परंपरा और वैयक्तिक प्रज्ञा का सिद्धांत

20वीं सदी के सशक्त समीक्षक थॉमस स्टर्न्स इलियट एक सशक्त कवि, प्रखर आलोचक और समर्थ नाटककार थे। व्यापारी पिता व कवयित्री माता की संतान इलियट का जन्म 26 सितम्बर 1888 को अमेरिका में हुआ। सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों के कारण इलियट का युग कुंठा, निराशा तथा हताशा का युग था। साहित्य में जिस निराशा के स्वर का सूत्रपात टॉमस हार्डी की कृतियों से हुआ वह इलियट की रचनाओं में भी विद्यमान है। इलियट के आदर्श आलोचक अरस्तू हैं। इनके अतिरिक्त उन पर रेमेडी गोर्की, टी. ई. हुलमे, एजरा पाउण्ड और फ्रांसीसी प्रतीकवादियों का भी प्रभाव था।

परंपरा का सिद्धांत –

19वीं शताब्दी एवं 20वीं शताब्दी के आरंभ में स्वच्छंदतावाद का बोलबाला था। स्वच्छंदतावादी काव्य-सिद्धांत कविता को भावोद्रेक मानता है। उसके अनुसार कवि प्रतिभा सम्पन्न प्राणी होता है। वह कल्पना की शक्ति द्वारा अपने वैयक्तिक मस्तिष्क (Highly individual) से काव्य रचना करता है। अतः काव्य रचना में कवि के व्यक्तित्व का प्रमुख स्थान है। इलियट ने कला को कलाकार का आत्मप्रकाशन मानने वाले सभी सिद्धांतों की विस्तृत आलोचना की है। उन्होंने प्रभाववाद को भी अस्वीकार किया। इलियट ने कहा कि परंपरा का काव्य रचना में प्रमुख स्थान है। प्रतिभा के स्थान पर इलियट ने परंपरा को महत्व दिया। काव्य को कवि के व्यक्तित्व की सीधी अभिव्यक्ति न मानकर उन्होंने व्यक्तित्व से पलायन की बात कही। परंपरा से उनका अभिप्राय उन सभी स्वाभाविक कार्यों, रीति-रिवाजों से है जो एक स्थान पर रहने वाले एक समुदाय के व्यक्तियों के रक्त-संबंध को व्यक्त करते हैं। इसका स्पष्ट आशय यह है कि परंपरा का सम्बन्ध संस्कृति से है और वह अपनी प्रगति में जातीय जीवन, कला-दर्शन और साहित्य के उत्कृष्ट अंशों को सन्निविष्ट (शामिल करना) करती जाती है अर्थात् उसकी अविच्छिन्न धारा प्रवाहित होती रहती है।

परंपरा के लाभ –

इलियट का कहना है कि कोई भी कलाकार चाहे कितना भी महान क्यों न हो अपने में स्वयं महत्वपूर्ण नहीं है, परंपरा से सम्बद्ध होने पर ही उसका महत्व है। साहित्य में भी कवि को परंपरा का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि परंपरा को भुलाकर वह केवल अपनी ही संवेदनाओं में उलझ जाता है, अपने दुख-दर्द की कथा ही लिखता है, वर्तमान की ही बात करता है तो वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है। परंपरा के ज्ञान से साहित्यकार को दो लाभ होते हैं –

  1. प्रथम, उसे यह जानकारी हो जाती है कि उसे क्या करना चाहिए।
  2. दूसरे, उसे यह भी पता चल जाता है कि स्वयं उसकी कृति का मूल्य क्या है क्योंकि किसी कवि को समझने और उसकी कृति का मूल्यांकन करने के लिए उसकी तुलना उस परंपरा के अन्य कवियों से करनी होगी।

स्पष्ट है कि इलियट परंपरा को रूढ़ि-पालन के रूप में स्वीकार नहीं करते। अतीत के प्रति विद्रोह भी उसमें संभव है। उनके अनुसार परंपरावादी होने का अर्थ है कला तथा काव्य की प्रमुख धाराओं से परिचित होना। इलियट कलाकार के व्यक्तित्व को परंपरा के आगे समर्पित करने के लिए कहता है।

कला की निर्वैयक्तिकता (Impersonality)

एजरा पाउण्ड, जिसके विचारों से इलियट प्रभावित हुए थे, मानता था कि कवि वैज्ञानिक के समान ही निर्वैयक्तिक और वस्तुनिष्ठ होता है। उसका कार्य आत्मनिरपेक्ष होता है। इलियट अनेकता को एकता में बांधने के लिए परंपरा को आवश्यक मानते थे जो वैयक्तिकता की विरोधी है। वह साहित्य के जीवन्त विकास के लिए परंपरा का योग स्वीकार करते थे जिसके कारण साहित्य में आत्मनिष्ठ तत्व नियंत्रित हो जाता है और वस्तुनिष्ठ तत्व सम्मुख हो जाता है। इलियट का मानना था कि कवि व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं करता; वरन् वह विशिष्ट माध्यम मात्र है। “व्यक्तिगत भावों की अभिव्यक्ति कला नहीं है वरन् उनसे पलायन कला है”। उनके अनुसार कलाकार की प्रगति निरन्तर आत्मत्याग एवं व्यक्तित्व का निरन्तर बहिष्कार है।

– कला की निर्वैयक्तिकता से इलियट का अभिप्राय मात्र कुशल शिल्पी की निर्वैयक्तिकता नहीं है। इलियट की निर्वैयक्तिकता का अर्थ है – कवि के व्यक्तिगत भावों की विशिष्टता का साधारणीकरण। उनका मानना था कि कवि अपनी तीव्र संवेदना और ग्रहण क्षमताओं (शक्तियों) से अन्य लोगों की अनुभूतियों को आयत्त (ग्रहण) कर लेता है। ये आयत्त अनुभूतियाँ उसकी निजी अनुभूतियाँ हो जाती हैं। जब वह अपने इन स्वसृस्त अथवा चिन्तन द्वारा प्राप्त अनुभवों को काव्य में व्यक्त करता है तो वे उसके निजी अनुभव होते हुए भी सबके अनुभव बन जाते हैं। भारतीय काव्यशास्त्र का ‘साधारणीकरण‘ सिद्धांत भी यही बात कहता है। इलियट कवि और कलाकृति दोनों का परस्पर प्रभावित होना स्वीकार करते हैं।

‘कविता के तीन स्वर’ नामक अपने भाषण में इलियट ने काव्य के 3 स्वर माने हैं –

  • प्रथम स्वर वह है जिसमें कवि किसी अन्य से नहीं वरन् स्वयं से बात करता है।
  • द्वितीय स्वर वह है जिससे वह अन्यों से (श्रोताओं से) बात करता है।
  • तृतीय स्वर में कवि स्वयं वक्ता न होकर पात्रों के माध्यम से बोलता है।

कविता के विषय में इलियट का कहना था कि कविता स्वयं अवतरित हो जाती है, लिखी नहीं जाती। ऐसी दशा में कवि केवल माध्यम होता है।

वैयक्तिक प्रज्ञा –

टी. एस. इलियट के कथन कि कविता में वैयक्तिक नहीं, अपितु निर्वैयक्तिक प्रज्ञा का प्रयोग होता है की आलोचकों ने विरोध किया। उनका कहना था कि इलियट ने स्वयं अपनी कविता में निर्वैयक्तिक प्रज्ञा का पूर्ण सज से पालन नहीं किया। हम पाते हैं कि इलियट पहले तो कविता को कुशल शिल्प-विधान मात्र मानते थे किन्तु बाद में इस विषय में उनके विचार बदल गये। सन् 1940 में यीट्स के विषय में इलियट ने कहा था – “यीट्स के प्रारंभिक कविता-संग्रहों की सभी कविताओं में मुझे इधर-उधर कुछ ऐसी पंक्तियाँ मिल जाती हैं जिनमें अपूर्व व्यक्तित्व का भान होता है, जो हमें कवि के मानस और अनुभूतियों के विषय में और अधिक जानने की इच्छा और उत्तेजना में बाँध देता है। यीट्स के निजी भावात्मक अनुभव की उत्कटता हमें कदाचित ही मिलती है। उसकी कुछ उत्तरकालीन कृतियों में हमें यह तत्व मिलता है।”

– ध्यान देने की बात यह है कि जिसने कला को ‘व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं अपितु व्यक्तित्व से पलायन माना’ और जिसने कविता में वास्तविक जीवन के भावों की उत्कटता को महत्व नहीं दिया, वही शिकायत करता है कि यीट्स की प्रारंभिक कविता में उसका अपूर्व व्यक्तित्व नहीं मिलता। कवि यीट्स की कविता की आलोचना के सन्दर्भ में इलियट ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि – “हो सकता है कि मैं उस समय अपनी बात ठीक ढंग से व्यक्त न कर सका या उस विचार को मैंने अप्रौढ़ रूप से ग्रहण किया था। अब मैं सोचता हूँ कि निर्वैयक्तिकता के दो रूप होते हैं – एक वह होती है जो कुशल शिल्पी मात्र के लिए प्राकृतिक होती है। दूसरी वह है जो प्रौढ़-कलाकार की होती है। यह दूसरे प्रकार की निर्वैयक्तिकता उस प्रौढ़ कवि की होती है जो अपने उत्कट और व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सामान्य सत्य को व्यक्त करने में समर्थ होता है।”

स्पष्ट है कि इलियट वैयक्तिक प्रज्ञा का प्रयोग भी कविता में मानने लगा था। उसके अनुसार कवि अपने निजी भावों की अभिव्यक्ति कविता में करते हैं, इसी का नाम वैयक्तिक प्रज्ञा है। दूसरे शब्दों में इलियट कविता में वैयक्तिक प्रज्ञा की स्वीकृति देते हैं। वैयक्तिक प्रज्ञा कवि के व्यक्तित्व को महत्व देती है। इलियट के अनुसार वैयक्तिक प्रज्ञा परंपरा से असम्बद्ध, निरपेक्ष या विच्छिन्न वस्तु नहीं है। परंपरा से जुड़कर ही कवि की वैयक्तिक क्षमता अधिक रमणीयता से सामने आती है। जो कवि वैयक्तिक प्रज्ञा को परंपरा से अलग कर देता है उसकी कविता निष्प्राण हो जाती है। वास्तव में इलियट का परंपरा और वैयक्तिक प्रज्ञा का सिद्धांत न तो रूढ़िपालन है और न ही मौलिकता का विरोधी। उनके अनुसार परंपरावादी होने का तात्पर्य कला तथा साहित्य की पूर्ववर्ती अवधारणाओं से अवगत होकर कला एवं साहित्य का सृजन करना है। वैयक्तिक प्रज्ञा की भिन्नता और विविधता का कारण बनती है।

इलियट के इन सिद्धांतों की रैंसम, विण्टर्स, एलेन टेट आदि समीक्षकों ने आलोचना की पर वे इलियट के महत्व को एकदम नकार नहीं सके।