‘ब्रह्मराक्षस’ (मुक्तिबोध) : व्याख्या, मूल पाठ, कथ्य एवं महत्त्वपूर्ण बिंदु | UGC NET/SET/JRF Hindi Literature Notes

ब्रह्मराक्षस (मुक्तिबोध)


  • चाँद का मुँह टेढ़ा है’ – संग्रह

  • फैंटेसी शिल्प, प्रतीकात्मक कविता

  • आत्मान्वेषण, आत्मशोधन एवं आत्मविस्तार की कविता।

  • ब्रह्मराक्षस बौद्धिक चेतना का ‘बावड़ी का जल’, अर्जित सैद्धांतिक ज्ञान का प्रतीक।

श्रीकांत वर्मा

“मुक्तिबोध स्वयं ही ब्रह्मराक्षस थे और स्वयं ही ब्रह्मराक्षस के शिक्षक भी थे। एक ज्ञान पिपासु की तरह मुक्तिबोध भी ज्ञान का अर्जन करके उसे समग्रता में दूसरे तक समर्पित करने के लिए लालायित रहे।”

बच्चन सिंह

“ब्रह्मराक्षस भी उसी प्रकार आत्मग्रस्त और आत्मचेतस है। विश्वचेतस होना कठिन था। अपने आप में आत्मग्रस्त पांडित्य में डूबा हुआ, बुद्धिजीवी ब्रह्मराक्षस होता है। ब्रह्मराक्षस लोक जीवन से लिया गया मिथक है। उसका दावा है सूर्य तक उसे प्रणाम करता है।”

• वह मार्क्स, एंगेल्स, टायनबी की व्याख्या करता है।

“लेकिन वह कोठरी में किस तरह

अपना गणित करता रहा

और मर गया”

. बुद्धिजीवी अपने आप में तिरस्करणीय नहीं है बशर्ते वह विश्वचेतस हो और अपने ज्ञान का संवेदनात्मक स्तर पर बावड़ी के बाहर प्रसार करता हो। इसलिए कवि उसका सजल-उर-शिष्य होकर किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की आकांक्षा व्यक्त करता है।

विश्व त्रिपाठी

“वह (काव्य-नायक) संघर्षरत है, इसलिए उसकी पीठ पर नहीं वक्ष पर घाव है। वह सकर्मक है, शक्ति का पुंज है, किंतु फटेहाल है क्योंकि वह करुणा से युत होकर समाज के शोषित जनों का प्रतिनिधि बनता है। यह संस्कृति-पुरुष मध्यवर्ग के आदर्शवादी, दृढ़ चरित्र और जीवन की सुविधाओं से समझौता न करने वाले व्यक्ति का प्रतीक है।”

ब्रह्मराक्षस : मूल पाठ एवं कथ्य

• एक परित्यक्त सूनी बावड़ी और उसके आसपास एक रहस्यमय सूनेपन के परिवेश-चित्रण से कविता प्रारंभ।

•  ‘ब्रह्मराक्षस’ उस बौद्धिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके पास अर्जित ज्ञान बहुत है किंतु अपने जड़ संस्कारों और परंपराओं में बंधे रहने के कारण वह उस अर्जित ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर पुष्ट और सार्थक नहीं बना पाता।

ऐसे दायरे में कैद ज्ञान में, उस ज्ञान को संजोने वाले व्यक्ति में विकृतियाँ आना स्वाभाविक है।

 • इसलिए ब्रह्मराक्षस अपनी देह को घिस-घिसकर साफ कर रहा है – यही आत्मशोधन है।

•  मैल यानी विकृतियाँ कम होने की बजाय बढ़ रही हैं, क्योंकि यह आत्मशोधन व्यावहारिक धरातल पर नहीं बल्कि अर्जित ज्ञान के उसी दायरे में कैद होकर हो रहा है (नकली/अवास्तविक)।

 • संघर्ष है लेकिन संघर्ष छद्म संघर्ष है, वास्तविक नहीं। इसलिए जटिलताएँ बढ़ रही हैं, संवेदनाएँ स्याह हो रही हैं।

•  कवि स्पष्ट करता है कि अर्जित ज्ञान कितना भी गहन और विस्तृत क्यों न हो, व्यावहारिक जीवन में प्रयुक्त न होने पर, अहंकार से मुक्त न होने पर, वह सार्थक नहीं होता, अपरिपक्व और अपूर्ण ही बना रहता है।

“सुमेरी – बेबिलोनी जन-कथाओं से ______

कि मार्क्स, एंगेल्स, रसेल, टॉयन्बी

कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भी

सभी के सिद्धांतों का नया व्याख्यान करता वह”

• उसकी व्याख्या का प्रत्येक शब्द उसी बावड़ी की दीवारों से टकराकर वहीं खो जाता है, अर्थात् वह अहं और दंभ के कारण अपने ज्ञान को व्यावहारिक नहीं बना पाता। अतः उसका आत्मसंघर्ष बढ़ता ही जाता है।

• उसकी इन व्याख्याओं को सुनने वाले भी केवल उस परिवेश की लतिकाएँ, उनके पुष्प और वृक्ष ही हैं।

 • यही मध्यवर्गीय बौद्धिक चेतना की सबसे बड़ी ट्रेजेडी है, अपने अर्जित ज्ञान को समर्पित न कर पाने की ट्रेजेडी।

 • ब्रह्मराक्षस का संघर्ष स्वयं से है, अपने अर्जित ज्ञान की कैद से है क्योंकि वह उस दायरे को अद्भुत और निराले लोक की तरह स्वीकार करता है।

 • विषमताओं में पिसकर वह शोधक बौद्धिक चेतना (ब्रह्मराक्षस) बेदम और निष्प्राण हो जाती है। उस शोधक का व्यक्तित्व कोमल-घटिक-प्रसाद-सा था अर्थात् पारदर्शी था, उसमें सीढ़ियाँ थीं अर्थात् अंदर-बाहर जाना भी संभव था।

 • बस विडंबना यह थी कि जीने की वे सीढ़ियाँ अकेली थीं अर्थात् वह समाज से कटकर रहा।

 • कवि अंत में ब्रह्मराक्षस का सजल-उर (संवेदनशील हृदय) वाला शिष्य बनने की लालसा व्यक्त करते हैं।

•  कविता की मूल संवेदना यही है कि कवि अतीत की बौद्धिक चेतना को वर्तमान को सौंपना चाहता है क्योंकि इसी सौंपने में अर्जित ज्ञान की सार्थकता है परंतु आत्मबद्ध चेतना के कारण ऐसा नहीं कर पाते।

•  मुक्तिबोध मानते थे कि अतीत से पूरी तरह कटकर कोई भी वर्तमान सार्थक भविष्य का आकार नहीं ले सकता।