प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के शिष्य यवन आचार्य प्लेटो का जन्म 427 ई० पू० माना जाता है। प्लेटो मूलतः एक दार्शनिक थे परन्तु उन्होंने जीवन के अन्य पक्षों यथा राजनीति, साहित्य, कलाओं आदि पर भी विचार किया है। प्लेटो ने आदर्श राज्य की स्थापना की। वह मानता था कि एक आदर्श राज्य के नागरिकों से यह अपेक्षित है कि वे अपनी क्षुद्र वासनाओं का दमन कर उनका निराकरण करें। उनके द्वारा लिखित ‘रिपब्लिक‘ (गणतंत्र) ग्रंथ राजनीतिक चिन्तन और आदर्श राज्य का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इनके अधिकांश ग्रंथ संवादों के रूप में हैं। काव्यशास्त्र पर प्लेटो ने अलग से नहीं लिखा वरन् राजनीतिशास्त्र पर विचार करते हुए ही उन्होंने प्रायः कवि, कलाकार और उनकी कलाओं पर अपना मत प्रकट किया है।
प्लेटो एक आदर्श राज्य से कवियों तथा कलाकारों को बाहर रखने के पक्ष में था। उसका कहना था कि कवि तर्करहित होकर आवेग और भावनाओं में बंध कर अपनी रचना करता है। अतः ये रचनाएँ वैज्ञानिक नहीं होतीं। ये समाज को उत्तेजित कर उसे अनैतिक और अनुशासनहीन बनाती हैं। अतः यह समाज के लिए वांछनीय नहीं होतीं।
प्लेटो के विचार से वस्तु के 3 रूप होते हैं –
- आदर्श
- वास्तविक
- अनुकृत
प्लेटो का मानना था कि यदि अनुकृत वस्तु शुभ नहीं होती है और अनुकरण अपूर्ण है तो ऐसी कला हानिकारक है। प्लेटो का मानना था कि हेलोनिस्टिक युग में यूनान में व्याप्त उच्छृंखलता और चरित्रहीनता के लिए काव्य ही जिम्मेदार था। उनके अनुसार काव्य क्षुद्र वासनाओं को उभारता है जिससे जीवन में अराजकता उत्पन्न होती है और उच्च बौद्धिक तथ्यों पर से व्यक्ति की पकड़ छूट जाती है।
अतः आदर्श राज्य के लिए यह अपेक्षित है कि वह कवि और काव्य का निष्कासन करे। स्पष्ट है कि प्लेटो ने साहित्य पर उपयोगितावादी दृष्टि से विचार किया है। प्लेटो के अनुसार ब्रह्म (ईश्वर) सत्य और जगत मिथ्या है (नाशवान है)। प्लेटो ने जीवन और सृष्टि के शाश्वत प्रश्नों पर विचार करते हुए परम सत्य की परिकल्पना की और उसी के आलोक में जीवन की अन्य क्रियाओं एवं सर्जनाओं का मूल्यांकन एवं विवेचन किया। स्पष्ट है कि इस बुनियादी दृष्टि को अपनाने के बाद प्रत्येक क्रिया या सर्जना का महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वह व्यक्ति को परम सत्य तक पहुँचाने में कहाँ तक सफल व सहायक होती है। इसी दृष्टि से उन्होंने काव्य पर भी विचार किया है। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में वही काव्य स्वीकार्य हो सकता है जो परम सत्य को प्राप्त करने में सहायक होता है और यदि काव्य का रूप, प्रेरणा, प्रभाव आदि ऐसे हों जो व्यक्ति को मूल सत्य से दूर ले जाते हों तो ऐसा काव्य सर्वथा त्याज्य है। अर्थात् प्लेटो ने काव्य पर बतौर काव्य विचार नहीं किया है अपितु उनके विवेचन का केन्द्र उनकी परम सत्य की परिकल्पना है।
काव्य सत्य
– प्लेटो मूल सत्य का कर्ता ईश्वर को स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार
- मूल सत्य एक है एवं उसका कर्ता ईश्वर है।
- यह वस्तु-जगत इस परम सत्य का अंश नहीं अपितु अनुकरण है।
- कलाकार अथवा कवि इस अनुकरण का भी अनुकरण करता है और सत्य से दुगुना दूर हो जाता है।
अपनी इस बात को प्लेटो एक उदाहरण द्वारा समझाते हैं। वे कहते हैं जैसे पलंग का मूलकर्ता ईश्वर है अर्थात् पलंग ईश्वर का मूलविचार है। उस विचार के आधार पर बढ़ई पलंग का निर्माण करता है और उस पलंग का चित्रकार चित्र बनाता है। इस प्रकार ईश्वर द्वारा
कल्पित मूल विचार बढ़ई द्वारा अनुकृत किया जाता है और फिर बढ़ई द्वारा निर्मित पलंग का चित्र चित्रकार द्वारा बनाया जाता है। इस प्रकार चित्रकार द्वारा बनाया गया पलंग का चित्र सत्य से दुगुनी दूरी पर है। अतः मिथ्या होने के कारण त्याज्य है।
- प्लेटो ने अपने युग की काव्य-कृतियों को आधार मानकर यह देखा कि प्रेरणा, प्रभाव तथा विषय आदि की दृष्टि से वह काव्य कहाँ तक सत्य का पोषक है और जीवन को कल्याण मार्ग पर अग्रसर करने की शक्ति रखता है। प्लेटो इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि काव्य जैसा कि वह होमर आदि के द्वारा रचित है, नगर से बहिष्कृत कर देना चाहिए। मगर यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि प्लेटो काव्य मात्र का विरोध करते हैं। वे ऐसे काव्य को सहर्ष स्वीकार करने को तैयार हैं जो मनुष्य में सद्वृत्तियों को जगाता है, और सत्य की ओर प्रेरित करता है तथा जीवन को अनुशासन, संयम तथा व्यवस्था प्रदान करता है। प्लेटो ने काव्य का जो विरोध किया है उसका आधार उनके युग का काव्य है मगर वे काव्य मात्र के विरोधी नहीं हैं।
प्लेटो के मत की समीक्षा –
प्लेटो घोर आदर्शवादी विचारक थे। उन्होंने साहित्य को वहीं तक लाभकारी माना है जहाँ तक वह जीवन के लिए उपयोगी है। प्लेटो ने पहली बार काव्य की सामाजिक उपयोगिता का सवाल उठाया और आदर्श काव्य को सामाजिक कल्याण के साथ सम्बद्ध माना। काव्य की आलोचना में नैतिक दृष्टि के समावेश का यह गंभीर प्रयास है। काव्य के माध्यम से अमुक्त मनोवेगों की अभिव्यक्ति, भोग और अनुभावन की बात प्लेटो ने अरस्तु से पहले कह दी थी।
साहित्य में काव्यगत न्याय के प्रतिष्ठाता भी प्लेटो ही हैं। उनका मत था कि मानव चरित्र में जो कुछ भी उदात्त तथा महान है वही काव्य का विषय बनाया जाए। काव्य का सत्य सार्वभौम और सार्वकालिक है। प्लेटो काव्य में कल्पना का तिरस्कार तथा भावुकता का विरोध करते हैं। इनका दृष्टिकोण समाजसुधार का था। उल्लेखनीय है कि प्लेटो एक प्रत्ययवादी दार्शनिक थे। अतः उनका यह मानना था कि यह दृश्यमान, वस्तु जगत परम सत्य का अनुकरण है। वह परम सत्य को ही कविता की कसौटी मानता था।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्लेटो का लक्ष्य एक ऐसे आदर्श राज्य की स्थापना था जिसके नागरिक शूरवीर, तर्कवादी और सत्यनिष्ठ हों। वह एक ऐसे समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत था जिसमें आध्यात्मिक एवं नैतिक जीवन को बल मिले। समाज कल्याण की भावना को सर्वोपरि मानकर प्लेटो ने जिन नियमों एवं विधानों की कसौटी समाज को दी, उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। यही प्लेटो के सिद्धान्तों की सबसे बड़ी देन है।
