सूरदास का जीवन परिचय | Surdas Ka Jivan Parichay
1 • सूरदास की भक्ति भावना
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• सूरदास के सगुण और निर्गुण ईश्वर संबंधी धारणा को स्पष्ट कीजिए।
• भ्रमरगीत सार में निर्गुण पर सगुण की विजय किस प्रकार चित्रित है?
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• भ्रमरगीत मूल उद्देश्य उपालंभ सौष्ठव।
सूरदास
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-
“सूरदास ही ब्रजभाषा के प्रथम कवि हैं और लीलागान का महान समुद्र ‘सूरसागर’ ही उसका प्रथम काव्य है।”
सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल 5, दिन मंगलवार, संवत् 1535 वि. को हुआ था। ये वल्लभाचार्य से 10 दिन ही छोटे थे।
सूरदास के जन्म-स्थान के संबंध में दो मत
(1) रुनकता (गुजरात) :- इस मत का समर्थन श्यामसुन्दरदास, रामचन्द्र शुक्ल तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया है।
(2) सीही (उ०प्र०) :-इस मत का समर्थन ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ साहित्य, डॉ. नगेन्द्र तथा गणपतिचन्द्र ने किया है।
वल्लभाचार्य ने सूरदास को भागवतलीला का वर्णन करने का उपदेश दिया-
“सूर सूरदास के जन्म-स्थान के संबंध में दो मतहै के विधियात काहे को है, कुछ भागवतलीला वर्णन करो।”
सूरदास द्वारा 25 ग्रंथ रचित बताए जाते हैं, जिनमें से केवल तीन ग्रंथ उपलब्ध हैं-
सूरसागर ,सूरसारावली ,साहित्य लहरी
सूरदास की रचनाओं का सर्वप्रथम संपादन कलकत्ता में सन 1841 ई. में ‘रागकल्पद्रुम’ नाम से हुआ।
सूरसागर
सूरदासकृत ‘सूरसागर’ का उपजीव्य ‘भागवत महापुराण’ का दशम स्कंध है।
सूरसागर में 4936 पद तथा 12 स्कंध हैं।
सूरदास ने सूरसागर में तीन भ्रमरगीतों की योजना की है।
प्रथम भ्रमरगीत (पद संख्या 4078 से 4710) ही मुख्य है। शेष दो भ्रमरगीत- (क) पद संख्या 4711–4712 (ख) पद संख्या 4713 कथात्मक हैं।
भ्रमरगीत का सर्वप्रथम एक पूर्ण प्रसंग के रूप में वर्णन श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 47वें अध्याय के 12 से 21 श्लोकों में मिलता है।
हिंदी साहित्य में ‘भ्रमरगीत’ काव्य-परंपरा का प्रवर्तन सूरदास ने किया।
सूरसागर के काव्य-रूप के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत
डॉ. चन्द्रबली पाण्डेय – लीला प्रबंधकाव्य या भाव प्रबंध काव्य
हजारीप्रसाद द्विवेदी – गीत काव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य
ब्रजेश्वर वर्मा – कृष्णचरित का महाकाव्य
सर्वसम्मति से – गेय मुक्तक काव्य
भ्रमरगीत
भ्रमरगीत में कुल 700 पद हैं।
प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने ‘भ्रमर’ के तीन रूप बताए हैं-
-कृष्ण का प्रतीक ,उद्धव का प्रतीक ,स्वतंत्र रूप में
भ्रमरगीत को उपालम्भ काव्य भी कहते हैं।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे ‘दृष्टिकाव्य’ कहा है।
सूरसारावली
सूरसारावली में 1107 छंद हैं।
इसकी रचना संसार को होली का रूपक मानकर की गई है।
साहित्य लहरी
‘साहित्य लहरी’ (1550 ई.) में अलंकार और नायिका-भेदों के उदाहरण प्रस्तुत करने वाले 118 दृष्टिकूट पद हैं।
सूरदास पर विद्वानों के कथन
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है–
“वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्र का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने बंद आँखों से किया, उतना किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का कोना-कोना वे झाँक आए।”
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने यह भी लिखा है-
“सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना। प्रसंगोद्भावना करने वाली ऐसी प्रतिभा हम तुलसी में नहीं पाते।”
शुक्लजी ने लिखा है-
“आचार्यों की छाप लगी हुई आठ वीणाएँ श्रीकृष्ण की प्रेमलीला का कीर्तन करने उठीं, जिनमें सबसे ऊँची, सुरीली और मधुर झंकार अंधे कवि सूरदास की वीणा की थी।”
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है–
“सूरदास जब अपने विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।”
सूरदास की मृत्यु पर विट्ठलनाथ का कथन
“पुष्टि मार्ग को जहाज जात है।
जाय कछु लेनौं होय सो लेउ॥”
भूमिका
हिन्दी काव्य जगत में सूरदास कृष्णभक्ति के अगाध एवं संत विचारधारा को प्रभावित करने वाले कवि माने जाते हैं। इनके काव्य का मुख्य विषय कृष्णभक्ति है। इन्होंने अपनी रचनाओं में राधा-कृष्ण की लीला के विभिन्न रूपों का चित्रण किया है। इनका काव्य ‘श्रीमद्भागवत’ से अत्यधिक प्रभावित रहा है। अपनी रचनाओं में सूरदास ने भावपक्ष को सर्वाधिक महत्त्व दिया है।
इनके काव्य में बाल-भाव एवं वात्सल्य-भाव की जिस अभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं, उनका उदाहरण विश्व-साहित्य में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। ‘भ्रमरगीत’ में इनके विरह-वर्णन की विलक्षणता भी दर्शनीय है।
- सूरदास के ‘भ्रमरगीत’ में गोपियों एवं उद्धव के संवाद के माध्यम से प्रेम, विरह, ज्ञान एवं भक्ति का जो अद्भुत भाव व्यक्त हुआ है, वह इनकी महान् काव्यात्मक प्रतिभा का परिचय देता है।
रचनाएँ – भक्त शिरोमणि सूरदास ने लगभग सवा-लाख पदों की रचना की थी। ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, काशी की खोज साक्ष्य के आधार पर सूरदास के ग्रन्थों की संख्या 25 मानी जाती है, किन्तु उनके 3 ग्रन्थ ही उपलब्ध रहे हैं –
(I) सूरसागर – यह प्रमाणिक कृति है, इनकी सवा लाख पदों में से केवल 8-10 हजार पद ही उपलब्ध हो पाए हैं। ‘रसपूर्ण’ ‘सूरसागर’ एक गीतिकाव्य है।
(II) सूरसारावली – यह ग्रन्थ विवादास्पद स्थिति में है, किन्तु कथावस्तु, भाषा-शैली व रचना की दृष्टि से यह सूरदास की प्रमाणिक रचना है। इसमें 1,107 छन्द हैं।
(III) साहित्यलहरी – इसमें सूरदास के 118 पदों का संग्रह है। इसमें मुख्य रूप से नायिकाओं एवं अलंकारों की विवेचना की गई है। कहीं-कहीं पर श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन हुआ है।
इसके अतिरिक्त ‘गोवर्धन-लीला’, ‘नाग-लीला’, ‘पद संग्रह’ एवं ‘सूर-पच्चीसी’ व ग्रन्थ भी प्रकाश में आए हैं।
• सूरसागर के बारे में आचार्य शुक्ल जी का कथन है कि – सूरसागर का सबसे मर्म स्पर्शी अंश भ्रमरगीत है, जिसमें गोपियों की वचन वक्रता अत्यंत मनौहारिणी है।
• सूरदास ने भ्रमरगीत के प्रतिपाद्य का प्रमुख अंश सगुण भक्ति की प्रतिष्ठा को ही अंकित किया है। सूरदास योग की उपेक्षा भक्ति के महत्व का अधिक प्रतिपादन करते हैं किन्तु वे योग को सर्वथा हीन दृष्टि से नहीं देखते। योग का मज़ाक उड़ाने से उनका तात्पर्य यही है कि भक्ति योग की उपेक्षा सहज साध्य है।
1 • सूर ने ज्ञान को निरस व भक्ति मार्ग को सरस बताया –
सूरदास ने ज्ञान मार्ग को संकीर्ण, कठिन और नीरस तथा भक्ति मार्ग को विशाल, सरल और सरस कहा है। भक्ति का मार्ग चौड़ा, निष्कंटक और सीधा है। इसमें गोपन, रहस्य या दुराव कहीं नहीं –
“काहे को रोकत मारग सूधौ। सुनहु मधुप!
निर्गुन कँटक ते राजपथ क्यौं कँथौ ॥”
2. निर्गुण ज्ञान की नीरस-सामान से तुलना –
गोपियाँ उद्धव के निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान को एक नीरस व्यापारी सौदा बताती हैं, जिससे खरीदने में दोनों का फायदा नहीं होता। गोपियाँ उद्धव को कहती हैं कि तुम अपना नीरस-सा सामान बेचकर हमसे ठगी कर रहे हो। हम अपने मन से कृष्ण को निकालकर योग को स्थान दें, यह संभव नहीं है।
“जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहैं।
यह ब्यौपार तिहारो उधो ऐसोइ फिरि जैहैं।।”
3.• भक्ति और सगुणोपासना की विजय –
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि यदि वे से निर्गुण ज्ञान की बात, कृष्ण को भूलकर ब्रह्म में लीन होने की बात किसी और से बात में कहते तो उनके लिए अच्छा न होता। क्योंकि गोपियाँ कृष्ण को अपना पति मानती हैं व शासकीय समाज में स्त्री के लिए अथवा पति ही सब कुछ होता है। उद्धव यहाँ गोपियों से व हार जाते हैं जिससे सूरदास ने निर्गुण पर सगुण की व विनय के रूप में लक्षित किया व अपनी सगुण व भक्ति मार्ग की सरसता व सरलता का एक बेहतरीन उदाहरण दिया।
जैसी कही हमारे सावत ही औखिन कहि पछिताते।
अपनो पति तजि और बतावत महीमनी कदु खातो।
4• प्रेम का पुरुषार्थ सबसे बड़ा / प्रेम की उच्चता का चित्रण –
सूरदास जी गोपियों के माध्यम से प्रेम के पुरुषार्थ को सबसे बड़ा बताते हैं। गोपियाँ उद्धव को अभागा मानती हैं क्योंकि उन्होंने जीवन में प्रेम रस का पान नहीं किया। जीवन में प्रेम सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। गोपियों पर उद्धव के ज्ञान व उपदेश का कोई असर नहीं होता व वे इसी से प्रश्न पूछ खड़ी होती हैं कि जिसने कृष्ण के समीप रह कर भी प्रेम करना नहीं सीखा, उसे प्रेम का क्या पता!
उधो तुम हो अति बड़भागी
अपरस रहत सनेह तगा तें, नाहिन मन अनुरागी
5• निराकार का खंडन, साकार का मंडन –
गोपियाँ जो कृष्ण का संदेश लेकर आए उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम यह बताओ कि जिस निर्गुण ब्रह्म को अपनाने कि तुम बात कर रहे हो वह किस देश का वासी है? उसके माता पिता कौन हैं? क्योंकि जिस कृष्ण से हम प्रेम करती हैं उसका निवास स्थान, माता-पिता का हमें पता है। गोपियाँ इस प्रकार के प्रश्न पूछकर उद्धव को चुप करा देती हैं जिससे पुनः उनके सगुण प्रेम की निर्गुण ज्ञान पर विजय होती है।
निर्गुन कौन देस के बासी?
मधुकर हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हाँसी ॥
उद्धव के परास्थ हो जाने से स्पष्ट रूप से सगुण भक्ति के सामने निराकार निर्गुण उपासना पद्धति और योग साधना को छोटा दिखाने का भाव है।
उद्धव गोपियों की वियोग की पीड़ा को कम करने हेतु उन्हें योग का मार्ग दिखाते हैं। परन्तु गोपियाँ उनके ब्रह्म के ज्ञान को चुनौती देती हैं। वे निर्गुण को फीका बताती हैं:-
“अलि क्या जोग में नीको। तजि रस रीति नंद नंदन की सिखवत निरगुन फीको ॥”
6.उद्धव ने बौद्धिक स्तर पर गोपियों को समझाने का प्रयत्न किया परन्तु वे असफल रहे। उद्धव ने सोचा कि ये गोपियाँ स्त्री हैं, इसलिए इन्हें मेरे ज्ञानमार्ग की थाह नहीं पा रही। गोपियाँ उद्धव को कहती हैं कि तुम बड़े मूर्ख हो कि यह भी नहीं जानते कि योग की बातें अबलाओं के लिए वर्जित हैं।
“अटपटी बात तिहारी ऊधौ, सुनौ बसौ ऐसी को है।
हम अहीर अबला सब मधुनगर, तिन्हें योग कैसे सोहै ॥”
निष्कर्ष :-
सूरदास ने अपने भ्रमरगीत की रचना करते समय अपनी उद्देश्य यह रखा है कि सगुण ब्रह्म की विजय की प्रतिष्ठा की जाए। इस कारण उन्होंने अनेक स्थलों पर ब्रह्म के समर्थन में जो अनेक तर्क दिए हैं पर निर्गुण ब्रह्म की ओर से तर्क प्रस्तुत नहीं किए। उद्धव को तो बोलने का अवसर ही अधिक नहीं दिया गया।
निर्गुण पर सगुण की विजय इस बात से भी व्यक्त होती है कि उद्धव-गोपी संवाद के समय उद्धव सिर झुकाकर अपनी हार स्वीकार कर लेते हैं। ‘सूरदास ने भ्रमरगीत में उद्धव द्वारा गोपियों के उपदेश दिलवाया है और उसका खंडन किया है।
महात्मा सूरदास ने पुष्टिमार्गी व प्रेमाभक्ति को ही अपनाया है। इसलिए उनके सूर-सागर के में प्रेम के विविध रूप — हास्य, वात्सल्य, माधुर्य, दाम्पत्य आदि की छटा विद्यमान है।

