अंधेरे में (Andhere Mein) कविता का मूल भाव, व्याख्या और नोट्स | मुक्तिबोध

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‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध

• 1964 कविता संग्रह: ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’

 • 8 भागों में विभक्त कविता

•  ‘मुक्तिबोध रचनावली’ में नेमिचंद्र जैन ने इस कविता का रचनाकाल 1957 से 1962 के मध्य संभावित माना है।

 • नाटकीय शिल्प में रचित Fantasy में ढली कविता।

 ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ कि भूमिका से:

 श्रीकांत वर्मा:

• “किसी और कवि की कविताएँ उसका इतिहास न हों, मुक्तिबोध की कविताएँ अवश्य उनका इतिहास हैं। जो इन कविताओं को समझेंगे, उन्हें मुक्तिबोध को किसी और रूप में समझने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”

•  “जिंदगी के एक-एक स्नायु (नस, नाड़ी) के तनाव को एक बार जीवन में और दूसरी बार अपनी कविताओं में जीकर मुक्तिबोध ने अपनी स्मृति के लिए सैकड़ों कविताएँ छोड़ी हैं और ये कविताएँ ही उनका जीवन वृतांत हैं।”

•  बीमारी के दौरान मुक्तिबोध ने इच्छा जाहिर की कि इस संकलन में उनकी 2 कविताएँ (चम्बल की घाटियाँ व आशंका के द्वीप: अंधेरे में) जरूर शामिल की जाएँ। दोनों एक के बाद दूसरी छापी जायें और दूसरी का शीर्षक बदल दिया जाए।

श्रीकांत वर्मा ने ‘आशंका के द्वीप’ का शीर्षक से हटा दिया। ये दोनों कविताएँ उनकी, बीमार होने से पहले की कविता व अंतिम कविताएँ हैं।

शमशेर बहादुर सिंह,

ने कविता का आमुख लिखा, इन्होंने अपने वक्तव्य ‘एक विलक्षण प्रतिभा’ में लिखा है:

 “राजनॉंद गाँव के दिग्विजय कॉलेज में उन्हें नौकरी मिल गयी और उनकी परिस्थिति में किंचित सुधार हुआ। यहाँ आकर उन्होंने अपनी कुछ सफलतम कविताओं की सृष्टि की जैसे: ब्रह्मराक्षस, ओरांग-उटाँग, अंधेरे में।”

 “राजनॉंद गाँव में सन् 1961 में मैं मुक्तिबोध से मिला था और उनकी बहुत लंबी, लाजवाब कविताएँ मैंने उनके मुख से सुनी थीं। एक ‘अंधेरे में’, दूसरी ‘प्रेम’, तीसरी ‘एक कथा’। इतनी गहरा असर डालने वाली आधुनिक दृष्टि से इतनी पुष्ट और स्वस्थ कविताएँ और इतनी ओजस्वी, मैंने निराला के बाद नहीं पढ़ी या सुनीं।”

 “आधुनिक हिंदी काव्य की प्रवृत्तियों पर शोध करने वाली बहुभाषा-विदुषी Polish (पोलिश) कवयित्री श्रीमती अगन्येष्का सोना का मत है कि मुक्तिबोध सहज ही हिंदी के आधुनिक युग के सबसे शक्तिशाली कवि हैं।”

 “मुक्तिबोध ने छायावाद की सीमाएँ लाँघकर, प्रगतिवाद से मार्क्सी दर्शन ले, प्रयोगवाद के अधिकांश हथियार संभाल और उसकी स्वतंत्रता महसूस कर, स्वतंत्र कवि-रूप में, सब वादों और पार्टियों से ऊपर उठकर, निराला की सुधरी और खुली मानवतावादी परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया।”

•  “देश की धरती, हवा, आकाश, देश की सच्ची मुक्ति-आकांक्षी नस-नस इसमें फड़क रही है और भावनाओं के अनेक गुम्फित स्तरों पर।”

•  डॉ प्रभाकर माचवे का कहना है कि यह Guernica (स्पेन का शहर) काव्य (Inverse) है: इसके बहुत से अंश पिकासो के विश्व-प्रसिद्ध चित्र जैसा ही प्रभाव डालते हैं।

‘अंधेरे में’ कविता की प्रेरक पृष्ठभूमि के विषय में मत-

•  इंप्रेस मिल का गोलीकाण्ड

•  विष्णु चंद्र शर्मा ने मुक्तिबोध की आत्मकथा में इसी गोलीकांड के अनुभवों की चर्चा की है।

 • शमशेर सिंह बहादुर: “इंप्रेस मिल के मज़दूरों पर जब गोली चली तो रिपोर्टर की हैसियत से वे घटना-स्थल पर मौजूद थे। उन्होंने सिरों का फूटना और खून का बहना अपनी आँखों से देखा। ‘अंधेरे में’ का शीर्षक उनकी सशक्त और मार्मिक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे संदर्भ अपने अंदर समेटे हुए हैं।”

हरिशंकर परसाई ने अपने 2 संस्मरणों में ‘अंधेरे में’ कविता का संबंध मुक्तिबोध रचित ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक का मध्य-प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंधित होना बताया है। यह घटना 1962 में घटी थी। मुक्तिबोध अपनी पुस्तक के जब्तीकरण को लेखकों की विचार स्वतंत्रता और लेखन-स्वतंत्रता के लिए खौफनाक मानते थे।

कविता के मूल कथ्य के विषय में विद्वानों के विचार

 • शमशेर बहादुर सिंह: “व्यक्ति और जन का स्वीकारण”

 डॉ रामविलास शर्मा: “‘अंधेरे में’ की मूल समस्या यह है कि मध्यवर्ग का बुद्धिजीवी, सर्वहारा वर्ग के साथ कैसे तादात्म्य स्थापित करे।”

•  शिवकुमार मिश्र: “इसमें एक ओर अपने युग का इतिहास अपने बाहरी द्वंद्वों को लिये मौजूद है, दूसरी ओर आत्मसाक्षात्कार तथा आत्म-विश्लेषण के स्तर पर एक कवि के अंतः व्यक्तित्व की कशमकश पूरी सजीवता के साथ सामने आई है।”

• ‘अंधेरे में’: मूल कथ्य

 • आत्मानवेषण और तत्सम्बंधित आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया की स्पष्ट अभिव्यक्ति।

 • कवि का सजग अन्वेषक रात के अँधेरे में, घनी लूटपाट के दृश्यों में, जिन्दगी में बेबसी में और रात के सन्नाटे में सीटी की आवाज सुनकर भी निरन्तर चलता रहता है।

 •भले ही पैरों में कील घुस गयी हो, पसलियाँ चटक रही हों, तलवे आग की गर्मी से तप रहे हों, कंधे बोझ से दब गये हों, रीढ़ की हड्डी में दर्द हो, लेकिन मन इसे नकारता हुआ अपने सहचर के साथ जागरूक है।

 • कविता में जो अभिधार्थ संकेतित है वह हमारे देश की स्थिति का आजादी से पहले और बाद का पूरा नक्शा है।

 • आर्थिक सामरस्य के लिए जो आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी, वह इस अँधेरे में आकर मिल गयी है।

 • जिन महापुरुषों ने अपनी जान पर खेलकर आज़ादी दिलाई, वे ही स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में पंगु व नपुंसक बनकर अँधेरे की स्याही में डूब गये हैं।

 • मृतक दल की शोभा-यात्रा का जो संदर्भ इस कविता में है, वह हमारी संस्कृति की ही पुनर्परख है।

 • इस कविता का संकेतित संघर्ष दोनों स्तरों पर घटित हुआ है: एक तो कवि के मन में और दूसरे सामाजिक भूमिका पर।

• इसमें मध्यवर्ग के उस आदमी के आत्मसंघर्ष को भी शब्दबद्ध किया गया है, जो एक ओर तो सामाजिक अव्यवस्था और विकृतियों के विरुद्ध जिहाद छेड़ता है और दूसरी ओर अपनी सुविधाओं को छोड़ने को तैयार नहीं है।

 • असल में वह एक साथ ही रक्तालोकस्नात (लाल + प्रकाश = नहाया हुआ) (क्रांतिकारी) पुरुष भी बनने का आकांक्षी है और दूसरी ओर वह डरता भी है, अपनी कमजोरियों से भी जुड़े रहना चाहता है।

 • आदमी की एक साथ दो जगहों पर हाजिरी देने की यह कोशिश उसे द्वंद्व की स्थिति में ले आती है। मन की यह दुविधा सहज भी है और महत्वपूर्ण भी है।

•  2 रक्तालोकस्नात पुरुष हैं:

* पहला वह जो जिंदगी के अँधेरे कमरों में चक्कर लगा रहा है।

 * दूसरा वह जो बाहर तालाब की लहरों में अपना चेहरा देखता हुआ अंदर आने के लिए सांकल बजा रहा है।

 • मुक्तिबोध ने रक्तालोकस्नात पुरुष के प्रतीक के माध्यम से सामाजिकता और कविता को अभेद्य रूप में संगठित कर दिया है, जो संपूर्ण कविता में आद्यन्त विद्यमान है।

‘मैं’ से ‘वह’ तक की यात्रा का संघर्ष

 • मनुष्य की पूर्ण संभावनाएँ तभी प्रकट होंगी जब कविता सामाजिकता को ग्रहण कर ले और समाज कविता या कला को अंगीकार कर ले।

 • कविता में वर्णित अंधेरा कई संकेत देता है:

 • पहला संकेत सामाजिक अव्यवस्था से जुड़ा है।

•  दूसरा संकेत कवि के मानस पर छायी किन्हीं अमूर्त छायाओं से जुड़ा है।

•  तीसरा संकेत व्यक्तित्व की परतों पर बिछे स्याह कागज का है, जिसे जलाए बिना व्यक्तित्व का शोधन नहीं होगा और जब तक यह नहीं होगा तो आत्मानवेषण के दौरान उपलब्ध सत्यों का विस्तार कैसे होगा? अस्मिता का विलय कैसे होगा? व्यक्ति निजता से परता और अंधेरे से प्रकाश की ओर कैसे बढ़ेगा? वह (मैं) से (हम) कैसे होगा?

 • प्रस्तुत कविता में आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया ‘वह‘ और ‘मैं’ के मध्य घटित होती है।

 • ‘मैं’, ‘वह’ को पाने के लिए भटक रहा है।

• ‘वह‘ रक्तालोकस्नात पुरुष है।

 ‘मैं’, ‘वह‘ से अपनी सुविधाजीवी प्रवृत्ति के कारण मिल नहीं पाता।

• उसे अर्थात् ‘मैं’ को अपनी कमजोरियों से भी लगाव है किंतु वह रक्तालोक-स्नात पुरुष को भी छोड़ना नहीं चाहता।

•  न छोड़ने का कारण ‘वह’ से हुए आत्मसाक्षात्कार के परिणामस्वरूप हुए इस परिवर्तन से संबंधित है:-

 “पैरों में बस महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया।”

 “आत्मा में, भीषण सत् चित् वेदना जल उठी, दहकती।”

 • यह रक्तालोकस्नात पुरुष मानवीय संस्कृति के विकास हेतु संघर्षरत, संस्कृति-पुरुष का प्रतीक है।

 • यह धर्म सब के भीतर भी है और बाहर भी है। बाहर से वह धर्म शक्ति देता है, सकर्मक बनाता है, सकर्मक बनकर भीतर का व्यक्ति ही बाहर अभिव्यक्त होता है।

•  डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी:- (रक्तालोकस्नात पुरुष) “वह संघर्षरत है, इसलिए उसकी पीठ पर नहीं वक्ष पर घाव है। वह सकर्मक है, शक्ति का पुंज है, किंतु फटेहाल है क्योंकि वह करुणा से युक्त होकर समाज को शोभितजनों का प्रतिनिधि करता है। खुद उसे रोटी पानी का अभाव रहता है। वह साधारण जन होकर साधारण जन का साथ देता है-

 ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत’। हमारे देशकाल को देखते हुए यह संस्कृति-पुरुष मध्यवर्ग के आदर्शवादी दृढ़ चरित्र और जीवन की सुविधाओं से समझौता न करने वाले व्यक्ति का प्रतीक है।

 • कवि यहाँ आत्मनिर्वासित होकर अस्मिता की खोज नहीं करता है, अपितु संघर्षी स्थितियों से गुजरता, अन्तर्बाह्य से लड़ता हुआ अपनी अस्मिता को अस्तित्व आत्मविस्तार देता है, ‘स्व’ को ‘पर’ की सीमाओं तक ले जाता है।