होरेस इटली के सुप्रसिद्ध काव्यशास्त्री एवं विचारक थे। इनका जन्म दक्षिण इटली के वेनुसिया नगर में 8 दिसम्बर 65 ई.पूर्व. में हुआ था। इनका पूरा नाम क्विन्टस होरेशियस फ्लेक्स था। होरेशियस इनके पिता का नाम था और क्विन्टस इनका निजी नाम परन्तु आगे चलकर ये होरेस के नाम से विख्यात हुए। इनके पिता ने शिक्षा प्राप्ति के लिए इन्हें यूनान के शहर एथेन्स भेजा। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात ये रोम लौट आए। रोम के गृह-युद्ध में इन्होंने जूलियस सीज़र के विरुद्ध ब्रूटस का साथ दिया। पिता की मृत्यु होने तथा सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर होरेस साहित्य की ओर झुके और समकालीन परिस्थितियों के कारण इन्होंने व्यंग्य-काव्य लिखकर अधर्म, अनीति और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाई।
कवि होने के साथ-साथ होरेस एक मर्मज्ञ समालोचक भी थे। उनकी पुस्तक “आर्स पोइतिका (पोइतिका)” जो पत्रकाव्य-शैली में रचित है, में उनके काव्य कला और काव्यशास्त्र सम्बंधी विचार प्राप्त होते हैं। यह पुस्तक उन्होंने निम्न कोटि के कवि “पिसो” के लिए सन्देशपत्र के रूप में लिखी थी। इसका उद्देश्य लगभग वही है जैसा केशवदास की रामचन्द्रिका तथा कविप्रिया का है। होरेस वास्तव में उत्तम काव्य रचना का विवेचन करने वाले कवि हैं। वे मानते हैं कि कविता या तो उदात्त गुण सम्पन्न होगी या फिर निम्न श्रेणी की। वह कविता की मध्यम श्रेणी नहीं मानते। होरेस ने आर्स पोइतिका में औचित्य पर बहुत बल दिया है। वे मानते हैं कि कवि को लेखन में स्वतंत्रता तो है पर उसमें उचित-अनुचित का विवेक होना चाहिए। वे युनानी अनुकरण सिद्धान्त को व्यापक रूप से स्वीकार करते हैं। नाटक के संबंध में होरेस के विचार कहीं-कहीं अरस्तू से भिन्न जान पड़ते हैं।
अरस्तू जहाँ घटनाओं पर जोर देते हैं वहीं होरेस कार्य पर बल देते हैं। वे नाटक को पाँच अंकों तक ही सीमित रखने के पक्ष में हैं। होरेस अशोभक, कुरूप और घृणित वस्तुओं एवं दृश्यों का प्रदर्शन वर्जित करते हैं। शिष्टता और सौन्दर्य उनके मूल प्रतिपाद्य हैं।
औचित्य सिद्धान्त
औचित्य सिद्धान्त के माध्यम से होरेस ने प्रभावी अभिव्यक्ति पर बल दिया है। कलाकार के प्रति होरेस के अनुदेश उपदेश मूलक हैं। औचित्य संबंधी अवधारणा को होरेस ने एक विशेष उदाहरण के द्वारा “आर्स पोइतिका” के प्रारम्भ में प्रस्तुत किया है —
“यदि कोई चित्रकार अपने चित्र में घोड़े की गर्दन और आदमी का सिर बनाए और शेष अंगों पर अनेक प्रकार के रंग-बिरंगे पंख लगा दे, जिससे एक ऐसी स्त्री का चित्र बन जाए जिसका उध्व भाग सुन्दर हो और अधोभाग कुरूप मछली की भाँति विकृत हो ….. तो, मेरे मित्रों! क्या आप अपनी हँसी रोक सकोगे? परिणामत : कोई भी बिम्ब अपने आप में न तो सावयव होगा, न सार्थक। उसका अस्तित्व नष्ट हो जाएगा। .. तुम्हारा विषय कुछ भी हो, परन्तु ऐसा होना चाहिए जो सरल भी हो और जिसमें अन्तर्विरोध भी न हो।”
अर्थात् चमत्कार-सृष्टि मात्र के लिए रचना में वैविध्य को प्रश्रय देना औचित्य का हनन है। होरेस के अनुसार विसंगत वैविध्य की स्थिति वैसे ही है जैसे जलपरी के जंगल में तथा वन-पशु को जलतरंगों पर चित्रित किया जाए। होरेस ने नाटक के सम्बन्ध में औचित्य की स्थापना करते हुए निम्नलिखित बातों पर जोर दिया —
- विषय-औचित्य – विषय-प्रतिपादन के औचित्य से होरेस का तात्पर्य नाटक के विषय-चयन से था। विषय वस्तु के चयन से होरेस का तात्पर्य ‘परम्परागत कथाओं’ के उपयोग से है, किन्तु इसका अभिप्राय ज्यों-की-त्यों पुनरावृत्ति से नहीं है। विषय चयन के क्षेत्र में वे नवीन उद्भावना को भी महत्व देते हैं। उनके अनुसार प्रतिभाशाली रचनाकार विषयभेद और शैलीभेद से भली प्रकार अवगत रहता है। कामदी (Comedy) विषय का प्रतिपादन त्रासदी (Tragedy) छन्दों की सीमा से सम्भव नहीं है। कथा कैसी भी हो उसके प्रस्तुतीकरण में सामंजस्य और संगति आवश्यक है। लेखक का कर्तव्य है कि वह अपने विषय को विसंगत न होने दे। जिन कथांशों की संगति न बैठती हो उन्हें छोड़ देना ही श्रेयस्कर है।
- चरित्र विधान का औचित्य – इस प्रसंग में होरेस का मत है कि चरित्रों का चित्रण उनकी अवस्था, प्रकृति और प्रसंग के अनुरूप होना चाहिए। चरित्र-चित्रण में ऐतिहासिक पात्रों के लिए विशेष सावधानी रखनी चाहिए। युग और घटना के अनुसार उनकी वेशभूषा, स्वभाव, कार्य, रुचि आदि का निर्वाह होना चाहिए जिससे ऐतिहासिकता की पूर्ण रक्षा हो। उदाहरण के लिए यदि प्रसिद्ध पात्र Achilles का चित्रण करना है तो उसे उसके स्वभाव के अनुरूप नियमों का अतिक्रमण करने वाला, शौर्य, पराक्रम, साहस से भरपूर चित्रित करना चाहिए। यदि मेदेआ को चित्रित करना है तो उसे हठी और स्वतन्त्र नारी के रूप में चित्रित करना चाहिए तभी चारित्रिक औचित्य प्रभावी हो सकेगा। इसी प्रकार बच्चों के चरित्र में बालसुलभ विशेषताएँ, स्त्रियों के चरित्र में नारी सुलभ व्यवहार, युवा एवं वृद्ध चरित्रों में उनकी वेशभूषा और व्यवहार दिखाना चाहिए। प्रत्येक चरित्र में औचित्य का समावेश करते हुए उसकी विशिष्टता की पहचान भी बनाए रखना आवश्यक है। इसके न होने से पात्र कठपुतली जैसे लगेंगे।
- अभिनय औचित्य – अभिनय की संगति से तात्पर्य रंगमंचीय अभिनय के ऐसे गुणों से है जो दर्शकों पर प्रभावी असर डाल सके। यदि अभिनय ठीक नहीं हुआ तो दर्शक या तो ऊब उठेगा या अभिनय का उपहास करेगा। अभिनय इस प्रकार का होना चाहिए कि अभिनेता सजीव जीवन का यथार्थ पात्र लगे। होरेस का मत है कि, “यदि तुम चाहते हो कि तुम्हें सहृदय दर्शक मिले जो यवनिका पतन (पर्दा गिरने तक) तक शांत बैठे रहे और फिर हर्ष ध्वनि करें तो तुम्हें प्रत्येक युग की विशिष्टताओं पर ध्यान देना होगा और जो स्वभाव, समय की गति के साथ बदलते जाते हैं, उनको उपयुक्त सौन्दर्य से विभूषित करना होगा।” अर्थात् पात्र और परिस्थिति के अनुरूप ही अभिनय प्रभावकारी होता है। अतः अभिनेता को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जैसा प्रभाव वह दर्शकों पर डालना चाहता है उसे उन्हीं भावों को अपनी मुखमुद्रा एवं भंगिमाओं के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो होरेस के अनुसार — “या तो नींद आएगी या हँसी।”
- घटना-औचित्य – होरेस के अनुसार घटनाओं का चयन और संयोजन विषयवस्तु के अनुरूप होना चाहिए। नाटक की घटनाओं को उनके अनुसार दो भागों में व्यवस्थित किया जा सकता है। एक तो वे जो अभिनीत हो सकें, दूसरी वे जिनकी सिर्फ सूचना दी जाए। उन्हें रंगमंच पर प्रदर्शित न किया जाए। उदाहरणार्थ मेदेआ का पुत्रवध, यात्कर द्वारा नरमांस पकाना तथा कथादास का सर्प बन जाना आदि। इस प्रकार की घटनाओं को अभिनय द्वारा नहीं अपितु सूचना देकर (सूच्य रूप में) ही सम्पन्न किया जाना चाहिए, अन्यथा दर्शक की मनः स्थिति जुगुप्सा भाव के कारण नाटक देखने के अनुकूल नहीं रह पाएगी। इसके विपरीत वात्सल्य भाव, मंगलागान एवं मन में करुणा, प्रेम, वीरता, आदि भावों को जगाने वाली अन्य घटनाओं को रंगमंच पर मंचित किया जा सकता है। अतः होरेस के अनुसार घटनाओं को 2 वर्गों में बाँटा जा सकता है —
- क. दृश्य
- ख. सूच्य होरेस नाटक में 5 अंकों के पक्ष में है। उनके अनुसार घटनाएँ पाँच अंकों में व्यवस्थित रहने से संतुलन बना रहता है। इससे अधिक अंकों से घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में असंतुलन होने की संभावना रहती है। यदि नाटककार त्रासदी और कामदी के विषयों को मिलाकर मंच पर प्रदर्शित करता है तो वह घटना औचित्य के विरुद्ध होगी। इन दोनों की रचना विधान एक दूसरे के विपरीत है अतः यह औचित्य को बाधित करेगा।
- शब्द-चयन में औचित्य – होरेस के मतानुसार शब्द-चयन में कवि या नाटककार को संतुलन अथवा औचित्य का ध्यान रखना पड़ता है। उनके अनुसार शब्द सरल-सुगम, उपयुक्त, मुहावरे के उपयुक्त तथा तुरन्त समझ में आ जाने वाला होना चाहिए। कठिन शब्दावली के प्रयोग से पात्रों की बातचीत दर्शक समझ नहीं पाएगा और नाटक प्रभावहीन हो जायेगा। होरेस का मानना है कि कवि को केवल पुरानी शब्दावली पर निर्भर न रहकर नए-नए शब्दों का कुशल, सक्षम और प्रभावपूर्ण प्रयोग करना चाहिए। उन्होंने रचना में दीप्तिहीन, अनुपयोगी और अर्थ-प्रयोग में असमर्थ शब्दों के बहिष्कार पर बल दिया है। वह पुराने शब्दों में नवीन संस्कार भरने का पक्षपाती है। विवेकपूर्ण नये शब्दों के प्रयोग का भी वह हिमायती है।
- भाषा-शैली – होरेस भाषा और शैली के उचित विन्यास पर बल देते थे। भाषा में दिखावटी, अशक्त, अति प्राचीन शब्दों के स्थान पर स्पष्ट, नवीन, जीवन्त एवं भाव-बोध के अनुकूल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। भाषा उद्देश्य, प्रसंग, चरित्र और भाव के उपयुक्त होनी चाहिए। होरेस का मानना था कि एक ही शैली सभी प्रकार के भावों को अभिव्यक्त नहीं कर सकती। वह शैली को विषयानुरूप संगति प्रदान करना चाहते थे। उनकी मान्यता है कि यदि विषय ओजगुण प्रधान है तो शैली भी ओजपूर्ण शब्दों से युक्त होनी चाहिए और माधुर्य गुण वाले विषय के लिए माधुर्य गुण वाली शैली समीचीन होती है। उनके अनुसार त्रासदी की शैली कामदी की और कामदी की शैली त्रासदी का माध्यम नहीं बन सकती। इसी प्रकार शैलीगत प्रयोग-वैविध्य से अमर्यादा की आशंका बनी रहती है।
- छंद सम्बंधी औचित्य – होरेस यह मानते हैं कि महाकाव्य, करुण काव्य, व्यंग्य रचना, त्रासदी, कामदी आदि काव्य रूपों के लिए विभिन्न छंदों का प्रयोग आवश्यक है। उनके अनुसार प्रत्येक छंद का विषय भी विशिष्ट होता है। विषय के अनुरूप छंद प्रयोग से काव्य-सौंदर्य द्विगुणित होता है। वे निम्नलिखित छंदों को कुछ विशिष्ट काव्य रूपों के लिए आवश्यक मानते हैं: —
- क) महाकाव्य तथा वीरकाव्य – षट्पदी (Hexametre)
- ख) दुखपूर्ण विषय के लिए – करुणगीत (Elegy – एलेजी)
- ग) व्यंग्य, कामदी-त्रासदी के लिए – लघु-गुरू द्विपदीय छंद (Iambic mitre, आइएम्बिक)
- घ) स्तुति, का तथा विजय स्तवन के लिए – सम्बोधन गीत (Ode)
- ङ) प्रेम भावना के लिए – गीति (Lyric)
औचित्य सिद्धान्त की सीमा एवं शक्ति
औचित्य सिद्धान्त का प्रकीर्ण रूप में विवेचन पाश्चात्य काव्यशास्त्र के प्रारम्भ काल से ही होता रहा है। किन्तु, ईसा की प्रथम शताब्दी में आकर होरेस ने विवेच्य विषय को गहनता और व्यवस्था दी है। यद्यपि, होरेस औचित्य-सिद्धान्त का प्रवर्तक नहीं है व्यवस्थापक ही है, तथापि रचना-शैली के प्रत्येक अंग का सूक्ष्मता से विवेचन उसने किया है। आलोचकों का मानना है कि होरेस की छंद सम्बन्धी मान्यता आंशिक रूप में ही स्वीकार्य हो सकती है, छंद का इतना विषयानुरूप हो सकना कठिन है।
औचित्य सिद्धान्त की अनेक सीमाएँ होते हुए भी ऐतिहासिक दृष्टि से उसका विशेष महत्व है। होरेस के सम्मुख उस समय का रोम का समाज और उसकी तत्कालीन साहित्य रचना थी। उसका दृष्टिकोण सुधारवादी और समाजवादी था। साहित्य के क्षेत्र में सामंजस्य लाकर वह सामाजिक क्षेत्र में संतुलन चाहता था। रचना को शीघ्रता से प्रकाशित कराने का वह पक्षपाती नहीं है। औचित्य सिद्धान्त में वह जनरुचि को भी काव्य की कसौटी मानता है। काव्य के बहिरंग पक्ष पर जोर देते हुए भी वह केवल “कला-कला के लिए” सिद्धान्त का पक्षधर नहीं है। यही उसके सत्काव्य की सामर्थ्य है और इसी रूप में होरेस के औचित्य सिद्धान्त का शाश्वत-मूल्य और स्थायी महत्व है।
