कबीर की विचार-चेतना एवं प्रासंगिकता / कबीर की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए / कबीर की प्रासंगिकता पर विचार डालिए

कबीर की प्रासंगिकता : वर्तमान संदर्भ में

कबीर की समसामयिकता आज के संदर्भ में

15वीं शताब्दी के हिन्दी काव्य में भक्तिकाल के सबसे प्रमुख कवि कबीरदास माने जाते हैं। वे भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा (संत काव्यधारा) से संबंधित हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, आडंबर व कुरीतियों का विरोध किया और सरलता से भक्ति का संदेश दिया। कबीर रूढ़िवाद को मानने वाले नहीं थे।


हिन्दी साहित्य का इतिहास

1. आदिकाल (1050–1375)

2. पूर्व मध्यकाल / भक्तिकाल (1375–1700)

•निर्गुण भक्ति

-संत काव्य

कबीर

रैदास

-सूफी

जायसी

कुतुबन

-सगुण भक्ति

-कृष्ण भक्ति काव्य

सूरदास

रसखान

मीराबाई

-राम भक्ति काव्य

तुलसीदास

केशवदास

3. उत्तर मध्यकाल / रीतिकाल (1700–1900)

4. आधुनिक काल (1900–वर्तमान)

कबीर की रचनाएँ

आधुनिक भी, उनकी मध्ययुगीन रचनाएँ सर्वश्रेष्ठ हैं। कबीर के शिष्य धर्मदास ने उनकी रचनाओं को ‘बीजक’ में संकलित किया। जिसके तीन भाग हैं—

साखी

सबद

रमैनी

संत काव्य : उत्पत्ति एवं अर्थ

‘संत’ शब्द संस्कृत के ‘सत्’ धातु से बना है।

• ‘सत्’ + ‘न’ प्रत्यय = संत इसका अर्थ है – ‘सत्य का अनुसरण’।

•संत उसे कहते हैं जिसका मन शांत हो तथा जो ईश्वर में लीन हो।

वर्तमान समय में आर्थिक संकटग्रस्तता एवं सामाजिक असमानता के कारण समस्या उत्पन्न हो रही है। मानवीयता शब्द का क्षय होने लगा। मानवीयता का अर्थ है:-


“वर्तमान के संदर्भ में अतीत को परखना।”

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी —“जो लोग हिन्दू धर्मग्रंथों, पंथों के वचनों में विश्वास रखते हैं, वे कबीर साहब को अपना मार्गदर्शक मानते हैं। यह उचित भी है क्योंकि कबीर साहब से अधिक जोरदार शब्दों में (सत्य) का प्रतिपादन किसी ने नहीं किया।”

1. वर्तमान में नारी की स्थिति व कबीर

“नारी नारायण करे, नारी नर की खान।

नारी नर की उपजे, ध्रुव सकल जहान।।”

यहाँ कबीर नारी को सृष्टि की जननी मानते हैं। उनके बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती। जब हम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ चला रहे हैं और महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तब कबीर की यह दृष्टि याद दिलाती है कि नारी केवल परिवार नहीं, पूरी दुनिया की धुरी है।

2. वर्तमान शिक्षा और कबीर

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय

आज शिक्षा के कई आयाम हैं। हम ऐसी शिक्षा का दम भरते हैं, जो नैतिकता व मानवीय शिक्षा से परे है।आज लाखों छात्र डिग्रियां लेकर भी बेरोजगार हैं। (IMF Report 2023 – भारत में युवा बेरोजगारी दर 23.2% है)

3. धर्म के वर्तमान स्वरूप की प्रासंगिकता

पाथर पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूं पहार

कबीर का यह दोहा आज के समय में भी प्रासंगिक है। किस प्रकार धर्म व तीर्थ स्थान की यात्रा के नाम पर लोग Helicopter व खच्चर का प्रयोग करते हैं। पैदल यात्रा की बजाय सुख सुविधाओं से भगवान के दर्शन उन्हें बिना किसी परिश्रम के करने होते हैं।धार्मिक स्थलों पर ‘करोड़ों’ का चढ़ावा चढ़ता है।

4. बाह्याडंबर व अंधविश्वास का वर्तमान सन्दर्भ —

“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर”

वर्तमान समय में पूजा पाठ, मूर्ति पूजा, अनुष्ठान, जादू-टोना व बलि-प्रथा के नाम पर बाह्याडंबर होते हैं। जो कबीर के समय से आज तक उपस्थित हैं।

5. भ्रष्टाचार का वर्तमान परिप्रेक्ष्य व कबीर

“कबीरा खड़ा बाज़ार में, लिए लुकाठी हाथ
जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ”

वर्तमान समय में सरकारी दफ्तरों, रिश्वतखोरी, राजनीति में धन बल यह सब भ्रष्टाचार का वर्तमान परिप्रेक्ष्य है। केवल स्वरूप बदलता है परंतु भ्रष्टाचार पहले भी होता था, अब भी होता है।Transparency International (2023) में भारत 93वें स्थान पर है।

6. हिंसा व असहिष्णुता पर कबीर दर्शन

“हिंदू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना
आपस में दोउ लरि-लरि मूए, मरम न काहू जाना”

हिंसा धर्म के नाम पर 15वीं शताब्दी में मुगलों व हिंदुओं में होती थी आज भी धर्म व संप्रदाय के नाम पर हिंसा व हत्याएं होती हैं जैसे दिल्ली दंगे (2020), मणिपुर दंगे (2023)।

7. सच्ची भक्ति व सेवा का वर्तमान सन्दर्भ

कबीर ने कहा है कि सच्चा धर्म सेवा है न कि आडंबर

“साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय”

वृद्धआश्रमों में, घरों में प्रतिदिन वृद्धों व अनाथों को खाना खिलाना यह सच्ची सेवा व भक्ति है जो वर्तमान समय में अपेक्षित है व जिसका कबीर ने अपने पदों में संकेत दिया है।

8. पर्यावरण व प्रकृति का आदर —

कबीर का सन्देश है कि परमात्मा व शांति हमें हमारे भीतर व प्रकृति के सन्तुलन में ही मिलेगी न कि बाह्य लालच में।

9. नैतिकता व कबीर दर्शन —

कबीर कहते थे कि नैतिकता व्यक्ति के आचरण से सिद्ध होती है न कि पूजा-पाठ व बाह्याडंबर से। व मनुष्य को अनैतिक तरीके से धन संचित नहीं करना चाहिए क्योंकि मनुष्य का मूल्य उपरोक्त कुछ भी साथ नहीं जाता है। हमें अपनी वाणी पे काबू रखना चाहिए, व वाणी में मिठास होनी चाहिए।

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोइ
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होइ”

10. स्वयं मूल्यांकन / मानवता का सन्देश

कबीर ने मानवता की राह पर चलने की सन्देश लोगों को दिया है जो कि सार्वदेशिक व सार्वकालिक है।

“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय”

निष्कर्ष:-

इस प्रकार निश्चित रूप से कबीर साहित्य आज भी प्रासंगिक है। इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए डॉ त्रिभुवन सिंह की टिप्पणी भी उपादेय प्रतीत होती है

“मध्यकालीन समाज, कबीर के युग का समाज आज भी ऐसी है जिसके कबीर ने अपने समाज में देखा, और जिनसे उनकी चिंता द्वारा प्रभावित थी हुई, रचनाकार की प्रासंगिकता ऐसी स्थिति में बिलकुल सटीक है।”