कबीर का दार्शनिक चिंतन

Kabeer ka darshnik chintan kya h

What is Kabir’s philosophical thought?

भूमिका

  • डॉ० बच्चन सिंह ने लिखा है, ‘हिन्दी भक्ति काव्य का प्रथम क्रान्तिकारी पुरस्कर्ता कबीर हैं।’
  • मुसलमानों के अनुसार कबीर के गुरु का नाम सूफी फकीर शेख तकी था। ये सिकन्दर लोदी के पीर (गुरु) थे।
  • कबीर की वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने ‘बीजक’ नाम से सन् 1464 ई० में किया। बीजक के तीन भाग किए गए हैं –
  • (1) रमैनी
  • (2) सबद
  • (3) साखी।

कबीर की रचनाएँ, छंद और भाषा

  • रमैनी (अर्थ: रामायण) – इसमें चौपाई और दोहा छंद का प्रयोग है। इसकी भाषा ब्रजभाषा और पूर्वी बोली है।
  • सबद (अर्थ: शब्द) – इसमें गेय पद (गाने योग्य पद) का प्रयोग है। इसकी भाषा ब्रजभाषा और पूर्वी बोली है।
  • साखी (अर्थ: साक्षी) – इसमें दोहा छंद का प्रयोग है। इसकी भाषा राजस्थानी और पंजाबी मिली खड़ी बोली है।
  • कबीरदास की भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’, सधुक्कड़ी आदि नाम से अभिहित किया जाता है।
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ कहा है।
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “कबीर की वचनावली की सबसे प्राचीन प्रति सन् 1512 ई० की लिखी है।”

कबीरदास की भाषा के सम्बन्ध में विद्वानों के मत:

श्याम सुन्दर दास के अनुसार कबीर की भाषा पंचमेल खिचड़ी है

रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार कबीर भाषा के डिक्टेटर (तानाशाह) हैं।

  • कबीर की बानियों का सबसे पुराना नमूना ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ में मिलता है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार:

  1. “इसमें कोई सन्देह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को संभाला जो नाथ पंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्ति रस से शून्य शुष्क पड़ता जा रहा था।”
  2. “उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया।”

3.”भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी इसमें सन्देह नहीं है।”

कबीरदास जी के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य

  • मृत्यु स्थल: कबीरदास की मृत्यु मगहर में हुई थी।
  • पारिवारिक विवरण: कबीर की पत्नी का नाम लोई था तथा उनके पुत्र-पुत्री का नाम क्रमश: कमाल तथा कमाली था।
  • पंथ एवं संप्रदाय:
    • सम्प्रदाय: कबीर पंथ
    • प्रवर्तक: कबीर
    • मुख्य केन्द्र: काशी
    • प्रमुख शिष्य: धर्मदास

भारतीय साहित्य में दर्शन भी साथ-साथ चलता आया है। किसी भी साहित्यिक विषय को भाववादी के साथ अवलोकन (परखना, देखना) करना दर्शन कहलाता है। दर्शन आँखों के साथ परस्पर जुड़ा है। कबीर वस्तुओं, भावों तथा मानव जीवन आदि पर दृष्टि रखते हैं।

शब्द, जीव तथा मानव सम्बन्धी विषयों पर चर्चा करना ही दर्शन कहलाता है।

कबीर के समय में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाने वाले संप्रदायों में शैववाद, एकेश्वरवाद, वैष्णववाद, सूफीवाद व शून्यवाद प्रमुख थे। उनकी आवश्यकता समझते हुए इन सबमें कुछ न कुछ अपनाकर अपना मार्ग तैयार किया। उनकी कविता के दार्शनिक स्वरूप के बारे में डॉ. श्याम मनोहर जी ने लिखा

“हमें यह पता चलता है कि निर्गुण भक्ति के निर्गुणवादी कबीरदास ही थे, जिन्होंने एक ओर तो रामानन्द जी के विशिष्ट अद्वैत भारतीय रहस्यवाद की सरल बातों, जटिल एवं दूसरी ओर योगियों और सूफियों के संस्कार प्राप्त किए। वैष्णववाद से उन्होंने अहिंसावाद अधिक किया।”

डॉ. श्यामसुन्दर दास लिखते हैं

“कबीर एक ऐसी भक्ति धारा को तैयार करना चाहते थे, जिसमें सभी बातें या धर्मों के व्यक्ति बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सकें।”

कबीर के दार्शनिक चिंतन को निम्न बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है

1. निर्गुणवादी

कबीर के काव्य में निर्गुण परमात्मा के प्रति समर्पण है।

“जाके मुख माथा नहीं, नाहीं रूप कुरूप।”

कबीर ने निर्गुण ब्रह्म को आत्मा तत्व, ज्योति (हिन्दू व मुसलमान), पिता, प्रियतम, स्वामी आदि कहकर एक ऐसी भक्ति का प्रचार किया जिसमें राम और रहीम, कृष्ण और करीम की एक ईश्वर की उपासना पर जोर दिया गया था।

2. अद्वैत दर्शन का प्रभाव

कबीर की रचनाओं पर अद्वैत एवं वेदांत दर्शन के प्रभाव को व्यापक मात्रा में स्वीकार किया गया है। कबीर ने अद्वैत परम्परा का प्रधान स्थान पर वर्णन किया है

“जल में कुंभ, कुंभ में जल है।”

“घट-घट है अविनाशी, सुनहु तकी तुम शेख।”

3. वेदान्त दर्शन का प्रभाव

कबीर की कविता में दया, करुणा, स्नेह की प्रधानता तथा ईश्वर का निवास जिस रूप में आया है, वह अद्वैतवाद, वेदान्त दर्शन से अधिक प्रभावित है। कबीर जीवात्मा की मुक्ति निश्चय करते हुए लिखते हैं

“दिन भर रोजा रहत हैं, राति हनत हैं गाय।”

4. सूफी दर्शन का प्रभाव

कबीर के यहाँ प्रेम एवं विरह की काव्यिकता और मिलन का दर्शन प्रियतम से मिलता है, वह सूफी दर्शन से आया हुआ प्रतीत होता है। सूफी दर्शन की तरह कबीर भी एकेश्वरवाद, प्रेम-भक्ति, समानता, मानवता, आंतरिक आस्था व आत्म-ज्ञान पर बल देते हैं।

“प्रेमी कहाँ ढूँढ़े रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।”

5. उपयोग व अन्य दर्शन का प्रभाव

कबीर की रचनाओं में सिद्धों और नाथ योगियों की आध्यात्मिक शब्दावली का प्रयोग सर्वत्र किया गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं

“कबीर के लिए जायसी जैसी बहुत-सी बातें निरर्थक थीं। भावना की निर्भीकता करने वाले उपासना के बाहरी विधानों को उन्होंने स्वीकार्यता पर जोर दिया था।”

चिंतन के मूल तत्त्व

•धर्म

•मानवता

•माया

•भजन

• ब्रह्म – सम्पूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण में जो मूल तत्व एक रस होकर व्याप्त है उसे ब्रह्म संज्ञा दी गई है। कबीर का ब्रह्म निर्गुण, निराकार, अजन्मा है। वह अगोचर और सर्वव्यापी है।
“बाबा अगम अगोचर कैसा, बाते कहि समझाईं ऐसा।”


• जीव दर्शन – मानव शरीर जिस तत्व से चलायमान है वह आत्मा है। कबीर जीव को परमात्मा से पृथक नहीं मानते और भारतीय अद्वैतवाद के पोषक हैं। कबीर ने भी परमात्मा की प्राप्ति के लिए एकाकार भाव की आवश्यकता पर बल दिया
“लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥”


• माया का प्रपंच –  भक्ति के मार्ग में माया ही सबसे बड़ी बाधा है। माया के विषय में डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सेना ने लिखा है
“कबीर ने माया को उस परम ब्रह्म की ऐसी रहस्यमयी शक्ति माना है जो विश्वमोहिनी नारी के रूप में प्रकट होकर सम्पूर्ण जीवों को ठगती है एवं अपने जाल में फँसाती रहती है।”
“माया ऐसी मोहिनी जैसे मीठी खाँड़।
सतगुरु की किरपा भई, नाहिं तो करती भाँड़॥”

• जगत दर्शन – यह जगत वस्तुतः मिथ्या है। जगत के विषय में कबीर शंकराचार्य के मायावाद से प्रभावित हैं। “जगत को शंकराचार्य ने रस्सी को साँप के भ्रम के समान माना है।”


निष्कर्ष –  इस प्रकार हम देखते हैं कि कबीर की भक्ति-भावना पर सर्वाधिक प्रभाव शंकर के अद्वैतवाद का है। इसके पश्चात् उनमें रामानुज के विशिष्टाद्वैत का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। नाथों व सिद्धों से उन्होंने रहस्यवादी भावों को व्यक्त करने का ढंग ग्रहण किया है, किन्तु उनके विचारों को ग्रहण नहीं किया। इसी प्रकार उन्होंने सूफियों से अपनी भक्ति में प्रणय-भाव को ग्रहण किया है।