आधुनिकता –

आधुनिक शब्द कालवाचक अधुना अवयव से बना है। अधुना का अर्थ – इस समय का, नया अथवा वर्तमान समय का है। आधुनिक शब्द जहाँ काल सापेक्षता को व्यक्त करता है वहीं वह नवीनता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, बौद्धिकता एवं तर्क-वितर्क की प्रवृत्ति का भी सूचक है। वास्तव में आधुनिकता एक यूरोपीय स्थिति एवं अवधारणा है। पारम्परिक बंधनों से मुक्त विशुद्ध वैयक्तिक अस्मिता, आधुनिकता की महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है। आधुनिक मानव तर्क से बाहर की हर चीज़ को नकारता है। चाहे वह धार्मिक हो या पारम्परिक। दूसरे शब्दों में आधुनिक काल में विवेक, तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रधानता थी।

उत्तर आधुनिकतावाद –

उत्तरआधुनिकतावाद एक विचार अथवा प्रवृत्ति है जिसका जन्म मुख्यतः 20वीं शती के उत्तरार्ध में यूरोप में हुआ था। यहाँ से वह पूरी दुनिया में फैला। क्यूबेक सरकार के आग्रह पर फ्रांसीसी विद्वान फ़्रांसुआ ल्योतार ने विभिन्न समाजों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका तथा भाषा और व्यवहार के विषय में कुछ निष्कर्ष निकाले। वे निष्कर्ष ‘द पोस्ट मॉडर्न कंडीशन : ए रिपोर्ट ऑन नॉलेज’ नामक रिपोर्ट में सुरक्षित किए गए। यह रिपोर्ट मूल फ्रांसीसी भाषा में सन 1979 में प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद की रिपोर्ट में जो पोस्ट मॉडर्न पद है, उसी का हिन्दी अनुवाद उत्तर आधुनिक है। इसके प्रचलन के बाद आधुनिक को आधुनिकता में बदलकर उत्तर आधुनिक शब्द बनाया गया। बाद में इस विचारधारा को उत्तर आधुनिकतावाद कहा गया।

उत्तर आधुनिकता का विस्तार भी है और अंतिम बिन्दु भी है। यह आधुनिकता व्यक्ति को विशाल सामाजिक तंत्र का एक पुर्जा न मानकर उसे एक अस्मितापूर्ण अस्तित्व प्रदान करती है। यह विचारों की समझता की जगह विखंडन की बात करती है। आज तकनीक ने सूचनाओं का विस्फोट सा कर दिया है। ज्ञान की जगह आज विकास का आधार विस्फोट बन गया है। आत्योतार और बौद्रीआ को उत्तरआधुनिकता का मौलिक व्याख्याकार कहा जा सकता है। फूको और देरिदा ने आधुनिकता दावों, आधारवाक्यों और पूर्व मान्यताओं पर प्रहार किया। इन दोनों ने विश्वास और तर्क को अमान्य घोषित किया। रोला बार्थ की प्रसिद्ध रचना ‘द डेथ ऑफ द ऑथर’ ने लेखक अर्थात कर्ता के अंत की घोषणा कर दी।

वास्तव में उत्तरआधुनिकता एक भूमंडलीय या वैश्विक स्थिति है। समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, साहित्यशास्त्र तथा सौंदर्यशास्त्र आदि कुछ भी इसके प्रभाव क्षेत्र से बाहर नहीं है। भूमंडलीकरण, तकनीक और उपभोक्तावाद को मुख्य मानने वाली इस विचारधारा में नैतिकता, आदर्श, सत्य, तर्क और विश्वास आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। उत्तरआधुनिकता को स्पष्ट करते हुए डॉ सत्यदेव मिश्र का कहना है कि, उत्तर आधुनिकता पूँजीवादी विकास की नई स्थिति है। नव पूँजीवाद की नाना विकृतियों और नाना रूपों से साक्षात्कार उत्तरआधुनिकता है। इस विचारधारा की प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन निम्नांकित बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है —

उत्तरआधुनिकता की प्रमुख विशेषताएँ

1. अंतवाद –

उत्तरआधुनिकता को अंतवादी विचारधारा कहा जा सकता है। इस विचारधारा के समर्थकों का मानना है कि उत्तरआधुनिकतावाद में सभी मान्यताओं, विश्वासों एवं धारणाओं का अंत हो गया है। 1960 में डेनियल बेल ने विचारधारा के अंत की घोषणा की। उत्तर आधुनिकता वादियों का मानना है कि किसी भी तरह की वैचारिक प्रतिबद्धताएँ अब कोई अर्थ नहीं रखती। इनके अनुसार विचारधारा के साथ-साथ इतिहास, लेखक, तर्क, साहित्य सभी का अंत (समाप्ति) हो गया है। इन मान्यताओं का विरोध बहुत से विद्वानों ने किया है।

2. बहुलतावाद –

बहुलतावाद उत्तरआधुनिकतावादी विचारधारा का दूसरा मुख्य लक्ष्य है। पाठों, व्याख्याओं और अर्थों की बहुलता ने भाषा एवं साहित्य कार्य को बदल कर रख दिया है। उनके अनुसार साहित्य में प्रत्येक रचना कई अर्थों की संभावना व्यक्त करती है। उनका मानना है कि लेखक या रचनाकार जो पाठ लिखता है, जो कृतियाँ प्रस्तुत करता है वे पूर्व निर्धारित नियमों द्वारा संचालित नहीं होतीं। सुपरिचित वर्गों अथवा नियमों को पाठ अथवा कृति पर लागू करके निर्धारित निर्णयों के आधार पर उनकी समालोचना नहीं की जा सकती। उत्तर आधुनिकता वादियों ने साहित्य की शुद्धता को खारिज कर दिया है।

3. उपभोक्तावाद –

उत्तरआधुनिकतावाद में उपभोक्तावाद को एक प्रमुख अवधारणा के रूप में स्वीकार किया गया है। इस उपभोक्तावाद को अनेक विद्वानों ने पश्चिम के आक्रमण के रूप में देखा है जो उपभोग के जरिए अन्य देशों की संस्कृति पर कब्जा जमाना चाहता है। उत्तरआधुनिकतावाद मुक्त बाजार एवं पूँजीवाद के माध्यम से स्वतंत्रता, स्वतंत्र इच्छाओं और नयी पहचान आदि का दावा करता है। सच्चाई तो यह है कि उपभोक्तावाद का उद्देश्य संस्कृति को खंडित करके उस स्थिति में ले जाना है जहाँ किसी तरह की आजादी न रहे।

4. तर्क एवं सत्य का नकार –

उत्तरआधुनिकता वाद में तर्क एवं अंतिम सत्य के लिए कोई स्थान नहीं है। उनका मानना है कि सत्य को जानने के लिए केवल बुद्धि और तर्क ही पर्याप्त नहीं है। सत्य तक पहुँचने का हर व्यक्ति का अपना मार्ग हो सकता है। किसी एक संस्था या व्यक्ति के तर्क को अंतिम क्यों माना जाए? प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है कि वह अपने सत्य का आविष्कार करे। दुनिया को अपने चश्मे से देखे, किसी दूसरे के चश्मे से नहीं। उनके अनुसार मानव-यथार्थ निश्चित, अंतिम और विकल्पहीन नहीं है। वह परिवर्तनशील रहा है और रहेगा। कुछ विद्वान उत्तरआधुनिकता वाद में एक प्रकार की सिद्धांतहीनता, अराजकता एवं पलायन देखते हैं।

5. तकनीक की उपस्थिति –

उत्तरआधुनिकता वाद में तकनीक और उत्पाद दोनों तेजी से बदल रहे हैं। जब तक लोग एक कनक तकनीक को अपनाते हैं, एक उत्पाद का उपभोग शुरू करते हैं तब तक उसकी जगह नया आ जाता है। इस वाद के पास कोई स्थायी मूल्य या आस्था नहीं है। बदलती तकनीक और बदलते उत्पाद इसकी पहचान है। यह वाद हर नयी चीज को पुरानी चीज से बेहतर बताता है। वह ऐसा धुआंधार प्रचार करता है कि नयी चीज के आते ही पुरानी चीज बेकार लगने लगती। वैश्वीकरण, निजीकरण तथा तकनीक की बहुतायत से संस्कृति से पलायन की प्रवृत्ति सक्रिय हो गई और अर्थ (संपत्ति) एवं स्वार्थ पारिवारिक सम्बन्धों पर छा गए। आज पूँजीवाद वस्तुओं को ही नहीं विचारों को भी नये-नये रूप में ओर नये-नये नामों से बेचता है।

6. विकेन्द्रण –

उत्तरआधुनिकता वादियों का मानना है कि अब केन्द्र की जगह उपकेन्द्रों ने ले ली है। इसी को विकेन्द्रण की प्रक्रिया भी कहते हैं। इसके तहत नारीवादी, दलित एवं अल्पसंख्यक आंदोलन आते हैं। विद्वानों का मानना है कि विकेन्द्रीकरण की यह प्रक्रिया भिन्नता को इस स्तर तक बढ़ा देगी कि उससे सामाजिक जीवन की विविधता और साझा संस्कृति नष्ट हो जाएगी। उत्तरआधुनिकता ने पुराने साहित्य के क्लासिकल मानदंड को अस्वीकार कर दिया है। यह विचारधारा महान आख्यानों (Grand Narratives) की समाप्ति की घोषणा करती है। इस विचारधारा का मानना है कि अब तक जो भी साहित्य रचा गया, उसकी रचना अभिजात वर्ग ने की है। इसमें दलित, शोषित, पीड़ित वर्ग का चित्रण नहीं हुआ। उत्तरआधुनिकतावादी हाशिये के समाज से सम्बंधित साहित्य के सृजन पर जोर देते हैं। महावृत्तांतों या महान आख्यानों (रामायण, महाभारत, गीता, बाइबिल आदि) का नकार इसकी महत्वपूर्ण विशेषता है।

7. अतिक्रमण –

उत्तरआधुनिकता में अंतर्विरोध अनिवार्य है। इसकी भाषा अनेकार्थी है। यह परिवार, समाज, विवाह, विज्ञान, धर्म, शिक्षा सभी का अतिक्रमण करती है। किसी भी नियम या सीमाबद्धता को यह स्वीकार नहीं करती। पूर्व प्रचलित नियम या परम्परा को तोड़कर उत्तरआधुनिकता नवीनता को स्थापित करती है। यह आधुनिकता दाम्पत्य मूल्यों, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षणिक, आर्थिक, मानवीय एवं नैतिक मूल्यों का अतिक्रमण करती है। उत्तर आधुनिकता शिक्षा की पूर्व-अवधारणा का भी अतिक्रमण करती है। यह संस्था-आधारित शिक्षा ग्रहण करने की अपेक्षा व्यक्तिगत अनुभव पर जोर देती है। शिक्षा के क्षेत्र में उच्चवर्ग के एकाधिकार एवं आधिपत्य को यह तोड़ती है। उत्तरआधुनिकता की विशेषता है कि यहाँ गद्य और पद्य अलग न रहकर एक दूसरे में घुल-मिल गए हैं। नये-नये विषयों पर उत्तेजक और सनसनीखेज ढंग से लिखना इसकी विशेषता है। प्रचलित मानवतावाद को उत्तर आधुनिकता वाद चुनौती देता है।

8. अति यथार्थवाद –

आधुनिकतावाद में यथार्थ पर बल दिया गया था। बौद्रीआ ने उत्तरआधुनिकता पर विचार करते हुए कहा है कि इसमें यथार्थ की जगह अतियथार्थवाद ने ले ली है।

9. भूमंडलीकरण –

इस वाद के समर्थकों का मानना है कि जब सभी कुछ ग्लोबल हो गया है तो साहित्य कैसे बचा रह सकता है। भूमंडलीकरण के कारण साहित्य में भिन्नताओं का सांस्कृतिक संकट उपस्थित हुआ है जो चिन्ता का विषय है। इस विचारधारा ने वास्तुकला की अंतर्राष्ट्रीय शैली का विरोध किया तथा सम्पूर्णता की धारा को नकार दिया। उत्तर आधुनिकतावाद में असहमतियों का साम्राज्य हो गया जो समाज के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित हुआ है। मूल्यों को नकारती यह विचारधारा अराजकतावादी मानी जाती है।

उत्तरआधुनिकता एवं हिन्दी साहित्य –

हिन्दी में उत्तरआधुनिकता की चर्चा नौवें दशक में शुरू हुई। श्रीकांत वर्मा, निर्मल वर्मा और अशोक वाजपेयी से होता हुआ यह शब्द हिन्दी में आया। सुधीर पचौरी की पुस्तक ‘कविता का अंत’ ने इस वाद को हिन्दी में चर्चा का विषय बनाया। देवेन्द्र इस्सर और रमेश उपाध्याय ने इस बाद पर काफी चर्चा की। मनोहरश्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को उत्तर उपन्यास कहकर विज्ञापित किया गया। श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ को भी इसी श्रेणी में रखा गया। वीरेन्द्र जैन का उपन्यास ‘डूब’ और सुरेन्द्र कुमार का ‘मुझे चाँद चाहिए’ भी इसी श्रेणी में आते हैं। कृष्ण बलदेव वैद, अलका सरावगी के उपन्यास भी उत्तरआधुनिक हैं। उदयप्रकाश की कहानियों, रमेश बक्षी के नाटकों, अशोक वाजपेयी, विनोदकुमार शुक्ल तथा देवीशंकर मिश्र की कविताओं में उत्तरआधुनिकता व्याप्त है। कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी व पुष्पा आदि अनेकानेक रचनाकार उत्तरआधुनिकता से प्रभावित हैं।

उल्लेखनीय है कि उत्तरआधुनिकता को लेकर पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों में बहुत सैद्धांतिक मतभेद नहीं होने के बावजूद कुछ भारतीय विद्वानों ने पश्चिमी विचारों को खारिज कर एक तरह का भारतीय उत्तरआधुनिकता वाद रचने की पहल की है।