1. मीराबाई के कला पक्ष पर विचार करें।
2. मीरा की काव्य भाषा स्पष्ट करें। (या कलापक्ष/काव्यभाषा)
3. गीति काव्य की दृष्टि से मीराबाई के काव्य की समीक्षा करें।
4. मीरा की प्रेम साधना।
भूमिका
भक्तिकाल की कृष्णभक्ति काव्य धारा के माधुर्य-भाव के उपासक रचनाकारों में कवयित्री मीराबाई सर्वप्रथम हैं। उन्होंने प्रियतम कृष्ण को प्राप्त करने के लिए अपना राजसी वैभव त्यागकर अपने हृदय की समस्त पीड़ा को अत्यधिक सुकोमलता के साथ पदों में अभिव्यक्त किया है।
मीरा का कृतित्व – मीराबाई की रचनाओं के विषय में मतैक्य नहीं है। कुछ निश्चित मतों के आधार पर मीराबाई की रचनाएँ निम्नानुसार स्वीकार की गई हैं –
1. गीत-गोविन्द की टीका
2. राग-सोरठ-संग्रह
3. मीरा का मलार
4. मीरा की पदावली
5. नरसी जी का मायरा
6. राग-गोविन्द
7. वर्षा-गीत
8. फुटकर पद
डॉ. शिवमंगल सिंह “सुमन” ने लिखा है:
“भक्त की अनन्यता, समर्पणशीलता और आर्तता के लिए मीरा से बढ़कर उदाहरण हिन्दी साहित्य में ही नहीं, विश्व-साहित्य में भी प्राप्त कर पाना दुर्लभ है। रागातुरा भक्ति की वह परम परिणति हैं।”
(I) कृष्ण की प्रेम दिवानी
मीरा बाल्यावस्था से ही कृष्ण पर मुग्ध थीं। समय के साथ-साथ उनका कृष्ण प्रेम विकसित होता गया तथा वह साहित्य जगत में “कृष्ण प्रेम की दीवानी” के रूप में विख्यात हो गईं। अपने दीवानेपन में मीरा ने लोक-लज्जा, कुल-मर्यादा का त्याग कर गोपियों की भाँति स्वयं को कृष्ण रंग में रँग लिया। साधु-संतों के साथ मंदिरों तथा अन्य धार्मिक स्थलों पर मीरा कृष्ण भजनों पर नाचती हैं
उद्धरण:
“पग घुँघरू बाँध मीरा नाची री
लोग कह्या मीरा बावरी, सासूँ कह्या कुल नासी री”
मीरा ने कृष्ण को अपना सर्वस्व मान लिया –
“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई”
II) माधुर्य भक्ति भावना
मीरा की भक्ति सगुण भाव की थी। मीरा ने कृष्ण को अपना पति स्वीकार किया है। यह माधुर्य भाव की भक्ति है जिसमें प्रियतम के रूप माधुर्य का वर्णन, मिलन की कामना, विरह की तीव्रता इत्यादि का वर्णन मिलता है। मीरा के काव्य में ये सभी गुण विद्यमान हैं।
(III) आत्मसमर्पण का काव्य
मीरा के काव्य में आत्मसमर्पण का भाव विद्यमान है। यह भक्ति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। मीरा का काव्य तो वास्तव में आत्मनिवेदन और सर्वस्व समर्पण का ही काव्य है। मीरा हर क्षण अपने कृष्ण के निकट रहने की इच्छा से उनकी दासी बनकर रहना चाहती हैं –
उद्धरण:
“गिराधारी चाकर राखो जी”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल मीरा की इस भक्ति भावना के बारे में लिखते हैं –
“पति प्रेम के रूप में ढले हुए भक्ति-रस की संगीत धारा में जो दिव्य माधुर्य घोला है वह भावुक हृदयों को और कहीं शायद ही मिले।”
IV) विरह-वेदना का काव्य
मीराबाई का समूचा काव्य विरह भावना से ओत-प्रोत है। विरह वेदना वह ज्वाला है जिसमें तपकर प्रेम रूपी सोना कुंदन बन जाता है। मीरा का हर क्षण कृष्ण के विरह में व्याकुल है, वह दर्शनों की लालसा में अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।
मीरा राधा के ही समान अपने को “जन्म-जन्म की पुजारी” मानती हैं।
“मीरा के प्रभु मिलह्यौ माघो जन्म-जन्म की कुँआरी”
डॉ. विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में:
“मीरा की विरह अभिव्यक्ति में केवल दर्शन की लालसा ही सबसे अधिक तीव्र है। बार-बार पदों में दर्शन की पुकार है।”
मीरा विरह की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए कहती हैं –
“हेरी म्हाँ तो दरद दिवाणी, म्हारा दरद न जाण्याँ कोय।
घायल की गति घायल जाणै, हिवड़ो अगण संजोय॥”
(V) विद्रोह एवं नारी विमर्श का स्वर
मीरा के काव्य में तत्कालीन समाज में नारी संबंधी कठोर मान्यताओं के प्रति विद्रोह का स्वर विद्यमान है। मीरा के काव्य में मध्यकालीन नारी का चित्र उभरता है जो वैधव्य की पीड़ा सहने के लिए विवश है। मीरा ने साहस साथ राज परिवार के बंधनों को तोड़कर, चारदीवारी से बाहर पाँव रखा व उसकी कीमत कष्ट सहकर देनी पड़ी। मीरा का स्वर उस नारी की स्वतंत्रता का स्वर है जिसे समाज के खोखले बंधनों द्वारा बाँधने का प्रयास किया जाता है –
उद्धरण:
“राणे म्हाने या बदनामी लागे मीठी।
कोई निंदो कोई बिंदो में चालूँगी चाल अनूठी॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जले जा अंगीठी॥”
(VI) श्रेष्ठ गीतिकाव्य
मीरा का काव्य श्रेष्ठ गीतिकाव्य है। इसमें आत्मानुभूति, संवेगात्मकता, गेयता, संगीतात्मकता आदि सभी गुण विद्यमान हैं। मीरा का गीतिकाव्य उस नारी हृदय का गीत स्वर है, जिसने वर्ण विषय को अपने जीवन की अनन्य अनुभूति के रूप में संवेदना के स्तर पर भोगा और व्यक्त किया है।
(VII) मीरा का अभिव्यक्ति पक्ष (काव्य-भाषा)
भाषा में गुजराती और पंजाबी के शब्दों का भी सुंदर प्रयोग किया गया है। मुहावरों एवं लोकोक्तियों के प्रभावशैली प्रयोग, दोहा, सार, कुंडलिया आदि छंदों के विधान, विभिन्न राग-रागिनियों, बिम्ब विधान तथा शब्द-शक्तियों के अनुभूतिभ्रम प्रयोग ने उनकी अभिव्यक्तियों को अत्यंत स्वाभाविक बनाया गया।
मीरा की काव्य-भाषा
1. शब्द चयन
मारवाड़ी मीराँ की काव्य-भाषा मुख्यतः राजस्थानी मानी गई है। इनके पदों में ब्रज भाषा के शब्द भी दृष्टिगत हैं। इसके अतिरिक्त गुजराती, पंजाबी भाषा के शब्द भी इनके काव्य में पाए जाते हैं –
ब्रज भाषा का प्रयोग:
“इण दीन-हीन छै बुधा रत से, राम नाम न लेत। प्रेमनी प्रेमनी प्रेमनी रे, मने लागी कटारी प्रेमनी रे॥”
पंजाबी भाषा:
“लागी सोही जाणै, करछा लागण दी पीरा।”
2. भाषा-स्रोत के आधार पर:
1. संस्कृत तत्सम:
पति, मुकुट, दण्ड, दोष, मृत्यु, भक्ति, पूर्व, चरण, छवि, चरणामृत, केश, कंचन इत्यादि।
2. संस्कृत तद्भव:
दूलहा, कंकर, चन्दा, भगत, सिंगार, माखन, गाँव, सुहाग, देस, निरमल इत्यादि।
3. राजस्थानी:
दिवड़ो, ठाठी, लापसी, रैन, नितखोणों, लूण, नेण …
4. देशज शब्द:
झुरमुट, झख, अराखा, छाछ, नीको, बाट।
5. विदेशी (अरबी-फ़ारसी):
मोती, महल, स्वामी, ज़ुल्फ़, बन्दगी, खता, दरद, दिवानी, कागद, जोहरी, कलेजा इत्यादि।
3. प्रतीक-बिम्ब
मीरा के पदों में प्रतीक व बिम्ब योजना सटीक है। उनके रागात्मक संवेगों और अमित अवचेतन को सरल तरीके से स्पष्ट करते हैं। मीरा के काव्य में प्रतीकों और बिम्बों का बड़ा महत्वपूर्ण अंश है।
“मैं गिरधर रंग राती संइयाँ में गिरधर रंगराती
पंचरंग चोला पहन सखी मैं झिरमिट खेलन जाती”
मीरा की काव्यभाषा में रूप रचनात्मकता और अर्थपरक दोनों प्रकार के विचलनों का सशक्त प्रयोग प्राप्त होता है।
4. कथन
मीरा की काव्यभाषा में उक्त अगम्य उदाहरण के समान किसी एकल वस्तु, तथ्य, व्यंजित विषयक बहुलता का अर्थ व्यक्त करने के लिए पुल्लिंग बहुवचन क्रिया के प्रयोग की प्रवृत्ति मिलती है।
“तन मन धन गिरधर पर वारूँ, मीरा गिरधर हाथ बिकानी, कैन मीरा हरि रंग रँगूँगी”
5. मुहावरे व लोकोक्तियाँ:
मुहावरे:
तन मन धन गिरधर पर वारूँ
मीरा गिरधर हाथ बिकानी
रैन मीरा हरि रंग रँगूँगी
नाचण लागी तब घुँघट कैसो
लोक लाज तिनका करूँ तोयों
उपमा:
पानी ज्हूँ पीली पड़ी रे देहा
6. अलंकार योजना
मीरा के भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए रचना काव्य में जो अलंकार मिलते हैं, न कि अलंकारों के लिए। अतः इनके में रूपक अलंकार का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है। मीरा के पदों में रूपक से सागर अति जोर कहिये अनन्त ऊँची धारा।
7. छंद योजना
छंदों के रूप में मीरा ने तात्कालिक युग की साहित्यिक परम्परा के अनुसार पदों को ही अधिकांश अपनाया है। गेयात्मक छंदों के रूप में आज मीरा के गीत सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। मीराबाई की कविताओं में मुख्य रूप से मात्रिक छंदों का ही प्रयोग हुआ है – इनमें सार छंद, सवैया, सरसी, विष्णुपद, दोहा और कुण्डल छंद प्रमुख हैं।
इनकी छंद योजना के सम्बन्ध में डॉ० रामकुमार वर्मा का कथन दृष्टव्य है:
“मीराबाई का पदों में प्रयुक्त छंदों के प्रति कम ध्यान रहा है। मात्राएँ भी बढ़ी–घटी हैं, पर राग–रागिनियों में रचना का रूप रहने के कारण गान की लय, मात्रा की विषमता को ठीक कर लेती है।“
8. प्रवाहात्मकता
प्रवाह भाषा का प्रमुख गुण माना जाता है। मीरा को संगीत का अत्यधिक ज्ञान था, इसलिए इन्होंने शब्दों का चयन संगीतमयी लय को अक्षुण्ण बनाने के लिए किया। यही कारण है कि इनकी भाषा के अबाध प्रवाह की धाराएँ तरंगित हैं।
9. संगीतात्मकता
संगीतात्मकता मीरा की भाषा की प्रमुखतम विशेषता है। मीरा ने शब्दों का लययुक्त प्रयोग किया है। कहीं शब्दों के संयुक्त रूप को भी करना पड़ा है, कहीं शब्दों को विकृत करना पड़ा है। मीरा के गीतों में शास्त्रीय एवं लोक दोनों ही प्रकार के गीतों का आदर्श रूप दृष्टिगोचर होता है। मीरा के गीत इनके स्वर और शब्द दोनों प्रकार की संगीतात्मकता विद्यमान है।
उन्होंने भैरवी, पीलू, पहाड़ी, जोगियों, बिहाग आदि लगभग 27 रागों का प्रयोग किया।
निष्कर्ष
कहा जा सकता है कि मीरा का काव्य अनुभूति का उदात्त काव्य है। डॉ. राजपाल के शब्दों में,
काव्यशास्त्रीय दृष्टि से देखना समृद्ध मीरा का उद्देश्य अपने काव्य को प्रेम कथा, विरह व्यथा का वर्णन करना था।”
मीरा एक सच्ची साधिका थीं। उनका काव्य कृष्ण के प्रति उनके प्रेम से सराबोर है। उनके प्रेम की प्रगाढ़ता तथा विरह की वेदना अत्यंत प्रबल व गहन है।
डॉ. देशराज भाटी के शब्दों में,
“मीरा की भक्ति हृदय की है। ज्ञान से उसका कोई संबंध नहीं है।”
