पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के आदि आचार्य, यूनानी दार्शनिक अरस्तू प्लेटो के प्रिय शिष्य थे। प्लेटो अरस्तू को अपने विद्यापीठ का मस्तिष्क कहा करता था। अरस्तू को सिकन्दर का गुरू होने का गौरव भी प्राप्त था। साहित्यशास्त्र पर अरस्तू के २ ग्रन्थ उपलब्ध है –

  1. भाषणशास्त्र (Rhetoric)
  2. काव्यशास्त्र (Poetics)

अरस्तू ने लगभग २५०० वर्ष पूर्व ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात किया। अरस्तू यद्यपि प्लेटो के शिष्य थे तथापि उन्होंने अपनी चिन्तन पद्धति का विकास स्वतंत्र एवं मौलिक ढंग से किया। अरस्तू के अनुसार कविता दो कारणों से उत्पन्न होती है –

  1. अनुकरण की सहज प्रवृत्ति
  2. सामंजस्य और लय की प्रवृत्ति

अरस्तू ने काव्य, चित्र एवं संगीत कलाओं पर एक साथ विचार करते हुए अनुकरण को उनका महत्वपूर्ण और अन्तरंग व्यापार माना। वे मानते थे कि अनुकरण की वृत्ति मानव में बचपन से ही होती है तथा वह अनुकरण के कारण बहुत कुछ सीखता है इसलिए वे अनुकरण को काव्य का पहला और प्रधान कारण मानते है।

यूनानी भाषा में कला के प्रसंग में अनुकरण का व्यवहार अरस्तू का मौलिक प्रयोग नहीं है। अरस्तू से पूर्व प्लेटो इसी आधार पर काव्य का तिरस्कार कर चुके थे। उनका आरोप था कि एक तो भौतिक पदार्थ स्वयं ही सत्य की अनुकृति है और काव्य तो इन भौतिक पदार्थों की भी अनुकृति होता है अतः अनुकरण का भी अनुकरण होने के कारण वह त्याज्य है।

प्लेटो और उनके पूर्ववर्ती आचार्यों ने अनुकरण शब्द का प्रयोग स्थूल अर्थ में हूबहू नकल या यथावत प्रतिकृति के अर्थ में किया है। उनके अनुसार विभिन्न कलाकार अपने-अपने माध्यम उपकरणों से भौतिक जीवन और जगत का अनुकरण करते हैं – चित्रकार रूप और रंग के द्वारा, अभिनेता वेशभूषा, आंगिक चेष्टा, वाणी द्वारा और कवि भाषा के द्वारा। अरस्तू ने इसी प्रचलित शब्द को ग्रहण किया किन्तु उसमें नया अर्थ भर दिया। अनुकरण शब्द का प्रयोग यूनानी शब्द मीमेसिस के पर्याय रूप में किया गया है। हिन्दी में यह अंग्रेजी शब्द इमिटेशन का रूपांतर होकर आया है।

– अरस्तू के गुरू प्लेटो नीतिवादी दार्शनिक थे। वे कला और अनुकरण का घनिष्ठ सम्बन्ध मानते थे। मूलादर्श की विशुद्ध अनुकृति न होने के कारण वे कला को हेय मानते हैं। वे अनुकरण को गंभीर कार्य स्वीकार नहीं करते और उसमें निहित खतरों – अज्ञान, भ्रांति, असावधानी आदि के कारण उसे त्याज्य मानते हैं। वे अनुकरण का समर्थन उसी सीमा तक करते हैं जबकि प्रथम तो वह वस्तु जिसका अनुकरण किया जा रहा है, शुभ हो और दूसरे वह अनुकरण सत्य के समीप हो।

– दूसरी तरफ अरस्तू ने काव्य को सौन्दर्यशास्त्री की दृष्टि से देखा। उसने प्रत्येक कलाकृति को सौन्दर्य की वस्तु माना। यही कारण है कि अनुकरण के सम्बन्ध में अरस्तू का मत प्लेटो के मत से भिन्न है। अरस्तू ने “कला अनुकरण है” इस सूत्र को तो स्वीकार किया किन्तु उसकी नवीन व्याख्या की। अरस्तू ने काव्य को नीतिशास्त्री की दृष्टि से न देखकर, सौन्दर्यशास्त्री की दृष्टि से देखा और इस प्रकार उन्होंने काव्य को दार्शनिक, राजनीतिक तथा नीतिशास्त्र के अत्याचार से मुक्त किया। उन्होंने प्रत्येक कलाकृति को सौन्दर्य की वस्तु माना। अरस्तू का मानना था कि –

“Poetry is an emotional delight, its end is give pleasure”

– अरस्तू के अनुसार – “कला प्रकृति का अनुकरण है”। प्रश्न उठता है कि प्रकृति से अरस्तू का क्या अभिप्राय है? क्या वे जगत के बाह्य, स्थूल और गोचर रूप, पर्वत, नदी, पशु आदि को ही प्रकृति के अन्तर्गत मानता है? स्पष्ट उत्तर है; नहीं। अरस्तू के अनुसार प्रथम तो मानवेतर प्रकृति का अनुकरण करना अनुकरणात्मक कला का काम नहीं। दूसरे कवि या कलाकार प्रकृति की गोचर वस्तुओं का नहीं वरन प्रकृति की ‘सृजन-प्रक्रिया’ का अनुकरण करता है। वह प्रस्तुत वस्तु को ऐसा रूप प्रदान करता है कि इससे उस वस्तु के सार्वभौम और आदर्श रूप का बोध हो जाए। इस प्रकार अनुकरण एक सृजन क्रिया है। एबरक्रोम्बे ने लिखा है कि अरस्तू का तर्क था कि यदि कविता प्रकृति का केवल दर्पण होती तो वह हमें उससे अधिक कुछ नहीं दे सकती थी जो प्रकृति देती है पर तथ्य यह है कि हम कविता का आस्वाद इसलिए करते हैं कि वह हमें वो देती है जो प्रकृति नहीं दे सकती।

– अर्थात् अनुकरण का अर्थ हूबहू नकल नहीं है बल्कि संवेदना, कल्पना, भावना, अनुभूति आदि के प्रयोग के द्वारा अपूर्ण को पूर्ण बनाता है। अनुकरण के द्वारा कलाकार सार्वभौम को पहचान कर उसे सरल और ऐन्द्रिय रूप में पुनरुत्पादित करता है। अर्थात् पुनः प्रस्तुतीकरण ही अनुकरण है। अनुकरण से अरस्तू का अभिप्राय भावनापरक अनुकरण से था न कि यथार्थ वस्तुपरक अंकन से। कलाकार का कर्तव्य है कि वह मूल वस्तु में स्थित प्राकृतिक सत्य को ही प्रेषित करने का प्रयत्न न करे अपितु अपने कला माध्यम के अनुरूप आवश्यक तथा सम्भावित का भी प्रेषण करे। दूसरे शब्दों में निर्माण अनुकरण का अनिवार्य तत्व है।

इस विवेचन के आधार पर हम अरस्तू के द्वारा प्रयुक्त अनुकरण की अवधारणा का अर्थ – ‘अनुकार्य का काव्यात्मक निर्माण’ कर सकते हैं। जिससे कवि न केवल अनुकार्य के यथार्थ स्वरूप की काट-छाँट करता है वरन उसमें काव्यरूप के अनुरूप कल्पना और भावना के रंग भी भरता है।

कविता नकल नहीं है

– अरस्तू के अनुसार कलाकार किसी एक का अनुकरण कर सकता है –

  1. जैसी वे थी या हैं
  2. जैसी वे कही या समझी जाती हैं
  3. और जैसी वे होनी चाहिए

स्पष्ट है कि वे काव्य का विषय प्रकृति के प्रतीयमान, सम्भाव्य और आदर्श रूप को मानते हैं। कवि को स्वतंत्रता है कि वह प्रकृति को उस रूप में चित्रित करे जैसी वह उसकी इन्द्रियों को प्रतीत होती है, जैसी वह भविष्य में प्रतीत हो सकती है अथवा जैसी वह होनी चाहिए। इस चित्रण में निश्चय ही कवि की भावना और कल्पना का योगदान होगा। वह नकलमात्र नहीं होगा। इस प्रकार अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत भावनामय या कल्पनामय अनुकरण को मानकर चलता है शुद्ध प्रतिकृति को नहीं।

अरस्तू ने एक स्थान पर लिखा है कि जिन वस्तुओं का प्रत्यक्ष दर्शन हमें दुख देता है, उनका अनुकरण द्वारा प्रस्तुत रूप हमें आनन्द प्रदान करता है। डरावने जानवर को देखने से हमें भय एवं दुख होता है किन्तु उसका अनुकृत रूप हमें आनन्द देता है। इसका आशय यह हुआ कि अनुकरण द्वारा वास्तविक जीवन में भय और दुख की अनुभूति प्रदान करने वाली वस्तु को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि उससे आनन्द की प्राप्ति होती है तथा भय और दुख का निराकरण हो जाता है। यह अनुकरण निश्चय ही यथार्थ, वस्तुपरक अंकन न होकर भावनात्मक और कल्पनात्मक होगा। इस प्रकार कल्पना और निर्माण अनुकरण के अनिवार्य अंग हैं।

अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत की समीक्षा –

पश्चिमी काव्यशास्त्र के बहुत से ऐसे आलोचक हुए हैं जिन्होंने अनुकरण का विरोध करते हुए उसे असम्भव तथा रचना के सन्दर्भ में अप्रासंगिक माना है। कॉलरिज कल्पना सिद्धांत का विवेचन करते हुए कविता के क्षेत्र में अनुकरण को असम्भव मानते हैं। उनका मानना है कि कवि की कल्पना शक्ति सीमित होने के कारण, ईश्वर की असीम सृष्टि का अनुकरण कर ही नहीं सकती और दूसरी बात यह है कि कल्पना का सहज एवं अनिवार्य गुण निर्माण है अनुकरण नहीं। क्रोचे तो एक कदम और आगे बढ़ जाते हैं और रचना को बाह्य सृष्टि से बिल्कुल काटकर आंतरिक और आत्मिक व्यापार घोषित करते हैं। बाह्य अभिव्यक्ति उनके अनुसार अनिवार्य नहीं है। इस प्रकार अरस्तू और क्रोचे पाश्चात्य आलोचना के दो विरोधी बिन्दु पर स्थित हैं।

– अरस्तू ने अनुकरण सिद्धांत में कवि की अंतश्चेतना को अधिक महत्व नहीं दिया है इसलिए इसकी परिधि संकुचित है। विश्व का गीतिकाव्य जो प्रमाण में बहुत अधिक है, अनुकरण की परिधि में नहीं आ सकता। गीत में नितान्त वैयक्तिक अनुभूतियाँ होती हैं अतः यह अनुकरण सिद्धांत से मेल नहीं खाता।

– इस सिद्धांत पर यह भी आक्षेप लगाया जाता है कि अरस्तू द्वारा प्रयुक्त शब्द मिमेसिस (Mimesis) उपयुक्त नहीं है क्योंकि इस शब्द की अर्थ परिधि में ‘कल्पनात्मक पुनर्निर्माण’, पुनःसर्जन, सर्जना के आनन्द की प्राप्ति आदि अर्थों का अन्तर्भाव (समावेश) नहीं हो सकता।

निस्संदेह आप समीक्षा के क्षेत्र में अनुकरण का महत्व काफी कम हो गया है और अनुकरण के स्थान पर नबोन्मेष (Innovation) को अधिक महत्व दिया जा रहा है। आप अनुकरण सिद्धांत नाटक, कविता, उपन्यास आदि में प्रकृतवाद और यथार्थवाद के रूप में विद्यमान है।