कबीरदास की काव्यगत विशेषताएँ
कबीरदास की काव्यगत विशेषताएँ
कबीरदास जी के भाव पक्ष और कला पक्ष का वर्णन कीजिए।
कबीरदास के काव्य की समीक्षा कीजिए।
कबीरदास की काव्य-भाषा स्पष्ट कीजिए।
कबीर के काव्य का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।

भूमिका 

कबीर के काव्य का भाव पक्ष

1. निर्गुण ब्रह्म के उपासक :- कबीर निर्गुण ब्रह्म में विश्वास रखते थे। उनका मानना है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान तथा कण-कण में व्याप्त है। उनका ईश्वर अगम और अगोचर है, उसे कहीं बाहर ढूँढने की आवश्यकता नहीं बल्कि वह तो प्रत्येक के हृदय में विराजमान है-

जो तिल माही तेल , चकमक में आगि,
तेरा सांई तुझ में है, जागि सके सो जागि।

2. अवतारवाद का विरोध :- कबीर के अनुसार ईश्वर के मानव रूप में अवतार लेने की धारणा मिथ्या है क्योंकि उसकी सत्ता तमाम बंधनों से परे है और वह सर्वव्यापी है। उनकी दृष्टि में ईश्वर की सत्ता सभी देवी-देवताओं से ऊपर है।

कबीर कहते हैं :-

अक्षर पुरुष एक पेड़ है निरंजन बाकी डार ,
त्रिदेव शाखा भए पात भया संसार ।

इस दोहे में उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्म एक ही है, और बाकी देवताओं का अस्तित्व उसके अवतार और शाखाओं के रूप में समझा जा सकता है।

3. भक्ति और आत्मज्ञान की प्रधानता :- कबीर के काव्य का मूल उद्देश्य लोगों को भक्ति और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करना था। उनके अनुसार सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों या शब्दों में नहीं, बल्कि साधना और अनुभव में निहित है। उनके दोहों में यह स्पष्ट है कि भक्ति और ज्ञान केवल बाहरी आभूषण नहीं, बल्कि हृदय और जीवन की गहराई में अनुभूत होने चाहिए। जैसे उन्होंने कहा:

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ , पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।”

4. गुरू की महिमा का वर्णन :- सतगुरू का स्थान जीवन में सर्वोपरि है। कबीर के शब्दों में गुरू केवल शिक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और ज्ञान का स्त्रोत है।

“सतगुरू की महिमा अनन्त , अनंत किया उपकार ।
लोचन अनन्त , उघाड़ियाँ , अनंत दिखावनहार ॥”

5. मानव जीवन की दुर्लभता एवं प्रेम का महत्त्व :- उनके अनुसार, जीवात्मा अनगिनत योनियों में भटकने के बाद ही मनुष्य के रूप में जन्म लेती है। इसलिए इस जीवन को केवल सांसारिक सुखों में व्यर्थ नहीं करना चाहिए, बल्कि ईश्वर भक्ति और प्रेम के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए।

कबीर कहते हैं:-

“दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारंबार ।
तरवर थें फल झड़ि पड्या, बहुड़ि न लागै डार ॥”

अर्थात् मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है, और यह बार-बार नहीं मिलता। जैसे पेड़ से गिरे हुए फल को दोबारा शाख पर नहीं लगाया जा सकता, वैसे ही जीवन ही क्षणभंगुर है।

6. सत्य के उपासक :- कबीर दास जी सत्य के अडिग उपासक थे। उनके लिए सत्य न केवल जीवन का मार्ग था, बल्कि सबसे बड़ा तप भी। वे झूठ और कपट को सबसे बड़ा पाप मानते थे।

“साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदै साँच है, ताकै हिरदै आप ॥”

7. धर्म समन्वय की गहरी भावना :- कबीर के काव्य में धर्म समन्वय की गहरी भावना दृष्टिगोचर होती है। वे सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखते थे और उनका मान-सम्मान करने का संदेश देते थे। कबीर ने समाज के दोनों प्रमुख धर्मों – हिंदू और मुस्लिम – में दिखावे और पाखंड को उजागर किया और लोगों को वास्तविक भक्ति की ओर मार्गदर्शित किया।

हिंदुओं के सम्बन्ध में :-

माला फेरत जुग भया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥

मुस्लिमों के सम्बन्ध में :-

काँकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ॥

8. बाह्याडंबरों का विरोध :- कबीर विद्रोही और क्रांतिकारी कवि के रूप में विख्यात हैं क्योंकि उन्होंने समाज में व्याप्त कर्मकांडों, अंधविश्वासों, कुरीतियों तथा दुराचारों का निर्भीक स्वर में विरोध किया है। मूर्ति पूजा के संबंध में हिंदुओं को फटकारते हुए वह कहते हैं :-

पाहन पूजे हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार।
ताते यह चाकी भली पीस खाए संसार॥

9. रहस्यवाद की प्रवृत्ति :- कबीर के रहस्यवाद में भारतीय एवं विदेशी दोनों प्रकार की दार्शनिक भावना का समावेश हुआ है। इसमें अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की साधना मार्ग, भक्ति मार्ग, सूफियों का प्रेम मार्ग

आदि सभी का भाव मिश्रित है –

राम संम राम संम रमि रहिउ ।
साकत सेती भूलि न कहिउ ॥

10. अद्वैतवाद की प्रधानता :- कबीर ने अद्वैतवाद की प्रवृत्ति को अपनाया और अद्वैतवाद में आत्मा, ब्रह्म में एकता को स्थापित किया। आत्मा को ‘परमात्मा’ कहा गया है और परमात्मा को पति, परमेश्वर की संज्ञा दी गई है। उन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं :-

“घट-घट है अविनासी, सुनहुँ तनी तुम श्वेत।”

11. व्यंग्यात्मकता की प्रधानता / भावनात्मकता की प्रधानता :- कबीर की रचनाओं में कला की उपेक्षा, भावों की धारा अधिक बहती है। पर अपने तीखे व्यंग्यों के बाण अपने छोड़े हैं। उन्होंने जाति-पांति तथा मूर्ति पूजा जैसे बाह्याडंबरों पर अपने तीखे व्यंग्यों के बाण छोड़े हैं।

“काँकर पाथर जोरि के मसजिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे बहरा हुआ खुदाय ॥”

कबीर के काव्य का कला पक्ष/कबीर की काव्य-भाषा

कला पक्ष के अंतर्गत अभिव्यंजना पक्ष आता है जिसके अंतर्गत भाषा-शैली, अलंकार, बिम्ब, छन्द, प्रतीक, आदि गुणों का विवेचन किया जाता है; जो निम्नलिखित है —

1) अलंकार विधान :- कबीर जी ने रूपक, अन्योक्ति, रूपक, उपमा, विरोधाभास आदि अलंकारों का प्रयोग किया है। ये अलंकार उनके काव्य स्वाभाविक रूप से स्फुरित होते हैं।

  • अनुप्रास अलंकार = “लाली मेरे लालकी, जित देखूँ तितलाल।
    लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल॥”
  • विरोधाभास अलंकार = “पानी बिन मीन पियासी।
    मोहे सुन-सुन आवै हाँसी॥”

11) प्रतीक व्यवस्था :- कबीर जी की आध्यात्मिकता व अनुभव का फल है। कबीर ने अदृश्य तत्त्वों को प्रतीकों के द्वारा अभिव्यक्त किया है। उन्होंने साधक ईश्वर के साथ पत्नी, पुत्र, पिता आदि नाना संबंध स्थापित करते आए हैं।

  • सम्बन्ध मूलक प्रतीक = “हरि जननी मैं बालक तेरा””हरि मेरा पति मैं राम की बहुरिया ॥”

III) उलटबासियाँ :- कबीर की उलटबासियाँ-पद्धति भी प्रसिद्ध है। यह मुख्यत: 3 प्रकार की हैं- अलंकार प्रधान, अद्भुत रस प्रधान और प्रतीक प्रधान।

“एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढा सिंह चरावै गाई।
पहले पूत पाछे भई माई, चेला के गुरू लागे पाई ॥”

IV) छन्द योजना :- कबीर दास ने अपने समय के प्रचलित अनेक छन्दों का प्रयोग प्राय: सभी पदों में किया है।

डॉ. गोविन्द के अनुसार “कबीर ने अधिकतर सधुक्कड़ी छन्दों का प्रयोग किया है। इनमें सबसे प्रमुख साखी, सबद और रमैनी हैं। इनमें हिंडोला, कहरा आदि छन्द, साधु परम्परा, ग्रामीणो की बोलियों का प्रयोग हुआ है। इनमें गीत और लय पर भी विशेष ध्यान दिया है।”

V) गुणगत – रमणीयता :- कबीर की रचनाओं में माधुर्य-गुण की प्रधानता है। अध्यात्मक उक्तियों में प्रसाद गुण मिलता है। रहस्यवाद की शृंगार-रस पूर्ण उक्तियों में माधुर्य गुण की प्रतिष्ठा मिलती है।

VI) भाषा-वैशिष्ट्य :-

डॉ. हजारीप्रसाद ने लिखा है, “कबीर का भाषा पर एकाधिकार था। भावानुकूल एवं समयानुकूल भाषा गढ़कर तथा काट-छाँटकर उससे अपनी स्वेच्छानुसार अभिव्यक्ति कर लेना उन्हें खूब आता है तभी तो उनकी उक्तियों में इतना प्रभाव और प्रेषणीयता है।”

  • पंचमेल खिचड़ी भाषा – कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं यथा – अरबी, फारसी, पंजाबी, बुंदेलखंडी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली आदि के शब्द मिलते हैं इसलिए इनकी भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा जाता है।
  • डॉ. रामकुमार वर्मा ने ‘कबीर ग्रंथावली’ की भाषा में पंजाबीपन अधिक बताया है।

कबीर के यहाँ कई भाषाओं का मेल है। इसलिए उनकी रचनाओं में भाषा और व्याकरण का निश्चित और स्थिर रूप नहीं मिलता।

VII) शब्द भंडार – शब्द भंडार की दृष्टि से कबीर की भाषा में अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी आदि के शब्द और रूप मिलते हैं। इनकी रहस्यवाद और दर्शन से जुड़ी पदावली में तत्सम शब्दों का समावेश है। तत्कालीन समय में मुग़ल शासन


की भाषा फारसी थी अत: इस भाषा के शब्दों का समावेश भी उनके साहित्य में हुआ है। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशज शब्दों का प्रयोग भी उनकी रचनाओं में मिलता है।

कबीर द्वारा प्रयुक्त विभिन्न भाषाओं के शब्द –

  • अवधी – साथ संगत मिली कडू विछौड़ा।
  • ब्रज – पर जालो।
  • भोजपुरी – जलहैं तनी बुनी पार न पावल।

VIII) व्यंग्यात्मक भाषा – कबीर का व्यक्तित्व विद्रोही था। तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों को वे तर्क और मानवता की कसौटी पर परखते हुए, उन पर व्यंग्य करते चले हैं। समाज में फैले हुए बाह्याडंबरों, धार्मिक रूढ़ियों पर उन्होंने अपने व्यंग्य से प्रहार भी किया है। उनसे पहले हिन्दी साहित्य के इतिहास में कबीर जैसा व्यंग्यकार पैदा नहीं हुआ।

IX) कोमलकांत पदावली – कबीर की भक्ति सम्बन्धी रचनाओं में उनके हृदय का कोमल और भावुक रूप देखने को मिलता है। ऐसे पदों में भाषा भी स्वयंमेव कोमल रूप धारण करके चली है। भक्त हृदय की सरलता और निर्मलता कोमलकांत पदावली में सघन रूप से प्रभावशाली बन पड़ी है —

“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाय ॥”

X) कबीर की शैली – कबीर की शैली उनके फक्कड़ और मस्तमौला व्यक्तित्व के अनुरूप है। सत्य को उसके सही रूप में कहने वाला और व्यंग्य-बाण छोड़कर तिलमिला देनेवाला उनका व्यक्तित्व उनके समूचे कृतित्व में झाँक रहा है।

निष्कर्ष :- कबीर की भाषा उनके व्यक्तित्व के अनुरूप जीवन्त और मुखर है। उन्होंने ईश्वर की साधना के समय, दिग्भ्रमित समाज को सही दिशा और वास्तविक जीवन-मूल्य दिखाते समय अपने आध्यात्मिक, दार्शनिक व रहस्यवादी भावों और विचारों को प्रकट किया।

अत: इस प्रकार, उपर्युक्त विवेचन के आधार पर देखा जा सकता है कबीर जी को भाव व कला पक्ष में जितनी सफलता उन को प्राप्त हुई, उतनी शक्ति और सफलता अन्य किसी लेखक को प्राप्त नहीं हुई।