यूनानी काव्यशास्त्र में अरस्तू की प्रसिद्ध रचना “पेरिपोइतिकेस” के उपरांत “पेरिइप्सुस” (Peri Hupsous) का दूसरा स्थान है। पेरिइप्सुस का अर्थ है – औदात्य, ऊँचाई। पेरिइप्सुस का अंग्रेजी अनुवाद दि सबलाइम (The Sublime) है और इसमें औदात्य सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की गई है। यह सिद्धान्त काव्य के लिए महत्वपूर्ण है। इस सिद्धान्त के माध्यम से लौंजाइनस ने औदात्य की प्रतिष्ठा करके काव्य को गरिमामय और भव्य बनाने का प्रयास किया।
पेरिइप्सुस शताब्दियों तक विस्मृति के गर्भ में पड़ा रहा। 1554 ई. में इसे पहली बार प्रकाशित किया गया। इसका लेखक था लौंजाइनस। हम इसे चाहे ईसा की पहली शताब्दी की रचना मानें चाहे तीसरी शताब्दी की, प्रत्येक स्थिति में रोमन सभ्यता का यह पतनशील युग था। आगस्टस का स्वर्ण युग पीछे छूट गया था और उसके बाद रोम अपने वैभव की अंतिम घड़ियाँ गिन रहा था। आर्थिक और सामाजिक ह्रास के युग में सामाजिक स्तर भी नीचे गिर गया था। दरबारी सभ्यता जोरों पर थी। वागाडम्बर के धनी वक्ताओं और चमत्कार प्रेमी कवियों की बन आई थी। ग्रीक साहित्य के गौरवशाली युग की प्राचीन कृतियों की ओर से लोग विमुख हो चले थे। सामने न कोई अतीत आदर्श था और न कोई वर्तमान उदाहरण। इस वातावरण की प्रतिक्रिया स्वरूप पेरिइप्सुस की रचना हुई।
पेरिइप्सुस का प्रतिपाद्य
लौंजाइनस की कृति पेरिइप्सुस का केवल 2/3 भाग उपलब्ध है। इसका अनुशीलन करने से पता चलता है कि इसमें उदात्त कला की प्रेरक भावनाओं और धारणाओं का विश्लेषण ही नहीं वरन् उदात्त शैली के आधार तत्वों का विवेचन भी किया गया है। यह उदात्तता अभिव्यक्ति का एक ढंग है। औदात्य वास्तव में अभिव्यक्ति की उच्चता और उत्कृष्टता का नाम है। इस सिद्धान्त के माध्यम से लौंजाइनस शैली में आई इन विकृतियों को भी दूर करना चाहते थे जो कला के ह्रास का कारण बनती हैं।
लौंजाइनस के विवेचन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह परिवाऊ शैली में सूत्र उपस्थित करके उनकी व्याख्या नहीं करता बल्कि अपनी प्रत्येक मान्यता को उदाहरण देकर स्पष्ट करता है। इनकी शैली कहीं भी शास्त्रीय जटिलताओं से बोझिल नहीं होती। इनकी विवेचन पद्धति की दूसरी विशेषता सुन्दात्मकता है। इसी पद्धति के कारण एक ओर वह शास्त्रीय जड़ता का खंडन करता है तो दूसरी ओर नवीनता प्रेमी कवियों के चमत्कारवाद को भी ध्वस्त करता है।
उदात्त का स्वरूप
लौंजाइनस ने उदात्त की परिभाषा नहीं दी है। उसे एक स्वतः स्पष्ट तथ्य मानकर छोड़ दिया है। उसका मत है कि उदात्तता साहित्य के सब गुणों में महान है। यह वह गुण है जो अन्य क्षुद्र त्रुटियों के बावजूद साहित्य को सच्चे अर्थों में प्रभावशाली बना देता है। लौंजाइनस की दृष्टि व्यावहारिक तथा मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार की थी। अतः उसने जहाँ एक ओर उदात्त के बहिरंग तत्वों की चर्चा की, वहाँ उसके अंतरंग तत्वों की ओर भी संकेत किया। उदात्त का विवेचन करते हुए उन्होंने 5 बातों को आवश्यक बताया –
- महान धारणाओं की क्षमता या विषय की गरिमा
- भव्य आवेग
- समुचित अलंकार योजना
- उत्कृष्ट भाषा
- गरिमामय रचना विधान
इनमें से प्रथम दो जन्मजात हैं अतः उदात्त के अन्तरंग पक्ष के अन्तर्गत आते हैं। शेष 3 कलागत हैं और बहिरंग पक्ष के अन्तर्गत आते हैं। लौंजाइनस ने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन तत्वों का भी उल्लेख किया है जो औदात्य के विरोधी हैं। इस प्रकार उनके उदात्त के स्वरूप विवेचन के 3 पक्ष हो जाते हैं –
- अंतरंग तत्व – विषय वस्तु, भव्य आवेग
- बहिरंग तत्व – समुचित अलंकार योजना, भव्य भाषा, गरिमामय रचना विधान
- विरोधी तत्व
1. अंतरंग तत्व
(क) महान धारणाओं की क्षमता
लौंजाइनस के अनुसार उस कवि की कृति महान नहीं हो सकती जिसमें महान धारणाओं की क्षमता नहीं है। कवि को महान बनने के लिए अपनी आत्मा में उदात्त विचारों का पोषण करना चाहिए। उनका कहना है कि महान विचार या शब्द उन्हीं के मुख से निकलते हैं जिनके विचार गंभीर और गहन हों। महान अवधारणाओं की क्षमता के विवेचन में लौंजाइनस को अपेक्षित था कि औदात्य की दशा में आत्मा अपने आप अभिमान से उच्चाकाश में विचरण करने लगेगी। उस समय वह हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण होगी। अतः कलाकार के जीवन चरित्र और विचारों का प्रभाव कलाकृतियों पर पड़ता है।
लौंजाइनस कृति की श्रेष्ठता के लिए प्रतिभा को अनिवार्य मानने के साथ-साथ अभ्यास की आवश्यकता भी महसूस करते हैं। इसी के साथ वह यह भी मानते हैं कि महान विचारों की प्राप्ति के लिए हमें उन महान लेखकों की रचनाओं का अनुशीलन भी करना चाहिए जिन्होंने उदात्त शैली में रचना की है। उनका मानना था कि रचना में ज्वालामुखी के समान प्रवेश और ईश्वर के समान ऐश्वर्य होना चाहिए। विषय ऐसा होना चाहिए जिसका पाठक-श्रोता पर उत्कट तथा स्थायी प्रभाव पड़े।
सारंश यह है कि उदात्त के संबंध में लौंजाइनस का मत यह है कि जहाँ तक विषयवस्तु का संबंध है वह विस्तार वाला हो तथा उसमें असाधारण शक्ति, वेग, अलौकिक ऐश्वर्य तथा उत्कट प्रभाव क्षमता हो। इसके लिए उन्होंने प्रतिभा, अभ्यास तथा महान कवियों के ग्रंथों का अनुशीलन आवश्यक माना है।
(ख) भव्य आवेग अथवा भावों की उत्कटता
भव्य आवेग से तात्पर्य ऐसे आवेगों से है जिनके परिणामस्वरूप आत्मा उत्कर्ष को प्राप्त होती है। ये भव्य आवेग उदात्त के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने विषय को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आवेगों के 2 भेद किए हैं — भव्य आवेग और निम्न आवेग।
निम्न आवेगों के अंतर्गत वे उन आवेगों को लेते हैं जिनका सम्बन्ध दया, शोक, भय आदि से है। भव्य आवेग से आत्मा उत्कर्ष को प्राप्त होती है तो निम्न से अपकर्ष को। उदात्त के लिए भव्य आवेग को आवश्यक माना गया है। इन भव्य आवेगों में भी तीव्रता और सबलता का होना औदात्य और आल्हाद के लिए आवश्यक है।
2. बहिरंग पक्ष
काव्य के बाह्य पक्ष पर विचार करते हुए अलंकार-योजना, भाषा-शैली, रचना-विधान आदि की चर्चा करते हैं। वे प्रतिभा के लिए अभ्यास आवश्यक मानते हैं। इसकी आवश्यकता वे अभिव्यक्ति के आवश्यक होने में मानते हैं।
(क) समुचित अलंकार योजना
लौंजाइनस का युग अलंकारों का युग था। अपने युग से कुछ हटकर उन्होंने अलंकारों को मनोवैज्ञानिक स्तर प्रदान किया। मात्र चमत्कार उत्पन्न करने के लिए उन्होंने अलंकारों की सत्ता को स्वीकार नहीं किया। उनकी दृष्टि में अलंकारों की उपयोगिता अर्थ को उत्कृष्ट बनाने और पाठक को आनंदित करने पर ही सार्थकता को प्राप्त करती है। अप्रासंगिक, अनावश्यक, संदर्भहीन और उद्देश्य के विपरीत अलंकार कृत्रिम हो जाते हैं और अपनी महत्ता खो बैठते हैं। अतः अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक और सहज होना चाहिए। दूसरे शब्दों में अलंकार भावावेग की प्रेरणा से सहज स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त होने चाहिए उसी स्थिति में वे औदात्य में सहायक सिद्ध होंगे।
जहाँ तक उदात्त के पोषक अलंकारों का संबंध है उन्होंने विस्तारणा, शपथोक्ति, प्रश्नालंकार, विपर्यय, व्यतिक्रम, पुनरावृत्ति, प्रत्यक्षीकरण, संचयन, सार, रूपपरिवर्तन, पर्यायोक्ति, छिन्नान्वय आदि का विवेचन किया है।
(ख) भव्य एवं उत्कृष्ट भाषा
भव्य भाषा के अंतर्गत लौंजाइनस ने शब्द चयन, पदों और वाक्यांशों का विवेकपूर्ण चयन और प्रयोग और भाषा की सज्जा को लिये हैं। उनका मानना था कि उदात्त विचार क्षुद्र या साधारण शब्दावली द्वारा अभिव्यक्त न होकर गरिमामयी भाषा में ही अभिव्यक्त हो सकते हैं। भाषा की गरिमा का आधार है – शब्द सौंदर्य अर्थात् उपयुक्त और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग।
शब्द-विन्यास के दो पक्ष होते हैं – ध्वनि पक्ष और अर्थ पक्ष। उनका विचार है कि अनुकूल ध्वनि के शब्दों का चयन काव्य में मोहकता की सृष्टि करता है। वे मानते थे कि हर जगह गरिमामयी भाषा का प्रयोग उचित नहीं। उसका प्रयोग प्रसंग के अनुरूप ही होना चाहिए।
डॉ. नगेन्द्र का कहना है कि – “छोटी-छोटी बातों को बड़ी-बड़ी और भारी-भरकम संज्ञा देना किसी छोटे से बालक के मुँह पर पूरे आकार वाला त्रासद् अभिनय का मुखौटा लगा देने के समान है।” वस्तुतः अयुक्त पदावली से भव्यता, सौंदर्य, गरिमा, ओज, शक्ति आदि गुणों की उद्भावना होती है। शब्द-योजना को वे संगीतात्मक प्रभाव के अनुकूल होने की भी सलाह देते हैं।
(ग) गरिमामय रचना-विधान
लौंजाइनस के अनुसार रचना-विधान गरिमामय होना चाहिए। रचना-विधान के अंतर्गत शब्दों, विचारों, कार्यों, सुंदरता तथा राग के अनेक रूपों का संगुफन होता है। उनकी दृष्टि में रचना का प्राणतत्व है सामंजस्य। यह सामंजस्य उदात्त शैली के लिए अनिवार्य है। उन्होंने शैलीगत रचना-विधान की तुलना शरीर-रचना से करते हुए दोनों को समान माना है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अवयवों का अलग-रहने पर कोई महत्व नहीं होता, सब मिलाकर ही वे एक समग्र और संपूर्ण शरीर की रचना करते हैं, उसी प्रकार उदात्त शैली के सभी तत्व जब समन्वित कर दिये जाते हैं तभी उनके कारण कृति गरिमामय बन पाती है।
इस प्रकार लौंजाइनस का कथन है, “वही काव्य-कृति उत्कृष्ट है जो पाठकों को पढ़ने के लिए एक बार नहीं वरन् बार-बार उत्तेजित और उद्वेलित कर सके, जो विभिन्न पेशों, आकांक्षाओं, युगों और भाषाओं के मनुष्यों के सम्मुख बार-बार पढ़ी जाने पर भी प्रभावित कर सके।”
कल्पना तत्व
लौंजाइनस ने प्रत्यक्ष रूप से कल्पना का नाम तो नहीं लिया किन्तु बिम्बों का विश्लेषण किया है। कल्पना बिम्बों का सृजन करती है इससे भाषा में गरिमा तथा शक्ति का आविर्भाव होता है। लौंजाइनस ने कल्पना और बिम्ब को एक ही माना है। बिम्ब कल्पना-चित्र है जिनका काव्य के क्षेत्र में उद्देश्य होता है – पाठक या श्रोता को अभिभूत करना। वस्तुतः कल्पना-शक्ति कवि को वर्ण्य विषय का मानस साक्षात्कार कराती है और पाठक या श्रोता के आवेग को उछाल बजाती है। इससे विषयवस्तु से तादात्म्य करने में पाठक को सुविधा होती है।
औदात्य के विरोधी तत्व
विषय को निःभ्रांत बनाने के लिए लौंजाइनस ने उन तत्वों को भी स्पष्ट किया है जो उदात्त के विरोधी हैं। ये तत्व इस प्रकार हैं –
- बालयेता – प्रथम उन्होंने बालयेता को औदात्य का विरोधी माना है। बालयेता के अंतर्गत चापल्य, असंयत वाग्विस्तार, हीन और क्षुद्र अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग आदि होता है। ये सभी उदात्त शैली के अपकारक हैं अतः त्याज्य हैं।
- भावाडम्बर एवं शब्दाडम्बर – भावाडम्बर एवं शब्दाडम्बर को भी वह विरोधी तत्व मानते हैं। भावाडम्बर से उनका अभिप्राय है उन स्थानों पर खोखला तथा अनुपयुक्त भावावेग दिखाना जहाँ आवेग की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। शब्दाडम्बर से उनका वही अभिप्राय है जिसे हम आडंबर कहते हैं।
- चमत्कार-प्रयोग – वे उन चमत्कार प्रयोगों को भी उदात्त का विरोधी समझते हैं जो साध्य हैं, साधन नहीं तथा जो विवेकपूर्ण प्रयुक्त नहीं किये गए हैं और जिनसे भावाभिव्यंजना में कोई गरिमा नहीं आती।
- संगीत-लय का आधिक्य – लौंजाइनस का मत है कि लय और संगीत का आधिक्य भी उचित की आवश्यकता से अधिक सुकुमार, कृत्रिम और निरस बनाकर श्रोता का ध्यान विषय से हटा देता है अतः वह भी त्याज्य है।
इन सबके अतिरिक्त अभिव्यंजना की क्षुद्रता, अत्यंत संक्षिप्तता एवं अनावश्यक साज-सज्जा को भी वह औदात्य का विरोधी मानते हैं। इनसे शैली उदात्त होने की बजाय निकृष्ट बन जाती है।
उपलब्धियाँ एवं सीमाएँ
आधुनिक कला-समीक्षा में लौंजाइनस के औदात्य सिद्धान्त को बहुत महत्व दिया जाता है। औदात्य में वे कवि का व्यक्तित्व, विचार तत्व, भाव तत्व, शैली का अलंकारण, शब्द-चयन आदि सभी प्रमुख तत्वों को समाविष्ट करते हैं। कान्ट, हीगल, ड्राइडन, एडिसन, पोप, वर्ड्सवर्थ आदि सभी ने इस सिद्धान्त की विस्तार से मीमांसा की है।
उनका ग्रंथ ‘पेरिइप्सुस’ काव्य के लिए शाश्वत सिद्धान्तों का निर्माण करता है। उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने दोषपूर्ण महानकृति को निर्दोष साधारण कृति से ऊँचा माना है। उनके अनुसार महान कृति में ही दोषों की संभावना हो सकती है।
इस सिद्धान्त के आलोचकों का कहना है कि औदात्य एक चारित्रिक या नैतिक तत्व है, उसका कला से सीधा सम्बन्ध नहीं है। कला का प्राथमिक गुण सौंदर्य है, औदात्य उसका अतिरिक्त गुण है। अलंकारों के विषय में आलोचकों का कहना है कि अलंकार वस्तुतः औदात्य के नहीं वरन् सौंदर्य के स्रोत हैं।
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि कला और काव्य का मूल गुण तो सौंदर्य का आकर्षण ही है, पर यदि उसमें औदात्य का भी समावेश हो तो निसंदेह वह महान बन जायेगा।
