेचन से अरस्तू का तात्पर्य शुद्धि से है। वह मानते हैं कि यद्यपि शिक्षा में नैतिक रागों को प्रधानता देनी चाहिए परन्तु आवेगों को अभिव्यक्त करने वाले रागों का भी आनन्द लिया जा सकता है। वास्तव में करूणा, त्रास आदि आवेगों का प्रभाव न्यूनाधिक मात्रा में सभी व्यक्तियों पर होता है। संगीत के प्रभाव से विरेचन द्वारा उनका आवेग शांत हो जाता है और व्यक्ति आत्मा की विशदता और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

विरेचन का अर्थ –

अरस्तू द्वारा प्रयुक्त शब्द कैथार्सिस है। हिन्दी में इसका अनुवाद रेचन, विरेचन, विरेचन तथा परिष्करण शब्दों द्वारा किया गया है किन्तु विरेचन शब्द सर्वाधिक प्रचलित है। मूलतः यह शब्द चिकित्सा शास्त्र का है। जिसका अर्थ है – रेचन औषधियों द्वारा शरीर के मल अथवा अनावश्यक एवं अस्वास्थ्यकर पदार्थों को निकालना। अरस्तू द्वारा प्रयुक्त कैथार्सिस शब्द इतना लाक्षणिक सिद्ध हुआ कि उनके परवर्ती आलोचक व्याख्याकारों ने लाक्षणिकता के आधार पर इसके प्रायः 3 अर्थ किये हैं –

  1. धर्मपरक अर्थ
  2. नीतिपरक अर्थ
  3. कलापरक अर्थ

विरेचन की व्याख्या –

1. धर्मपरक अर्थ –

विश्व का अधिकांश नाट्य साहित्य धार्मिक भावना से ही प्रेरित रहा है। यूनान में भी भारत की तरह नाटक का आरंभ धार्मिक उत्सवों से ही हुआ। अरिस्टोटल ऑन दि आर्ट ऑफ पोएट्री की भूमिका में प्रोफेसर गिल्बर्ट मुरे ने लिखा है कि वर्षारंभ पर डिसोन्यसुस नामक युनानी देवता से सम्बद्ध उत्सव मनाया जाता था। इस उत्सव में देवता से विनती की जाती थी कि वह उपासकों को विगत वर्ष के पापों, कुकर्मों तथा कालुष्यों से मुक्त कर दें, तथा आगामी वर्ष में उन्हें इतना विवेकपूर्ण तथा शुद्ध हृदय बना दे कि वे पाप, कालुष्य, मृत्यु आदि से बचे रहें। इस प्रकार यह उत्सव एक प्रकार से शुद्धि की प्राप्त का प्रतीक था।

अरस्तू ने अपने ग्रंथ पॉलिटिक्स में लिखा है कि हाल की स्थिति से उत्पन्न आवेश के शमन के लिए भी यूनान में उद्यमी संगीत का उपयोग होता था। स्पष्ट है कि यूनान की धार्मिक संस्थाओं में बाह्य विकारों के द्वारा आंतरिक विकारों के शमन का यह उपाय अरस्तू को ज्ञात था और संभव है कि वहीं से उन्हें विरेचन सिद्धांत की प्रेरणा मिली हो।

सारांश यह है कि विरेचन का धर्मपरक अर्थ स्वीकार करने वाले विद्वानों का मत है कि अरस्तु ने विरेचन शब्द का लाक्षणिक प्रयोग धार्मिक आधार पर किया। विरेचन का धर्म परक अर्थ था – बाह्य उत्तेजना और अन्त में उसके शमन द्वारा आत्मिक शुद्धि और शांति।

2. नीतिपरक अर्थ –

प्रसिद्ध जर्मन विद्वान बारनेज (Barney) ने विरेचन सिद्धान्त का नीतिपरक अर्थ ग्रहण करते हुए उसकी व्याख्या की है। वास्तव में नीतिपरक अर्थ मनोविज्ञान के बहुत निकट का है। बारनेज के अनुसार मानव मन में अनेक मनोविकार वासना रूप में स्थित रहते हैं। इनमें करूणा और त्रास नामक मनोवेग मूलतः दुखद होते हैं। त्रासदी रंगमंच पर ऐसे दृश्य प्रस्तुत करती है जिसमें ये मनोवेग अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। उसमें ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित की जाती हैं कि जो त्रास और करूणा से भरी होती हैं। प्रेक्षक जब उन दृश्यों को देखता है या उन परिस्थितियों के बीच मानसिक रूप से गुजरता है, तो उसके मन में भी त्रास और करूणा के भाव पहले तो अपार वेग से उद्वेलित होते हैं किन्तु फिर उसके उमड़े हुए मनोवेग शनै-शनै (धीरे-धीरे) उपशमित होते रहते हैं। इस प्रक्रिया के पश्चात् दर्शक मानसिक शांति का सुखद अनुभव करता है। इसका कारण है कि दर्शक के मन में वासना रूप में स्थित करूणा तथा त्रास आदि मनोवेगों का ढंग समाप्त हो जाता है। केवल प्रेक्षागृह या नाट्यशाला में ही इन भावों को स्वस्थ अभिव्यक्ति मिल सकती है क्योंकि वहाँ हम निडर होकर इन भावों में विहार कर सकते हैं। वही भाव विहार द्वारा खोया हुआ मानसिक संतुलन लौटाकर स्वस्थ बनाता है।

इस प्रकार विरेचन का नीतिपरक अर्थ हुआ – करूणा एवं त्रास आदि भावों के उत्तेजन के उपरांत उनका शमन और तज्जन्य मानसिक शांति।

3. कलापरक अर्थ –

प्रो. बूचर के अनुसार विरेचन के दो पक्ष हैं – एक अभावात्मक और दूसरा भावात्मक।

  • अभावात्मक पक्ष – मनोवेगों के उत्तेजन और उनके शमन से उत्पन्न मनः शांति।
  • भावात्मक पक्ष – कलात्मक परितोष एवं आनंद।

अर्थात् प्रो. बूचर के अनुसार विरेचन के कलापरक अर्थ से अभिप्राय है पहले मानसिक संतुलन और फिर कलात्मक परिष्कार।

आक्षेप –

विरेचन सिद्धान्त पर अनेक आलोचकों ने आक्षेप किए हैं। उनका मत है कि वास्तविक अनुभव में विरेचन होता ही नहीं। त्रासदी को देखकर करूणा, भय आदि मनोवेग जाग्रत तो हो जाते हैं परन्तु उसको देखने से मन की शांति हर बार नहीं मिलती। उनका तो यहाँ तक कहना है कि बहुत से नाटक तो केवल प्रेक्षक के भावों को क्षुब्ध करके छोड़ देते हैं। डॉ. नगेन्द्र इस आक्षेप को अस्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि यदि त्रासदी केवल भावों को विक्षुब्ध कर छोड़ देती तो प्रेक्षक समय और धन खर्च कर त्रासदी देखने क्यों जाते?

  • दूसरा आक्षेप यह लगाया जाता है कि त्रासदी में प्रदर्शित भाव अवास्तविक होते हैं अतः उनके विरेचन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आलोचकों का मानना है कि नाटक में हम केवल कला का (अभिनय, रंगसज्जा, संगीत आदि) ही आस्वादन करते हैं। अनुभव बताता है कि यह आक्षेप भी दुर्बल है।
  • विरेचन सिद्धांत की सबसे बड़ी दुर्बलता यह मानी जा सकती है कि अरस्तू ने प्रेम, श्लाघा आदि भावों को विरेचन में जगह न देकर भूल की है। वास्तव में त्रासदी केवल करूणा और त्रास का ही परिष्कार नहीं करती वरन् अन्य अवांछनीय भावनाओं – पाप, क्रोध, भय आदि प्रबल मनोवेगों की निस्सारता भी बनाती है।

सारांश –

सारांश यह है कि विरेचन सिद्धान्त अपनी समस्त शक्ति तथा सीमाओं सहित पाश्चात्य काव्यशास्त्र को अरस्तू की महत्वपूर्ण देन है। इसके द्वारा अरस्तू ने प्लेटो के काव्य पर लगाए गए आक्षेप का उत्तर दिया, काव्य की महत्ता स्थापित की और त्रासदी के प्रभाव को गौरवपूर्ण बनाया। अरस्तू द्वारा अनेक परवर्ती एवं आधुनिक पाश्चात्य एवं पौरस्त्य आलोचकों –  आई. ए. रिचर्ड्स तथा आचार्य शुक्ल का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। अरस्तू के “विरेचन”, रिचर्ड्स के अन्तर्वृत्तियों के संगठन और शुक्ल जी द्वारा प्रतिपादित हृदय की मुक्तावस्था में कोई भेद नहीं है। अतः विरेचन सिद्धान्त पाश्चात्य काव्यशास्त्र की स्थायी उपलब्धि कहा जा सकता है।