राग दरबारी उपन्यास में व्याप्त मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता को विस्तार से बताइए।

‘राग दरबारी’ उपन्यास के उद्देश्य अथवा उसमें व्याप्त समस्याओं को उजागर कीजिए।

मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता :

राग दरबारी उपन्यास श्री लाल शुक्ल द्वारा लिखित आधुनिक समाज की विसंगतियों दर्शाने वाला एक व्यंग्यपरक उपन्यास है। व्यंग्य का जन्म ही विसंगति से होता है चाहे वह सामाजिक व्यवस्था में हो राजनीतिक प्रणाली में हो संस्कारों में हो अथवा मूल्यों में हो।

आधुनिक युग में मानव के सोचने में परिवर्तन होने पर अनेक मूल्य परिवर्तित हुए हैं अथवा इसे अन्य शब्दों में कहें तो सामाजिक जीवन में मूल्यहीनता और संस्कारहीनता का बोलबाला हो गया है। न मूल्यों पर आधारित जीवन रह गया है और न ही मूल्यों पर आधारित राजनीति। इसका एक कारण है आदर्शों का स्थान च्युत होना अर्थात् समाज अथवा परिवार अपने आदर्शों को सामने रखकर आगे चलता है। यदि आदर्श ही अपने स्थान से विस्थापित हो जायेंगे, वे मूल्यों का परित्याग करेंगे तो उनके अनुयायी स्वतः ही मूल्यों को तिलांजलि दे देंगे। अतः स्पष्ट है कि उपन्यास में रंगनाथ का चरित्र केवल एक सीमा है और शिवपालगंज एक घेरा मात्र है, मनुष्य न जी पाते हुए भी जीने के लिए विवश है और यह विवशता उसे पैना डंक भी मारती है।

संभवतः यही विवशता विद्रूपता को जन्म देती है। ‘राग दरबारी’ उपन्यास में इसी विद्रूपता, मूल्यहीनता का चित्रण स्थान-स्थान पर किया गया है। आलोचक डॉ. नगेन्द्र के अनुसार –

“राग दरबारी उपन्यास में एक बड़े गांव के माध्यम से पूरी भारतीय आधुनिक जिंदगी की मूल्यहीनता और संस्कारहीनता को उजागर किया है।”

मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता का प्रधान तत्त्व राग-दरबारी उपन्यास कई जगहों पर दिखाया गया है :

 • पारिवारिक संस्था द्वारा मूल्यों का परित्याग

 • शिक्षा के क्षेत्र में अवमूल्यन

 • शिक्षित वर्ग में मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता

 • कानून व्यवस्था में आदर्शहीनता

 • न्याय व्यवस्था में फैली मूल्यहीनता एवं अनैतिकता

 • राजनीति में नैतिकता का पतन

 • विद्रूपताओं से घिरी चुनाव व्यवस्था

• पतनोन्मुख भविष्य का कर्णधार युवा वर्ग

 • समाज व्यवस्था में फैली विद्रूपता

• सहकारिता आंदोलन एवं ग्राम सभा संस्कारहीनता का अड्डा

 • शिक्षक वर्ग एवं साहित्यकारों में फैली मूल्यहीनता

पारिवारिक संस्था द्वारा मूल्यों का परित्याग:-

परिवार भारतीय समाज में एक संस्था है। मूल्य एवं संस्कारों की नींव परिवार द्वारा ही रखी जाती है। नैतिकता का पहला पाठ व्यक्ति परिवार में ही ग्रहण करता है। परन्तु आज परिवार अपने आदर्शों को, मूल्यों को, संस्कारों को छोड़ता जा रहा है। ‘राग-दरबारी’ उपन्यास में राजनीति की भूख पिता और बेटे के संबंधों का गला घोट देती है।

“तू नेता बनता है ? मेरा विरोध करके तू नेता बनना चाहता है ? तो देख अभी बताता हूँ?”

अपने पुत्र रुप्पन के लिए वैद्यजी का यह कथन राजनीति में उनकी मूल्यहीनता और अनैतिकता का उदाहरण है।

शिक्षा के क्षेत्र में अवमूल्यन : शिक्षा एक व्यक्ति के जीवन को आधार प्रदान करती है। मूल्य एवं संस्कारों का भी शिक्षा के माध्यम से ही संभव हो पाता है। परन्तु आज शिक्षा के क्षेत्र में भी मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। आज शिक्षा विद्यार्थियों में मूल्यों एवं संस्कारों की जगह मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता का विकास कर रही है।

“वर्तमान शिक्षा-पद्धति रास्ते में पड़ी हुई कुतिया है जिसे कोई भी लात मार सकता है।”

लेखक ने इस प्रकार के व्यंग्यों के माध्यम से आज के युग में शिक्षा के अवमूल्यन को उजागर किया है।

शिक्षित वर्ग में मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता :

समाज के विकास का दायित्व शिक्षित वर्ग पर होता है। परन्तु आज शिक्षित वर्ग ही मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता की मिसाल कायम कर रहा है। राग-दरबारी उपन्यास में शिक्षित वकील वर्ग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मूल्यों एवं संस्कारों को तिलांजलि दे देते हैं।

“नकल बाबू भी घर गिरिस्तीदार आदमी हैं। लड़कियाँ ब्याहनी हैं। इसलिए रेट बढ़ा दिया। मान जाओ और पाँच रुपये दे दो।”

कानून के रक्षक वकील द्वारा इस तरह के तर्क देकर लंगड़ को समझाना मूल्यहीनता को उजागर करता है।

कानून व्यवस्था में आदर्शहीनता :

भारत में कानून व्यवस्था की बड़ी ही दयनीय अवस्था है। थाने तो भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं। कानून केवल कुछ धनी व्यक्तियों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है। आज कानून में मूल्य या आदर्श जैसी कोई भावना नहीं है।

“अपने देश का कानून बहुत पक्का है, जैसा आदमी वैसी अदालत।”

इस प्रकार लेखक ने भारत में कानून व्यवस्था की आदर्शहीनता का सफल चित्रण किया है।

न्याय व्यवस्था में फैली मूल्यहीनता एवं अनैतिकता :

आज न्याय प्रणाली भी मूल्यहीनता एवं अनैतिकता से ग्रस्त है। जब कानून व्यवस्था ही विद्रूपताओं से घिरी हुई है तब न्याय व्यवस्था इससे अछूती कैसे रह सकती है।

“पंचायत अदालत का यह न्याय छोटेलाल जैसे आदमियों के लिए नहीं है। ये बड़े आदमी हैं। इतने बड़े पहलवान हमारी कॉलिज कमेटी के मेम्बर, वहाँ का न्याय तो देहाती ढोरों के लिए है। कौडिल्ला छाप न्याय।”

प्रिंसिपल के इन शब्दों में आज की संस्कारहीन, अनैतिक न्याय व्यवस्था का दिग्दर्शन होता है।

राजनीति में नैतिकता का पतन :

शिक्षा और कानून की तरह एक और संस्था का अवमूल्यन हुआ है और वह है राजनीति। राजनीति आज हिंसा, भ्रष्टाचार और स्वार्थ सिद्धि का अड्डा बन गई है। इसे चलाने वाले राजनेता भाषण देने के अतिरिक्त जनता को कुछ नहीं देते। आज वर्तमान समय में राजनीति में अवमूल्यन, नैतिकता की तिलांजलि ही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

“देखो दादा यह तो पालिटिक्स है। इसमें बड़ा-बड़ा कमीनापन चलता है।”

विद्रूपताओं से घिरी चुनाव व्यवस्था:

लेखक ने आज के भारत की चुनाव प्रक्रिया पर गहरा व्यंग्य किया है। ग्राम सभा के चुनाव हो, कॉलिज की प्रबन्ध समिति के हो या को-आपरेटिव सोसाइटी के, हर स्तर पर भ्रष्टाचार, धाँधले बाजी, हिंसा, मूल्यहीनता ही दिखाई पड़ती है। चुनाव होने से पहले ही उसके परिणाम सामने आ जाते हैं। दूसरे शब्दों में चुनाव के परिणाम को ध्यान में रखकर चुनाव लड़े जाते हैं। सिद्धांत, मूल्य एवं आदर्श सब बकवास है। सामान्य जन के लिए चुनाव मात्र दिखावा है। वास्तव में यह कुछ शक्तिसम्पन्न लोगों का खिलौना है।

“मैनेजिंग डायरेक्टर थे, हैं और रहेंगे।”

रुप्पन का यह कथन विद्रूपताओं से घिरी चुनाव व्यवस्था का दिग्दर्शन करता है।

पतनोन्मुख भविष्य का कर्णधार युवावर्ग :

आज का युवा कल के भविष्य का कर्णधार है। सामाजिक विकास में युवा का योगदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव कितने ही युवाओं का त्याग और बलिदान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से रचित है। परन्तु आधुनिक युग में युवाओं में इन भावनाओं का ह्रास हो रहा है। इसका मुख्य कारण है मूल्यहीनता, एवं संस्कारहीनता। साथ ही युवाओं में बढ़ती नशावृत्ति जिससे युवा निरंतर पतन की खाई में गिरता जा रहा है।

“वे जानते थे जितनी देर में एक गोल से दूसरे गोल तक एक ढेले बराबर गेंद के पीछे हाथ में स्टिक पकड़े हुए वे पागलों की तरह भागेंगे उतनी ही देर में वे ताड़ी का एक कच्चा घड़ा पी जाएंगे।”

इस प्रकार नशे में लिप्त युवा मूल्यहीन एवं संस्कारहीन होता जा रहा है तथा निरंतर पतन की खाई में गिरता जा रहा है।

समाज व्यवस्था में फैली विद्रूपता :

राग दरबारी उपन्यास में लेखक ने समाज व्यवस्था में फैली विद्रूपताओं को चित्रित किया है। सामाजिक पक्ष की इस कुरूपता का मुख्य कारण भी मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता है। धार्मिक अंधविश्वास, दहेज प्रथा, शारीरिक रूप से विकलांग के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण न जाने ऐसी कितनी ही सामाजिक समस्याओं को इस उपन्यास में उठाया गया है।

अपंगों के प्रति समाज के दृष्टिकोण को भी लेखक ने व्यंग्यात्मक रूप में व्यक्त किया है।

“अपंगों और अंगहीनों के लिए यही हमारा परम्परागत प्रेम है कि लंगड़े को लंगड़ कहा जाता है, अंधे को सूर, कान टूटे को टुट्टे, चेचक के दाग वाले को ‘छत्ता प्रसाद’ छः उंगलियों वाले को छंगा प्रसाद।”

विकलांग वर्ग के प्रति भारतीय समाज का यह दृष्टिकोण मूल्यहीनता एवं संस्कार हीनता का परिणाम है। विवाह समाज के विकास के लिए आवश्यक माना गया है परन्तु आज मूल्यों के पतन के कारण ही विवाह एक व्यापार बन कर रह गया है।

“लड़का आपका है जब चाहें ब्याह कर लें। पर आजकल हमारे दिन बुरे आ गए हैं, इसलिए मैं लड़के को सस्ते दामों पर बेचने के लिए तैयार नहीं हूँ।”

इस प्रकार लेखक ने मूल्यहीनता एवं संस्कारहीनता का ज्वलंत प्रश्न पाठक के समक्ष रखा है।

सहकारिता आंदोलन एवं ग्राम सभा संस्कारहीनता का अखाड़ा :

सहकारी संघों एवं ग्राम सभाओं में नैतिकता के पतन, मूल्यहीनता के कारण शक्तिसम्पन्न वर्ग निजी हितों को महत्त्व देता है। यही कारण है कि वैद्यजी सहकारी समिति को अपने घर की जायदाद समझते हैं जिसे मरने के बाद वे अपने पुत्रों को देना चाहते हैं।

“आशा की थी कि वृद्धावस्था शांति से बीतेगी। गाँव सभा का झगड़ा समाप्त कर चुका हूँ। सहकारी संस्था वह बद्री को दे चुका हूँ। सोचा था इस कालिज का भार तुझे देता जाऊँगा। देने के लिए इसके अतिरिक्त मेरे पास बचा ही क्या था? पर नीच! तू विश्वासघाती निकला। जा अब तुझे कुछ नहीं मिलेगा।”

इस प्रकार मूल्यों के पतन एवं संस्कारों के अभाव में उच्च वर्ग के लिए सहकारिता आंदोलन या ग्राम सभाओं का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। अपने स्वार्थों की पूर्ति एवं स्वहित की रक्षा करना ही उनका धर्म बन गया है।

शिक्षक वर्ग एवं साहित्यकारों में फैली मूल्यहीनता :

राग दरबारी उपन्यास में लेखक ने शिक्षक वर्ग एवं साहित्यकारों में फैली मूल्यहीनता को भी प्रदर्शित किया है। शिक्षक जिसे शिष्य के जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। आज केवल नाममात्र का मार्गदर्शक बन कर रह गया है। शिक्षा देना नहीं बल्कि अपने स्वार्थों की पूर्ति उसका प्रधान उद्देश्य बन गया है।

“कॉलेज को तो आप हमेशा ही छोड़े रहते हैं वह तो कॉलेज ही है जो आपको नहीं छोड़ता।”

इस प्रकार आज का शिक्षक वर्ग भी अपने मूल्यों का त्याग करके स्वहित को ही महत्त्व देता नजर आता है।

निष्कर्षत :

कहा जा सकता है कि आधुनिक युगीन भारत में मूल्यहीनता और संस्कारहीनता का बोलबाला है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ की बेदी पर मूल्यों की बलि चढ़ा रहा है। ‘राग-दरबारी’ उपन्यास में इस संस्कारहीनता के चित्रण करने के उद्देश्य में लेखक ने अथाह सफलता प्राप्त की है। इसके साथ ही लेखक ने पाठक का ध्यान एक ओर महत्त्वपूर्ण समस्या के प्रति मुखरित करने का प्रयास किया है। ‘भ्रष्टाचार’, लेखक अपने उद्देश्य में सफल भी रहा है क्योंकि इस उपन्यास के हर स्तर पर भ्रष्टाचार जैसी ज्वलंत समस्या को लेखक ने पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है।