Q. “कामायनी आधुनिक मानव का दर्पण है,” तर्कसंगत उत्तर दें।
कामायनी की काव्यगत विशेषताओं का वर्णन करें।
‘कामायनी’ आधुनिक युग का प्रतिनिधि महाकाव्य है। सिद्ध कीजिए।
‘कामायनी’ छायावाद युग की सर्वश्रेष्ठ कृति है। सिद्ध कीजिए।
“कामायनी में मानवतावाद की उदात्त चेतना को व्यक्त किया गया है।”
जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। द्विवेदी युग की स्थूल और इतिवृत्त-त्मक कविता को सूक्ष्मभाव-सौन्दर्य, रमणीयता एवं माधुर्य से परिपूर्ण कर प्रसाद जी ने नवयुग का सूत्रपात किया। वे छायावाद के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ ही युग-प्रवर्तक नाटककार, निबन्धकार, उपन्यासकार एवं कहानीकार के रूप में भी जाने जाते हैं। इनका जन्म काशी में सन् 1889 में हुआ।
डॉ० द्वारिकाप्रसाद सक्सेना के शब्दों में –
“प्रसाद छायावाद की काव्यधारा के प्रवर्तक ही नहीं हैं, अपितु उसकी प्रौढ़ता, शालीनता, गुरुता, गम्भीरता के भी पोषक कवि हैं। प्रसाद की कविताओं में प्रकृति के सचेतन रूप के साथ-साथ मानव के लौकिक एवं पारलौकिक जीवन की जैसी रमणीक झांकी अंकित है, वैसी किसी अन्य कवि की कविता में दृष्टिगोचर नहीं होती।”
जयशंकर प्रसाद काव्य रचनाएँ
कामायनी (1935)
आँसू
लहर
झरना (1918)
कानन-कुसुम
प्रेम पथिक
अरुण यह मधुमय देश हमारा
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से
आह! वेदना मिली विदाई
बीती विभावरी जाग री
दो बूँदें
प्रयाणगीत
तुम कनक किरन
भारत महिमा
सब जीवन बीता जाता है
प्रसाद जी के महाकाव्य “कामायनी” में मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा है, लेकिन सूक्ष्म रूप से यह कथा मानव-जीवन के अनेक मनोवैज्ञानिक पहलुओं के लिए मानव विकास की कथा हो गई है। इसमें मनु “मन” के, श्रद्धा “हृदय” की और इड़ा “बुद्धि” की प्रतीक है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया के सामंजस्य द्वारा ही आनन्द की प्राप्ति होती है। इसके कथानक का सूत्र ऋग्वेद, पुराणों तथा ब्राह्मणों में पाया जाता है।
इस काव्य की महान घटनाएँ – देव सृष्टि के विनाश के पश्चात् मनु का प्रकृति पर विजय पाना, इड़ा के सहयोग से नागरिक सभ्यता को विकसित करना आदि हैं।
इसमें 15 सर्ग हैं।
डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में,
“कामायनी की प्रमुख घटना है मनु की मानसरोवर यात्रा, जिसका प्रतीकार्थ है मानव मन की आनन्द साधना। तद्नुसार ‘कामायनी’ में निहित जीवन दर्शन का चरम साध्य हुआ आनन्द और कामायनी का मूल प्रतिपाद्य हुआ आनन्दवाद।”
“कामायनी में आनन्द के जिस रूप की प्रतिष्ठा है, वह स्पष्टतः आत्मस्थ है। वह अन्तर्मुख आनन्द या आत्मानन्द है।”
जयशंकर प्रसाद जी ने साहित्य ही नहीं अपितु इतिहास, समाज, धर्म, दर्शन, संस्कृति तथा मानवता को गौरवान्वित किया है। प्रसाद के बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व की अमर कृति “कामायनी” विश्व-साहित्य की अमूल्य कृति है। इन्होंने रचना ब्रजभाषा में आरम्भ की और धीरे-धीरे खड़ी बोली के मूर्धन्य कवियों में उनकी गणना की जाने लगी। इनकी रचना “कामायनी”, छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण है।
सुमित्रानंदन पंत इसे “हिंदी में ताजमहल के समान” मानते हैं।
इनको कामायनी पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। (1938)
सन् 1954 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया।
आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने लिखा है –
“भारत के गिने-चुने आधुनिक श्रेष्ठ साहित्यकारों में प्रसाद जी का पद सर्वदा ऊँचा है।”
महादेवी वर्मा ने लिखा है –
“प्रसाद जी की कामायनी महाकाव्यों के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है, क्योंकि वह ऐसा महाकाव्य है जो ऐतिहासिक धरातल पर प्रतिष्ठित है और सांकेतिक अर्थ में मानव विकास का रूपक भी कहा जा सकता है। कल्याण भावना की प्रेरणा और समन्वयात्मक दृष्टिकोण के कारण वह भारतीय परंपरा के अनुरूप है।”
जयशंकर प्रसाद ने शुरुआत में कलाधर उपनाम से लिखा था और उनकी प्रारंभिक रचनाएँ ब्रज भाषा में थी। इनका पहला कविता संग्रह चित्राधार नाम से आया।
आदर्शवादी तथा अध्यात्मवादी भारत में पाश्चात्य शासन और शिक्षा विज्ञान के साथ-साथ यथार्थवादी भौतिकवादी वृत्ति भी विकसित हुई। विकसित जड़-बुद्धिवाद के श्रद्धा और विश्वास गौण हो गये, सामाजिक चिन्तन में संतुलन न रहा, ज्ञान और कर्म का मानव की कामना से सम्बन्ध विच्छेद हो गया। अतीत गौरव की अपेक्षा, परकीय सभ्यता का मोहजाल, कर्मठता और त्याग भावना की अपेक्षा परमुखापेक्षी वृत्ति बढ़ने लगी। समाज और परिवार के प्रत्येक क्षेत्र में स्वार्थ, शोषण, वासना तथा उच्छृंखलता की प्रधानता के साथ-साथ समाज में विषमता का बहुमुखी विस्तार होने लगा। इस संक्रमण काल में कामायनी के माध्यम से प्रसाद ने जीवन की समरसता का सन्देश दिया। कामायनी का प्रतिपाद्य समरसता है, जो व्यक्ति, राष्ट्र, समाज अथवा समग्र जीवन में स्थिरता, आत्मगौरव तथा शान्ति प्रदान कर सकता है।
1. मानव-जीवन तथा संस्कृति का उत्कर्ष :
कवि ने मानव-जीवन तथा संस्कृति का उत्कर्ष प्रतिष्ठित किया है। देव संस्कृति अपने एकांगी दृष्टिकोण से नष्ट हुई, उसी की भस्मराशि पर मानवता का विकास दिखाते हुए कवि ने मानव जीवन को अनमोल भावधाम तीर्थ बना दिया है। जीवन के प्रति मोह अथवा झलक पैदा करना भी आधुनिक जीवन के लिए सर्वथा उपयुक्त है। इस संघर्षमय जीवन में समाज से विलग होकर किसी प्रकार की साधना उचित नहीं हो सकती; एकांगी चिन्तन से निराशा ही उत्पन्न हो सकती है। ऐश्वर्य तथा भोग प्रधान देश की सभ्यता के नष्ट होने पर मनु की चिन्ता, उसे अकर्मण्य, निराश तथा हतोत्साहित ही कर देती है, वह ‘मृत्युमयी चिर निद्रा तेरा अंक हिमानी या शीतलता’ कहकर अपने को समाप्त कर देना चाहता है। ऐसी स्थिति में कवि ने सौन्दर्य, प्रेम, त्याग, सेवा तथा समर्पण की साक्षात् प्रतिमा श्रद्धा को उपस्थित करके मनु के मन में जीवन शक्ति को उत्पन्न करने का सफल प्रयास किया है। प्रेम, जो श्रद्धामय है, वह जीवन का आधार बनता है, जीवन विस्तार करता है। समस्त सृष्टि-विस्तार की मूलशक्ति ‘प्रेमकला’ के साथ ही महाकाव्य के चिन्ता-विजड़ित कथानक में गतिशीलता का प्रादुर्भाव हुआ है। काम ने श्रद्धा का परिचय निम्न शब्दों में दिया है –
“यह लीला जिसकी विकस चली, वह मूल शक्ति थी प्रेम कला,
जिसका सन्देश सुनाने की, संस्कृति में आयी यह अमला।”
2. काम का वास्तविक ज्ञान :
‘कामायनी’ का एक अन्य मुख्य प्रतिपाद्य है – काम। वर्तमान युग में काम का विकृत, अपूर्ण तथा अनुचित अर्थ ही लिया जा रहा है। आज तो पुरुष की दृष्टि में स्त्री कामिनी तथा स्त्री की दृष्टि में पुरुष कामी बनकर एक-दूसरे से घृणा कर रहे हैं। काम के वास्तविक ज्ञान से रहित, केवल पश्चिम के दिये बाह्य ज्ञान तक सीमित रहकर, पश्चिमी सभ्यता के मोहाकर्षण में स्त्री-पुरुष दोनों अपने स्वरूप को भूल रहे हैं।
काम अशरीरी है, उस पर विजय पाई जा चुकी है, यह लज्जा, घृणा या पाप का विषय नहीं, अपितु समस्त विश्व का मूल है। काम को शरीरी मानने वाली देव-संस्कृति नष्ट हो गई, काम को मर्यादित तथा समुचित रूप में समझने वाले मनु की सृष्टि विकसित हुई। काम का महत्व प्रतिपादित करते हुए कामायनी में कवि ने गीता, शैवागमों तथा पौराणिक विश्वासों का चिन्तन भी समाविष्ट किया है –
क) काम से झिझक रहे हो आज भविष्यत् से बनकर अनजान।।
ख) काम मंगल से मण्डित श्रेय, सर्ग इच्छा का परिणाम।।
प्रसाद जी इस बात पर बल देते हैं कि पूर्ण जीवन का केन्द्र विन्दु काम ही वास्तव में दया, माया, ममता, समर्पण, सेवा आदि उदात्त वृत्तियों में समन्वित है। शास्त्र सम्मत व मर्यादित काम जीवन को जीवन प्रदान करता है। उसकी मर्यादा के लिए लज्जा सर्ग की अवधारणा हुई है।
3. नारी गौरव की स्थापना :
प्रसाद जी ने नारी गौरव की स्थापना की है। वर्तमान जीवन में दुःखों तथा विषमताओं का कारण है नारी की उपेक्षा। प्रसाद की देवसेना, मल्लिका, मालविका तथा ध्रुवस्वामिनी आदि नारी पात्रों में नारीत्व का उच्चतम रूप प्राप्त होता है। प्रसाद-साहित्य तो नारी गौरव से भरपूर है। श्रद्धा अथवा विश्वासमयी नारी न केवल पुरुष को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है अपितु समय-समय पर उसकी उच्छृंखलता को मर्यादित भी करती है।
मनु अपनी वासनाओं में भटक गए, श्रद्धा “सुन जा रूक रे ओ निर्भोही” की पुकार लगाती रही, किन्तु ईर्ष्या और काम से प्रेरित मनु रूक न पाया। तभी काम आकर मनु को फटकारता है –
“तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता थी नारी की।
समरसता है सम्बन्ध बनी, अधिकार और अधिकारी की॥”
ममतामयी माँ के रूप में श्रद्धा का चित्रण, अपनी सन्तान के लिए घर का प्रबन्ध करने में संलग्न गृहिणी, पति से विलग होकर भी अपने पुत्र का पालन करने में रतचित्त और आवश्यकता आने पर लोकहित के लिए अपना पुत्र भी इड़ा को समर्पित कर देने वाली श्रद्धा वास्तव में समाज की श्रद्धा का पात्र बन जाती है। अकेले श्रद्धा का चित्रण करके ही प्रसाद जी ने नारी-गौरव का महान आदर्श उपस्थित कर दिया है। इसके अतिरिक्त कामुकता एवं वासना में उच्छृंखल मनु से इड़ा आत्मरक्षा, मनु से युद्ध तथा उसे पराजित दिखाकर भी प्रसाद जी ने नारी-गौरव की प्रतिष्ठा ही की है।
4. अधिकार की उपेक्षा कर्तव्य की प्रमुखता :
प्रसाद जी ने व्यक्ति और समाज को अन्योन्याश्रित माना है। व्यक्ति और समाज में सरलता का एकमात्र आधार है अधिकार की उपेक्षा कर्तव्य की प्रमुखता। इसीलिए कामायनी में विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक मत वादों का चित्रण भी किया गया है। प्रसाद जी के मत में शासक प्रजा का सेवक, रक्षक तथा नियामक है। किन्तु उसके एकाधिकार का कवि ने विरोध किया है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के कुछ अधिकार होते हैं, जिनसे उसे वंचित नहीं रखना चाहिए। एकांतिक स्वार्थ व्यक्तित्व के विकास को अवरुद्ध कर देता है, श्रद्धा के शब्दों में –
“अपने में सब कुछ भर कैसे व्यक्ति विकास करेगा
यह स्वान्त स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।”
5. आदर्श मानवता के स्वप्नदृष्टा :
प्रसाद जी आदर्श मानवता के स्वप्नद्रष्टा थे, उनके विचार में जीवन को समग्र रूप से अपनाने और देखने के लिए बुद्धिवाद अपेक्षित नहीं, उसके साथ श्रद्धा का समन्वय होना भी आवश्यक है।
वस्तुतः जीवन के सत सुखद रूप को पाने के लिए भाव और बुद्धि, व्यक्ति तथा समाज, शासक व शासित में समरसता अनिवार्य है। श्रद्धा द्वारा मानव को इड़ा के पास छोड़कर जाना व्यक्ति तथा समाज की एकता का प्रतिपादक है। मानव और इड़ा को राष्ट्रनीति अथवा जीवन कर्म के आदर्शों का उपदेश देते हुए श्रद्धा कहती है –
“तुम दोनों देखो राष्ट्रनीति, शासक बन फैलाओ न भीति।”
6. त्याग के महत्व का प्रतिपादन :
श्रद्धा का जीवन-दर्शन, ममतामयी माँ का प्यार लेकर एक ही मार्ग दिखाता है कि “सबकी समरसता का प्रचार, मेरे सुत सुन माँ की पुकार”।
इसी प्रसंग में त्याग का महत्व भी प्रतिपादित किया गया है। त्याग, दान अथवा उत्सर्ग, विकास और समृद्धि का मूल है। श्रद्धा अपने पुत्र का भी त्याग कर देती है। उसका विश्वास है कि “देकर कुछ कोई नहीं रंक”।
7. आर्थिक स्वतन्त्रता का उद्घोष :
कामायनी में अहिंसा, करुणा, ममता के साथ-साथ आत्मनिर्भरता और लघु उद्योगों का महत्व भी स्वीकार किया गया है। श्रद्धा का तकली कातना, नारी की भावुकता, भारतीय ग्रामीण जीवन तथा उसकी आत्मनिर्भरता आदि के द्वारा आर्थिक स्वतन्त्रता का उद्घोष कामायनी में किया गया है। गाँधी के समान प्रसाद भी बड़े-बड़े उद्योग के समर्थक नहीं थे। उनकी मान्यता के अनुसार यान्त्रिक उद्योग व्यक्ति की स्वाधीनता को सीमित करता है। इससे आत्मिक शक्ति का ह्रास हो जाता है। मनु तथा सारस्वत नगरवासियों का संघर्ष एवं मनु का पराभव दिखाकर प्रसाद जी ने सिद्ध कर दिया है कि संघर्ष नहीं समरसता से ही सच्ची शान्ति स्थापित हो सकती है।
8. आनन्दवाद की प्रतिष्ठा :
“समरस थे जड़ या चेतन
सुन्दर साकार बना था
चेतनता एक विलसती
आनन्द अखण्ड बना था।”
यान से देखें तो कामायनी में अत्यन्त आनन्दवाद व्याप्त है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में,
“कामायनी की प्रमुख घटना है मनु की मानसरोवर यात्रा, जिसका प्रतीकार्थ है मानव मन की आनन्द साधना। तद्नुसार ‘कामायनी’ में निहित जीवन दर्शन का चरम साध्य हुआ आनन्द और कामायनी का मूल प्रतिपाद्य हुआ आनन्दवाद।”
नगेन्द्र के शब्दों में,
“कामायनी में आनन्द के जिस रूप की प्रतिष्ठा है, वह स्पष्टतः आत्मस्थ है। वह अन्तर्मुख आनन्द या आत्मानन्द है।”
9. सनातन समस्याओं की प्रतिष्ठा :
कामायनी में कवि ने मानव-जीवन की नाना समस्याओं का भी स्थान-स्थान पर अंकन किया है। ऐसी ही कुछ समस्याएँ हैं – प्रकृति से पराजित मानव (मनु) की निराशा, नर-नारी का आकर्षण, वासनादि का मानव को भ्रमित करना, दुःखातिरेक, काम का गर्ह्य रूप, बुद्धिवाद (इड़ा) का खोखलापन, भौतिकवाद का परिणाम, मन या जीव का भटकना, इच्छा, कर्म और ज्ञान का संघर्ष और रहस्य आदि।
10. पुरुषार्थ चतुष्टय का प्रतिपादन
भारतीय काव्यशास्त्र में पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को काव्य-मात्र का इष्ट कहा गया है। प्रसाद जी ने भी चारों को ग्रहण किया है तथा सबसे अधिक अंकन किया है – काम का। कामायनी में काम एक अशरीरी चरित्र (इड़ा सर्ग) में काम का शाप देना तथा ‘काम’ सर्ग में मनु को (स्वपरिचय देना) आदि विविध रूपों में अंकित किया गया है।
“वह विश्व चेतना पुलकित थी
पूर्ण काम की प्रतिमा।”
11. युग की अभिव्यक्ति
प्रकृति कवि जीवन को समझने के लिए अतीत की ओर तथा उसे सफल बनाने के लिए भविष्य की ओर देखता है, किन्तु उसका साध्य हमेशा वर्तमान ही रहता है। निःसन्देह प्रसाद जी भी ऐसे ही प्रकृति कवि सिद्ध हुए हैं।
12. बुद्धिवाद और भौतिकवाद का विरोध
इड़ा और उसके सारस्वत प्रदेश की स्थिति एवं ध्वंस देव-सभ्यता ‘कामायनी’ में क्रमशः बुद्धिवाद और भौतिकवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस सम्बन्ध में स्वयं प्रसाद जी ने ग्रन्थ के प्राक्कथन में संकेत करते हुए कहा है –
“यह इड़ा का बुद्धिवाद श्रद्धा और मनु के बीच व्यवधान बनाने में सहायक होता है। बुद्धिवाद के विकास में, अधिक सुख की खोज में, दुःख मिलना स्वाभाविक है।”
13. समन्वयवाद का महत्व
श्री विश्वम्भर ‘मानव’ ने ठीक कहा है, “कामायनी एक विराट सामंजस्य की सनातन गाथा है। उसमें हृदय और मस्तिष्क का सामंजस्य, वासना-संयम सामंजस्य, शासक-शासित के अधिकारों का सामंजस्य, दुःख-सुख का सामंजस्य, नर-नारी के संबंध का सामंजस्य है।”
14. समरसता का प्रतिपादन
‘कामायनी’ में समरसता का प्रतिपादन 3 रूपों में किया है – व्यक्ति की समरसता, समाज की समरसता तथा पुरुष-प्रकृति की समरसता।
व्यक्ति की समरसता का चित्रण श्रद्धा के जीवन द्वारा प्रतिपादित हुआ है। समाज की समरसता के अभाव में सारस्वत प्रदेश में विप्लव और संघर्ष उत्पन्न होता है। प्रकृति तथा पुरुष की समरसता ‘आनन्द सर्ग’ में दिखाई देती है। प्रसाद की मान्यता है कि जीवन में दुःख की व्याप्ति का कारण समरसता का अभाव ही है।
निष्कर्ष
समरसता का प्रतिपादन करते हुए प्रसाद जी ने भारतीय संस्कृति के मूल आधार – कर्म को महत्व दिया है। आनन्दलोक के यात्री, कृषि प्रधान भारत के प्रतीक वृषभ अथवा बैल को आगे करके चले। आनन्द की प्राप्ति शिवत्व के दर्शन, सामाजिक एकता की अनुभूति, लौकिक वासना का त्याग करने से ही सम्भव है।
इस प्रकार समरसता को मूल केन्द्र “हिमगिरि का उत्तुंग शिखर” बनाकर प्रसाद जी ने भारतीय जीवन-दर्शन इतिहास के गौरव की स्थापना की है।
इस प्रकार प्रेम-सौन्दर्य और दर्शन के कवि होकर भी प्रसाद ने जिस समरसता का प्रतिपादन किया है, वह सर्वांगीण तथा विश्व जीवन में शान्ति, उत्कर्ष तथा समृद्धि के लिए एकमात्र आधार हो सकता है।
