अस्तित्ववाद दर्शन तथा साहित्य के उस आंदोलन का नाम है जो प्रथम विश्वयुद्ध के समय में सामान्यतः पूरे यूरोप तथा मुख्यतः जर्मनी और फ्रांस में आरम्भ हुआ। सोरेन कीर्केगार्ड (1813-1855) तथा फ्रेडरिच नीत्शे अस्तित्ववाद के जन्मदाता माने जाते हैं। कार्ल जेस्पर्श (1883), हेडेगर (1889) तथा गैब्रिएल मार्शेल (1889) ने इसे तकों के आधार पर प्रतिष्ठित किया।

19वीं शताब्दी में विभिन्न प्रकार के आविष्कारों एवं सिद्धान्तों के प्रचलन के कारण मानव जीवन पर वैज्ञानिकता एवं सामाजिकता का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ने लगा। अतः व्यक्ति की वैयक्तिकता एवं स्वतंत्रता उपेक्षित होने लगी। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने मनुष्य को कुछ हद तक बुद्धिवादी बना दिया। जर्मन दार्शनिक नीत्शे की घोषणा – ‘ईश्वर मर गया’ – ने बौद्धिक जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया, यथार्थ का स्वरूप ही बदल गया। पुराने मूल्य विघटित हो गए और मनुष्य ने पाया कि वर्तमान परिस्थितियों में वह असहाय, क्षुद्र और निरर्थक प्राणी है। विज्ञान की प्रगति ने भी निश्चयवादी सिद्धान्त को खोखला सिद्ध कर दिया। प्लैंक के क्वांटम सिद्धान्त और आइंस्टीन के सापेक्षवाद से सिद्ध हो गया कि न तो कोई सार्वभौम सत्य है और न ही शाश्वत नैतिकता। परिणामस्वरूप एक ऐसे वाद का प्रवर्तन हुआ जो व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व देता हुआ जो व्यक्ति की वैध वैज्ञानिकता एवं सामाजिकता का तीव्र विरोध करता है। यह वाद दर्शन एवं कला के क्षेत्र में अस्तित्ववाद कहलाता है।

अस्तित्ववाद ने अपने पूर्ववर्ती दर्शनों और विज्ञान की अमूर्तता पर आक्रमण किया तथा अपने ठोस अनुभवों को व्यक्ति के व्यक्तित्व से सम्बन्धित बुनियादी प्रश्नों के साथ जोड़ा। ये आधारभूत प्रश्न हैं – व्यक्ति की स्वतंत्रता, अकेलापन, दुख, निराशा एवं मृत्युबोध। इसके साथ ही वह सामूहिकवाद एवं निश्चयवाद के विरुद्ध भी खड़ा हुआ। वास्तव में वह उन समस्त विचारों के विरुद्ध है जो मनुष्य को अ-मनुष्य एवं अस्तित्वहीन बनाते हैं। उसकी दृष्टि में मनुष्य स्वतंत्र है। वे न तो वस्तु हैं और न ही मशीन। वह तो एक क्रियात्मक शक्ति है, वह स्वतंत्र निर्णय लेने में समर्थ है और उसके लिए स्वयं जिम्मेदार है। सार्त्र, कीर्केगार्ड आदि पर अस्तित्ववादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। आधुनिक चित्रकला भी इससे कम प्रभावित नहीं हुई। सेज़ा, वान गॉग, पिकासो आदि पर इसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। सातवें दशक में हिंदी साहित्य में अकवि, अकहानी, अनाटक, अनपन्यास आदि की जो चर्चाएँ हुई उनके आधार पर लिखा गया साहित्य आज के अनिश्चय, व्यर्थता, अजनबीयत, अलगाव, अकेलेपन, आत्मपीड़न आदि को ही व्यक्त करता है।

अस्तित्ववाद के प्रवर्तक एवं आधारभूत अवधारणाएँ

अस्तित्ववादी विचारों के मूल प्रवर्तक एक दिनेश विद्वान सोरेन कीर्केगार्ड थे जिन्होंने अपने ग्रंथों की रचना डैनिश भाषा में की थी। अन्य अस्तित्ववादी विचारकों में कार्ल जेस्पर्स (1883 ई.), ज्याँ पॉल सार्त्र (1905) व अलर्बर्ट कामू (1913-1960) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अस्तित्ववादी विचारकों के आस्था की दृष्टि से 2 वर्ग किए जा सकते हैं –

  • आस्तिक अस्तित्ववादी – इस वर्ग में कीर्केगार्ड, यास्पर्स एवं गैब्रिएल मार्शेल के नाम लिये जा सकते हैं।
  • नास्तिक अस्तित्ववादी – इस वर्ग में मार्टिन हेडेगर, सार्त्र, अल्बेयर कामू आदि आते हैं।

आस्तिक अस्तित्ववादियों का मानना था कि जब मनुष्य के अस्तित्व पर संकट आता है तो वह ईश्वर के समक्ष क्षमा याचना करता है और अपनी जान बचाता है। अंततः मनुष्य ईश्वर में आस्था रखने लगता है। कीर्केगार्ड के अनुसार मनुष्य को नैतिक नियमों के अनुसार स्वयं को ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए।

नास्तिक अस्तित्ववादियों ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया। उनपर नीत्शे की घोषणा – ‘ईश्वर मर गया’ का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।

अस्तित्ववादी विचारधारा का आधारभूत शब्द ‘अस्तित्व’ है। इस वाद को मानने वाले विचार अथवा वस्तु (प्रत्यय) की अपेक्षा व्यक्ति के अस्तित्व को अधिक महत्व देते हैं। सार्त्र के अनुसार केवल मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध होता है मनुष्येतर प्राणियों को नहीं। अतः विचार एवं सिद्धान्त गौण हैं, व्यक्ति का अस्तित्व ही प्रमुख है। अस्तित्ववादियों के अनुसार हर व्यक्ति को अपना सिद्धान्त स्वयं खोजना या बनाना चाहिए। दूसरों के द्वारा प्रतिपादित या निर्मित सिद्धान्तों को स्वीकार करना उसके लिए आवश्यक नहीं है। इसी कारण से अस्तित्ववादी के लिए सभी परंपरागत सामाजिक, नैतिक, शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक सिद्धान्त जो कि व्यक्ति के जीवन से सम्बद्ध हैं, अमान्य एवं अव्यावहारिक सिद्ध हो जाते हैं।

अस्तित्ववाद व्यक्ति के अस्तित्व को भी स्वयं व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर मानता है। उसके अनुसार यह कहना कि व्यक्ति का अस्तित्व किसी बाह्यसत्ता एवं परिस्थिति पर अथवा उसके पूर्व कर्म-फल पर आधारित है, उचित नहीं। उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। व्यक्ति अपने हिसाब एवं सुविधा से परिस्थितियों का चुनाव करता है। व्यक्ति क्या बनता है और क्या नहीं इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। इसके लिए किसी अन्य को दोष देना व्यर्थ है। यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि यदि कोई व्यक्ति एक बड़ा अधिकारी बनना चाहता है यदि कहीं क्लर्क बनने को मजबूर होता है तो क्या यह भाग्य नहीं है? इसके उत्तर में अस्तित्ववादियों का कहना है कि यदि तुम जो बनना चाहते हो वह न बन पाओ तो कुछ और बनना क्यों स्वीकार करते हो? वास्तव में हम अपने दुख, संकट या मृत्यु के भय के कारण ही अप्रिय या अवांछित को स्वीकार करने को विवश होते हैं। किन्तु यदि हम किसी भी अप्रिय परिस्थिति से भयभीत न हों, मृत्यु को भी सहर्ष स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत रहें तो फिर हमें कोई झुका नहीं सकता।

अस्तित्ववाद की विशेषताएँ

अस्तित्ववाद की विशेषताओं का अध्ययन निम्नांकित बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है –

1. वेदना का भोग

अस्तित्ववादी के लिए अपना अस्तित्व, स्वतंत्रता एवं निजी लक्ष्य का चुनाव जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण दुख एवं वेदना को भोगना भी है। इस वेदना के भोग के बिना न तो व्यक्ति को अपनी सत्ता का बोध होता है और न ही वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति में सफल हो सकता है। इनका विश्वास है कि आत्म स्वतंत्रता की रक्षा एवं व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्राप्त होने वाला दुख चाहे वह कितना भी दारुण क्यों न हो, दासता एवं परतंत्रता से प्राप्त सुख से हजार गुना अच्छा होता है।

2. धर्म और अध्यात्म के प्रति दृष्टिकोण

निस्संदेह अस्तित्ववादी धर्म और अध्यात्म का विरोध करते हैं। वस्तुतः उनका विरोध ईश्वर से कम एवं धार्मिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों से अधिक है क्योंकि ये ही वे तत्व हैं जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित एवं नियमित करते हैं। अस्तित्ववादियों का मानना है कि यदि ईश्वर मनुष्य के व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप न करे तो उसे भी बने रहने की छूट देने के लिए अस्तित्ववादी तैयार हैं। सार्त्र ने एक स्थान पर लिखा था “अगर ईश्वर है भी तो उससे मनुष्य का कुछ बनता बिगड़ता नहीं“।

3. ज्ञान-विज्ञान के प्रति दृष्टिकोण

ईश्वर धर्म और अध्यात्म की ही भाँति ज्ञान-विज्ञान के प्रति भी अस्तित्ववादियों का दृष्टिकोण विरोधमूलक है। हेडेगर का मानना है कि प्राकृतिक जगत के बौद्धिक ज्ञान की अपेक्षा व्यक्ति के आंतरिक अनुभवों का अधिक महत्व है, अस्तित्ववादी ज्ञान-विज्ञान को व्यक्ति के लिए अनावश्यक मानता है। उसकी दृष्टि में इतिहास, भूगोल, समाज-शास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान आदि की जानकारी का कोई महत्व नहीं है क्योंकि इनसे व्यक्ति के अस्तित्वबोध में कोई सहायता नहीं मिलती। वैज्ञानिक नियमों के विरोध का एक और कारण यह भी है कि अस्तित्ववादी प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता में विश्वास रखता है अतः उस पर समूहों के सामान्य निष्कर्षों को लागू करना अन्याय है। विज्ञान के सामान्य नियमों या निष्कर्षों को अस्तित्ववादी वैयक्तिकता का विरोधी मानते हैं। ऐसी स्थिति में दर्शन और विज्ञान की प्रचलित अध्ययन पद्धतियाँ अस्तित्ववादी की दृष्टि में बेकार हैं।

4. मानव-मूल्य एवं जीवन दर्शन

परंपरागत विचारों के अनुसार सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य दूसरों को सुख पहुँचाना होता है, अतः व्यक्ति एवं समाज को सुखी बनाने का प्रयास करना महान पुरुषों का लक्ष्य रहा है। अस्तित्ववादी ऐसे किसी भी लक्ष्य अथवा मूल्यों को स्वीकार नहीं करता। उसके विचार में सुख की लालसा या धारणा मिथ्या है। मनुष्य कितना भी नैतिक एवं मानव-मूल्यों को समर्पित क्यों न हो जाए वह कभी पूर्णतः सुखी नहीं हो सकता। वस्तुतः पूर्ण संतुष्टि एवं सुखी होना मानव की प्रकृति में ही नहीं है। या तो मनुष्य मनुष्यता त्यागे या फिर सुखी होने की आशा को। अतः मानव जाति की सेवा, समाज-सुधार आदि में इनका कोई विश्वास नहीं है।

5. पीड़ा की महत्ता

अस्तित्ववादी दुख एवं अवसाद को जीवन के अनिवार्य एवं काव्य तत्वों के रूप में स्वीकार करता है। उसका मानना है कि वेदना जितनी गहरी होगी अस्तित्व का बोध भी उतना ही गंभीर होगा।

6. क्षण का महत्व

अस्तित्ववादी के लिए प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण होता है। उसका सम्पूर्ण वर्तमान सिकुड़कर क्षण में सिमट गया है। वह जीवन के प्रत्येक अद्वितीय, कड़वे-मीठे क्षण को सम्पूर्णता में जी लेना चाहता है, आत्मसात कर लेना चाहता है।

7. अस्तित्ववाद पर आक्षेप

अस्तित्ववादियों की वैयक्तिकता, असीमित स्वतंत्रता, धर्म, संस्कृति, मूल्यों का नकार, उन्मुक्त भोग, आत्मपीड़न असीमित अधिकार भावना आदि इस सिद्धान्त की सीमाएँ हैं। मानवता के समक्ष यह सिद्धान्त कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं करता।