त्यागपत्र उपन्यास में प्रमोद का चरित्र-चित्रण

Tyagpatra Upanyas Mein Pramod ka Charitra Chitran)

त्यागपत्र उपन्यास के आधार पर प्रमोद की चारित्रिक विशेषताएं

भूमिका

समादृत मनोवैज्ञानिक कथाकार-उपन्यासकार जैनेंद्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। सन् 1929 में उनका पहला उपन्यास ‘परख‘ प्रकाशित हुआ। ‘त्यागपत्र’ भारतीय उपन्यासों में सर्वाधिक भावविरेचनक उपन्यास है। जैनेंद्र का यह उपन्यास उनके बहुचर्चित व ‘सुनीता‘ के बाद लिखा गया। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, ललित निबंध, यात्रा साहित्य, बाल साहित्य आदि गद्य की विभिन्न विधाओं में योगदान किया है।
उनके कहानी लेखन का प्रारंभ प्रेमचंद युग में ही हुआ था लेकिन उनके विषय-वस्तु और पात्र प्रेमचंद से पर्याप्त भिन्न थे। जैनेंद्र को हिंदी गद्य में दर्शन, मनोविज्ञान, अध्यात्म और भाव-सिक्तन को कला चेतना के साथ संयुक्त करने का श्रेय दिया जाता है।
इनको पद्म भूषण साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है व दिल्ली व आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट् की उपाधि प्रदान की गई है।

उपन्यास


परख (1929)
सुनीता (1935)
त्याग-पत्र (1937)
सुखदा (1953)
मुक्तिबोध (1968)
कल्याणी (1939)


जैनेंद्र कुमार ने महात्मा गाँधी के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के असहयोग आंदोलन में भाग लिया था।
जैनेंद्र के पात्रों में शंका, उलझन दिखाई देती है कि स्त्रियों संबंधों की मर्यादा में रहते हुए भी स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाए रखना चाहती है जो निःसंदेह भारतीय परिवेश में आज भी यथार्थ नहीं है।
प्रमोद जैनेंद्र द्वारा रचित उपन्यास ‘त्यागपत्र’ का प्रमुख पात्र है। वह उपन्यास का कथा वाचक है। प्रमोद चीफ जस्टिस है। वह कथा का वाचक है। उपन्यास उसकी बुआ मृणाल के जीवन की त्रासदी पर आधारित है और प्रमोद इस त्रासदी का साक्षी और भागीदार दोनों है।
डॉ. जैनेंद्र प्रमोद के विषय में लिखते हैं;

प्रमोद मृणाल के बढ़ते हुए दर्द का तापमापक है।”

:- प्रमोद की चारित्रिक विशेषताएँ –


नन्ददुलारे वाजपेयी के शब्दों में

प्रमोद की उच्चाभिलाषा, उसकी सहानुभूति, आदर्शवादिता और जज्जी भी मृणाल की विद्रोही ज्वाला और ज्योति के समक्ष निष्प्राण और अर्थहीन है। मृणाल में समर्पण और बलिदान की पुकार है, प्रमोद में एक थोथे गौरव का वृथा संसार।”

1. स्नेह शील एवं संवेदनशील


प्रमोद बेहद संवेदनशील एवं अपनी बुआ के प्रति स्नेहशील है। वह अपनी बुआ की पीड़ा को भली-भाँति महसूस करता है। जब मृणाल के प्रेम प्रसंग के विषय में प्रमोद की माँ को पता चलता है तो वह मृणाल को बेंत से मार-मारकर बेहोश कर देती है। प्रमोद इस संवेदनशील संदर्भ को प्रस्तुत करते हुए कहता है-
मुझसे वहाँ थोड़ी देर रहना भी असह्य हो गया। मुझसे कुछ भी बोला नहीं गया। बुआ के गले लग कर वही थोड़ा रो लेता तो ठीक होता।”

2.अध्ययनशील:-


प्रमोद पढ़ने-लिखने में अत्यधिक रुचि रखता है। वह एक नामी वकील और उसके अपनी अध्ययनशील प्रवृत्ति के कारण ही वह समाज होता है। उसके जीवन की इन परिस्थितियों को लेखक ने इस प्रकार व्यक्त किया है,
“जिंदगी बढ़ती चली गई। बी.ए. का इम्तिहान नज़दीक था और मैं पोजीशन लाना चाहता था।”

3. सामाजिक मान्यताओं में बंधा:-


प्रमोद समाज की मान-मर्यादा और पद लालसा में बंधकर रह जाता है। वह मृणाल की सहायता करना चाहता है परंतु सामाजिक मान्यताओं एवं परिवार वालों की बंदिशे उसे ऐसा करने नहीं देती है।
वह चाहकर भी उन मान्यताओं को तोड़ नहीं सकता। वह कई बार सोचता है,
पर क्या करूँ? सोचता हूँ, उस समाज की नींव को कुरेदने से क्या हाथ आएगा? नींव ढीली ही होगी और ऐसा हाथ आने वाला कुछ नहीं है।”

4. आत्मचिंतन से ग्रसित –


प्रमोद चिंतनशील एवं द्वन्द्वग्रस्त प्राणी है। वह मृणाल की कठिन परिस्थितियों में उसका सहायक नहीं बन पाता। वह चाहता तो बुआ की सहायता कर सकता था व उसे समाज में पुनः प्रतिष्ठा दिला सकता था। प्रमोद के चरित्र की इस आत्मचिंतन की प्रवृत्ति को लेखक ने इन शब्दों में व्यक्त किया है,


मन में एक गाँठ सी पड़ती जाती थी। वह ना खुलती थी ना फूलती थी।”

5. उच्चाभिलाषी एवं आदर्शवादी –


प्रमोद उच्चाभिलाषी है। वह जीवन में धन, मान व पद हासिल करना चाहता है और पाकर रहता है। वह समाज और उसकी मर्यादाओं में बंधकर चलने में विश्वास रखता है। प्रमोद के शब्दों में,
“पति गृह को छोड़ यहाँ गंदे व्यभिचार में रहने वाली नारी पति धर्म की बात करती है और उसे सुना हुआ पाठ-लिखा मुझ जैसा समझदार युवक उस नारी को लांछित नहीं करता।”

6. दार्शनिक प्रवृत्ति-


प्रमोद जीवन और जगत की समस्याओं पर गहराई से विचार-विमर्श करता है। वह संसार की सत्यता और असत्यता के प्रश्नों पर गंभीरता से चिंतन करता है,
पूछता हूँ, मानव के जीवन की गति क्या अंधी है? वह अप्रतिरोध्य है पर अंधी है यह तो मैं नहीं मानूँगा।”

7. सामाजिक रूढ़ियों की अपेक्षा मानव मूल्यों में आस्था :-


प्रमोद सामाजिक रूढ़ियों के आलोचक एवं विरोधी के रूप में चित्रित हुआ है। जिस मृणाल को कुल कलंकिनी और व्यभिचारी मानकर परिवार के लोग भुला देते हैं, वह निरंतर उसकी चिंता करता है और उसके प्रति सहानुभूति भी रखता है। प्रमोद के मन में बुआ के आचरण के प्रति कोई कुंठा नहीं है, वह इस संताप से ग्रसित है कि वह बुआ की सहायता नहीं कर पाया।
वह कहता है, “इस सबका अब मैं क्या करूँ जब कि समय रहते प्रेम के तत्वदान से मैं चूक गया। यह सब मैल है जो मैंने बटोरा है।”

8. पश्चाताप से ग्रसित:-


प्रमोद पश्चाताप से ग्रसित है। जिस बुआ मृणाल के हर सुख-दुख का वह बचपन का साथी था उसी की स्थिति को उबारने के लिए वह कुछ न कर पाया। उसके पास धन, मान, पद सभी कुछ था फिर भी वह समाज की खोखली मर्यादाओं की सीमा लांघ नहीं सका। व इसी पश्चाताप से ग्रसित होकर अपने न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र दे देता है। वह कहता है,
बुआ तुम गई। तुम्हारे जीते जी मैं यह पर न आया। अब सुनो मैं यह जजी छोड़ता हूँ।”

निष्कर्ष:-


इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रमोद उपन्यास में एक गंभीर एवं चिंतनशील प्रवृत्ति वाला पात्र है जो जीवन और जगत के सत्य-असत्य के फेर में उलझा रहता है। वह अपनी बुआ और बचपन की साथी मृणाल के प्रति संवेदनशील तो है परंतु समय आने पर उसकी सहायता नहीं कर पाता। वह सामाजिक मान-मर्यादाओं के बंधन में फंसकर स्वयं कभी इसके लिए ज़ोर नहीं दे पाता, क्योंकि वह दुविधा में पड़ा रहता है। मृणाल की अंतिम अवस्था उसे आंदोलित कर देती है और वह अपने जजी के पद से त्यागपत्र देकर प्रायश्चित करता है।