
भारतीय आर्यभाषा
प्राचीन आर्यभाषा का स्वरूप ऋग्वेद से प्राप्त होता है। वैदिक साहित्य का सृजन वैदिक संस्कृत में हुआ। वैदिक संस्कृत को वैदिकी, वैदिक, छन्दस् आदि भी कहा जाता है। वैदिक साहित्य को 3 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
1. संहिता
2. ब्राह्मण
3. उपनिषद्
संहिता विभाग में ऋक् संहिता, यजुः संहिता, साम संहिता एवं अथर्व संहिता आते हैं। महत्व की दृष्टि से प्रधान ऋक् संहिता है। ऋग्वेद में 10 मण्डल हैं; इसमें देवताओं की स्तुति से सम्बन्ध रखने वाले गीतात्मक काव्य हैं।
ब्राह्मण – भाग में कर्मकाण्ड की व्याख्या की गई है। प्रत्येक संहिता के अपने-अपने ब्राह्मण ग्रंथ हैं। इनमें ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद), ताण्डव व पंचविंश ब्राह्मण (सामवेद), तैत्तिरीय ब्राह्मण (यजुर्वेद) ग्रन्थ महत्वपूर्ण हैं।
ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम भाग उपनिषदों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनमें वैदिक मनीषियों के आध्यात्मिक चिन्तन के दर्शन प्राप्त होते हैं। उपनिषदों की संख्या 108 बताई गई है।
वैदिक संस्कृत ध्वनियाँ – डॉ धीरेन्द्र वर्मा, डॉ उदय नारायण तिवारी, डॉ. कपिल देव द्विवेदी प्रभृति विद्वानों ने वैदिक ध्वनियों की संख्या 52 मानी है जिसमें 13 स्वर तथा 39 व्यंजन हैं। डॉ. हरदेव बाहरी ने वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानी है।
वैदिक स्वर – (13)
मूल स्वर – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ (9)
संयुक्त स्वर – ए, ऐ, ओ, औ (4)
वैदिक व्यंजन (39)
वैदिक व्यंजन

वैदिक संस्कृत की विशेषताएँ :
1. वैदिक संस्कृत में “स्वराघात” इतना महत्वपूर्ण था कि सभी संहिताओं, कुछ ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों आदि में स्वराघात मिलता है। बिना स्वराघात के वैदिक छन्दों को पढ़ना अशुद्ध को पढ़ना अशुद्ध माना जाता है।
2. “टर्नर” का मत है कि वैदिक संस्कृत में दोनों प्रकार स्वराघात -संगीतात्मक एवं बलात्मक उपलब्ध था। वैदिक संस्कृत में संगीतात्मक स्वराघात प्राप्त हुआ जो 3 अनुदात्त, उदात्त एवं स्वरित 3 प्रकार का था।
3. वैदिक भाषा की पद रचना श्लिष्ट योगात्मक था।
4. वैदिक संस्कृत में 3 लिंग हैं –
5. पुल्लिंग
6. स्त्रीलिंग
7. नपुंसकलिङ्ग
8. वैदिक संस्कृत में 3 वचन हैं –
9. एकवचन
10. द्विवचन
11. बहुवचन
12. वैदिक संस्कृत में केवल 4 समास ही थे –
तत्पुरुष
बहुव्रीहि
कर्मधारय
द्वन्द्व
पृष्ठ 33
1. 3 पुरुष थे –
2. उत्तम
3. मध्यम
4. प्रथम
5. 8 विभक्तियाँ थी जो संस्कृत में आज भी पाई जाती हैं।
6. वैदिक संस्कृत में धातुओं के रूप (आत्मने) तथा (परस्मै) दो पदों में मिलते हैं।
7. वैदिक संस्कृत में भविष्य काल के रूप में कम मिलता है उसके स्थान पर सम्भावनार्थ तथा निश्चयार्थ रूपों का अधिक प्रयोग मिलता है।
8. क्रिया रूप 3 वचनों तथा 3 पुरुषों में होते थे। क्रिया के कुल 11 प्रकार के रूपों का प्रयोग वैदिक संस्कृत में मिलता है। इनके नाम हैं :
9. लट्
10. लङ्
11. लिट्
12. लुङ्
13. लृट्
14. विधि लिङ्
15. आशिर् लिङ्
16. आज्ञार्थ
17. लोद्
18. ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में लेट् लकार का प्रयोग बहुत है किन्तु धीरे-धीरे इसका प्रयोग कम हो गया और लौकिक संस्कृत में यह समाप्त हो गया।
