घनानंद विश्वनाथप्रसाद मिश्र

घनानंद : महत्वपूर्ण तथ्य

  • रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि।
  • ‘प्रेम की पीर’ के कवि के रूप में विख्यात।
  • जन्म के विषय में विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत—
    • लाला भगवानदीन – 1658 ई.
    • रामचंद्र शुक्ल – 1689 ई.
    • विश्वनाथप्रसाद मिश्र – 1673 ई.
  • घनानंद की मृत्यु 1739 ई. में नादिरशाही आक्रमण के दौरान।
  • बाबू राधाकृष्णदास और ज्ञानवती त्रिवेदी के मतानुसार इनकी मृत्यु दुर्रानी के दूसरे कत्लेआम के दौरान 1760 ई. में।
  • जाति से कायस्थ।
  • वृंदावन में निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित।
  • मुगल बादशाह मोहम्मदशाह रंगीले के मीर मुंशी।
  • ‘मिश्रबंधु विनोद’ में इन्हें वेश्यासक्त (सुजान) बताया गया है।
  • सखीभाव सूचक नाम ‘बहुगुनी’।

रचनाएँ

  • घनानंद की कुछ रचनाओं का सर्वप्रथम प्रकाशन भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने ‘सुन्दरी तिलक’ में कराया।
  • सुजानसागर, विरह लीला, कोकसार, रसकेलिवल्ली, कृपाकांड।
  • 1870 ई. में हरिश्चंद्र द्वारा ‘सुजान शतक’ में घनानंद के 119 कवित्त प्रकाशित।
  • 1897 में जगन्नाथदास रत्नाकर द्वारा ‘सुजानसागर’ का प्रकाशन।
  • आचार्य शुक्ल ने घनानंद को ‘साक्षात् रसमूर्ति’ कहा।
  • विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने कवि घनानंद की रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित कराये –
    1. घनानंद कवित्त—288 सवैये, 214 कवित्त
    2. दूसरे संग्रह में (1945) कवित्त, सवैयों के अतिरिक्त 500 पद, वियोग बेलि, इश्कता, यमुनायश, प्रीति पावस, प्रेम पत्रिका संकलित।
    3. ‘घनानंद ग्रंथावली’ (1952) कवित्त प्रकाशित।
  • 1907 में के.पी. जायसवाल ने ‘वियोग बेलि’ और ‘विरह लीला’ का काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशन कराया।
  • कृष्णभक्ति संबंधी इनका एक बड़ा ग्रंथ छतरपुर के राजकीय पुस्तकालय में है, जिसमें ‘प्रियाप्रसाद’, ‘ब्रजव्यवहार’, ‘वियोगवेली’, ‘कृपाकंद निबंध’, ‘गिरिगाथा’, ‘भावनाप्रकाश’, ‘गोकुलविनोद’, ‘धाम चमत्कार’, ‘कृष्णकौमुदी’, ‘नाम माधुरी’, ‘वृंदावनमुद्रा’, ‘प्रेमपत्रिका’, ‘रसवसंत’ इत्यादि विषय वर्णित हैं। (हिंदी साहित्य का इतिहास – आचार्य शुक्ल)
  • ‘विरहलीला’ ब्रजभाषा में रचित, इसमें फारसी के छंद प्रयुक्त।
  • ‘प्रीतिपावस’ में वर्षा का वर्णन।
  • ‘प्रेम-पत्रिका’ में श्रीकृष्ण के भक्ति व विनय के पदों का वर्णन।
  • ‘कृष्ण कौमुदी’ में कृष्ण लीलाओं का वर्णन।
  • ब्रजनाथ ने घनानंद की रचनाओं का सर्वप्रथम संकलन किया।

आचार्य शुक्ल

i. “इनकी सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ।”

ii. “ये वियोग श्रृंगार के प्रधान मुक्तक कवि हैं। ‘प्रेम की पीर’ ही लेकर इनकी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ। प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबाँदानी का ऐसा दावा रखनेवाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।”

iii. “संयोग का भी कहीं-कहीं बाह्य वर्णन मिलता है, पर उसमें भी प्रधानता बाहरी व्यापारों या चेष्टाओं की नहीं है, हृदय के उल्लास और लीनता की ही है।”

iv. “प्रेमदशा की व्यंजना ही इनका अपना श्रेय है। प्रेम की गूढ़ अंतर्दशा का उद्घाटन जैसा इनमें है वैसा हिंदी के अन्य श्रृंगारी कवि में नहीं।”

v. “इन्होंने संयोग और वियोग दोनों पक्षों को लिया है पर वियोग की अंतर्दशाओं की ओर ही दृष्टि अधिक है।”

vi. “यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि भाषा पर जैसा अचूक अधिकार इनका था वैसा और किसी कवि का नहीं।”

vii. “अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधड़क प्रयोग करनेवाला हिंदी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ।”

viii. “लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और प्रयोग वैचित्र्य की जो छटा इनमें दिखाई पड़ी, खेद है कि फिर पौने दो सौ वर्ष पीछे जाकर आधुनिक काल के उत्तरार्द्ध में अर्थात् वर्तमान काल की नूतन काव्यधारा में ही अभिव्यंजनावाद के प्रभाव से कुछ विदेशी रंग लिए प्रकट हुई।”

हजारीप्रसाद द्विवेदी

“फारसी कविता में जिस एक तरफा प्रेम या अनुभवनिष्ठा रति को बड़े मोहक रूप में वर्णन किया गया है, उसका थोड़ा-सा आभास ठाकुर और घनआनंद जैसे स्वच्छंद प्रेमवादी कवियों की रचनाओं में मिल जाता है।”

बच्चन सिंह

  • i. “घन आनंद प्रेम की यातना के कवि हैं। इसीलिए ब्रजनाथ ने कहा है – “समुझै कबिता घन आनँद की हिय आँखिन नेह की पीर तकी।’ प्रेम का ऐसा आवेग न ठाकुर में है न बोधा में।”
  • ii. “वस्तुतः घन आनंद वियोग के मूर्तिमान कवि हैं।”

Q. ‘अतिसूधो सनेह को मारग है,जहाँ नैनु सयानप बाँक नहीं’ इन पंक्तियों में रचनाकार हैं— उत्तर: घनानंद

Q. “नेही महा, ब्रजभाषा–प्रबीन और सुंदरतानि के भेद को जानै।” विश्वनाथप्रसाद मिश्र के अनुसार घनानंद की यह काव्य–प्रशस्ति किसके द्वारा की गई है? उत्तर: ब्रजनाथ

Q. यह पंक्ति किस कवि की प्रशस्ति में कही गयी है? ‘चाह के रंग में भीज्यों हियो, बिछुरे मिले प्रीतम शांति न मानै।’ उत्तर: घनानंद

Q. ‘स्वच्छन्द प्रवाह के प्रमुख कर्ताओं में रसखान, आलम, ठाकुर, घनानंद, बोधा और द्विजदेव का नाम लिखा जा सकता है। × × × इन सबमें श्रेष्ठ घनानंद ही प्रतीत होते हैं।’ कथन किसका है? उत्तर: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

Q. “लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत। यह काव्य पंक्ति किस कवि द्वारा रचित है? उत्तर: घनानंद

Q. ‘लट लोल कपोल कलोल करै, कल कंठ बनी जलजावलि द्वै।’ पंक्ति में ‘जलजावलि’ शब्द का अर्थ है— उत्तर: मोतियों की माला

Q. ‘छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद, तृषित चखनि लाल, कब धौ दिखाय है’ चटकीलो भेष करें मटकीली भाँति सों ही मुरली अधर धरे लटकत आय हौ।’ पंक्तियों में विप्रलंभ श्रृंगार की कौनसी दशा का वर्णन है? उत्तर: पूर्वराग

Q. ‘हाय! कब आनँद को घन बरसाय हौ’ पंक्ति में व्यंजित भाव है – उत्तर: दर्शन देकर अपनी आनंदपूर्ण दृष्टि से मुझे कब कृतार्थ करोगे।

Q. ‘तब तो छबि पीवत जीवत है, अब सोचन लोचन जात जरे। पंक्ति के विषय में संगत कथन है – उत्तर: संयोग और वियोग की अवस्थाओं के अंतर को स्पष्ट करना।

Q. ‘घनआनंद रसऐन, कहौ कृपानिधि कौन हित। मरत पपीहा नैन, बरसौ पर दरसौ नहीं।’ पंक्ति में किसकी व्यथा का वर्णन है? उत्तर: प्रिय के नेत्रों की।

​Q. ‘आसा–गुन बाँधि कै भरोसो–सिल धरि छाती पूरे पन–सिंधु मैं न बूड़त सकायहौ।’ पंक्ति में प्रयुक्त ‘पन–सिंधु’ शब्द का अर्थ है –

Uttar: प्रेम की प्रतिज्ञा के सागर में।

​Q. ‘बिकच नलिन लखें सकुचि मलिन होति’ पंक्ति संबंधित है –

Uttar: प्रिय के कमल के समान सुंदर मुख से।