भूल गलती (गजानन माधव मुक्तिबोध)
शमशेर बहादुर सिंह:
“मुक्तिबोध की कविताओं में सदैव एक साथीपन का भाव है। सबसे बड़ी बात उनमें यह है कि उनके अंदर ‘मस्तिष्कहीन’ कोरी भावुकता (Mindless feeling) नहीं है। उनके भावों के ज्वार के पीछे दीर्घ दोहन है… कभी-कभी विशुद्ध से काव्य तत्व के साथ-साथ विद्रूप का भाव, अतल से गलित गर्त के साथ-साथ उत्तुंग शिखरों के दर्शन, व्यक्ति के निजी धर और तड़प के साथ उसका राजनीतिक, सामाजिक संघर्ष पाठक को कई स्तरों पर एक साथ उद्द्वेलित करता है।”
मुक्तिबोध के जीवन काल में उनका कोई कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ।
• ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ -कविता संग्रह में संकलित
•कविता के माध्यम से कवि समाज व्यापी भ्रष्टाचार और अनैतिकता की ओर संकेत करते हैं, जिसके दमन-चक्र में सत्य और ईमान पिस कर रह गया है।
• कविता में ‘भूल-गलती’ को एक शहंशाह के रूप में चित्रित किया गया है, जिसके दरबार में समाज के सभी वर्गों के कायर और डरपोक लोग सिर झुकाकर खड़े हैं।
• दरबार में सत्य और ईमान को जंजीरों में जकड़कर लाया जाता है।
•भ्रष्टाचारी राजा (भूल-गलती) को जनता की कमजोरियों से ताकत मिलती है, जिससे वह क्रमशः अधिक शक्तिशाली होता जा रहा है।
•सत्य (ईमान) घायल और आहत है परंतु बेखौफ़ है।
•ईमान को कैद करके लाया गया है शहंशाह के पास।
•सत्य मिट्टी के बादशाह की शर्मसार जिंदगी जीने की शर्तें नामंजूर कर देता है लेकिन दरबार में एकत्र कतारबद्ध लोग चुप हैं क्योंकि डरे, सहमे हैं, उनकी चेतना सोई है।
•रेतःका-सा-ढेर शहंशाह को कहा गया है।
•सच्चाई पर प्रहार पर प्रहार किये जाते हैं कि अचानक भरे दरबार में से किसी एक की चेतना जाग उठती है। कवि की चेतना भी जागती है।
“दिल में अलग चबड़ा, अलग दाढ़ी लिए
दुमुँहेपन से सौ तजुर्बों की बुजुर्गी से भरे“
•कवि आशान्वित है कि कभी न कभी किसी-न-किसी एक की चेतना जाग्रत होगी और वह इस जर्जर, झूठी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठायेगा ताकि सत्य और ईमानदारी की व्यवस्था स्थापित की जा सके और फिर सारा समाज धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगेगा।
•‘संकल्प-धर्मा चेतना का स्वतप्लावित स्वर’, ‘हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर’ = क्रांतिचेतस व्यक्ति
