1. मीरा बाई : जीवन–परिचय
    • सगुण भक्ति की कृष्ण भक्ति शाखा की कवयित्री।
    • मेड़तिया के राठौर रत्नसिंह की पुत्री, राव दूदा की पौत्री तथा जोधपुर के संस्थापक राव जोधा की प्रपौत्री।
    • जन्म 1504 ई. (विक्रम संवत 1561)
    • जन्म स्थान – मेड़ता के समीप कुड़की ग्राम।
    • उदयपुर के महाराणा भोजराज की पत्नी।
    • बाल्यकाल से कृष्ण–भक्ति में लीन।
    • विवाह के कुछ वर्ष बाद ही पति का देहावसान।
    • मंदिर में उपस्थित भक्तों और संतों के बीच श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष आनंदमग्न होकर नृत्य करने के कारण लोकनिंदा।
    • राजपरिवार द्वारा अनेक बार विष देने का असफल प्रयास।
    • कुछ समय वृंदावन वास।
    • वृंदावन में मीरा की भेंट चैतन्य मत के शास्त्र प्रणेता, जीव गोस्वामी से हुई।
    • जीवन का अंतिम समय द्वारिका में व्यतीत।
    • द्वारिका में वे रणछोड़ जी के मंदिर में भजन–कीर्तन।
    • निधन–1558 ई.– 1563 ई. के मध्य (विक्रम संवत् 1615 से 1620 के मध्य) द्वारिका।
    • गुरु – रैदास
  2. साहित्यिक – परिचय सामान्यतः मीराँबाई के निम्न 11 ग्रंथों का उल्लेख –
    1. नरसी जी का मायरा
    2. गीतगोविंद की टीका
    3. राग गोविंद
    4. सोरठ के पद
    5. मीराँबाई का मलार
    6. सत्यभामानु रूसणं
    7. गर्वागीत (मीरा की गरबी)
    8. रुक्मिणी मंगल
    9. फुटकर पद
    10. नरसी मेहता की हुण्डी
    11. चरीत (चरित्र)
    • आचार्य शुक्ल ने प्रारंभिक चार कृतियाँ ही प्रामाणिक मानी हैं।
    • मुंशी देवीप्रसाद ने भी प्रारंभिक तीन कृतियों – नरसी जी रो मायरो, गीत गोविंद की टीका, राग गोविंद की ही चर्चा की है।
    • गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने ‘मीराँबाई का मलार’ कृति का उल्लेख किया है।
    • कृष्णलाल मोहनलाल झावेरी ने ‘गर्वागीत’ का और स्वामी आनंदस्वरूप ने ‘राग विहाग’ का उल्लेख किया है।
    • मीराँबाई की प्रामाणिक कृतियों का प्रश्न विवादाग्रस्त।
    • एकमात्र प्रामाणिक कृति ‘मीराँबाई की पदावली’, जिसके अनेक संस्करण विभिन्न संस्थानों से प्रकाशित हो चुके हैं।
  3. साहित्यिक विशेषताएँ
    • दैन्य एवं माधुर्यभाव की भक्ति।
    • कृष्ण को पति के रूप में स्वीकार कर ‘गिरिधर नागर’ के रूप में उनका स्मरण।
    • विरह उनकी भक्ति का प्रमुख अंग।
    • काव्य में जीवन की सहज अभिव्यक्ति।
    • एकनिष्ठ एवं अनन्य प्रेम।
    • भाषा राजस्थानी, ब्रज एवं गुजराती मिश्रित।
    • कहीं–कहीं पंजाबी, खड़ी बोली और पूरबी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग।
    • गेयता एवं रागबद्धता। उनके पद विविध राग–रागिनियोंमें बद्ध।
    • उनके प्रेम में सामान्य मानवीय मर्यादा एवं उनकी प्रेम साधना में स्वकीया का भाव प्रधान।
    • भक्ति का शास्त्रीय रूप भी उनके काव्य में मिलता है।
    • शांत रस की प्रधानता।
    • इनके पदों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है – 1. लीला 2. विनय 3. व्यक्तिगत अनुराग।
    • नाभादास, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि भक्तों ने मीरा का गुणगान किया है।
    • शुक्ल जी ने तुलसी से मीरा के पत्राचार के विषय को प्रामाणिक नहीं माना।
  4. प्रश्न उत्तर
    • प्रश्न 1: ‘रेजां–रेजां भयो करेजो, अंदर देखो धंसि के।’ मीराँ की इस पंक्ति में ‘रेजां–रेजां’ का क्या अर्थ है? उत्तर: c. रेशा–रेशा
    • प्रश्न 2: ‘कुण्डल झलका कपोल अलकां लहराती मीणा तज सरवर ज्यों मकर मिलाह धाई’ मीराँ की इस पंक्ति में ‘मीणा’ किसका उपमान है? उत्तर: b. अलकों का
    • प्रश्न 3: ‘इण चरण गोबरधन धारयाँ गरब मघवा हरण।’ पंक्ति में रेखांकित शब्द का अर्थ है – उत्तर: c. इन्द्र
    • प्रश्न 4: ‘देस्यूँ प्राण अँकोर’ पंक्ति में रेखांकित शब्द का क्या अर्थ है? उत्तर: c. न्योछावर करना
    • प्रश्न 5: ‘ब्रजबणताँ सुखरासी’ में ‘ब्रजबणताँ’ शब्द से किसकी ओर संकेत किया गया है? उत्तर: a. ब्रज की स्त्रियों की ओर।
    • प्रश्न 6 : ‘हे मा बड़ी–बड़ी आँखियन वारो, साँवरो मो तन हेरत हँसिके’ पंक्ति मीरा किसे संबोधित करके कह रही हैं? उत्तर: c. सखी से
    • प्रश्न 7: ‘टेढ़ियाँ कट टेढ़े करि मुरली, टेढ़ियाँ पाग लर लटके।’ पंक्ति में किसका वर्णन किया गया है? उत्तर: a. कृष्ण के त्रिभंगी रूप का।
    • प्रश्न 8: ‘चंचल निपट अटक नहिं मानत, परहथ गये बिकाय’ पंक्ति में किसके बिकने की बात कही गई है? उत्तर: b. मीरा के नेत्रों की।
  5. ​‘प्रीत पुराँतन’ का अभिप्रेत अर्थ है– उत्तर: c. जन्म–जन्मांतर का प्रेम।
  6. ‘रण पड़े तब ही उठि जाऊँ भोर गये उठि आऊँ’ पंक्ति में मीराँ कहाँ जाने तथा लौटकर आने की बात कह रही हैं? उत्तर: c. गिरधर के घर।