आधुनिक युग के मौलिक पाश्चात्य विचारकों में आईवर आर्मस्ट्रांग रिचर्ड्स का महत्त्वपूर्ण स्थान है। रिचर्ड्स की गणना 20वीं शताब्दी के अंग्रेजी के प्रभावशाली समालोचकों में की जाती है। डॉ. रिचर्ड्स ने पहले मनोविज्ञान एवं अर्थ विज्ञान के क्षेत्र में कार्य किया था, अतः साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने मनोविज्ञान व अर्थ-विज्ञान को अपनी स्थापनाओं के आधार के रूप में ग्रहण किया। इनका महत्त्व मुख्य रूप से इसलिए है कि इन्होंने अपने युग की विविध आलोचना पद्धतियों का जो कला के निरपेक्ष संसार पर आस्था रखती थी युक्ति-युक्त खंडन करके आलोचना को एक वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया। “कला-कला के लिए”, “कविता कविता के लिए”, तथा सौंदर्यशास्त्र पर आधारित अवधारणाओं के प्रचार-प्रसार से ऐसे वातावरण का निर्माण हो रहा था जिसमें कला को जीवन से काटकर देखने की प्रवृत्ति बलवती होती जा रही थी। ऐसी परिस्थिति में रिचर्ड्स ने मनोविज्ञान के सहारे काव्य के भावपक्ष की व्याख्या की तथा काव्य के ‘मनोवैज्ञानिक मूल्य’ का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

  • रिचर्ड्स सौंदर्य, कला तथा जीवन का निकट एवं अनिवार्य सम्बन्ध मानते हैं। रिचर्ड्स ने कहा कि सभी आनन्दमूलक भावनाओं का संबंध सौंदर्य से नहीं होता। आनन्द के अनेक स्रोत एवं प्रकार होते हैं। वह यह नहीं मानते थे कि मानव मन में कोई विशेष सौंदर्यपरक भावना होती है और इसलिए सौंदर्य से हमें आनन्द मिलता है। वास्तव में रिचर्ड्स की आलोचना में रुमानी आलोचना का ‘भाववाद’, आर्नल्ड की ‘सामाजिकता’ तथा मनोविज्ञान की ‘अंतर्दृष्टि’ का समावेश दिखाई देता है। एक तो वह कलागत मूल्यों की रक्षा करता है, दूसरा वह कला को जीवन से भी सम्बद्ध करता है।

रिचर्ड्स का काव्य मूल्य का सिद्धांत –

रिचर्ड्स ने काव्य-मूल्य के सिद्धांत द्वारा 19वीं शती के आरंभ में व्यक्त किए गए थॉमस लव पीकॉक के इस मत का खंडन किया है कि बढ़ती हुई बौद्धिकता के युग में कविता के लिए कोई स्थान नहीं रहा। शैली ने ‘इन डिफेंस ऑफ पोएट्री’ में इस मत का खंडन किया था और आर्नल्ड ने कविता की सांस्कृतिक उपयोगिता के आधार पर कविता के व्यापक महत्त्व को स्थापित किया। रिचर्ड्स ने मनोविज्ञान के सहारे काव्य के स्वरूप एवं कार्य की व्याख्या करते हुए उसे वैज्ञानिक धरातल पर उपयोगी सिद्ध करने का प्रयास किया।

रिचर्ड्स के अनुसार कविता का मूल्य उसकी मन को प्रभावित करने की क्षमता पर निर्भर है। जो कविता पाठक या श्रोता के मन को जितना अधिक प्रभावित कर पायेगी, जिसमें संप्रेषणीयता जितनी अधिक होगी वह उतनी ही उत्कृष्ट कहलाएगी। रिचर्ड्स ने मानव के सम्पूर्ण मनोवेगों को 2 प्रमुख वर्गों में रखा। एक ‘प्रवृत्तिमूलक’ मनोवेग है और दूसरा ‘विरक्तिमूलक’ मनोवेग है। प्रत्येक व्यक्ति में दोनों प्रकार के मनोवेग होते हैं। विभिन्न कारणों से मानव मन के आवेगों में असंतुलन आ जाता है। मन में संतुलन लाने के लिए यह आवश्यक है कि वे आवेग व्यवस्थित होकर एकस्वर हो जाएं। काव्य और कला का प्रयोजन ही यह है कि वह आवेगों में संतुलन स्थापित करे और आवेगों को ऐसा व्यवस्थित कर दे कि वे मन को आराम पहुँचाएँ तथा शांति प्रदान करें। इस प्रकार विरोधी मनोवेगों का संतुलन या सामंजस्य ही काव्य-मूल्य है। रिचर्ड्स का यह मानना है कि काव्य के अध्ययन से राग तत्त्व का परिमार्जन होता है।

रिचर्ड्स मानते थे कि विरोधी मनोवेगों के संतुलन से जो स्थिति उत्पन्न होती है, वह न तो वह निष्क्रिय अवस्था है जिससे हम स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और न ही वह उत्तेजनापूर्ण अवस्था है जो क्रोध आदि के प्रबल आवेग के समय मन में आती है। रिचर्ड्स की दृष्टि में साहित्य का प्रयोजन एक ऐसी मनःस्थिति उत्पन्न कर देता है जिसमें आवेगों का संतुलन होने के साथ-साथ बाह्य क्रिया के लिए भी तत्परता उत्पन्न हो जाए। वस्तुतः जिसे भारतीय आचार्यों ने काव्यानन्द के आस्वाद की दशा या रसदशा कहा है, उसी की यह मनोवैज्ञानिक व्याख्या है।

आक्षेप –

रिचर्ड्स के काव्य सिद्धांतों की एक आधारभूत मान्यता यह है कि वह सौंदर्य को वस्तु का धर्म नहीं मानते। उनका कहना है कि जब हम कहते हैं कि अमुक वस्तु सुन्दर है तो हम अपनी मनःस्थिति का वस्तु पर प्रक्षेपण करते हैं। इस मान्यता की आलोचना जॉन क्रोव रैन्सम तथा थियोडोर जीन जैसे समीक्षकों ने की है।

इन आलोचकों के अनुसार रिचर्ड्स के मत को स्वीकार करने पर तो काव्यवस्तु का चयन निरर्थक होगा। उनके अनुसार सच्चाई यह है कि सुन्दर वस्तु सौंदर्यभोगी पर अबाध शक्ति से प्रभाव डालती है।

रिचर्ड्स का मानना था कि ‘यह मानना कि कोई कुशल पाठक आनन्द के लिए कविता पढ़ने बैठता है वैसा ही हास्यास्पद है जैसा यह मानना कि कोई गणितज्ञ आनन्द के लिए समीकरण हल करता है।’ रिचर्ड्स की यह मान्यता भी पर्याप्त विवाद का विषय बनी। अनुभव बताता है कि अधिकांशतः पाठक आनंद के लिए ही काव्य पढ़ता है।

रिचर्ड्स की आलोचना का केन्द्र अंतर्मन, विषयी या सहृदय है। उनकी इस मान्यता पर आक्षेप लगाने वालों का कहना है कि यदि हम रिचर्ड्स के सिद्धान्तों को मान लें तो आलोचना की आवश्यकता ही नहीं रहेगी क्योंकि आलोचना का केन्द्र तो प्रधान रूप से कृति ही होती है।

सार रूप में कहा जा सकता है कि रिचर्ड्स ‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त के विरोधी हैं। वे मूल्यवादी समीक्षक हैं। उन्होंने सामान्य जीवन में कविता की उपयोगिता प्रभावित करने का प्रयास किया और कला को जीवनोपयोगी सिद्ध किया; अतः उनके सिद्धांत की महत्ता स्वतः सिद्ध है।