‘अंधेरे में’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं? स्पष्ट करें।
‘अंधेरे में’ कविता का नायक के द्वंद्व को सोदाहरण स्पष्ट करें।
भूमिका
गजानन माधव मुक्तिबोध स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि, कहानीकार और समीक्षक माने जाते हैं। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलाकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। इन्होंने ‘वसुधा’ व ‘नया खून’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। इन्होंने अध्यापन के अलावा सूचना एवं प्रसारण विभाग में भी कार्य किया है। प्रथम तार सप्तक (1943) में मुक्तिबोध भी शामिल थे।
साहित्य जगत में मुक्तिबोध अपनी लंबी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। ‘अंधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘एक स्वप्न कथा’, ‘भूल-गलती’, और ‘मैं तुम लोगों से दूर हूँ’ उनकी लोकप्रिय कविताएँ मानी जाती हैं। हालाँकि उनकी छोटी सी जीवन यात्रा में उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह प्रकाशित न हो सका। इनकी पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन इन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
काव्य – संग्रह
चाँद का मुँह टेढ़ा है
भूरि-भूरि खाक-धूल
प्रतिनिधि कविताएँ
अपनी काव्य प्रेरणा के संबंध में उन्होंने स्वयं लिखा है, “मेरे बाल-मन की पहली भूख सौन्दर्य और दूसरी विश्व मानव का सुख-दुख; इन दोनों का संघर्ष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी।।”
मालवा के प्राकृतिक सौन्दर्य, सामान्य जन के सुख-दुख, टॉल्स्टॉय की लोक-मंगल भावना तथा मार्क्सवाद ने उनकी काव्य-चेतना को प्रभावित किया। उनकी काव्य संवेदना पर अस्तित्ववाद का भी प्रभाव दृष्टिगत होता है। इनकी काव्य-चेतना का मूलाधार है – मानवीय संवेदना।
‘अंधेरे में’ गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित एक लम्बी कविता है। सृजनकाल में इस कविता का शीर्षक ‘आशंका के द्वीप : अंधेरे में’ था, पर बाद में ‘आशंका के द्वीप’ हटाकर केवल ‘अंधेरे में’ शीर्षक ही रहने दिया। यह कविता आरम्भ से अन्त तक कथात्मक स्तर पर चलती है। यह 8 अंशों / दृश्य में विभाजित है।
इस कविता के कथ्य के संदर्भ में ‘भूमिका’ शीर्षक के अन्दर शमशेर सिंह बहादुर सिंह ने लिखा है –
“मुक्तिबोध शुक्रवारी में तिलक की मूर्ति के पास ही गली में रहते थे। एम्प्रेस मिल के मजदूरों पर जब गोली चली तो रिपोर्टर की हैसियत से वे घटनास्थल पर मौजूद थे। उन्होंने सिरों का फूटना और खून का बहना अपनी आँखों से देखा था। ‘अंधेरे में’ शीर्षक उनकी सशक्त और मार्मिक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे सन्दर्भ अपने अंदर समेटे हुए है। … यह कविता देश के आधुनिक जन-इतिहास का, स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है। इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है। देश की धरती, हवा, आकाश, देश की सच्ची मुक्ति आकांक्षी नस-नस इसमें कड़क रही है।।”
‘अंधेरे में’ कविता मुक्तिबोध के काव्य संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में संकलित 28 कविताओं में सबसे बड़ी कविता है। मुक्तिबोध मूल रूप से फैंटेसी के कवि हैं। ‘अंधेरे में’ इसका ज्वलंत प्रमाण है। यह कविता अंधेरे से आरम्भ होती है पर अन्त गैलरी में फैले सुनहले रवि भोर से होता है। कविता के आरम्भ में कवि ने देश और देशवासियों के प्रति अपनी चिन्ताओं को व्यक्त किया है।
अँधेरे बंद कमरे में अर्थात् अंवर्मन में कोई आशंका उठने के कारण कवि लगातार इधर-उधर चक्कर लगाता रहा। अपने अलक्षित पैरों की चेष्टा करते हैं पर दिखाई नहीं देता। कवि कहते हैं –
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीत से
फुले हुए प्लस्तर
झरती है चूने भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ
झरती है चूने भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह
खुद-ब-खुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है।
समाज में व्याप्त विषमता से आहत
चिंतन के गहन क्षणों में कवि ने अपने ही द्वन्द्व उसकी चेतना के आकाश पर मँडराने लगते हैं। आप अपने आस-पास चलने वाली हड़ताली वातावरण, हड़ताली श्रमिकों पर होने वाले अत्याचार, खून-खराबा और इन सबके कारण बनने वाले वातावरण की गंभीर रहस्यमयता का अपनी अंतश्चेतना में पुनरीक्षण करते हैं। वे मानते हैं कि मानव की दिव्यता और विराटता को जागृति की आवश्यकता है। उसके जागरण में ही मानवता का भविष्य सुरक्षित रह सकता है। कवि कहता है कि कोई अज्ञात हृदय के द्वार को चेतावनी दे-देकर खुलवाना चाहता है।
विचार उमड़-घुमड़कर प्रकट हो जाने के लिए भग्न द्वारों से उस पार तीव्रता से बुलबुला रहे हैं। कोई अंतश्चेतना मेरी ही बातों को मुझे बताने के लिए मन के द्वार बजा-बजाकर अपनी ओर बुला रही है। अंतश्चेतना के द्वन्द्वों समाज में व्याप्त विषमता से आहत होकर कवि कहता है –
कमजोर घुटनों को बार-बार मसल
लड़खड़ाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाजा खोलने
चेहरे के रंगहीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से।
–
जंग खायी, जमी हुई, जबरन
छिटकनी ढीली कर जोर लगा,
दरवाजा खोलता, साँकता हूँ बाहर…
पत्रकारों की दशा का वर्णन
कहीं भी कोई घटना-दुर्घटना हो सकती है, कवि इस वेदना से ग्रस्त है। चिन्ता के इस भयावह क्षणों में उन्हें प्रसिद्ध रूसी लेखक टॉल्स्टाय की याद आ जाती है। कवि सोचता है कि उनका मन भी इसी तरह अशान्त हुआ होगा। इस सोच से कवि की छटपटाहट व्यक्त होती है।
पत्रकार को लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है, पर उस समय के पत्रकार शासक नेताओं के पिछलग्गू बन गए थे। वे नेताओं के छोटे-छोटे कार्यों को जनता के समक्ष बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते थे। इससे सच्चाई जनता के समक्ष नहीं आ पाती थी। श्रमिकों की बड़ी-बड़ी हड़तालों का पत्रकार लोग उपहास करते थे और पूँजीपतियों की जी-हुज़ूरी पर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते थे।
भयावह भवनों के विवरणों में छिप गये
समाचारपत्रों के पतियों के मुख-स्थूल
पूँजीपतियों का शासन
पूँजीपति प्रत्येक उस व्यक्ति के दुश्मन बन जाते हैं जो उनके विरुद्ध आवाज उठाते हैं। कारखानों में श्रमिकों पर जब बहुत अत्याचार होते हैं तो उनके विरुद्ध आवाज उठाते हैं। पास हड़ताल करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रह जाता है। जब श्रमिक हड़ताल करते हैं और मिल मालिक के विरोध में जुलूस निकालते हैं, तब ये मिल-मालिक अपने धन के बल पर पुलिस तथा गुंडों को उनके पीछे लगाकर उनकी मार-काट करवा देते हैं। इस प्रकार उनका आन्दोलन बिखर जाता है और वे पुनः काम करने पर मजबूर हो जाते हैं। इस प्रकार देश में चारों ओर निराशा का वातावरण व्याप्त है।
रक्तपायी वर्ग से अभिनाल-बद्ध से सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।
स्वतंत्रता का अंधकार में डूबना
एकाएक उठ पड़ा आत्मा का पिंजर
मूर्ति की ठठरी
नाक का चश्मा, हाथ में डंडा,
कांधे पर बोर, बाँह में बच्चा,
आश्चर्य ! अद्भुत ! यह शिशु कैसे !
यह बच्चा वास्तव में स्वतंत्रता रूपी बच्चा है। दिव्य पुरुष ने कवि को वह बच्चा सौंपते हुए कहा कि इसे अपने पास संभालकर सुरक्षित रखना। उसकी सुरक्षा का दायित्व देशवासियों को सौंपकर गांधीजी स्वयं तिरोहित हो गए। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के दिन व्यतीत होते जा रहे हैं। हमारी स्वतंत्रता का शिशु अब अंधकार में डूबता जा रहा है।
गाँधी विरोधी विचारधारा का सक्रिय हो उठना
लोग अहिंसा को भूलकर हिंसा पर उतारू हो गए हैं। इन्हीं लोगों ने महात्मा गाँधी की हत्या कर दी है। जो लोग गाँधी जी के प्रति श्रद्धा-सम्मान प्रकट करने और उनके मिशन को पूरा करने के लिए सहयोगियों को एकत्र करने की बात सोचते थे, उन्हें राजद्रोह का आरोप लगाकर शासन के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बन्दीगृह से जब इन लोगों को छोड़ा गया तब वे हड्डियों का ढाँचा बन गए थे। बन्धनमुक्त होने पर भी समाज की विचारधारा में कोई परिवर्तन नहीं दिखा। वे अब भी परस्पर मार-काट कर रहे थे। एक-दूसरे का गला काट रहे थे। स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए देशवासियों का बलिदान ये लोग भूल चुके थे।
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब
बुद्धिजीवी वर्ग का नपुंसकता में मौन होना
कहीं आग लग रही है, कहीं गोलियाँ चल रही हैं, पर सभी बुद्धिवादी लोग मौन रहकर तमाशा देख रहे हैं। बड़े-बड़े साहित्यकार भी चुप हैं। बड़े-बड़े कवियों की वाणी भी मौन है। विभिन्न प्रकार के शोषक वर्गों के साथ जन्मजात रूप में बंधे हुए बुद्धिवादी वर्गों के लोग नपुंसक बनकर भोग-विलास के जालों में उलझ रहे हैं।
भयावह भवनों के विवरणों में छिप गए
समाचारपत्रों के पतियों के मुख-स्थूल
गढ़े जाते संवाद, गढ़ी जाती समीक्षा
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-भर उर पूर
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास
किराये के विचारों का उद्भास
चेहरे वे मेरे जाने-
बूझे से लगते,
उनके चित्र समाचार
पत्रों में छिपे थे,उनके लेख देखे थे,
सारा बुद्धिवादी वर्ग खरीदे हुए गुलाम-सा बनकर रह गया है। इसलिए अपने आकाओं को प्रसन्न करने के लिए वह अपने वास्तविक नहीं बल्कि दाम लेकर उनके अनुसार विचारों को अभिव्यक्त कर रहा है। इस प्रकार सारा वातावरण गर्म हो रहा है।
खूनी / लाल क्रांति का वातावरण
चारों ओर खूनी क्रांति का वातावरण छा रहा है। अयाचित को जलाकर राख कर देने वाली चिंगारियाँ चारों ओर सुलग रही हैं। उलझाने वाले पुराने विचार और यातनादायक रूढ़ियाँ क्रांति की लाल आग में जलकर राख हुई जा रही हैं। युगों-युगों की मानवी यातना जलकर राख हो रही है। लाल क्रांति की विचारधारा ने सभी क्रमागत दुख-दर्दों और चिंताओं को बहाकर नष्ट कर दिया है।
गेरूआ मौसम उड़ते हैं अंगार
जंगल जल रहे जिंदगी के सब
निष्कर्ष
शमशेर सिंह बहादुर सिंह का यह कथन उचित जान पड़ता है कि ‘अंधेरे में’ कविता देश के आधुनिक-जन-इतिहास का एक दहकता, इस्पाती दस्तावेज है, इसमें अजब और अद्भुत रूप से व्यक्ति और जन का एकीकरण है। यह कविता कवि की अनेक चिंताओं को व्यक्त करती है और स्वप्न के रूप में एक ऐसे देश की तस्वीर दिखाती है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सुखी होगा, अपने कर्तव्यों और अधिकारों से परिचित होगा।
